8 अंकीय प्रश्न उत्तर -संविधान का निर्माण – Class12th History Chapter 15

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 15 Important Question Answer 8 Marks संविधान का निर्माण(एक नए युग की शुरुआत)

प्रश्न 1. पृथक निर्वाचिका की समस्या संविधान सभा के सामने एक बहुत ही जटिल समस्या थी। इस प्रश्न पर हुए वाद-विवाद की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर : पृथक निर्वाचिका से अभिप्राय ऐसे चुनाव क्षेत्र से है जहाँ से केवल किसी विशेष समुदाय का व्यक्ति ही चुना जा सकता है। इसकी व्यवस्था सबसे पहले 1909 में ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों के लिए की थी। संविधान निर्माण के दौरान इस पर जोरदार बहस हुई।
पृथक निर्वाचिका का समर्थन : 27 अगस्त, 1947 को मद्रास के बी. पोकर बहादुर ने अपने भाषण द्वारा पृथक निर्वाचिका को बनाए रखने का जोरदार समर्थन किया। बहादुर ने कहा कि अल्पसंख्यक हर जगह होते हैं। उन्हें हम चाहकर भी नहीं हटा सकते। हमें आवश्यकता एक ऐसे राजनीतिक ढाँचे की है जिसके अंतर्गत अल्पसंख्यक भी औरों के साथ सद्भाव के साथ रह सकें और समुदायों के बीच मतभेद कम-से-कम हों। इसके लिए आवश्यक है कि राजनीतिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों का पूरा प्रतिनिधित्व प्राप्त हो और उनके विचारों पर ध्यान दिया जाए। देश के शासन. में मुसलमानों की एक सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पृथक निर्वाचिका के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं हो सकता। बहादुर का मानना था कि मुसलमानों के हितों को गैर-मुसलमान पूरी तरह नहीं समझ सकते । न ही अन्य समुदायों के लोग मुसलमानों का कोई उचित प्रतिनिधि चुन सकते हैं।
पृथक निर्वाचिका का विरोध : पृथक निर्वाचिका के पक्ष में दिए गए इस तर्क से अधिकतर राष्ट्रवादी सदस्य भड़क गए।
(i) उनका मानना था कि पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था लोगों को बाँटने के लिए अंग्रेजों की चाल थी। आर. वी. धुलेकर ने बहादुर को संबोधित करते हुए कहा, “अंग्रेजों ने संरक्षण के नाम पर अपना खेल खेला। इसकी आड़ में उन्होंने अल्पसंख्यकों को फुसला लिया है। अब इस आदत को छोड़ दो… अब कोई तुम्हें बहकाने वाला नहीं है।
(ii) विभाजन के कारण तो राष्ट्रवादी नेता पृथक निर्वाचिका के प्रस्ताव पर और भी भड़क उठे थे। उन्हें लगता था कि इससे निरंतर गृह-युद्ध दंगों और हिंसा की भूमिका तैयार होगी। सरदार पटेल ने कहा था कि पृथक निर्वाचिका एक ऐसा “विष है जो हमारे दरेश की पूरी राजनीति में समा चुका है।” उनके अनुसार यह एक ऐसी माँग थी जिसने एक समुदाय को दूसरे समुदाय से । भिड़ा दिया, राष्ट्र के टुकड़े कर दिए, रक्तपात को जन्म दिया और देश का विभाजन कर दिया। पटेल ने कहा, क्या तुम इस देश में शांति चाहते हो ? यदि चाहते हो तो पृथक निर्वाचिका को तुरंत छोड़ दो।”
(ii) पृथक निर्वाचिकाओं का विरोध करते हुए गोविंद वल्लभ पंत ने कहा कि यह प्रस्ताव न केवल राष्ट्र के लिए बल्कि स्वयं अल्पसंख्यकों के लिए भी खतरनाक है। वह बहादुर के इस विचार से तो सहमत थे कि किसी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समाज के विभिन्न वर्गों में कहाँ तक आत्मविश्वास पैदा कर पाता है। उन्हें इस तर्क पर भी कोई आपत्ति नहीं थी कि एक स्वतंत्र देश में प्रत्येक नागरिक के साथ ऐसा आचरण किया जाना चाहिए जिससे “न केवल उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो बल्कि उसमें स्वाभिमान भाव भी पैदा हो।” वह मानते थे कि बहुसंख्यक-बहुल समुदाय का यह दायित्व है कि वह अल्पसंख्यकों की समस्याओं को समझे और उनकी आकांक्षाओं को महसूस करे इसके बावजूद पंत पृथक निर्वाचिका का विरोध कर रहे थे। उनका मानना था कि यह एक आत्मघाती माँग है जो अल्पसंख्यकों को स्थायी रूप से अलग-थलग कर देगी, उन्हें कमजोर बना देगी और शासन में उन्हें प्रभावशाली भागीदारी नहीं मिल पाएगी।
सभी मुसलमान भी पृथक निर्वाचिका के पक्ष में नहीं थे । उदाहरण के लिए, बेगम ऐजाज रसूल को लगता था कि पृथक निर्वाचिका आत्मघाती सिद्ध होगी क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जाएँगे। 1949 तक संविधान सभा के अधिकांश सदस्य इस बात पर सहमत हो गए थे कि पृथक निर्वाचिका का प्रस्ताव अल्पसंयकों के हितों के विरुद्ध है। इसकी बजाय मुसलमानों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि राजनीतिक व्यवस्था में उन्हें एक निर्णायक आवाज मिल सके।

प्रश्न 2. भारतीय संविधान के निर्माण में प्रमुख ‘छह’ व्यक्तियों के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर : भारतीय संविधान के निर्माण में प्रमुख छह व्यक्तियों के योगदान का वर्णन :(i) संविधान सभा में कुल तीन सौ सदस्य थे। इनमें से छह सदस्यों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण दिखाई देती है। इन छह में से तीन-जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल और राजेन्द्र प्रसाद-कांग्रेस के सदस्य थे। “ऐतिहासिक उद्देश्य” प्रस्ताव नेहरू ने पेश किया था। यह प्रस्ताव भी उन्होंने ही पेश किया था कि भारत का राष्ट्रीय ध्वज “केसरिया, सफेद और गहरे हरे रंग की तीन बराबर चौड़ाई वाली पट्टियों का तिरंगा'” झंडा होगा जिसके बीच में नीले रंग का चक्र होगा।
(ii) सरदार वल्लभ भाई पटेल मुख्य रूप से परदे के पीछे कई महत्त्वपूर्ण काम कर रहे थे। उन्होंने कई रिपोर्टों के प्रारूप लिखे, कई परस्पर विरोधी विचारों के बीच सहमति पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की ।
(iii) राजेन्द्र प्रसाद : वह संविधान सभा के अध्यक्ष थे। उन्हें न केवल चर्चा की रचनात्मक दिशा में ले जाना था बल्कि इस बात का ख्याल भी रखना था कि सभी सदस्यों को अपनी बात कहने का अवसर भी मिले।
(iv) बी.आर.अंबेडकर : वह प्रख्यात विधिवेत्ता और अर्थशास्त्री थे। वह सभा के सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे। उन्होंने संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनके साथ दो अन्य वकील काम कर रहे थे।
(v) के. एम. मुंशी तथा अल्लादि कृष्णा अय्यर स्वामी : ये दोनों सभा सदस्य प्रसाद समिति में डा. अम्बेडकर के साथ कार्य करते रहे। मुंशी गुजरात से थे तथा अय्यर मद्रास से थे। दोनों ने ही संविधान के प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए।
निष्कर्ष तथा उपयोगी टिप्पणी : उपर्युक्त छह सदस्यों को दो प्रशासनिक अधिकारी भी महत्त्वपूर्ण सहायता दे रहे थे। इनमें से एक बी. एन. राव थे। वह भारत सरकार के संवैधानिक सलाहकार थे और उन्होंने अन्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन करके कई चर्चा पत्र तैयार किए थे। दूसरे, अधिकारी एस. एन. मुखर्जी थे । मुख्य योजनाकार मुखर्जी के बारे में अंबेडकर ने कहा था कि “बेहद जटिल प्रस्तावों को भी सरलतम और स्पष्टतम कानूनी रूप में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता का विरले ही कोई मुकाबला कर पाएगा।”

प्रश्न 3. संविधान निर्माण से पहले के साल काफी उथल-पुथल वाले थे। इस कथन के समर्थन में उदाहरण (तर्क) दीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि संविधान निर्माण से पहले के साल काफी उथल-पुथल वाले थे इस संबंध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं
(i) 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया, परन्तु इसके साथ ही इसे विभाजित भी कर दिया गया।
(ii) लोगों की याद में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन अभी भी जीवित था जो ब्रिटिश राज के विरुद्ध संभवत: सबसे व्यापक जनांदोलन था।
(iii) विदेशी सहायता से सशस्त्र संघर्ष द्वारा स्वतंत्रता पाने के लिए सुभाषचंद्र बोस द्वारा किए गए प्रयास भी लोगों को याद थे।
(iv) 1946 के वसंत में बंबई में तथा अन्य शहरों में रॉयल इंडियन नेवी (शाही भारतीय नौसेना) के सिपाहियों का विद्रोह भी लोगों को बार-बार आंदोलित कर रहा था। लोगों की सहानुभूति इन सिपाहियों के साथ थी।
(v) चालीस के दशक के अंतिम वर्षों में देश के विभिन्न भागों में मजदूरों और किसानों के आंदोलन भी हो रहे थे। हिन्दू मुस्लिम एकता इन जनांदोलनों का एक महत्त्वपूर्ण पहलू था। इसके विपरीत कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल धार्मिक सद्भावना और सामाजिक तालमेल स्थापित करने में सफल नहीं हो पा रहे थे।
(vi) अगस्त, 1946 में कलकत्ता में हिंसा भड़क उठी। इसके साथ ही उत्तरी तथा पूर्वी भारत में लगभग साल भर तक चलने वाले दंगे-फसाद और हत्याओं का दौर आरंभ हो गया था। हिंसा के इस दौर में भीषण जनसंहार हुए।
(vii) इसके साथ ही देश-विभोजन की घोषणा हुई और असंख्य लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे।
(viii) 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता दिवस पर आनंद और उम्मीद का वातावरण था परन्तु भारत के बहुत-से मुसलमानों और पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं तथा सिखों के लिए यह एक निर्मम क्षण था। उन्हें मृत्यु अथवा पीढ़ियों पुरानी जड़ों से उखड़ जाने के बीच चुनाव करना था। करोड़ों शरणार्थी यहाँ से वहाँ जा रहे थे। मुसलमान पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान की ओर तो हिन्दू और सिख पश्चिमी बंगाल तथा पूर्वी पंजाब की ओर बढ़ रहे थे। उनमें से बहुत-से लोग रास्ते में ही दम तोड़ गए।
(ix) नवजात राष्ट्र के सामने इतनी ही गंभीर समस्या देशी रियासतों को लेकर थी। ब्रिटिश राज के दौरान उपमहाद्वीप का लगभग एक-तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों और रजवाड़ों के अधीन था जिन्होंने ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर ली थी। उनके पास अपने राज्यों को अपनी इच्छा से चलाने की सीमित परन्तु काफी आजादी थी।

प्रश्न 4. भारतीय संविधान के निर्माण को प्रभावित करने वाले विषयों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर : भारतीय संविधान के निर्माण को अनेक विषयों अथवा मुद्दों ने प्रभावित किया। ये विषय ऐसे थे जिन्हें स्थान दिए बिना वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना नहीं की जा सकती थी। इनमें से कुछ मुख्य विषय निम्नलिखित थे : (i) राजनीतिक समानता तथा सामाजिक-आर्थिक न्याय : सभी को समान रूप से मतदान का अधिकार देना राजनीतिक समानता का प्रतीक था परन्तु सामाजिक-आर्थिक न्याय के बिना राजनीतिक समानता अधूरी थी। अतः सामाजिक एवं आर्थिक भेदभाव (अंतर) को समाप्त करना आवश्यक था।
(ii) पिछड़े वर्गों और अछूतों के विषय : पिछड़े वर्गों तथा अछूतों के उद्धार के लिए उन्हें विशेष संरक्षण देना आवश्यक था। आदिवासियों की भी यही स्थिति थी।
(iii) केन्द्रीय संघ : देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए केन्द्रीय संघ की स्थापना को कार्यरूप दिया गया। यह संघ भिन्नता में एकता का प्रतीक था।
(iv) पृथक निवाचिका : अल्पसंख्यकों तथा पिछड़े वर्गों द्वारा पृथक् निर्वाचिका की माँग की जा रही थी ताकि उन्हें विधानमंडल में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। परन्तु इससे राज्य के प्रति निष्ठा के विभाजित होने का खतरा था। अतः इस विचारको अस्वीकार कर दिया गया और इसका हल आरक्षित सीटों के रूप में ढूँढा गया।
(v) अन्य विषय : (i) संविधान के अनुसार भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य हो।
(ii) राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर हो।
(iii) हिन्दी राजकीय भाषा होगी। परन्तु सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा।

प्रश्न 5. भारत की संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर काफी बहस हुई। सभा के सदस्यों द्वारा इस विषय पर दी गई दलीलों की परख कीजिए।
उत्तर : भारत की संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर बहस और सभा के सदस्यों द्वारा इस विषय पर दी गई दलीलें:(i) भारत प्रारंभ से ही एक बहुल भाषा-भाषी देश है। देश के विभिन्न प्रांतों और हिस्सों में लोग अलग-अलग भाषाओं का प्रयोग करते हैं, बोलियाँ बोलते हैं। जिस समय संविधान सभा के समक्ष राष्ट्र की भाषा का मामला आया तो इस मुद्दे पर अनेक महीनों तक गरमा-गर्म बहस हुई, कई बार काफी तनाव पैदा हुए।
(ii) आजादी से पूर्व 1930 के दशक तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया था कि हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि प्रत्येक भारतीय को एक ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें। हिन्दी और उर्दू के मेल से बनी हिन्दुस्तानी भारतीय जनता की बहुत बड़े हिस्से की भाषा थी और अने संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी।
(iii) दुर्भाग्यवश हिन्दी और उर्दू पर सांप्रदायिकता, सांप्रदायिक दंगों और सांप्रदायिकता से प्रेरित राजनीतिक और धार्मिक संकीर्णता का कुप्रभाव पड़ने लगा। हिन्दी और उर्दू परस्पर दूर होती जा रही थी। मुसलमान फारसी और उर्दू से ज्यादा से ज्यादा शब्द हिन्दी से मिला रहे थे तो अनेक हिन्दू भी संस्कृतनिष्ठ शब्दों को ज्यादा से ज्यादा हिन्दी में ले रहे थे। परिणाम यह हुआ कि भाषा भी धार्मिक पहचान की राजनीतिक हिस्सा बन गई लेकिन महात्मा गाँधी जैसे महान नेताओं के हिन्दुस्तानी (भाषा) के साझे चरित्र में आस्था कम नहीं हुई।
(iv) संयुक्त प्रांत के एक कांग्रेसी सदस्य आर.वी. धूलेकर ने आवाज उठाई थी कि हिन्दी को संविधान बनाने की भाषा का प्रयोग किया जाए। धूलेकर ने उन लोगों का विरोध किया जिन्होंने यह तर्क दिया कि संविधान सभा के सभी सदस्य हिन्दुस्तानी भाषा नहीं समझते।
आर.वी. धूलेकर ने कहा था, “इस सदन में जो लोग भारत का संविधान रचने बैठे हैं और हिन्दुस्तानी नहीं जानते वे इस सभा की सदस्यता के पात्र नहीं हैं। उन्हें चले जाना चाहिए।”
(v) धूलेकर की टिप्पणियों से संविधान सभा में हंगामा खड़ा हो गया। अंत में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से संविधान सभा में शांति स्थापित हुई। लगभग तीन वर्षों के बाद 12 सितम्बर, 1947 को राष्ट्र की भाषा के प्रश्न पर आर.वी. धूलेकर के भाषण ने एक बार फिर तूफान खड़ा कर दिया। तब तक संविधान सभा की भाषा समिति अपनी रिपोर्ट पेश कर चुकी थी।
(vi) समिति ने राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर हिन्दी के समर्थकों और विरोधियों के बीच पैदा हो गए गतिरोध को तोड़ने के लिए फार्मूला विकसित कर लिया था। समिति ने सुझाव दिया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी भारत की राजकीय भाषा होगी परन्तु इस फार्मूले को समिति ने घोषित नहीं किया था । आर. वी. धूलेकर ने उन लोगों का मजाक उड़ाया जो गाँधी का नाम लेकर हिन्दी की बजाय हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा बनाना चाहते थे।

प्रश्न 6. भारत राज्य के नीति निदेशक तत्वों के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर : 1. सामाजिक तथा शिक्षा विषयक सिद्धांत (Social and Educational Principles) : 1.राज्य देश के सभी नागरिकों के लिए समान आचार संहिता बनाने का प्रयत्न करेगा।
2.राज्य संविधान लागू होने के 10 वर्ष की अवधि में 14 वर्ष तक की आयु के सभी बालकों को अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा दिए जाने की व्यवस्था करेगा।
2.आर्थिक सिद्धांत (Economic Principles) :1.समान कार्य के लिए सभी स्त्री-पुरुषों को समान पारिश्रमिक मिले, इसकी भी व्यवस्था की जायेगी।
2.भारत के प्रत्येक नागरिक, स्त्री व पुरुष को समान रूप से आजीविका कमाने के पर्याप्त अवसर प्राप्त हों, राज्य इसकी व्यवस्था करेगा।
3.शासक विषयक सिद्धांत (Principles Related to the Government):1.राज्य न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग होने की कोशिश करेगा ताकि न्यायाधीश कार्यपालिका के दबाव में आये बिना न्याय कर सकें।
2.राज्य ग्रामों में ग्राम पंचायतों का संगठन करेगा और उन्हें वे सभी अधिकार देगा, जिससे वे स्वतन्त्रतापूर्वक कुशलता से अपना कार्य कर सकें।
4.अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से संबंधित सिद्धांत (Principles of International Peace and Security): 1.राज्य विश्व शांति का समर्थन करेगा और उसे प्रोत्साहन देगा।
2. राज्य विभिन्न राज्यों के बीच न्याय और सम्मान पूर्ण संबंधों की स्थापना के लिए प्रयत्न करेगा।

प्रश्न 7. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का निम्नलिखित वर्णन किया जा सकता है :1.लिखित तथा विस्तृत संविधान (Written and Wide Constitution): हमारे देश का संविधान लिखित है। यह संविधान लिखित होने के साथ-साथ विस्तृत भी है। इसका अर्थ यह है कि इसमें विभिन्न बातों का विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है। यह विश्व के संविधानों में सबसे बड़ा संविधान है । 1950 के संविधान में 39 धाराएँ थीं। इसमें अब तक लगभग 80 संशोधन किए जा चुके हैं।
2.लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना (Establishment of Democrative Government): हमारे संविधान की एक विशेषता यह है कि इससे देश में लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना की गई है। यहाँ की जनता को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपनी सरकार का चुनाव स्वयं करे। प्रत्येक व्यक्ति को मतदान करने तथा चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया है। इस प्रकार यहाँ एक ऐसी सरकार का गठन होता है जो लोगों के प्रतिनिधियों के माध्यम से चलाई जाती है।
3.संघात्मक व्यवस्था (Federal System) : हमारे संविधान की अन्य विशेषता यह है कि हमारे यहाँ संघात्मक सरकार की व्यवस्था है। संघात्मक सरकार का अर्थ है कि शासन प्रबंध राज्य तथा केन्द्र दो स्तरों पर होगा तथा इनके अधिकार और शक्तियों का वर्णन संविधान में किया जाएगा। दोनों प्रकार की सरकारें संविधान के संघीय ढाँचे के अंतर्गत कार्य करेंगी।
4.स्वतंत्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका (Free and impartial .Judiciary) : हमारे देश में एक स्वतंत्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका का प्रावधान है। संविधान में इसके क्षेत्राधिकार तथा शक्तियों का वर्णन मिलता है। न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त रखा गया है। इस प्रकार न्यायपालिका निष्पक्ष तथा स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करती है।
5.धर्म निरपेक्ष राज्य (Secular State) : हमारे संविधान ने भारत को एक धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित किया है । इसका अर्थ यह है कि भारत में सरकार किसी धर्म विशेष के प्रति कोई लगाव नहीं रखेगी। उसकी दृष्टि से सभी धर्म समान होंगे। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म के मामले में पूर्ण स्वतंत्रता होगी। धर्म के नाम पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। अपने धर्म का प्रचार करने की भी प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्रता होगी।
6.सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) : सभी नागरिकों को मताधिकार प्राप्त है। सार्वभौमिक का अर्थ है बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक वयस्क की, जिसकी आयु 18 वर्ष अथवा उससे अधिक है, मत देने का अधिकार प्राप्त है।
7.संसदीय सरकार (Parliamentary Form of the Government) : संविधान संसदीय व्यवस्था की स्थापना करता है। राज्य के अध्यक्ष (राष्ट्रपति) का पद नाममात्र का तथा सरकार के अध्यक्ष (प्रधानमंत्री) का पद वास्तविक शासक की भाँति बनाने का प्रयास किया गया है। प्रधानमंत्री तथा उसके मंत्रिपरिषद् संसद से ली जाएगी जो संसद के प्रति उत्तरदायी होगी।

प्रश्न 8. उद्देश्य प्रस्ताव पर एन.जी. रंगा तथा जयपाल सिंह के आदिवासियों तथा अल्पसंख्यकों की आवश्यकताओं और सुरक्षा के बारे में उनके विचारों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तावित ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ के संबंध में एन. जी. रंगा के विचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : उद्देश्य प्रस्ताव पर एन.जी.रंगा तथा जयपाल सिंह के आदिवासियों तथा अल्पसंख्यकों की आवश्यकताओं और सुरक्षा के बारे में उनके विचारों की व्याख्या :1.संविधान सभा में उद्देशिका (या उद्देश्य प्रस्ताव) जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्तुत की थी।
2.एन. जी. रंगा के अनुसार तथाकथित पाकिस्तानी प्रांतों में रहने वाले हिंदू, सिख और यहाँ तक कि मुसलमान भी अल्पसंख्यक नहीं हैं। उनके अनुसार असली अल्पसंख्यक तो इस देश की जनता है। यह जनता (आदिवासी जनजातीय, सर्वसाधारण ग्रामीण) इतनी दु:खी, कुचली और पीड़ित है कि अभी तक साधारण नागरिक के अधिकारों का लाभ भी नहीं उठा सके थे।
3.आदिवासी क्षेत्रों में जनजातियाँ आदिकाल से रह रही हैं। उनके अपने कानूनों, उनके जनजातीय कानूनों, उनकी जमीन को उनसे नहीं छीना जा सकता लेकिन अन्य प्रदेशों के व्यापारी वहाँ (आदिवासियों के क्षेत्रों में) जाते हैं और तथाकथित मुक्त बाजार (Open market) के नाम पर वे व्यापारी तथा सौदागर उनकी जमीन छीने जाने के विरुद्ध है लेकिन सच्चाई यह है कि व्यापारी आदिवासियों को विभिन्न प्रकार की शतों में जकड़कर गुलाम बना लेते हैं। वे उन्हें पीढ़ी-दर पीढ़ी दासता के नर्क में धकेल देते हैं।
4.आम गाँववालों को जिनमें अल्पसंख्यक तथा आदिवासी भी होते हैं, सूदखोर पैसा ब्याज पर देते हैं। वह ऐसा करके सर्वसाधारण ग्रामीणों को अपनी जेब में डाल लेते हैं। गाँव में जमींदार तथा मालगुजार और कुछ अन्य ऐसे ही साधन संपन्न लोग गरीब देहातियों का शोषण करते हैं। इन लोगों में मूलभूत शिक्षा तक नहीं है। वास्तविक अल्पसंख्यक गाँव के सर्वसाधारण लोग ही हैं जिन्हें राज्य (या सरकार या संविधान) द्वारा सुरक्षा का आश्वासन मिलना चाहिए।
आदिवासी से संबंधित ताकतों ने संविधान सभा में तर्क दिया कि आदिवासियों के साथ अनेक वर्षों से ब्रिटिश सरकार जमींदारों, सूदखोरों और साहूकारों ने सही व्यवहार नहीं किया। उन्होंने अपने दावों को बढ़ा चढ़ाकर कहा है कि 6 हजार सालों से उन्हें अपमानित या उपेक्षित किया जा रहा था। उदाहरण के लिए एन.जी.रंगा और जयपाल सिंह जैसे आदिवासी नेताओं ने संविधान का स्वरूप तय करते समय इस बात की ओर ध्यान देने के लिए जोर दिया कि उनके समाज (आदिवासियों का इतिहास) भारत के गैर मूल निवासियों के हाथों निरंतर शोषण और छीना-झपटी का शिकार होता रहा। उन्होंने कहा आदिवासियों की सुरक्षा तथा उन्हें आम आदमियों की दशा में लाने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ बनाने की जरूरत है। आदिवासी समाज के नेता चाहे पृथक निर्वाचिका के हक में नहीं थे लेकिन विधायिका में आदिवासियों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था जरूरी समझते थे। उन्होंने कहा कि इस तरह से औरों को आदिवासियों की आवाज सुनने और उनके पास आने के लिए विवश किया जा सकेगा।

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