Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 4 Important Question Answer 3 Marks विचारक, विश्वास और इमारतें सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 1, क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियति वादियों और भौतिक वादियों से भिन्न थे ? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर : हाँ, उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों तथा भौतिकवादियों से भिन्न थे इनकी भिन्नता का मुख्य आधार बिंदु निम्नलिखित है
नियतिवादियों तथा भौतिकवादियों के विचार : नियतिवादी मानते थे कि मनुष्य के सुख-दु:ख निर्धारित मात्रा में दिए गए हैं। इन्हें संसार में बदला नहीं जा सकता। न ही इन्हें घटाया-बढ़ाया न जा सकता है। बुद्धिमान लोग सोचते हैं कि वे सद्गुणों तथा तपस्या द्वारा अपने कर्मों से मुक्ति प्राप्त कर लेंगे परंतु वे संभव नहीं है क्योंकि मनुष्य को अपने सुख-दु:ख भोगने ही पड़ते हैं।
इसी प्रकार भौतिकवादी मानते हैं कि संसार में दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज नहीं है। दान देने का सिद्धांत झूठा और खोखला है। मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता। मूर्ख हो या विद्वान दोनों हो कटकर नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिन चार तत्त्वों से बना है वे संसार के उन्हीं तत्त्वों में विलीन हो जाते हैं।
उपनिषदों के दार्शनिक विचार : ऊपर दिए गए विचारों में ‘आत्मा’ तथा ‘परमात्मा’ का कोई स्थान नहीं है। इसके विपरीत उपनिषदों के अनुसार मानव-जीवन का लक्ष्य ‘आत्मा’ को ‘परमात्मा (परम ब्रह्म) में विलीन कर स्वयं परम ब्रह्म हो जाना है।

प्रश्न 2. जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप मे लिखिए।

अथवा

जैन धर्म ने समग्र रूप से भारतीय चिंतन पर अपना प्रभाव छोड़ा है।’ महावीर के संदेशों से इस कथन का समर्थन कीजिए।
उत्तर : जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ निम्नलिखित थीं
(क) अहिंसा : प्रत्येक जीव के प्रति अहिंसा-खासकर इन्सानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकौड़ों को न मारना जैन दर्शन का केन्द्र बिन्दु है। जैन दर्शन विश्व की प्रत्येक वस्तु या पदार्थ में जीवों की अवधारणा को स्वीकार करता है।
(ख) घोर तपस्या और आत्म त्याग : जैन धर्म के अनुसार कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की आवश्यकता होती है। जैन धर्म को मानने वाले अपने शरीर को कष्ट देकर अपने मन तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण करने के पक्ष में हैं।
(ग) ईश्वर में अविश्वास : जैन धर्म में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया है। (घ) यज्ञ, बलि और कर्मकांड में अविश्वास : जैन धर्म को मानने वाले ब्राह्मणों के यज्ञ, बलि और कर्म कांड में विश्वास नहीं रखते हैं।
(ङ) जाति प्रथा में अविश्वास : जैन धर्म में जाति प्रथा को सिरे से नकारा गया है। उनके अनुसार सभी मनुष्य समान हैं। (च) मोक्ष प्राप्ति : जैन धर्म के अनुसार मोक्ष प्राप्ति या निर्वाण प्राप्ति के लिए ‘सम्यक् विश्वास’, ‘सम्यक ज्ञान’, ‘सम्यक चरित्र’, आदि त्रि-रत्नों पर चलना आवश्यक है।
(छ) पुनर्जन्म और कर्म-सिद्धान्त में विश्वास : जैन धर्म भी पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। उनका मानना है कि वर्तमान में जिस प्रकार का कर्म किया जाता है व्यक्ति को उसी प्रकार के अनुसार नया जन्म मिलता है।
(ज) उच्च नैतिक जीवन : महावीर ने अपने अनुयायियों को हत्या न करने, चोरी नहीं करने, झूठ नहीं बोलने, ब्रह्मचर्य का पालन करने और धन संग्रह न करने की शिक्षा दी ।

प्रश्न 3. साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।

अथवा

“साँची के स्तूप के अवशेषों के संरक्षण में भोपाल की बेगमों ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।” उचित प्रमाण देकर इस कथन की पुष्टि कीजिए।

अथवा

साँची का स्तूप-परिसर बना नहीं रह सकता था यदि भोपल के शासकों, शाहजहाँ बेगम व सुल्तानजहाँ बेगम की सहायता प्राप्त न होती। इस कथन को समीक्षा के साथ प्रस्तुत कीजिए।

अथवा

भोपाल के शासकों, शाहजहां बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने साँची के प्राचीन स्थल की रख-रखाव के लिए किस प्रकार अपना योगदान दिया? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : साँची के स्तूप के अवशेषों के संरक्षण में भोपाल की बेगमों का निम्नलिखित योगदान रहा
1.पहले फ्रांसीसियों ने और बाद में अंग्रेजों ने सांची के पूर्वी तोरण द्वार को अपने-अपने देश में ले जाने की कोशिश की परंतु भोपाल की बेगमों ने उन्हें स्तूप की प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट कर दिया।
2.शाहजहां बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया।
3. सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय तथा अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया।
4.जॉन मार्शल ने साँची पर लिखे अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथ सुल्तान जहाँ को समर्पित किए। इनके प्रकाशन पर बेगमों ने धन लगाया।
5.बेगमों द्वारा समय पर लिए गए विवेकपूर्ण निर्णय ने साँची के स्तूप को उजड़ने से बचा लिया। यदि ऐसा न होता तो इसकी दशा भी अमरावती के स्तूप जैसी होती।
6.साँची का स्तूप बौद्ध धर्म का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण केंद्र है। इसने आरंभिक बौद्ध धर्म को समझने में बहुत अधिक सहायता दी है।

प्रश्न 4. निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़ें और जवाब दीजिए :
महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन तिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, तिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्व की मूर्ति स्थापित की।
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की ?
( ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्व की मूर्ति क्यों स्थापित की ?
(ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं ?
(घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थी ?
(ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे ?

उत्तर : (क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारी शासक महाराज हुविष्क के शासनकाल की सहायता से की। यह तारीख हुविष्क के शासनकाल के तैंतीसवें साल क. गर्मियों के पहले महीने का आठवाँ दिन (8 तारीख) है।
(ख) धनवती एक भिक्षुणी थीं। उनकी बोधिसत्त में अगाध श्रद्धा थी। इसी कारण उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित करवाई।
(ग) वे अपनी मौसी बुद्धिमता तथा अपने माता-पिता का नाम लेती हैं।
(घ) वे त्रिपिटक नामक बौद्ध ग्रंथों को जानती थीं।
(ङ) उन्होंने ये पाठ अपने गुरु तथा भिक्षु ‘बल’ से सीखे थे। यह भी संभव है कि उन्होंने कुछ पाठ अपनी मौसी बुद्धिमता से सीखे हों जो त्रिपिटक ग्रंथों को जानती थीं।

प्रश्न 5. आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे ?
उत्तर : स्त्री-पुरुष संभोग: निम्नलिखित बातों के कारण संघ में जाते थे
(1) वे सांसारिक विषयों से दूर रहना चाहते थे।
(2) वहाँ का जीवन सादा तथा अनुशासित था।
(3) वहाँ वे बौद्ध दर्शन का गहनता से अध्ययन कर सकते थे।
(4) कुछ लोग धम्म के शिक्षक (उपदेशक) बनना चाहते थे।
(5) संघ में सभी का दर्जा समान था, क्योंकि भिक्खु अथवा भिक्खुनी बन जाने के पश्चात् सभी को अपनी पुरानी पहचान का त्याग करना पड़ता था।

प्रश्न 6. साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है ?

उत्तर : साँची की मूर्तिकला को समझने के लिए बौद्ध साहित्य से व्यापक सहायता मिलती है। साँची का स्तूप मध्य प्रदेश में भापाल से 20 मील दूर उत्तर पूर्व में कनखेड़ा की पहाड़ियों की तलहटी में बसे एक गाँव में स्थित है। असोक के काल में इसे ईटों से बनवाया गया था। शुंगकाल में उस पर पाषाण की शिलाओं का आवरण लगाया गया। साँची की मूर्तिकला के गहराई में अध्ययन से पता चलता है कि यह दृश्य वंषान्तर जातक से लिया गया है जिसमें एक दानी राजकुमार एक ब्राह्मण को अपना सब कुछ सौंपकर पत्नी और बच्चों सहित जंगल में रहने चला जाता है।
बौद्ध ग्रंथों के मुताबिक एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए ही बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई थी। मूर्तिकारों ने बुद्ध को उपस्थित प्रतीकों द्वारा दर्शाया गया है। बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए पहले है उपदेश को चक्र द्वारा दर्शाया गया है। वहाँ पेड़, एक पेड न होकर के जीवन की एक घटना का प्रतीक है।साँची में जातकों से लिए गए हाथी, बन्दर, गाय, बैल आदि चित्र भी मिले हैं जानवरों को मनुष्य के गुणों के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।शाल भजिका का मूर्ति से बौद्ध धर्म की समृद्धि धारणाओं और विश्वासों का पता चलता था। साँची के मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक चिह्न इन्हीं परंपराओं से उभरे हैं।

प्रश्न 7. चित्र 1 और 2 में साँची से लिये गये दो परिदृश्य दिये गये हैं। आपको इनमें क्या नजर आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम धंधों को पहचानकर यह बतायें कि इनमें से कौन-से ग्रामीण और कौन-से शहरी परिदृश्य हैं?
उत्तर : (क) दोनों चित्रों को देखने से जान पड़ता है कि इस कालांश (600 ई. पू. से 600 ई. तक) में भारतीय वास्तुकला बहुत विकसित हो चुकी थी। इसके कुछ चित्र पौधे और मवेशियों से संबंधित हैं। इसे किसी स्तूप अथवा चैत्य की दीवारों पर उसकी भव्यता को बढ़ाने के लिए लगाया गया था।
(ख) चित्र नं. 2 में पौधे भली-भांति स्पष्ट रूप से दिखाने का प्रयास किया गया है। बुद्ध ने पौधों के महत्त्व और लाभ को समझते हुए उन्हें विभिन्न चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित करवाया ताकि समाज के लोग उनके महत्त्व को समझें और पेड़-पौधे जीवित प्राणियों (पशु पक्षियों और मानव जाति) के लिए उपयोगी माने जायें।
(ग) चित्र नं 2 में विभिन्न प्रकार के मवेशी, जैसे-दुधारू पशु, हिरण, गाय इत्यादि बनाए गए हैं। उन्हें विभिन्न भिक्षु – भिक्षुणिओं से घेरा हुआ है। और उनके द्वारा बनाये गए घेरे में विभिन्न मवेशियों को सुरक्षित स्थिति में दिखाया गया है। यह चित्र बुद्ध धर्म में अहिंसा के सिद्धांत और जीवों के सरंक्षण के महत्त्व को दर्शाता है और बलि-प्रथा के प्रति उनकी अस्वीकृति को दर्शाते हैं। (घ) जहाँ तक चित्र नं. 1 का संबंध है, इसमें कुछ मजबूत लंबे-लंबे स्तंभ और उनके नीचे जाली का सुन्दर कार्य दिखाया गया है। इन स्तंभों के ऊपर विभिन्न मवेशी और कुछ अन्य वस्तुओं को चित्रित किया गया है। स्तंभों के माध्यम से बौद्ध ध र्म के अनुयायियों का विभिन्न शारीरिक आकृतियों में बैठे हुए. खड़े हुए एक-दूसरे के समक्ष निहारते हुए विभिन्न हाव-भाव की अभिव्यक्ति करते हुए दिखाया गया है। स्तंभ के ऊपरी सिरों पर उल्टे रखे हुए कलश जिन पर डिजाइन बने हैं अभिव्यक्त किया गया है । चित्र के निचले भाग में कुछ स्तंभ, भिक्षुनियों के विभिन्न आकार, हाव-भाव और किसी इमारत के डिजाइन जो संभवत: किसी स्तंभ के बाहरी हिस्से से संबंधित हैं, दिखाया गया है। हमारे विचारानुसार चित्र नं. 2 राजदरबार और ग्रामीण क्षेत्रों से और चित्र नं. । राजा शहरी परिदृश्य और महलों से संबंधित है।

प्रश्न 8. वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर : वास्तुकला : जिस समय साँची जैसे स्थानों पर स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियों को दखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बनाए गए। आरंभिक मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में होते थे जिन्हें गर्मगृह कहा जाता था इनमें एक दरवाजा होता था जिसमें से उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए अंदर जा सकता था। धीरे धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा जाता था मंदिर की दीवारों पर प्रायः भित्ति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे आने वाले समय में मंदिरों के स्थापत्य में कई नई बातें शामिल हो गई। अब माँदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी बनाए जाने लगे। जल आपूर्ति की व्यवस्था भी की जाने लगी।
शुरू-शुरू के कुछ मंदिर पहाड़ियों को काटकर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परंपरा प्राचीनकाल से ही चली आ रही थी। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में असोक के आदेश से आजीविकों के लिए बनाई गई थीं। यह परंपरा अलग-अलग चरणों में विकसित होती रही। इसका सबसे विकसित रूप हमें आठवीं शताब्दी के कैलाशनाथ के मंदिर में दिखाई देता है जिसमें पूरी पहाड़ी को काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया था।एक ताम्रपत्र अभिलेख से पता चलता है कि इस मंदिर का मुख्य वास्तुकार (मूर्तिकार) भी मंदिर को बनाकर हैरान रह गया था। वह अपने आश्चर्य को इन शब्दों में व्यक्त करता है.. ” भगवान्, यह मैंने कैसे बनाया।”
मूर्तिकला : कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। अन्य देवताओं की भी मूर्तियाँ बनाई गई। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था परंतु उन्हें कई मूक्तिया स में के रूप में भी दर्शाया गया है। ये सभी चित्रण देवताओं से जुड़ा हुई मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे उनके गुणा आर प्रतीकों को उनके शिरोवस्त्रों, आभूषणों, आयुधों (हथियार आर हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से व्यक्त किया जाता था।

प्रश्न 9. स्तूप क्यों और कैसे बनाये जाते थे ? चर्चा कीजिए।
उत्तर : बहुत प्राचीन काल से ही लोग कुछ स्थानों को पवित्र मानते थे। ऐसे स्थानों में वे स्थान शामिल थे जहाँ विशेष प्रकार की वनस्पति, अनूठी चट्टाने या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य देखने को मिलता था। ऐसे कुछ स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी भी बनी रहती थीं जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।
बौद्ध साहित्य में कई चैत्यों का उल्लेख है। इसमें बुद्ध के जीवन से जुड़े स्थानों का भी वर्णन है-जहाँ वे जन्में थे (लुंबिनी), जहाँ उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया (बोधगया) , जहाँ उन्होंने प्रथम उपदेश दिया (सारनाथ) और जहाँ उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया (कुशीनगर)। धीरे-धीरे ये सभी स्थान पवित्र स्थल बन गए। बुद्ध के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद अशोक ने बुद्ध के जन्म-स्थल लुंबिनी में अपनी यात्रा की याद में एक स्तंभ बनवाया था।

प्रश्न 11. इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परंपराओं में से क्या कोई परंपरा आपके अड़ोस-पड़ोस में मानी जाती है ? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है ? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है ? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है ? यदि हाँ तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं या अलग हैं ? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से करें।

उत्तर : इस अध्याय में बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिन्दू धर्म से संबंधित धार्मिक परंपराओं का विवरण किया गया है। हमारे पड़ोस में इस अध्याय में उल्लेखित सभी धार्मिक परंपराओं को अड़ोस-पड़ोस में माना जाता है। आजकल गीता, रामायण, महाभारत, वेदों आदि का प्रयोग हिन्दुओं द्वारा श्री गुरु साहिब का अध्ययन सिक्कों द्वारा. बाइबल का अध्ययन ईसाइयों द्वारा, कुरान का अध्ययन मुसलमानों द्वारा, बौद्धों द्वारा त्रिपिटक, जैनियों द्वारा अपंग नामक धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया जाता है।धार्मिक पुस्तकें संग्रहालयों में रखी हुई हैं और सभी धार्मिक संस्थाओं जैसे मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च, मस्जिद, बौद्ध चैत्य. जैन मंदिर आदि में उन्हें बड़े सम्मान और आदर के साथ रखा जाता है। ये धार्मिक पुस्तकें संस्कृत, पंजाबी अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फारसी, अरबी, हिन्दी आदि में छापी जाती हैं और इन्हें धार्मिक स्थलों, प्रदर्शनियों, समारोह में प्रायः नि:शुल्क वितरित भी किया जाता है। आज भी हिन्दुओं के द्वारा मूर्ति पूजा होती है, सिक्ख, मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि विभिन्न तरह से प्रार्थना या पूजा आदि करते हैं। आज की मूर्तियाँ मूलत: आदि मूर्तियों से काफी मिलती-जुलती हैं लेकिन इन्हें विभिन्न प्रकार के सुंदर वेशभूषा और आभूषणों से सजाया जाता है। पूजा स्थलों को प्रकाशित किया जाता है।जहाँ तक विभिन्न धार्मिक कार्यो के लिए प्रयोग की जाने की तुलना है वे प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कई दृष्टियों से भिन्न हैं लेकिन बौद्ध स्तूप और हिंदू मंदिरों में काफी समानता भी है। गुरुद्वारे मध्यकाल में विकसित हुए. मस्जिदें मध्य काल में विकसित हुई इसलिए इन दोनों में प्राचीन स्तूपों और मंदिरों में स्थापत्य की दृष्टि से कोई समानता नहीं है। चर्च का निर्माण प्रथम शताब्दी से शुरू हुआ। इस पर रोमन स्थापत्य का अधिक प्रभाव है।

प्रश्न 12. इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परंपराओं से जुड़े अलग-अलग काल और इलाकों की कम-से-कम पाँच मूर्तियों और चित्रों की तस्वीरें इकट्ठी करें । उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक तस्वीर दो लोगों को दिखायें और उन्हें इसके बारे में बताने को कहें। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज की रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर : संकेत : विद्यार्थियों के लिए स्वयं अध्ययन के लिए यह प्रश्न है। उन्हें पाँच मूर्तियाँ और पाँच चित्र अथवा तस्वीरें इकट्ठी करनी चाहिए। वे उन लोगों को यह मूर्तियाँ और चित्र दिखा सकते हैं जो उनमें रुचि लें और सम्मानपूर्वक, ध्यानपूर्वक देखना चाहें। विद्यार्थियों को विभिन्न व्यक्तियों द्वारा दिये गये विवरणों में अपनी नोट बुक लिखना चाहिए।

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