2 अंकीय प्रश्न उत्तर -संविधान का निर्माण – Class12th History Chapter 15

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर
Index

Class 12th Geography

1. मानव भूगोल

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2. विश्व जनसँख्या

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. जनसँख्या संघटन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. मानव विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

5. प्राथमिक क्रियाएं

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

6. द्वितीयक क्रियाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. तृतीयक तथा चतुर्थक क्रियाकलाप

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. परिवहन एवं संचार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

9. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 15 Important Question Answer 2 Marks संविधान का निर्माण(एक नए युग की शुरुआत)

प्रश्न 1. उद्देश्य प्रस्ताव में किन आदर्शों पर जोर दिया गया था ?

अथवा

जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश किए गए ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ में व्यक्त उन आदर्शों की व्याख्या कीजिए जिनको भारत के संविधान निर्माण के समय ध्यान में रखा जाना था।
उत्तर : उद्देश्य प्रस्ताव में निम्नलिखित आदर्शों पर जोर दिया गया-(i) भारत एक स्वतंत्र प्रभुसत्ता-संपन्न गणतत्र है।
(ii) भारत राज्यों का एक संघ होगा, जिसमें ब्रिटेन के अधीन रहे भारतीय क्षेत्र, भारतीय राज्य तथा भारत-संघ में सम्मिलित होने की इच्छा रखने वाले अन्य राज्य सम्मिलित होंगे।
(iii) भारत संघ के क्षेत्र में स्वायत्त इकाइयाँ होंगी।
(iv) प्रभुसत्ता संपन्न स्वतंत्र भारत संघ तथा इसके अंग्रेजों को सभी अधिकार तथा शक्तियाँ जनता से प्राप्त होंगी ।
(v)सभी भारतीयों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय तथा समानता प्राप्त होगी। सभी को धर्म, विचार, अभिव्यक्ति, उपासना, व्यवसाय आदि की मौलिक स्वतंत्रता होगी।
(vi) अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों एवं कबीलों को पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
(vii) गणतंत्र की क्षेत्रीय अखंडता और इसके प्रभुसत्ता संबंधी सभी अधिकारों को सभ्य राष्ट्रों के नियमों तथा न्याय के अनुसार बनाए रखा जाएगा।
(viii) भारत राज्य विश्वशांति तथा मानव-कल्याण को बढ़ावा देने में अपना पूरा योगदान देगा।

प्रश्न 2. विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे ?
उत्तर : विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द अपने-अपने ढंग से परिभाषित कर रहे थे।
(i) मद्रास के बी. पोकर बहादुर के अनुसार अल्पसंख्यक सब जगह होते हैं और चाहने पर भी उन्हें हटाया नहीं जा सकता, इसलिए उनके हितों की रक्षा के लिए पृथक निर्वाचिका को बनाए रखना चाहिए। उनका कहना था कि मुसलमानों की जरूरतों को गैर-मुसलमान अच्छी तरह नहीं समझ सकते। न ही अन्य समुदायों के लोग मुसलमानों का कोई सही प्रतिनिधि चुन सकते हैं।
(ii) एन.जी. रंगा जो किसान आंदोलन के नेता और समाजवादी विचारों वाले थे, के अनुसार अल्पसंख्यक शब्द की परिभाषा आर्थिक स्तर पर की जानी चाहिए। उनके अनुसार अल्पसंख्यक वास्तव में ‘गरीब’ और दबे-कुचले लोग हैं। उन्होंने आदिवासियों को भी अल्पसंख्यकों में गिनाया था।
(iii) आदिवासी सदस्य जयपाल सिंह के अनुसार असली अल्पसंख्यक आदिवासी लोग हैं जिन्हें पिछले 6000 वर्षों से अपमानित किया जा रहा है, अपेक्षित किया जा रहा है । उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है।
(iv) दमित जातियों के नेताओं के अनुसार असली अल्पसंख्यक लोग वे ही हैं जो चाहे गिनती में कम नहीं हैं, परन्तु समाज के अन्य वर्गों का उनके साथ व्यवहार बहुत गलत रहा है। ऐसे नेताओं की आवाज को सुना जाए और अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए।

प्रश्न 3. प्रांतों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए ?
उत्तर : प्रांतों (राज्यों) के अधिकारों का सबसे शक्तिशाली समर्थन मद्रास के सदस्य के संतनम ने किया।
(i) उन्होंने कहा कि न केवल राज्यों को बल्कि केन्द्र को मजबूत बनाने के लिए भी शक्तियों का पुनर्वितरण आवश्यक है। “यह तर्क एक जिद-सी बन गया है कि सभी शक्तियाँ केन्द्र को सौंप देने से वह मजबूत हो जाएगा।” संतनम ने कहा कि यह गलतफहमी है। यदि केन्द्र के पास आवश्यकता से अधिक जिम्मेदारियाँ होंगी तो वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा। उसके कुछ दायित्वों को राज्यां को सौंप देने से केन्द्र अधिक मजबूत हो सकता है।
(ii) संतनम का मानना था कि शक्तियों का वर्तमान वितरण राज्य को पंगु बना देगा। राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देगा क्योंकि भू-राजस्व को छोड़कर अधिकांश पर केन्द्र सरकार के अधिकार में हैं। पैसे के बिना राज्यों में विकास परियोजनाएँ नहीं चल सकतीं। “मैं ऐसा संविधान नहीं चाहता जिसमें राज्य को केन्द्र से यह कहना पड़े कि “मैं लोगों की शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकता। मैं उन्हें साफ-सफाई नहीं दे सकता। मुझे सड़कों में सुधार तथा उद्योगों की स्थापना के लिए भीख दे दीजिए। अच्छा तो यही होगा कि हम संघीय व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दें और एकात्मक व्यवस्था (यूनिटरी सिस्टम) स्थापित करें।”
(iii) संतनम ने कहा कि यदि पर्याप्त जाँच-पड़ताल किए बिना शक्तियों का प्रस्तावित वितरण लागू कर दिया गया तो हमारा भविष्य अंधकार में पड़ जाएगा। इस स्थिति में कुछ ही सालों में सभी प्रांत “केन्द्र के विरुद्ध” उठ खड़े होंगे।

प्रश्च 4. महात्मा गाँधी क्यों सोचते थे कि हिंदुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए ?
उत्तर : तीस के दशक तक कांग्रेस ने यह मान लिया था कि हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए। महात्मा गाँधी का मानना था कि हमें एक ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें। हिन्दुस्तानी हिन्दी और उर्दू के मेल से बनी भारतीय जनता के बहुत बड़े भाग की भाषा थी। यह एक साझी भाषा थी जो विविध संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई थी। समय के साथ-साथ बहुत तरह के स्रोतों से नए-नए शब्द और अर्थ इसमें समाते गए और विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग इसे समझने लगे। महात्मा गाँधी को लगता था कि वह बहुसांस्कृतिक भाषा विविध समुदायों के बीच संचार की आदर्श भाषा बन सकती है। उनका मानना था कि यह हिंदुओं और मुसलमानों के साथ-साथ उत्तर और दक्षिण के लोगों को भी एकजुट कर सकती है।
लेकिन उन्नीसवीं सदी के अंत से एक भाषा के रूप में हिन्दुस्तानी धीरे-धीरे बदल रही थी। हिन्दी और उर्दू एक – दूसरे से दूर जा रही थीं। परिणाम यह हुआ कि भाषा धार्मिक पहचान की राजनीति का भाग बन गई परन्तु हिन्दुस्तानी के साझा चरित्र में महात्मा गाँधी की आस्था कम नहीं हुई।

प्रश्न 5. वे कौन-सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया ?
उत्तर : संविधान सभा उन लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति कर रही थी जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लिया था। लोकतंत्र, समानता तथा न्याय जैसे आदर्श उन्नीसवीं शताब्दी से ही भारत में सामाजिक संघर्षों के साथ गहरे रूप से जुड़ चुके थे :(i) जब उन्नीसवीं शताब्दी में समाज-सुधारकों ने बाल-विवाह का विरोध किया तथा विधवा-विवाह का समर्थन किया तो वे सामाजिक न्याय का ही समर्थन कर रहे थे।
(ii) जब विवेकानन्द ने हिंदू धर्म में सुधार के लिए अभियान चलाया तो वह धर्मों को और अधिक न्यायसंगत बनाने का ही प्रयास कर रहे थे। जब महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले ने दमित जातियों के उत्पीड़न का प्रश्न उठाया अथवा कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों ने मजदूरों एवं किसानों को एकजुट किया तो वे भी आर्थिक और सामाजिक न्याय के लिए ही संघर्ष कर रहे थे।
एक दमनकारी और अवैध सरकार के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन निश्चित रूप से लोकतंत्र एवं न्याय नागरिकों के अधिकारों और समानता का संघर्ष भी था।

प्रश्न 6. दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए ।

अथवा

भारतीय संविधान बनाते समय दलित जातियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए विभिन्न लोगों द्वारा दिए गए विभिन्न तर्कों की परख कीजिए।
उत्तर : दलित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए दावे : (i) राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान अंबेडकर ने दलित जातियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की माँग की थी जिसका विरोध महात्मा गाँधी ने यह कहकर किया कि ऐसा करने से दलित समुदाय सदा के लिए शेष समाज से कट जाएगा।
(ii) संविधान सभा के दलित वर्गों के सदस्यों का यह कहना था कि समाज ने उनकी सेवाओं और श्रम का इस्तेमाल तो किया है परन्तु उन्हें अपने से दूर रखा है। अन्य जातियों के लोग उनसे घुलने-मिलने में कतराते हैं। उनके साथ खाना नहीं खाते और उन्हें मंदिरों में नहीं जाने देते।
(iii) इस संबंध में मद्रास के जे. नागप्पा का कहना था, “हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं पर अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं। हमें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो गया हैं हमें मालूम है कि अपनी बात कैसे मनवानी है। नागप्पा ने आगे कहा कि संख्या की दृष्टि से हरिजन अल्पसंख्यक नहीं हैं। आबादी में उनका हिस्सा 20-25 प्रतिशत है। उनकी पीड़ा का कारण यह है कि उन्हें बाकायदा समाज व राजनीति के हाशिए पर रखा गया है। उसका कारण उनकी संख्यात्मक महत्त्वहीनता नहीं है। उनके पास न तो शिखा तक पहुँच थी और न ही शासन में हिस्सेदारी।
(iv) मध्य प्रांत के श्री के.जे. खाण्डेलकर ने दमित जाति से होने वाले अन्याय के बारे में कुछ इस प्रकार कहा : “हमें हजारों साल तक दबाया गया है। दबाया गया …. इस हद तक दबाया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती और अब हमारा हृदय भी भावशून्य हो चुका है। न ही हम आगे बढ़ने के लायक रह गए हैं। यही हमारी स्थिति है।”
(v) बँटवारे में होने वाली हिंसा को देखकर अम्बेडकर ने पृथक निर्वाचन क्षेत्र वाली अपनी माँग को छोड़ दिया।
(vi) परन्तु दमित वर्ग के सदस्यों की माँगों को उचित ठहराते हुए संविधान सभा ने यह सुझाव दिया, पहले यह कि अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए; दूसरे हिंदू मन्दिरों को सभी के लिये खोल दिया जाए; तीसरे, निचली जातियों को विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए।
(vii) कुछ सदस्यों का यह मानना था कि इन कदमों से भी सारी समस्याएँ हल नहीं हो पायेंगी। सामाजिक भेदभाव को केवल संवैधानिक कानून पास करके ही हल नहीं किया जा सकता। इसके लिये समाज की सोच में बदलाव लाना होगा।
इन सभी सुझावों का केवल संविधान सभा के सदस्यों ने ही स्वागत किया परन्तु जनसाधारण ने भी इन सुझावों का अनुमोदन किया।

प्रश्न 7. संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय का राजनीतिक परिस्थिति और एक मजबूत केंद्र सरकार का जरूरत के बीच क्या संबंध देखा ?

अथवा

स्पष्ट कीजिए कि संविधान सभा की बहसों में अनेक नेताओं ने शक्तिशाली केंद्र की माँग क्यों की थीं ? अंततः विधान बनाने के अधिकारों का विभाजन किस प्रकार किया गया ?

अथवा

संविधान सभा के कुछ सदस्य केंद्र को मजबूत बनाने के लिए समस्त शक्तियाँ केंद्र को क्यों देना चाहते थे ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति और एक मजबूत केन्द्र सरकार की जरूरत के बीच निम्न संबंधों की पहचान की : (i) जगह-जगह सड़कों पर होने वाली हिंसा से चिंतित सदस्यों ने बार-बार यह कहा कि केन्द्र की शक्तियों में भारी इजाफा होना चाहिए अन्यथा देश टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा।
(ii)बी.आर. अम्बेडकर ने भी इस बात की घोषणा की कि वे एक शक्तिशाली और एकीकृत केन्द्र चाहते हैं।
(iii) प्रांतों के लिए अधिक शक्तियों की माँग का जवाब देते हुए गोपाल-स्वामी अय्यर ने जोरदार शब्दों में कहा कि केन्द्र ज्यादा से ज्यादा मजबूत होना चाहिए।
(iv) बँटवारे से पहले कांग्रेस के सदस्यों ने मुस्लिम लीग की शंकाओं को दूर करने के लिए प्रांतों को काफी स्वायत्तता देने पर अपनी सहमति प्रकट की थी। परन्तु बँटवारे को देखने के बाद अधिकतर राष्ट्रवादियों की राय बदल चुकी थी। उनका कहना था कि अब विकेन्द्रीकरण के लिए कोई औचित्य नहीं है और न कोई पहले जैसा दबाव है।
(v) अब विभाजन के कारण पैदा होने वाली अफरा-तफरी पर अंकुश लगाने और समूचे देश के आर्थिक विकास के लिए केन्द्रीयवाद को जरूरी माना जाने लगा।
(vi) संयुक्त प्रांत के सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने विश्वास से इस बात पर बल दिया कि शक्तिशाली केन्द्र का होना जरूरी है ताकि वे सारे देश के हित में योजनाएँ बना सके, उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटा सके, एक उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सकें और देश को विदेशी आक्रमण से बचा सकें।

प्रश्न 8. संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला ?

अथवा

भारत में भाषा संबंधी कौन-कौन से विवाद थे ?संविधान सभा द्वारा किस प्रकार इस विवाद का समाधान किया गया ?
उत्तर : संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर कई महीनों तक वाद-विवाद होता रहा और कई बार काफी तनातनी भी पैदा हो गई।
(i) महात्मा गाँधी के अनुसार ऐसी भाषा हिन्दुस्तानी भाषा ही हो सकती है जो हिन्दी और उर्दू के मेल से बनी है, जों अनेक संस्कृतियों के आदान-प्रदान से एक सांझी भाषा बन चुकी है, जिसमें समय के साथ-साथ अनेक प्रांतों से नए-नए शब्द समाते रहे है। उनके अनुसार यही हिन्दुस्तानी भाषा उत्तर और दक्षिण एवं हिन्दू और मुसलमानों को एक-जुट करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
(ii) परन्तु 19वीं शताब्दी के अन्त में हिन्दुस्तानी का स्वरूप साम्प्रदायिक टकराव के कारण बदलता जा रहा था। एक तरफ कुछ लोगों ने फारसी और अरबी के शब्दों को मिलाकर हिन्दी को सांस्कृतिक बनाने का प्रयत्न किया और दूसरी तरफ कुछ अन्य लोगों ने उर्दू में फारसी और अरबी के शब्द मिलाकर उसे फारसीनिष्ठ बना दिया था। इस प्रकार हिन्दुस्तानी धार्मिक पहचान की राजनीति का एक हिस्सा-मात्र बनकर रह गई।
(iii) स्वतंत्रता के पश्चात् संविधान सभा के बहुत से सदस्य हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के पक्ष में हो गए। संयुक्त प्रान्त के कांग्रेसी नेता आर.वी. धुलेकर की भाँति बहुदल से सदस्य हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने पर जोर देने लगे परन्तु जब कुछ सदस्यों ने यह कहा कि विधान सभा के सभी सदस्य हिन्दी नहीं जानते तो घुलेकर ने पलटकर कहा, “इस सदन में जो लोग भारत का संविधान रचने बैठे हैं और हिन्दी नहीं जानते वे इस सभा की सदस्यता के पात्र नहीं है उन्हें चले जाना चाहिये।” इस प्रकार भाषा के प्रश्न पर काफी वाद-विवाद उठ खड़ा हुआ।
(iv) हिन्दी के समर्थकों और विरोधियों के बीच पैदा हो गए गतिरोध को देखते हुए संविधान सभा की भाषा समिति ने एक फार्मूला विकसित कर लिया था। उसने निम्नलिखित सुझाव दिये :(क) उसने हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के स्थान पर राजकीय भाषा का पद देना स्वीकार किया। ऐसा करके उसने विभिन्न पक्षों को शांत करने का प्रयत्न किया।
(ख) हिन्दी को राष्ट्रभाषा यदि बनाना है तो धीरे-धीरे आगे बढ़ना होगा। पहले 15 साल तक सरकारी कामों में अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा।
(ग) प्रत्येक प्रांत में अपने कार्यों के लिये एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा। बहुत से सदस्यों का यह मानना था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये आक्रमक रुख नहीं अपनाना चाहिये अन्यथा कुछ लोगों में गहरी कड़वाहट रह जायेगी। उदाहरण के तौर पर मद्रास के श्री टी.ए. रामलिंगम चेट्टियार ने यह सुझाव दिया कि “जो कुछ भी किया जाए, एहतियात के साथ किया जाए यदि आक्रामक होकर काम किया गया तो हिन्दी का कोई भला नहीं हो जाएगा अन्यथा लोगों में बड़ी कड़वाहट रह जायेगी।”

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