Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 4 Important Question Answer 2 Marks विचारक, विश्वास और इमारतें सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 1 शाहजहाँ बेगम कौन थी ? उन्होंने अपनी आत्मकथा में साँची के विषय में क्या लिखा है ?
उत्तर : परिचय (Introdiuction): शाहजहाँ बेगम, भोपाल की नवाब की पत्नी थी, जिसने 1868 से 1901 तक शासन किया था।
उसकी आत्मकथा के अनुसार साँची की एक झलक (4 glimpse of Sanchi according to autobiography of Shahjahan Begum) : ७वीं शताब्दी में बेगम शाहजहाँ ने अपनी आत्मकथा लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने साँची स्तूप को इमारत के विषय में निम्न मुख्य बिन्दुओं का उल्लेख किया है :
(i) यह इमारत भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में सबसे अद्भुत कनकखेड़ा (साँची) की इमारत है। यह गाँव मध्यप्रदेश की राजधानी से 20 मील उत्तर-पूर्व की तरफ एक पहाड़ी की तलहटी में बसे गाँव में स्थित यह स्तूप पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है। इसके परिवेश द्वार से ही पत्थर की विभिन्न वस्तुएँ, बुद्ध की प्रतिमाएँ और एक प्राचीन तोरण द्वार देखा जा सकता है।
(ii) बेगम की आत्मकथा का नाम ताज-उल-इकबाल तारीख भोपाल (यानी भोपाल का इतिहास है) जिसे 1876 में उन्होंने एच. डी. ब्रास्तो के द्वारा अनुवाद करवाया बेगम ने साँची की मूल वस्तुओं और प्रतिमाओं को अंग्रेजों और फ्रांसीसियों द्वारा बार-बार मांगने के बावजूद भी इस राष्ट्रीय धरोहर को बचाए रखा और उन्होंने प्लास्टर की प्रति कृतियों से ही अंग्रेज और फ्रांसीसी जिज्ञासियों को देकर उन्हें संतुष्ट कर दिया। इस प्रकार साँची की मूलकृति भोपाल राज्य में अपने स्थान पर आज भी स्थित है।
(iii) बौद्ध धर्म के इस महत्त्वपूर्ण केन्द्र के बारे में शाहजहाँ बेगम की आत्मकथा ने जो तथ्य लिखे वे लोगों के सामने प्रस्तुत किए उससे लोगों के दृष्टिकोण में बौद्ध धर्म के विषय में महत्त्वपूर्ण बदलाव आये। पहाड़ी पर चढ़ते हुए इस पूरे स्तूप समूह, इमारत समूह (Complex) को देखने पर दूर से ही एक विशाल गोलार्द्ध ढाँचा और अन्य कई इमारतें जिनमें पाँचवीं सदी से बना एक हिन्दू मंदिर भी शामिल है, देखा जा सकता है। इस टीले के चारों ओर पत्थर की रेलिंग बनाई हुई है।

प्रश्न 2. “जैन दर्शन द्वारा दिए गए अहिंसा और त्याग के सिद्धांत ने परंपरा को प्रभावित किया है।” इस कथन की वीर के संदेशानुसार पुष्टि कीजिए।

अथवा

जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है।” महावीर के संदेशानुसार इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर : (i) जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे। उन्हें तीर्थकर कहा जाता है यानी कि वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।
(ii) जैन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा यह है कि संपूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। जीवों के प्रति अहिंसा-खासकर इंसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना जैन दर्शन का केन्द्रबिंदु है।
(iii) वस्तुतः जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिन्तन परम्परा को प्रभावित किया है। जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है।
(iv) कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की जरूरत होती है। यह संसार के त्याग से ही सम्भव हो पाता है।
(v) इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया। जैन साधु और साध्वी पाँच व्रत करते थे : हत्या न करना, चोरी नहीं करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य (अमृषा) और धन संग्रह न करना।

प्रश्न 3. उपनिषदों के इन्सानों और विश्व व्यवस्था के बीच रिश्तों से संबंधित नई विचारधाराओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

अथवा

वैदिक परंपराओं और यज्ञ ( बलि) प्रथा के प्रति छठी सदी ई० पू० में उठे प्रश्नों और विवादों का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : उपनिषद् वैदिक परंपरा के ग्रंथ हैं। ये नए प्रश्नों के भंडार हैं। इनमें दी गई विचारधाराओं से पता चलता है कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते थे। पुनर्जन्म तथा अतीत के कर्मों के आपसी संबंधों पर भी काफी बहस होती थी। विचारक परम यथार्थ की प्रकृति को समझने और उसे अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रहे थे वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक भी यह प्रश्न उठा रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी सोचने लगे। इस प्रकार एक चिंतन भरा वातावरण तैयार हो गया था।

प्रश्न 4. पौराणिक हिन्दू धर्म के विश्वास को परंपराओं अलग ढंग से कैसे विकसित किया गया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : पौराणिक हिन्दू धर्म के विश्वास को पंरपराओं में अलग ढंग से निम्नवत् विकसित किया गया :
(i) उपनिषदों में पाई गई विचारधाराओं से पता चलता है कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे। इनका प्रश्न था,” क्या पुनर्जन्म अतीत के कार्यों के कारण होता था?”
(ii) ऐसे मुद्दों पर पुरजोर बहस होती थी। वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ मनीषी यह सवाल उठा रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी चिंतन करने लगे। (iii) शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूम कर अपने दर्शन या विश्व के विषय में अपनी समझ को लेकर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे। शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को अपने तकों से समझाने की कोशिश करते थे कि आखिर सत्य क्या है। (iv) इनमें से कई शिक्षक जिनमें महावीर और बुद्ध शामिल हैं, वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते थे। चिंतन, धार्मिक विश्वास और व्यवहार की कई धाराएँ प्राचीन युग से ही चली आ रही थीं।
(v) इन शिक्षकों ने यह भी माना कि जीवन के दु:खों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता था। यह समझ ब्राह्मणवाद से बिल्कुल भिन्न थी। जैसे कि ब्राह्मणवाद यह मानता था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से निर्धारित होता था।

प्रश्न 5. गौतम बुद्ध को बुद्ध के नाम से कैसे जाना गया अथवा वे किस तरह एक ज्ञानी व्यक्ति बने ?

उत्तर : लगभग 30 वर्ष की अवस्था में गौतम ने अपने पिता के घर अथवा महल को त्याग दिया। वह जीवन के सत्य को जानने के लिए निकल पड़े। सिद्धार्थ ने साधना के कई मार्गों का अन्वेषण किया। इनमें एक था शरीर को अधिक-से-अधिक कष्ट देना जिसके चलते वे मरते-मरते बचे। इन अतिवादी तरीक़ों को त्यागकर, उन्होंने कई दिन तक ध्यान करते हुए अंततः ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद से उन्हें बुद्ध अथवा ज्ञानी व्यक्ति के नाम से जाना गया है बाकी जीवन उन्होंने धर्म या सम्यक् जीवनयापन की शिक्षा दी।

प्रश्न 6. साँची क्यों बच गया जबकि अमरावती नष्ट हो गया ? आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।

अथवा

अमरावती स्तूप की नियति साँची स्तूप से कैसे भिन्न थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी। तब तक विद्वान इस बात के महत्त्व को नहीं समझ पाये थे कि किसी पुरातात्त्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना महत्त्वपूर्ण था। 1818 जब साँची की खोज हुई, इसके तीन तोरण द्वार तब भी खड़े थे। चौथा वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी हालत में था।
तब भी यह सुझाव आया कि तोरण द्वारों को पेरिस या लंदन भेज दिया जाये। अंतत: कई कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा। इसलिए वह आज भी बना हुआ है जबकि अमरावती का महाचैत्य अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।

प्रश्न 7. समकानील बौद्ध ग्रंथों में विभिन्न विचारों वाले लोगों से जीवंत चर्चाओं और विवादों की एक झलक कैसे मिलती है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों अथवा चिंतन परंपाओं का उल्लेख मिलता है। इन परंपराओं से हमें जीवंत चर्चाओं और विवादों की एक झाँकी मिलती है। हमें पता चलता है कि प्रचारक (दार्शनिक) स्थान-स्थान पर घूमकर अपने दर्शन या विश्व के विषय में अपने ज्ञान को लेखकर एक-दूसरे के साथ तथा सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे। ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोंपड़ी) या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ विचारक ठहरा करते थे। यदि कोई दार्शनिक अपने तकों से अपने प्रतिद्वंद्वी को अपनी बात पर सहमत कर लेता था, तो उसका प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था। इसलिए समय के साथ किसी भी संप्रदाय के प्रति लोगों का समर्थन घटता-बढ़ता रहता था।
कई विचारकों ने जिनमें महावीर और बुद्ध शामिल हैं, वेदां के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाया। उन्होंने यह माना कि जीवन के दु:खा से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है। यह सोच ब्राह्मणवाद से बिल्कुल भिन्न थी. क्योंकि ब्राह्मणवाद का मानना था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से निर्धारित होता है।

प्रश्न 8. बौद्ध मूर्तिकला की प्रतीकात्मका पद्धति क्या थी? इन प्रतीकों को समझ पाना क्यों कठिन था ?
उत्तर : कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा तथा स्तूप महापरिनिब्बान का प्रतीक बन गए। चक्र का भी प्रतीक रूप में काफी प्रयोग किया गया यह बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था। वास्तव में ऐसी मूर्तिकला को अक्षरशः समझ पाना बहुत ही कठिन था। उदाहरण के लिए पेड़ का अर्थ केवल एक पेड़ नहीं था बल्कि वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था। ऐसे प्रतीकों को समझने के लिए यह जरूरी है कि इतिहासकार इन कलाकृतियों के निर्माताओं की परंपराओं को समझें।

प्रश्न 9. तांत्रिकवाद की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ?
उत्तर : (i) छठी शताब्दी के लगभग भारत में तंत्रवाद का प्रचार हुआ। इस संप्रदाय में स्त्रियाँ और शूद्र दोनों प्रविष्ट हो सकते थे।
(ii) इसमें जंत्र-तंत्र जादू-टोने पर बल दिया जाता था। तंत्र विद्या के जोर से भक्तगण अपने दु:खों का निवारण चाहते थे धन-दौलत की कामना करते थे। तथा
(iii) तंत्रवाद ने धीरे-धीरे अपना स्थान सभी धर्मों में बना लिया। दूसरे शब्दों में तत्कालीन धर्म जैन, बौद्ध, शैव तथा सभी इससे प्रभावित हुए। (iv) लोग अपने रोगों तक का इलाज तंत्र मंत्र द्वारा कराने वैष्णव,लगे, इससे जन साधारण में अंधविश्वास बढ़ गये।

प्रश्न 11. मिनेन्द्र कौन था ? उसकी सफलताओं का वर्णन करें।
उत्तर : डा० विन्सेण्ट स्मिथ (Dr Vinsent Smith) के मतानुसार मिनेन्द्र डेमोट्रियस के वंश का था। उसने 160 ई.पू. से 140 ई पू. तक शासन किया। वह शुंग राजा पुष्यमित्र का समकालीन था। मिनेन्द्र एक बड़ा विजयी राजा था जिसने व्यास नदी को पार करके काठियावाड़, भरहुत (भड़ौच) और गंगा-यमुना के मध्यवर्ती भागों को जीता। उसने 149 ई. पू. के लगभग पाटलिपुत्र पर भी हमला किया परन्तु वहाँ उसका मार्ग पुष्यमित्र ने रोक लिया। फिर भी मिनेन्द्र के पास एक बड़ा साम्राज्य था जिसमें अफगानिस्तान, पंजाब, काठियावाड़ सिन्ध, राजपूताना (राजस्थान) और मथुरा के भाग शामिल थे। इसके राज्य की राजधानी साकला (वर्तमान स्यालकोट) में अनेक सुन्दर उपवन थे और यह नगर हीरे-मोतियों के लिए प्रसिद्ध थे। मिनेन्द्र का राजभवन नगर के केन्द्र में था और बड़ा अनुपम था। मिनेन्द्र बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसने बौद्ध धर्म के अपनाने के बाद अपना जीवन इतनी पवित्रता से व्यतीत करने आरम्भ कर दिया कि लोग उसकी देवता की भांति पूजा करने लगे। वह इतना लोकप्रिय था कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसकी राख को लेने के लिए लोगों में लड़ाई हो गई। इस प्रकार मिनेन्द्र ने एक शक्तिशाली सम्राट की भाँति नहीं, बल्कि एक दार्शनिक की भौति प्रसिद्धि प्राप्त की।

प्रश्न 13. मगध नए-नए धार्मिक आंदोलनों का केंद्र क्यों बना ?
उत्तर : छठी शताब्दी ईसा पूर्व को धार्मिक उथल-पुथल का युग माना जाता है, क्योंकि इस शताब्दी में देश में अनेक धार्मिक आदोलनों का उदय हुआ। इन आंदोलनों का मुख्य केंद्र मगध था। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे-
(1) कृषि-मूलक अर्थव्यवस्था का विकास सर्वप्रथम मगध में ही हुआ। वह अर्थव्यवस्था नए धार्मिक आंदोलनों का आधार बनी।
(2) मगध राज्य ने व्यापार-वाणिज्य में तेजी से उन्नति की परिणामस्वरूप वैश्यों का महत्त्व बढ़ा और उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभुत्व की प्रतिक्रिया के रूप में जन्म लेने वाले नए धार्मिक आंदोलनों को प्रभावित किया।

प्रश्न 14. सातवाहनों के राज्य काल में भारत की आर्थिक स्थिति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : धार्मिक स्थिति (Religious position) : इस काल में हिन्दू और बौद्ध दोनों धर्मों का प्रचार हुआ। शासक वर्ग ब्राह्मण थे। अत: उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किए तथा ब्राह्मणों को दान में पर्याप्त धन भूमि आदि दिये। इस काल में सूर्य, चंद्र, इंद्र. वासुदेव, कृष्ण पशुपति शिव, पार्वती (गौरी) आदि कई देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती थी। समाज में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
सातवाहन शासकों ने अन्य धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई। बौद्ध धर्म के प्रचार में भेदभाव नहीं होता था। इस काल में कई बौद्ध मठों, चैत्यों और विहारों का निर्माण हुआ था। इस काल में कई विदेशी जातियों शकों, यवनों, पल्लवों और कुषाणों ने हिन्दू धर्म या बौद्ध धर्म स्वीकार किया। दूसरे शब्दों में वे भारतीय समाज में घुल मिल गए।

प्रश्न 15.”बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार, इमारतों, मूर्तियों या चित्रकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज नहीं किए गए।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।

उत्तर : (i) यह कथन काफी हद तक उपयुक्त है कि, “बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार, इमारतों, मूर्तियों या चित्रकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज नहीं किए गए थे।” (ii) इन रीति-रिवाजों, विश्वासों तथा व्यवहारों आदि में दिन-प्रतिदिन तथा विशेष अवसरों की गतिविधियों को शामिल किया जाता है। (i) अनेक लोगों तथा समुदायों को लंबे काल तक विवरण रखने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। यह भी मुमकिन है कि धार्मिक गतिविधियों तथा दार्शनिक मान्यताओं की उनकी सक्रिय परंपरा रही हो।(iv) इतिहासकार प्रायः किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते थे। बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए इतिहासकारों को बुद्ध के चरित्र लेखन के बारे में समझ बनानी पड़ी। उदाहरण के लिए अनेक प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव के रूप में प्रदर्शित न करके उनकी उपस्थिति को प्रतीकों के जरिए दर्शाने की कोशिश की। (v) इसी प्रकार, साँची में उत्कीर्णित अनेक मूर्तियाँ संभवत: बौद्ध मत से प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध नहीं थी। अनेक स्तंभों में दिखाए गए सपों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह प्रतीक ऐसी लोक-परंपराओं से लिया गया मालूम पड़ता है जिनका जिक्र ग्रंथों में हमेशा नहीं होता है।

प्रश्न 16. भक्ति की प्रमुख विशेषताएँ क्या था ?
उत्तर : किसी देश या देवता के प्रति लगाव को भक्ति कहा जाता है। मौर्यकाल के बाद भक्ति की परंपरा काफी प्रचलित हो गई। इसकी मुख्य विशेषताएँ अग्रलिखित थीं
(1) भक्ति का मार्ग अपनाने वाले लोग आडंबरों में विश्वास नहीं रखते थे। वे ईश्वर के प्रति सच्ची लगन और व्यक्तिगत पूजा पर बल देते थे।
(2) भक्ति मार्ग अपनाने वालों का यह मानना था कि यदि अपने आराध्य देवी या देवता की सच्चे मन से पूजा की जाए तो वह उसी रूप में दर्शन देते हैं, जिस रूप में भक्त उसे देखना चाहता है। अतः आराध्य देवी या देवता मानव के रूप में भी हो सकते हैं और सिंह, पेड़ या अन्य किसी भी रूप में भी जैसे-जैसे इस विचार को समाज द्वारा स्वीकृति मिलती गई कलाकार देवी-देवताओं की तरह से एक से बढ़कर एक सुंदर मूर्तियाँ बनाने लगे।
(3) देवी-देवताओं का विशेष सम्मान किया जाता था। इसलिए उनकी मूर्तियों को मंदिरों में स्थापित किया जाता था
(4) भक्ति परंपरा ने चित्रकला, शिल्पकता और स्थापत्यकला के माध्यम से अभिव्यक्ति की प्रेरणा भी दी।
(5) भक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था -चाहे वह धनी हो या निर्धन, स्त्री हो या पुरुष, ऊँची जाति का हो या निम्न जाति का।

प्रश्न 17. “मुक्तिदाता की कल्पना केवल बौद्ध धर्म तक ही सीमित नहीं थी।” टिप्पणी कीजिए।
उत्तर : (i) यह सही है कि मुक्तिदाता की कल्पना केवल बौद्ध धर्म तक ही सीमित नहीं थी। इस प्रकार के विश्वास एक अलग ढंग से उन परंपराओं में भी विकसित हो रहे थे जिन्हें हम हिंदू धर्म के नाम से जानते हैं।
(ii) इसके अंतर्गत वैष्णव (वह परंपरा जिसमें विष्णु को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता मानते हैं) तथा शैव (संकल्पना जिसमें शिव परमेश्वर है) परंपराएँ सम्मिलित हैं।
(iii) इनमें एक विशेष देवता की पूजा को विशिष्ट महत्त्व प्रदान किया जाता है।
(iv) इस तरह की आराधना में उपासना तथा ईश्वर के मध्य का संबंध प्रेम एवं समर्पण का संबंध माना जाता था इसे भक्ति कहा जाता है।
(v) वैष्णववाद में अनेक अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई। समस्त स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परंपरा के निर्माण का महत्त्वपूर्ण तरीका था।

प्रश्न 18, उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप के विद्वानों को प्राचीन भारतीय मूर्तिकला को समझना कठिन क्यों लगा ? उन्होंने इस समस्या के समाधान का प्रयास कैसे किया ?
उत्तर : 19वीं शताब्दी में यूरोप के विद्वानों ने जब कुछ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखीं तो वे उनकी पृष्ठभूमि और को नहीं समझ पाए। कई सिरों तथा हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूपों को मिलाकर बनाई गई मूर्तियाँ उन्हें विचित्र लगती थीं। महत्त्व कई बार तो उन्हें इन मूर्तियों से घृणा होने लगती थी। फिर भी उन्होंने उन विचित्र मूर्तियों को समझने के निम्नलिखित प्रयास किए
यूनानी परंपरा से तुलना : विद्वानों ने इन कलाकृतियों की तुलना एक परिचित परंपरा से की। यह परंपरा प्राचीन यूनान की कला परंपरा थी। भले ही वे प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को यूनान की कला जैसी श्रेष्ठ नहीं मानते थे, तो भी बुद्ध और बोधिसत्त की मूर्तियों की खोज से वे काफी उत्साहित हुए इसका कारण यह था कि ये मूर्तियाँ यूनानी आदर्शों से प्रभावित थीं और यूनानी मूर्तियों से काफी मिलती-जुलती थीं क्योंकि ये विद्वान यूनानी मूर्तिकला से परिचित थे, इसलिए उन्होंने बुद्ध तथा बोधिसत्त की मूर्तियों को भारतीय मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना।
इस प्रकार यूरोपीय विद्वानों ने इस कला को समझने के लिए एक आम तरीका अपनाया-परिचित चीजों के आधार पर अपरिचित चीजों को समझने का प्रयास करना।

प्रश्न 19, हर्षकालीन भारत की धार्मिक स्थिति का वर्णन करें।

उत्तर : (i) हर्ष की धार्मिक नीति उदार थी। पहले वह शैक् था परन्तु बाद में उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था।
(ii) उसने बौद्ध धर्म की महायान शाखा के सिद्धांतों के प्रचार हेतु कन्नौज में एक विशाल सम्मेलन किया और बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु व्याख्यान कराये।
(iii) कन्नौज में घटित होने वाली घटना, जिसमें महास्तंभ के फटने से अनेक लोग घायल हुए तो रुष्ट होकर उसने 500 ब्राह्मण को बन्दी बना लिया और फिर उन्हें निर्वासित कर दिया। इसमे उसकी धार्मिक असहिष्णुता का बोध होता है।
(iv) कन्नौज के पश्चात् हर्ष ने प्रयाग में एक महा सम्मेलन बुलाया। इसमें उसके सभी सामन्त, मंत्री एवं सभ्य लोग सम्मिलित हुए थे। इस अवसर पर गौतम बुद्ध की प्रतिमा का पूजन हुआ। इस अवसर पर ह्वेनसांग का प्रवचन हुआ। अन्त में हर्ष ने बड़े-बड़े दान दिये, यहाँ तक कि अपने शरीर के वस्त्र व गहने भी उतारकर दान कर दिये।

प्रश्न 20. भगवान महावीर की शिक्षाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : भगवान महावीर की शिक्षाएँ :
1.जैन दशन की अवधारणा के अनुसार संपूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान तथा जल में भी जीवन पाया जाता है।
2.जीवों के प्रति अहिंसा-विशेषकर व्यक्तियों, जानवरों, पेड़-पौधों तथा कीड़े-मकोड़े को न मारना जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है।
3. जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है।
4. कर्म चक्र से मुक्ति हेतु त्याग और तपस्या अपरिहार्य हैं। यह विश्व के त्याग से ही संभव हो पाता है।
5.जैन दर्शन के अनुसार मुक्ति हेतु विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम है। जैन साधु और साध्वी पाँच व्रत करते थे: (i) हत्या न करना, (ii) चोरी नहीं करना, (iii) झूठ न बोलना, (iv) ब्रह्मचर्य (अमृषा), (v) धन संग्रह न करना।

प्रश्न 21. “प्रारंभिक बौद्ध मत में निर्वाण प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व दिया गया है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए ।
उत्तर : निर्वाण का अर्थ है-जीवन-मरण ने चक्र से मुक्ति। भगवान बुद्ध जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति तथा आत्म-ज्ञान के लिए व्यक्ति के अपने प्रयास तथा सम्यक् कर्म की कल्पना की। उनके लिए इसका अर्थ था, अहं और इच्छा का समाप्त हो जाना जिससे गृहस्थी वालों के दु:खों के चक्र का अंत हो सकता था। बौद्ध परंपरा के अनुसार उनका अपने शिष्यों के लिए अंतिम निर्देश था, “तुम सब अपने लिए स्वयं ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें स्वयं ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूँढ़ना है।”

प्रश्न 22. प्रारंभिक भारतीय कालांश में मंदिर वास्तुकला के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर : प्रारंभिक भारतीय मंदिर वास्तुकला के अंतर्गत विशाल चट्टानों को काटकर गुफा मंदिरों का निर्माण किया गया। इन गुफा मंदिरों के प्राचीनतम साक्ष्य मौर्य काल में मिलते हैं। मौर्य सम्राट अशोक और उसके पौत्र दशरथ नें गया (बिहार) के पास बराबर और नागार्जुन की पहाड़ियों में चट्टानों को काटकर गुहा मंदिरों का निर्माण करवाया था। इन गुफा मंदिरों को आजीवकों को दान में दिया गया था।देवी-देवताओं की मूर्तियों को रखने के लिए सबसे पहले जो मंदिर बनवाये गये, वे चौकोर रूप में होते थे, जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इसमें एक दरवाजा होता था जिसमें उपासक मूर्तिपूजा करने के लिए अंदर जा सकता था। कालान्तर में गर्भ -गृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा जाता था। आगे चलकर मंदिरों की स्थापत्य कला का काफी विकास हुआ। इसके अंतर्गत मंदिरों में बड़े-बड़े हॉल और द्वार बनाए जाने लगे। आठवीं शताब्दी में बने एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर में मंदिर स्थापत्यकला की सारी विशेषताएँ समाहित की गई हैं।

प्रश्न 23. ‘मुक्तिदाता’ की संकल्पना बौद्ध धर्म में अद्वितीय नहीं थी। विवेचना कीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘मुक्तिदाता’ की संकल्पना केवल बौद्ध धर्म से ही संबंधित नहीं थी। हिंदू धर्म की विभिन्न परंपराओं में भी ऐसे ही विचार विकसित हुए। उदाहरण के लिए वैष्णववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुईं। इस परंपरा के अंदर दस अवतारों की कल्पना है। यह माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के कारण जब दुनिया में अव्यवस्था और विनाश की स्थिति आ जाती है तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते हैं। सम्भवत: अलग-अलग अवतार देश में भिन्न-भिन्न हिस्सों में लोकप्रिय थे। इन सभी स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परस्परा के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण तरीका था।

प्रश्न 24. सुत्त-पिटक ने बौद्ध दर्शन की पुनर्रचना किस प्रकार की है? बौद्ध त्रिपिटक के बारे में उल्लेख कीजिए।

उत्तर : बौद्ध धार्मिक ग्रंथ (Religious books of Buddhism) : साँची के स्तूप के अतिरिक्त बौद्ध धर्म के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अनेक बौद्ध धार्मिक ग्रंथ प्रयोग में लाए जाते थे। ब्राह्मण साहित्य की तरह बौद्ध साहित्य भी इतिहास निर्माण में कुछ कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक है। इनके नाम हैं-सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्मपिटक। गौतम बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के उपरांत इनकी रचना हुई। सुत्तपिटक में बुद्ध के धार्मिक विचारों तथा वचनों का संग्रह है। विनयपिटक में बौद्ध संघ के नियमों का उल्लेख है तथा अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन का विवेचन है। बुद्ध के उपदेश तथा शिक्षाएँ प्रायः सभी स्थलों पर कहानियों तथा दृष्टांतों के साथ संबद्ध रखते हैं। अत: त्रिपिटक नामक बौद्ध ग्रंथों में जानकारी की बहुत-सी बातें हैं जिनसे राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक स्थितियों का तत्कालीन (लगभग 600 ई. पू.) ज्ञान अर्जित किया जा सकता है।

‘महावास’ तथा ‘दीपवम्स’ बौद्धों के दो अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। इनकी रचना श्रीलंका में पालि भाषा में ही की गई है इससे श्री लंका के राजवंशों के अतिरिक्त तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक अवस्थाओं के विषय में उपयोगी सूचनायें उपलब्ध होती हैं बौद्धों के गैर धार्मिक साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं रोचक हैं गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों से संबंधित कथाएँ। यह माना जाता था कि अंत में गौतम के रूप में जन्म लेने से पहले बुद्ध 500 से भी अधिक पूर्व जन्मों से गुजरे थे तथा इनमें से कई जन्मों में उन्होंने पशु-जीवन धारण किया था। पूर्व जन्म की कथाएँ जातक कथाएँ कहलाती हैं तथा प्रत्येक जातक कथा एक प्रकार की लोक कथा है। ये जातक ईसा पूर्व पाँचवीं से दूसरी सदी तक की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति पर बहुमूल्य प्रकाश डालते हैं। प्रसंगवश ये कथाएँ बुद्धकालीन राजनीतिक घटनाओं की भी जानकारी देती हैं।
इसके कि उसमें पत्थर की वेदिकाएँ हैं। ये पत्थर की वेदिकाएँ जो किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरण द्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वा तोरण द्वार से प्रवेश करके टीले को दाईं तरफ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों। बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जो की ढेरी में स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की कला के काफी उदाहरण मिलते हैं।

प्रश्न 26. ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत 600 तक पौराणिक हिंदू धर्म के उदय को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : (i) पौराणिक हिंदू धर्म का उदय मुक्तिदाता का कल्पना से हुआ था। हिंदू धर्म में दो परंपराएं शामिल थीं -वैष्णव तथा शैव। वैष्णव परंपरा में विष्णु को सबसे महत्त्वपूर्ण देवता माना जाता है, जबकि शैव संकल्पना में शिव परमेश्वर है। इन परंपराओं में एक विशेष देवता की पूजा को विशेष महत्त्व दिया जाता था।
(ii) वैष्णववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई। इस परंपरा में दस अवतारों की कल्पना की गई है। यह माना जाता था कि पाप बढ़ जाने के कारण दुनिया में अव्यवस्था और विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे समय पर विश्व की रक्षा के लिए भगवान् अलग-अलग रूपों में अवतार लेते हैं।
(iii) कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। अन्य देवताओं की भी मूर्तियों बनाई गई। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था परंतु उन्हें कई मूर्तियों में मनुष्य के रूप में भी दर्शाया गया है। ये सभी चित्रण देवताओं से जुड़ी हुई मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे।
(iv) मूर्तियों के अर्थ को समझने के लिए इतिहासकारों को इनसे जुड़ी कहानियों से परिचित होना पड़ता है । कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दी के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित पुराणों में मिलती हैं। इनमें अनेक किस्से ऐसे हैं जो सैकड़ों वर्षों तक सुने-सुनाए जाते रहे थे।
(v) पुजारी, व्यापारी और सामान्य स्त्री-पुरुष एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते हुए अपने विश्वासों तथा अवधारणाओं का आदान-प्रदान करते थे। उदाहरण के लिए, वासुदेव-कृष्ण मथुरा प्रदेश के महत्त्वपूर्ण देवता थे।

प्रश्न 27. बुद्ध के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के पश्चात् बौद्ध धर्म के तेजी से फैलने के कारणों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

“बुद्ध के जीवनकाल में तथा उसकी मृत्यु के पश्चात् भी बौद्ध धर्म तेजी से फैला”। उक्त कथन का औचित्य निर्धारित कीजिए।
उत्तर-बुद्ध धर्म के तेजी से फैलने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे .
(1) लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे। वे उस युग में तेजी से हो रहे सामाजिक बदलावों के कारण उलझन में थे। अब वे कोई नया चाहते थे।
(2) बुद्ध धर्म में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया जाता था। इस बात से लोग बुद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए।
(3) बुद्ध धर्म के छोटे तथा कमजोर लोगों के प्रति मित्रता एवं करुणा के भाव ने भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया।
(4) बुद्ध संघ में महिलाओं के प्रवेश से बुद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई।
(5) बुद्ध अपने युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे। सैकड़ों वर्षों के दौरान उनके संदेश पूरे उपमहाद्वीप में और उसके बाद मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तथा श्रीलंका से समुद्र पार कर म्यांमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैल गए।

प्रश्न 28. “ईसवी पूर्व प्रथम मध्य सहस्त्राब्दि का काल इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।” इस कथन का औचित्य निर्धारित कीजिए।
उत्तर : (i) ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि का काल विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस काल में ईरान में जरथुष्ट्र जैसे चिन्तक, चीन में खुंग त्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और भारत में महावीर, बुद्ध और कई अन्य चिन्तकों का उद्भव हुआ। उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया। साथ-साथ वे इंसानों और विश्व व्यवस्था के बीच रिश्ते को समझने की कोशिश कर रहे थे।
(ii) यही वह समय था जब गंगा घाटी में नये राज्य और शहर उभर रहे थे और सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में कई तरह के बदलाव आ रहे थे। ये मनीषी इन बदलते हालात को भी समझने की कोशिश कर रहे थे।

प्रश्न 29. समकालीन बौद्ध ग्रंथों में विभिन्न विचार वाले लोगों से जीवंत चर्चाओं और विवादों की एक झलक कैसे मिलती है ? स्पष्ट कीजिए।

अथवा

बुद्ध की शिक्षाओं की पुनर्रचना कहानियों से हुई है। उन शिक्षाओं तथा घटनाओं को स्पष्ट कीजिए जिन्होंने बुद्ध के जीवन में परिवर्तन ला दिया।
उत्तर : उपनिषदों (छठी सदी ई. पू.) में पाई गई विचारधाराओं से पता चलता है कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे। क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता था ? ऐसे मुद्दों पर पुरजोर बहस होती थी। मनीषी परम यथार्थ की प्रकृति को समझने और अभिव्यक्त करने में लगे थे वैदिक परम्परा से बाहर के कुछ दार्शनिक यह सवाल उठा रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी चिंतन करने लगे।प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में हमें 64 सम्प्रदायों या चिंतन परम्पराओं का उल्लेख मिलता है। इससे हमें चर्चाओं और विवादों की एक झाँकी मिलती है। शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूम कर अपने दर्शन या विश्व के विषय में अपनी समझ को लेकर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क- वितर्क करते थे।बुद्ध की शिक्षाओं को सुत्र पिटक में दी गई कहानियों के आधार पर पुनर्निमित किया गया है। हालांकि कुछ कहानियों में उनकी अलौकिक शक्तियों का वर्णन है, दूसरी कथाएँ दिखाती हैं कि अलौकिक शक्तियों की बजाय बुद्ध ने लोगों को विवेक और तर्क के आधार पर समझाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए जब एक मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ बुद्ध के पास आई तो उन्होंने बच्चे को जीवित करने के बजाय उस महिला को मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझाई। ये कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गई थीं जिससे इन्हें आसानी से समझा जा सकता था।बौद्ध दर्शन के अनुसार विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है, यह आत्माविहीन है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है। इस क्षणभंगुर दुनिया में दुःख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्त्व है। घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दु:खों से मुक्ति पा सकता है। बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था।

प्रश्न 30, वर्णन कीजिए कि बुद्ध की शिक्षाएँ सुत पिटक की कहानियों के आधार पर कैसे पुनर्निर्मित की गई हैं?

अथवा

‘बुद्ध की शिक्षाओं को किस प्रकार पुनर्निमित किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : महात्मा बुद्ध अथवा बौद्ध धर्म की मुख्य शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं
(1) बौद्ध दर्शन के अनुसार विश्व अनित्य है। यह लगातार बदल रहा है। यह आत्मविहीन (आत्मा) है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी अथवा शाश्वत नहीं है।
(2) इस क्षणभंगुर संसार में दु:ख मनुष्य के जीवन को जकड़े हुए हैं। घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य संसार के दु:खों से मुक्ति पा सकता है।
(3) बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान् का होना या न होना अप्रासंगिक था।
(4) बुद्ध का मानना था कि समाज का निर्माण मनुष्यों ने किया था न कि ईश्वर ने। इसीलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान बनने की सलाह दी। बुद्ध के अनुसारव्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता है।
(5) बुद्ध ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्म-ज्ञान और निर्वाण के लिए सम्यक् कर्म पर बल दिया।
(6) बौद्ध परंपरा के अनुसार अपने शिष्यों के लिए बुद्ध का अंतिम निर्देश यह था : “तुम सब अपने लिए स्वयं ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें स्वयं ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढना है।”

प्रश्न 31. बुद्ध और महावीर के वेदों के प्रभुत्व पर दिए गए विचारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : बुद्ध और महावीर ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए। माना ब्राह्मणवाद के अनुसार किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति तथा लिंग से निर्धारित होता है। उसके सुख-दु:ख भी इसी से जुड़े हैं। इसके विपरीत बुद्ध तथा महावीर का मानना था कि जीवन के दुःखों से मुक्ति का प्रयास प्रत्येक व्यक्ति स्वयं कर सकता है। बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध का अपने शिष्यों के लिए अंतिम निर्देश था, “तुम सब अपने लिए स्वयं ही ज्योति बनो, क्योंकि तुम्हें स्वयं ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूँढना है।”
बुद्ध और महावीर ने वैदिक धर्म में प्रचलित पशुबलि का भी विरोध किया और अहिंसा पर बल दिया। उन्होंने यज्ञों को भी कोई महत्त्व नहीं दिया।

प्रश्न 32. स्तूप की संरचना का वर्णन कीजिए तथा महत्त्वपूर्ण स्तूपों के कोई दो उदाहरण दीजिए ।
उत्तर : स्तूप की संरचना (The structure of the Stupa) : स्तूप (संस्कृत शब्द का अर्थ टीला) का जन्म एक गोलार्द्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया । धीरे-धीरे इसकी संरचना ज्यादा जटिल हो गई जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का संतुलन बनाया गया। अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँचा देवताओं के घर का प्रतीक था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे जिस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी । टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।साँची और भरहुत के स्तूप (Srupas at Sanchi and Bharhut) : साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप बिना अलंकरण के हैं सिवाय इसके कि उसमें पत्थर की वेदिकाएँ हैं। ये पत्थरं की वेदिकाएँ जो किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं और चारों दिशाओं में खड़े तोरण द्वार पर खूब नक्काशी की गई थी। उपासक पूर्वी तोरण द्वार से प्रवेश करके टीले को दाई तरफ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों । बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी की जाने लगी। अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जी की ढेरी में स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की कला के काफी उदाहरण मिलते हैं।

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