Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 4 Important Question Answer 8 Marks विचारक, विश्वास और इमारतें सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 1. पौराणिक हिंदू धर्म का उदय किस प्रकारहुआ? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताओ।
उत्तर : पौराणिक हिंदू धर्म का उदय मुक्तिदाता की कल्पना से हुआ था। हिंदू धर्म में दो परंपराएँ शामिल थीं-वैष्णव तथा शैक।
वैष्णव परंपरा में विष्णु को सबसे महत्त्वपूर्ण देवता माना जाता है, जबकि शैव संकल्पना में शिव परमेश्वर है । इन परंपराओं में एक विशेष देवता की पूजा को विशेष महत्त्व दिया जाता था | इस प्रकार की उपासक और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम आर समर्पण का रिश्ता माना जाता था। इसे भक्ति कहते है।
अवतारवाद : वैष्णववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुई। इस परंपरा में दस अवतारों की कल्पना की गई है। यह माना जाता था कि पाप बड़ जाने के कारण दुनिया में अव्यवस्था और विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । ऐसे समय पर विश्व की रक्षा के लिए भगवान् अलग-अलग रूपों में अवतार लेते हैं। संभवत: अलग-अलग अवतार देश के भिन्न-भिन्न भागों में लोकप्रिय थे। इन सभी स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेने से ही वैष्णववाद एक एकीकृत धार्मिक परंपरा बन गई।
मूर्तियाँ : कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। अन्य देवताओं की भी मूर्तियों बनाई गई। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था परंतु उन्हें कई मूर्तियों में मनुष्य के रूप में भी दर्शाया गया है। ये सभी चित्रण देवताओं से जडी हुई मिश्रित अवधारणाओं पर आधारित थे। उनके गुणों और प्रतीकों को उनके शिरोवस्त्रों, आभूषणों, आयुधों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से व्यक्त किया जाता था।
पुराणों की कहानियाँ : इन मूर्तियों के अर्थ को समझने के लिए इतिहासकारों को इनसे जुड़ी कहानियों से परिचित होना पड़ता है। कई कहानियाँ प्रथम सहस्त्राब्दी के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित पुराणों में मिलती हैं। इनमें अनेक किस्से ऐसे हैं जो सैकड़ों वर्षों तक सुने-सुनाए जाते रहे थे। इनमें देवी- देवताओं की कहानियाँ भी हैं। इन्हें सरल संस्कृत श्लोकों में लिखा गया था और इन्हें लोगों को ऊँची आवाज में पढ़कर सुनाया जाता था।
पुराणों की अधिकतर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से विकसित हुई। पुजारी, व्यापारी और सामान्य स्त्री-पुरुष एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते हुए अपने विश्वासों तथा अवधारणाओं का आदान-प्रदान करते थे। उदाहरण के लिए वासुदेव-कृष्ण मथुरा प्रदेश के महत्त्वपूर्ण देवता थे परंतु कई शताब्दियों के दौरान उनकी पूजा देश के अन्य प्रदेशों में भी फैल गई।

प्रश्न 2. जैन धर्म की कला, स्थापत्य कला और साहित्य के विकास में योगदान बताइए।

उत्तर : जैन धर्म के अनुयायियों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए कला का भी सहारा लिया। उन्होंने भवन निर्माण कला मन्दिर निर्माण कला, मूर्तिकला और चित्रकला के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जैनियों ने अपने सन्तों की स्मृति में स्तूपों, मठों और मंदिरों का निर्माण किया और उन्हें पत्थरों की रैलिंग, सुंदर प्रवेश द्वारों, पाषाण छत्रों, उत्कृष्ट स्तंभों आदि से अलंकृत किया। जैनियों ने अपने तीर्थ स्थानों जैसे-पार्श्वन पर्वत. पावा, पुरी (बिहार), राजगृह, गिरनार, आबू आदि में अनेक सुंदर मन्दिरों एवं मूर्तियों की स्थापना की। राजस्थान में आबू पर्वत पर बना जैन मन्दिर कला का उत्कृष्ट नमूना है। मथुरा, बुन्देलखंड और मध्य भारत में उन्होंने कई मन्दिर बनवाये। दक्षिणी भारत में जैनियों के सुंदर मंदिर अनेक स्थानों पर आज भी देखे जा सकते हैं।
जैनियों ने पर्वतों की चट्टानों को काट-काटकर सुन्दर मन्दिरों व गुफाओं का निर्माण किया। उड़ीसा में हाथी-गुफा, ऐलोरा में इन्द्रसभा गुफा और उदयगिरि में सिंह गुफा जैन कला के उत्तम नमूने हैं। जैन मुनियों व जैन तीर्थस्थानों का भी जैन चित्रकला में चित्रण किया गया है। जैन कला बड़ी सरल व सादा थी। इसमें बौद्ध और हिन्दू कला की चमक-दमक और अनुकरण का प्रभाव दिखाई नहीं देता।
जैनियों ने धर्म प्रचार के लिए तथा अपने ग्रन्थ लिखने के लिए जनसाधारण की तत्कालीन भाषाओं का प्रयोग किया। जैनियों के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अंग’ तथा ‘उप-अंग’ आदि प्राकृत भाषाओं में लिखे गये। उन्होंने अपभ्रंश भाषा में कई ग्रंथों की रचना की। धीरे-धीरे उन्होंने संस्कृत भाषा को अपना लिया। उन्होंने व्याकरण, काव्य, कोष, कथाएँ आदि विभिन्न विषयों पर संस्कृत में उत्तम ग्रन्थों की रचना की। इस प्रकार इस भाषा की उन्नति हुई।

प्रश्न 3. बौद्ध धर्म के मुख्य उपदेशों का वर्णन करो। इनका भारतीय जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ?

अथवा

बुद्ध की शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर : महात्मा गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ न तो घोर तप पर आधारित थीं और न ही भोग या शिथिलता पर। शिक्षाओं का आधार चार मूल सिद्धांत थे-
(i) संसार दुःखों का घर है।
(ii) इच्छाएँ ही दु:खों का कारण बनती हैं। (ii) इच्छाओं का दमन ही दुःखों के नाश का मूल मंत्र है।
(iv) इच्छाओं का दमन अष्ट, मार्ग द्वारा करना चाहिए। আष्टमार्ग निम्न हैं : (a) सम्यक् समाधि, (b) शुद्ध कथन, (c) शुद्ध आचरण (d) शुद्ध दृष्टि, (e) शुद्ध विश्वास, ) शुद्ध संकल्प, (g) शुद्ध जीवन, (h) शुद्ध विचार।
मध्यम मार्ग के सिद्धांत : (अ) अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। (आ) कर्म और पुनर्जन्म में विश्वास। (इ) जाति-पाँति और छुआछूत में अविश्वास| (ई) ईश्वर के अस्तित्व के विषय में मौन (उ) वेद को ईश्वरीय ज्ञान का स्रोत न मानना। (ऊ) जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति अर्थात् मोक्ष। (ए) शुद्ध जीवन पर विशेष बल, जिसमें मनसा, वाचा, कर्मणा, सत्य, अहिंसा पर बल दिया जाता था। (ऐ) यज्ञ और बलि पर विश्वास न था।
भारतीय जीवन पर प्रभाव (Effect on Indian Life) : लोगों में सत्य, अहिंसा आदि नैतिक गुणों का विकास हुआ। समाज ३ में ब्राह्मणों का प्रभाव कम हो गया। लोग व्यर्थ के आडम्बरों से में दूर हो गये। तक्षशिला और नालन्दा जैसे विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए देश-विदेश से विद्यार्थी आते थे। इससे अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री बढ़ी। बौद्ध धर्म के विदेशों में फैलने से वहाँ से सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्बन्ध जुड़े।
जातीय बंधन ढीले पड़ गये। समाज के निम्न वर्ग के लोगों के लिए बौद्ध धर्म के दरवाजे खुले थे। जो हिंदू कट्टरता से तंग आकर धर्म परिवर्तन की बात सोचते थे, उन्हें अपना मनचाहा धर्म मिल गया। जादू-टोना और अंधविश्वासों से लोग दूर हो गये।

प्रश्न 4. जैन धर्म बौद्ध धर्म में कौन-कौन सी समानताएँ थीं ?
उत्तर : 1. हिन्दू धर्म की कुरीतियों का विरोध : दोनों धर्मों का जन्म हिन्दू धर्म में फैली कुरीतियों का विरोध करने के लिए ही हुआ था। दोनों धर्म जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच एवं मूर्ति पूजा के विरोधी थे।
2. दोनों क्षत्रिय राजकुमार : दोनों धर्मों के प्रवर्तक, क्षत्रिय राजकुमार थे। दोनों ही जीवों के प्रति दयाभाव रखते थे। दोनों का जनसाधारणं पर विशेष प्रभाव था।
3.अहिंसा पर बल : दोनों धर्म अहिंसा में विश्वास रखते थे और किसी भी जीव को कष्ट देना महापाप समझते थे।
4.ईश्वर की सत्ता को न मानना : बौद्ध और जैन धर्म दोनों ही ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं रखते थे और वेदों को भी ईश्वर कृत नहीं मानते थे।
5.यज्ञ व कर्मकांड के विरोधी : जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म यज्ञ, हवन आदि अनुष्ठानों अथवा आडंबरों से दूर थे और यज्ञ में बलि देने के कट्टर विरोधी थे।
6.पवित्रता पर बल : दोनों धर्म बाहरी व आन्तरिक पवित्रता के पक्षपाती थे।
7.;जातिवाद का विरोध: दोनों धर्म जातिवाद के घोर विरोधी थे और अन्य धर्म वालों का अपने धर्म में आने के लिए स्वागत करते थे।
8. मोक्ष का समान लक्ष्य:दोनों धर्म जीव को मुक्ति दिलाने के लिए मोक्ष को आवश्यक मानते थे। वे पुनर्जन्म एवं आवागमन के चक्कर से मुक्ति चाहते थे।

प्रश्न 5. ईसा पूर्व छठी शताब्दी में दो धार्मिक आंदोलनों के प्रारंभ होने के चार कारण बताइए।
उत्तर : ईसा की छठी शताब्दी में जिन दो धार्मिक आंदोलनों का जन्म हुआ; वे थे-जैन धर्म और बौद्ध धर्म। इनके प्रारंभ होने के निम्नलिखित कारण थे :
(क) हिन्दू धर्म की, जटिलता (Complexity of Hinduism) : हिन्दू धर्म में विभिन्न प्रकार के आडम्बर और अन्धविश्वास आ गये थे। कर्मकांड बढ़ते जा रहे थे। अच्छे आचरण तथा हृदय की पवित्रता का लोप हो गया था।
(ख) धार्मिक व्यय (Religious Expenditure) : बड़े-बड़े यज्ञों व हवनों में होने वाले व्यय से जनसाधारण घबरा गया था। धार्मिक अनुष्ठान दिन-प्रतिदिन महँगे होते जा रहे थे। अतः जनसाधारण (निर्धन जनता) उनका व्यय सहन करने में असमर्थ था, इसलिए उनका विश्वास इनसे दिन-प्रतिदिन हटता जा रहा था।
(ग) बलि प्रथा (Sacrifice system) : देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिये प्रायः पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी। ऐसा करने के लिए हर किसी की आत्मा नहीं मानती थी। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि किस प्रकार से एक बेजुबान पशु की हत्या करने से देवता प्रसन्न हो जाते हैं। अतः लोगां की रुचि उस धर्म में बढ़ी, जिसमें हिंसा नाममात्र की भी न थी।
(घ) तंत्र मंत्र में विश्वास (Belief in witchcraft) : हिन्दू धर्म में बढ़ती हुई जटिलता के कारण तंत्र – मंत्र एवं जादू-टोनों में लोगों का विश्वास अधिक बढ़ गया था। धर्म में ब्राह्मणों के एकाधिकार के प्रति भी लोगों में रोष बढ़ गया था। अत: लोग ऐसे धर्म की तलाश में थे. जिसमें किसी वर्ग विशेष का एकाधिकार न हो।

प्रश्न 6. ‘बुद्ध ने अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया।’ इस कथन पर प्रकाश डालते हुए, जीवन पर उनकी शिक्षाओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है यह आत्माविहीन (आत्मा) है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है।
(ii) इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्त्व है।
(iii) घोर तपस्या और विषयाशक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुखों से मुक्ति पा सकता है।
(iv) बुद्ध का मानना था कि समाज का निर्माण इंसानों ने किया था न कि ईश्वर ने। इसीलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी। उनका मानना था कि व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश को बदला जा सकता था।
(v) बुद्ध ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्मज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति केंद्रित हस्तक्षेप और सम्यक कर्म की कल्पना की। निर्वाण का मतलब था अहं और इच्छा का खत्म होना जिससे गृहत्याग करने वालों के दुख के चक्र का अंत हो सकता था।
(vi) बौद्ध परंपरा के अनुसार अपने शिष्यों के लिए उनका अंतिम निर्देश था “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढना है।”
(vii) बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में ईश्वर का होना या न होना अप्रासंगिक था।
(viii) बुद्ध ने धर्म या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा दी।

प्रश्न 7. बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ हिन्दू धर्म की शिक्षाओं से कैसे भिन्न हैं ?
उत्तर : यद्यपि हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों में प्रारम्भ में कई अंतर थे, परन्तु समय की गति के साथ साथ धीरे-धीरे दोनों धर्मों में कई अन्तर दिखाई देने लगे। निम्नलिखित बातों में दोनों धर्म एक दूसरे से भिन्न हैं :
1.अहिंसा का सिद्धांत (Principle of Ahinsa) : हिन्दू धर्म की अपेक्षा बौद्ध मत ने अहिंसा के सिद्धांत पर बहुत बल दिया है और पशुओं की बलि का घोर विरोध किया है परन्तु हिन्दू लोग स्वयं मांस खाने के साथ-साथ पशुओं की बलि भी देते थे। 2. ईश्वर का अस्तित्व (Status of God) : हिन्दू धर्म में एक सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी ईश्वर के अस्तित्व को गया परन्तु महात्मा बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व के विषय में शान्त थे। उनके अनुसार निर्वाण प्राप्त करने में ईश्वर का हाथ नहीं है। माना
3.यज्ञ, बलि व कर्मकांडों में मतभेद (Difference in Yajana, sacrifices and rituals) : हिन्दू लोग यज्ञ, बलि और अन्य कर्मकांडों को मुक्ति पाने और ईश्वर प्राप्ति के लिए आवश्यक मानते थे, परंतु महात्मा गौतम बुद्ध का इन सब में कोई विश्वास न था। वे लोग तो पवित्र जीवन पर विशेष जोर देते थे।
4.वेद, संस्कृत और ब्राह्मणों की स्थिति में मतभेद (Difference in the condition of Vedas, Sanskrit and Brahmins) : हिन्दू धर्म में वेदों का बड़ा ऊँचा स्थान है और संस्कृत भाषा को बहुत पवित्र माना गया है। ब्राह्मणों का आदर करना अन्य हिन्दुओं के लिए आवश्यक माना गया है जबकि बौद्ध मत में ब्राह्मणों को कोई स्थान नहीं दिया है और न ही वेदों व संस्कृत को पवित्र माना गया है।
5.जाति प्रथा (Caste system) : हिन्दू धर्म बहुत ऊंच-नीच पाई जाती थी। शूद्र लोगों को न तो वेद पढ़ने की आज्ञा थी और न ही उन्हें मोक्ष का अधिकारी समझा जाता था इसके विपरीत महात्मा बुद्ध जाति-पाँति, ऊँच-नीच आदि किसी को नहीं मानते थे वरन् सब मनुष्यों को समान समझते थे।
6.धर्म प्रचार में मतभेद (Difference in propaganda of Religion) : बौद्ध मत एक प्रचारक मत था, परन्तु हिन्दू-धर्म इस बात में बहुत पीछे रह गया। बौद्ध-भिक्षुओं ने बौद्ध धर्म का प्रचार करके लोगों को अपने धर्म में लाने का प्रयास किया। वे एक संघ में संगठित थे और सुव्यवस्थित ढंग से कार्य करते हिन्दू धर्म में बौद्ध धर्म की भाँति प्रचार करने के लिए कोई संघ नहीं था। अतः प्रचार के क्षेत्र में हिन्दू धर्म बहुत पीछे रह गया।
7.एक में ज्ञान पर, दूसरे में कर्म पर जोर (One based on Knowledge, Second on Karma) : हिन्दू धर्म में मोक्ष प्राप्त करने के लिए ज्ञान पर विशेष बल दिया गया जबकि बौद्ध धर्म में मोक्ष प्राप्त करने के लिए अच्छे कर्म और अच्छा जीवन व्यतीत करने पर बल दिया गया है।

प्रश्न 8. बताएँ कि बौद्ध धर्म का पतन होने के बाद भी भारत में इस धर्म का प्रभाव कैसे और किन-किन पहलुओं पर जमा रहा ?

अथवा

भारतीयों के राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को बौद्ध धर्म ने कैसे प्रभावित किया।
उत्तर : (क) राजनैतिक प्रभाव (Political Effect); 1. जब कई तत्कालीन शासकों ने अपनी साम्राज्यवादी भावन को छोड़कर बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया, तो कई वर्षों तक आस-पास के क्षेत्रों में शान्ति छाई रही। कहीं से किसी संघर्ष या टकराव का समाचार नहीं मिला।
2.बौद्ध धर्म के अधिकांश ग्रन्थ धार्मिक दृष्टि से लिखे गये थे फिर भी उनसे मिली जानकारी के आधार पर हम तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक दशा का अनुमान लगा सकते हैं।
3.जब सम्राटों ने बौद्ध धर्म को अपना लिया तो पशुओं के लिए पानी पीने के स्थान, मनुष्यों के लिए धर्मशाला, अस्पताल और सराय आदि बनाये गये।
4.बौद्ध धर्म ने विश्व बन्धुत्व की भावना को प्रसारित किया। भारत से प्रचारक जावा, सुमात्रा, लंका आदि विदेशों में जाने लगे। विदेशी बौद्ध (फाहियान और ह्वेनसांग जैसे) भारत आने लगे जिसके परिणामस्वरूप परस्पर सहयोग और मैत्री को बढ़ावा मिला।
5.बौद्ध धर्म के प्रभाव से तत्कालीन शासकों की सेनाओं में निष्क्रियता आ गई। वर्षों तक युद्ध न लड़ने के कारण वे आलसी हो गये। अतः जब विदेशियों ने भारत पर आक्रमण किये तो वे विदेशी आक्रमणकारियों का मुकाबला न कर सके।
(ख) धार्मिक प्रभाव (Religious Effect) :
1.बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने हिन्दू धर्म की बुराइयों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। अतः हिन्दू धर्म का अस्तित्व बचाने के लिए पुरोहितों तथा ब्राह्मणों को हिन्दू धर्म में सुधार लाने के लिए बाध्य होना पड़ा।
2.बौद्ध धर्म ने जातीय बन्धनों पर प्रहार किया और अपने धर्म में प्रवेश के लिए सभी का स्वागत किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू लोग अपना धर्म छोड़कर बौद्ध-धर्म के अलावा अन्य धर्मों में नहीं गये। सरल और आदर्श धर्म उन्हें केवल बौद्ध धर्म ही जँचा, अत: वे इसी धर्म में सम्मिलित हो गये।
3.आर्य लोग खुले वातावरण में प्रकृति की पूजा करते थे। बौद्ध धर्म ने अपने आराध्य-देवों के लिए सुन्दर मन्दिरों का निर्माण कराया जो स्थापत्य कला के अनुपम उदाहरण हैं।
4.हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म में काफी समय तक वाद-विवाद होता रहा जिसके परिणामस्वरूप भक्ति के लिए विभिन्न सम्प्रदायों का जन्म हुआ।
(ग) सामाजिक प्रभाव (Social Effect) –
1. बौद्ध द्वारा भारतीय आधार का ढाँचा तोड़ देने के बाद भारतीय समाज में सामाजिक सद्भाव का वातावरण पैदा हो गया।
2. बौद्ध धर्म के अहिंसा के प्रचार से पशुवध में कमी आई जिसके फलस्वरूप हवनों, यज्ञों में दी जाने वाली पशु बलि समाप्त होने से पशुओं की जान बचने लगी और उनकी संख्या में वृद्धि होने लगी।
(घ) सांस्कृतिक प्रभाव (Cultural Effect)-
1.अशोक, कनिष्क और हर्षवर्धन जैसे राजाओं ने कई मठ, विहार एवं स्तूप बनवाये। कनिष्क ने गांधार कला को प्रोत्साहन दिया।
2.बौद्ध साहित्य जन साधारण की भाषा पालि में था। अतः इससे जनता के ज्ञान-विज्ञान में वृद्धि के साथ धार्मिक अभिरुचि भी बढ़ी।
3.बौद्ध धर्म के प्रचारक कई देशों जैसे लंका, जावा, सुमात्रा, चीन आदि देशों में गये। इससे भारतीय संस्कृति की छाप इन देशों पर भी पड़ी। इससे आपसी सहयोग बढ़ने के साथ-साथ परस्पर व्यापार को भी बढ़ावा मिला।

प्रश्न 9. बौद्ध धर्म के पतन के कारण लिखें।
उत्तर : 1. हिन्दू धर्म में सुधार : हिन्दू धर्म में असंख्य देवी-देवता हैं। अत: उन्होंने गौतम बुद्ध को भी अवतार मानकर उसकी भी पूजा अर्चना शुरू कर दी। उनके कुछ सिद्धांतों जैसे सत्य और अहिंसा को ग्रहण कर लिया। ब्राह्मणों एवं हिन्दू विद्वानों के समय पर चेत जाने के कारण हिन्दू धर्म का विघटन रुक गया। जो लोग हिन्दू धर्म छोड़कर चले गये थे। उसे उन्होंने पुनः स्वीकार कर लिया।
2.बौद्ध धर्म का विभाजन (Split in Buddhism) : कनिष्क के काल में बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयान और महायान के रूप में हो गया था। महायान शाखा को मूर्तिपूजा की छूट दी गई जिसके फलस्वरूप कई लोगों ने फिर से इस धर्म में प्रवेश पा लिया, जो पहले इसे छोड़ चुके थे।
3.बौद्ध मठों में भ्रष्टाचार (Corruption in the Buddhist Sanghas) : मठों में सुख-सुविधाएँ मिल जाने तथा स्त्रियों को भिक्षुणी बनाने की छूट दिये जाने के कारण मठों में भ्रष्टाचार फैल गया। भिक्षु तथा भिक्षुणियाँ धार्मिक कार्यों की आड़ में विषय-वासनाओं में लग गये। उनका चरित्र भ्रष्ट हो गया। उनके सब त्याग, तपस्या व आदर्श मिट्टी में मिल गये। गौतम बुद्ध के उपदेशों को भूलकर वे वासनाओं में लिप्त हो गये जिससे समाज पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
4.राजकीय सहायता का न मिलना (Loss of Royal Patronage) : कनिष्क की मृत्यु के पश्चात् बौद्धों को राजकीय सहायता मिलनी बन्द हो गई। गुप्त साम्राज्य के आ जाने के कारण हिन्दू धर्म को बढ़ावा मिलना प्रारम्भ हो गया। उधर बौद्ध धर्म धनाभाव के कारण अधिक दिनों तक नहीं चल सका।
5.बौद्ध धर्म में जटिलता आना (Arrival of complexity in the Budalhism) : बोद्धों ने हिन्दुओं के कई सिद्धांत ग्रहण कर लिये थे। जन-साधारण की भाषा को छोड़कर वे संस्कृत में साहित्य रचना करने लगे थे। अत: यह धर्म जनता की समझ से बाहर होने लगा था।
6.हिन्दू उपदेशकों का आना (Coming of the Hindu Missionaries) : कुमारिल भट्ट और शंकाराचार्य जैसे हिन्दू विद्वानों के मैदान में आ जाने से बौद्ध विद्वानों की दाल गलनी बंद हो गई थी। वे इन सिद्धांत के तक्कों के सामने नहीं उहर पाते थे।
7.राजपूत शक्ति का विस्तार (Rise of Rajpoot Power) : सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक सारे उत्तरी भारत में राजपूतों का सत्ता छा गई। राजपूत शक्ति के उपासक थे। वे अहिंसा को कायरता मानते थे। उनका मत था कि बौद्ध मत में अहिंसा का अर्थ मृत्यु को बुलावा देना होता है, अतः अहिंसा आदि सिद्धांत वाक पर रख दिये गये। इससे बौद्ध धर्म का प्रचार कार्य बन्द होने लगा और वे विदेशों में जाने लगे।
8.मुसलमानों के आक्रमण (The Muslim Invasions) : बारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी और अन्य आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किये। बौद्धों में उनके आक्रमण का मुकाबला करने का साहस न था। अतः वे या तो मारे गये, या निकटवर्ती क्षेत्रों जैसे नेपाल, तिब्बत, बर्मा, श्रीलंका आदि में चले गये।
9.हूणों का आक्रमण (Invasions of the Hunas) : बौद्धों की अधिकतम हानि हूणों द्वारा हुई। उन्होंने हजारों भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। उनके मठों को खंडहर बना दिया। तक्षशिला आदि विश्वविद्यालयों को आग लगा दी तथा बौद्ध साहित्य को जला दिया। इस प्रकार से पंजाब, राजपूताना एवं उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त से बौद्धों का सफाया हो गया था।

प्रश्न 10. बौद्ध और जैन सम्प्रदायों के आंदोलनों को धार्मिक सुधार आंदोलन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर : (i) इस काल का समाज चार वर्गों में बँटा हुआ था। ब्राह्मण, जिन्हें पुरोहित और शिक्षा का काम सौंपा गया था, समाज में सबसे ऊँचा होने का दावा करते थे। वे कई विशेषाधिकारों के दान लेना, करों से छुटकारा और दण्ड की अधिकारी थे; जैसे- माफी आदि।
(ii) जो जितने ऊँचे वर्ण का होता था, वह उतना ही सुविधाधिकारी और शुद्ध माना जाता था। अपराधी, जितना ही नीच वर्ग का होता था, उसके लिये सजा उतनी ही कठोर होती थी।
(iii) यह स्वाभाविक था कि वर्ण विभाजन वाले समाज में तनाव हो क्षत्रिय लोगों ने ब्राह्मणों के समाज में ऊँचा स्थान पान पर आपत्ति को। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को जन्म मूलक मानने के विरुद्ध एक आन्दोलन छेड़ दिया।
जैन धर्म के संस्थापक वर्द्धमान महावीर और बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा गौतम बुद्ध दोनों क्षत्रिय वंश के थे। दोनों ने ब्राह्मणों की मान्यता को चुनौती दी।
(iv) ब्राह्मण प्रधान समाज में वैश्यों का स्थान तीसरी कोटि में था। प्रथम और द्वितीय कोटि में क्रमश: ब्राह्मण और क्षत्रिय आते हैं। अतः वैश्य ऐसे किसी समाज की तलाश में थे, जहाँ उनकी स्थिति सुधरे। वैश्यों ने महावीर और गौतम बुद्ध दोनों को उदारतापूर्वक सहायता की। इसके मुख्य कारण थे-इन दोनों का वर्ण व्यवस्था में विश्वास न होना। अहिंसा का उपदेश दिया, जिससे युद्ध रुक गये और व्यापार में वृद्धि हुई। ब्राह्मणों ने धर्म सूत्र द्वारा सूद लेना वर्जित कर रखा था, अत: वैश्य उनके विरोधी हो गये।
(v) बौद्ध धर्म और जैन धर्म, दोनों शुद्ध और नियमित जीवन के पक्षपाती थे। भिक्षुओं को सोना और चाँदी छूना वर्जित था। उन्हें अपने दाताओं से उतना ही लेना होता था, जितने से उनकी प्राण रक्षा हो सके। इसलिए उन्होंने गंगा घाटी के नये जीवन में विकसित भौतिक सुख-सुविधाओं का विरोध किया।

प्रश्न 11. महात्मा गौतम बुद्ध के जीवन एवं शिक्षाओं पर संक्षिप्त रूप से प्रकाश डालिए।

अथवा

महायान बौद्ध मत के विकास का वर्णन कीजिए। बुद्ध ने समाज धर्म या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा किस प्रकार दी ? स्पष्ट कीजिए।

अथवा

बुद्ध की शिक्षाओं की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1. महात्मा गौतम बुद्ध का जीवन (Life of Mahatma Gautam Budh) : महात्मा गौतम बुद्ध शाक्य वंश के एक राजकुमार थे। आपके पिता शुद्धोदन नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के राजा गौतम बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इनका जन्म 567 ई. पू. में प्रसिद्ध इतिहासकारों-डॉ० के० चौधरी और डॉ० आर. सी. मजूमदार आदि के मतानुसार कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी नामक वन में हुआ था। जन्म के दिन के बाद ही इनकी माता माया देवी का देहान्त हो गया, अत: सात इनका पालन-पोषण इनकी सौतली माँ गौतमी ने किया। उन्हें बड़े लाड़-प्यार से पाला गया और क्षत्रिय राजकुमा भाँति उन्हें ऊँची शिक्षा दिलाई गयी।
गौतम बुद्ध सब प्रकार से योग्य थे, परन्तु सांसारिक कार्यों में उनकी रुचि न थी। वे बचपन से ही बड़े विचारशील थे एवं जीवन-मरण, सुख-दु:ख आदि विषयों में प्रायः सोचते रहते थे। इनका जीवन बहुत विचारशील और सदैव चिंतित रहता था। उनका ध्यान इन विचारों से दूर करने के लिए इनके पिता ने 10 वर्ष की आयु में ही इनका विवाह एक रूपवती राजकुमारी यशोधरा से कर दिया। इनके एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया। एक महान त्याग (A Great Sacrifice) : राजकुमार सिद्धार्थ को प्रसन्न रखने और सांसारिक दु:खों से दूर रखने का हर सम्भव प्रयास किया गया परन्तु ऐश्वर्य की समस्त वस्तुएँ गौतम बुद्ध को आकर्षित नहीं कर सकीं, उन्हें शान्ति प्रदान नहीं कर सकीं। एक दिन जब वह अपने सारथी (रथवान) चन्ना के साथ भ्रमण के लिए भेजे गये तो उन्होंने एक बूढ़ा आदमी, जिसकी कमर झुकी हुई थी, देखा। दूसरी बार उन्होंने एक बहुत बीमार आदमी को देखा। तीसरी बार उन्होंने कुछ व्यक्तियों को एक मृत व्यक्ति के समीप रोते-पीटते हुए देखा। चौथे अवसर पर उन्होंने एक साधु को देखा जो बिल्कुल निश्चिन्त, स्वस्थ और प्रसन्न मुद्रा में था। पहली तीनों घटनाओं से बुद्ध का मन इस संसार से उचाट हो गया और वे भली-भाँति समझ गये कि यह संसार दुःखों और आपत्ति-विपत्तियों का घर है, अतः इससे छुटकारा पाना चाहिए। अतः 29 वर्ष की आयु में वे अपनी स्त्री और बच्चे को रात के समय सोते हुए छोड़कर वन में चले गये।
परम ज्ञान की प्राप्ति : घर से निकलकर सर्वप्रथम मगध की राजधानी राजगृह में दो ब्राह्मण गुरुओं से धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया परन्तु उन्हें वास्तविक शान्ति नहीं मिली। तत्पश्चात् वन में जाकर उन्होंने 6 वर्ष तक घोर तपस्या की। उनका शरीर सूखकर काँटा-सा हो गया। इसके पश्चात् गया (बिहार में एक स्थान) के निकट पीपल के वृक्ष के नीचे समाधि लगाकर बैठ गये। उन्हें एक विशेष प्रकाश दृष्टिगोचर हुआ। उन्होंने सांसारिक दु:खों से बचने और सच्चा आनन्द प्राप्त करने का मार्ग ढूँढ लिया। उसी समय से वे ‘बुद्ध’ अर्थात् ‘ज्ञानी’ कहलाने लगे।
धर्म प्रचार : गौतम बुद्ध ने अपने (बौद्ध) धर्म का प्रचार किया । उन्होंने बनारस के निकट ‘सारनाथ’ नामक स्थान पर अपना पहला उपदेश दिया। इस प्रथम उपदेश को बौद्ध मत में ‘धर्म-चक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य सच्चरित्र हो, पवित्र हृदय वाला और प्रत्येक जीव के प्रति दयालु हो तो वह मोक्ष पा सकता है। यहाँ पाँच व्यक्ति इनके शिष्य बने जिन्हें ‘पाँच बड़े’ कहा जाता है। धीरे-धीरे गौतम बुद्ध के अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। यहाँ तक कि उनके परिवारजन भी उनके शिष्य बन गये।
महायान बौद्धमत का विकास : बौद्ध अवधारणाओं तथा व्यवहार में ईसा की प्रथम सदी के बाद परिवर्तन दिखाई देते हैं। शुरूआती बौद्ध मत में निब्बान हेतु व्यक्तिगत प्रयास को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता था। बुद्ध को भी एक मनुष्य समझा जाता था जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन तथा निब्बान प्राप्त किया था । लेकिन धीरे-धीरे एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरने लगी तथा इसके साथ-साथ बोधिसत्त की अवधारणा भी उभरने लगी। बुद्ध तथा बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गई। चिंतन की इस नई परंपरा को महायान के नाम से जाना जाने लगा।
बुद्ध का देहान्त : निरन्तर 45 वर्ष तक धर्म प्रचार करने के पश्चात् 80 वर्ष की आयु में 487 ई. पू. के लगभग उनका देहान्त कुशीनगर (Kushinagar) के स्थान पर हो गया तब तक उनके अनुयायियों की संख्या कई हजार तक पहुँच गई थी।
II. महात्मा गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ:चार मौलिक सिद्धांत (Four Fundamental Prin ciples) : (i) संसार दु:खों का घर है। (i) दु:खों का कारण-वासनाएँ और इच्छाएँ हैं। (if) वासनाओं को वश में करने से दुःख दूर हो सकते हैं। (iv) वासनाओं को वश में करने के लिए अष्टमार्ग पर चलना चाहिए।
गौतम बुद्ध का मध्यम मार्ग (Middle way of Gautam Buddha): गौतम बुद्ध एक ओर तो ब्राह्मणों के भोग-विलास के जीवन से घृणा करते थे और दूसरी ओर जैनियों के घोर तप के जीवन के विरोधी थे। अतः उन्होंने इन दोनों के बीच का मार्ग अपनाया, जिसे मध्यम मार्ग अर्थात् सम्यक् जीवन बिताना कहते हैं। उनके मध्यम मार्ग संबंधी विशेष बातें निम्न प्रकार हैं : () अहिंसा, (ii) ईश्वर के अस्तित्व के विषय में मौन, (iii) यज्ञ बलि व कर्मकांड में अविश्वास, (iv) जाति-प्रथा में अविश्वास,(v) निर्वाण, (vi) कर्म-सिद्धांत, (vii) शुद्ध आचरण पर जोर।

प्रश्न 12. स्तूपों की खोज किस प्रकार हुई ? अमरावती तथा साँची के स्तूपों के उदाहरण देते हुए उनकी नियति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : अमरावती के स्तूप की खोज अचानक हुई। 1796 में एक स्थानीय राजा मंदिर बनाना चाहता था। अचानक उसे अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गए। उसने उसके पत्थरों का प्रयोग करने का निश्चय किया। उसे ऐसा लगा कि इस छोटी-सी पहाड़ी में संभवत: कोई खजाना छिपा है। कुछ वर्षों के बाद कॉलिन मेकेंजी नामक एक अंग्रेज अधिकारी इस प्रदेश से गुजरा। उसे यहाँ कई मूर्तियाँ मिलीं। उसने उनका विस्तृत चित्रांकन किया, परंतु उसकी रिपोर्ट कभी छपी नहीं। 1854 में गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की। वह यहाँ से कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गया। उसी के नाम पर इन पत्थरों को एलियट संगमरमर कहा जाता है। उसने स्तूप के पश्चिमी तोरणद्वार को भी खोज निकाला। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था। 1850 के दशक में ही अमरावती में उत्कीर्ण पत्थर अलग-अलग स्थानों पर ले जाए गए। कुछ पत्थर कलकत्ता (कोलकाता) में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल में पहुँचे, तो कुछ मद्रास (चेन्नई) में इंडिया ऑफिस में। कुछ पत्थर तो लंदन तक ले जाए गए। अमरावती की मूर्तियाँ कई अंग्रेज अधिकारियों के बागों की शोभा बन गईं। वास्तव में इस प्रदेश का प्रत्येक नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया था।
अमरावती तथा साँची के स्तूपों की नियति : पुरातत्त्ववेत्ता एच० एच० कोल उन लोगों में से एक थे जो अलग सोचते थे। उन्होंने लिखा, “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट की इजाजत देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” उनका मानना था कि संग्रहालयों में वास्तविक मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिएँ, जबकि वास्तविक कृतियाँ खोज-स्थल पर ही रखी जानी चाहिएँ। दुर्भाग्य से वह अधिकारियों को अपनी सोच पर सहमत नहीं कर पाए परंतु साँची के संबंध में यह बात मान ली गई। परिणामस्वरूप साँची का स्तूप बच गया, जबकि अमरावती का स्तूप छिन्न-भिन्न हो गया।
साँची बच गया, जबकि अमरावती नष्ट हो गया : अमरावती की खोज संभवत: कुछ पहले हो गई थी। उस समय तक विद्वान इस बात के महत्त्व को नहीं समझ पाए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज स्थल पर ही सरंक्षित करना कितना आवश्यक होता है।
1818 में साँची की खोज हुई। उस समय तक भी इसके तीन तोरणद्वार खड़े थे। चौथा द्वार वहीं पर गिरा हुआ था। टीला अभी भी अच्छी दशा में था। तब भी यह सुझाव दिया गया कि तौरणद्वारा को पेरिस या लंदन भेज दिया जाए। परंतु कई कारणों से साचा का स्तूप वहीं बना रहा और आज भी बना हुआ है। इसके विपरीत अमरावती का महाचैत्य अब केवल एक छोटा-सा टीला मात्र ह जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।
प्रश्न 13. बौद्ध ग्रंथ किस प्रकार तैयार और सुरक्षित किए जाते थे ?
उत्तर : भगवान् बुद्ध चर्चा और बातचीत द्वारा मौखिक शिक्षा देते थे। इन प्रवचनों को महिलाएँ, पुरुष और सभी: बच्चे, सभी सुनते थे और इन पर चर्चा करते थे। बुद्ध के किसी भी प्रवचन को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके शिष्यों ने वैशाली में ‘ज्येष्ठों’ अथवा अधिक वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा बुलाई। इस सभा में उनकी शिक्षाओं को संकलित किया गया। इन संग्रहों को ‘त्रिपिटक’ जिसका शादिब्क अर्थ है-ग्रंथों को रखने के लिए ‘तीन टोकरियाँ’ का नाम दिया गया। पहले उन्हें मौखिक रूप से ही संप्रेषित किया जाता था। परंतु बाद में उन्हें लिखा गया और विषय तथा लंबाई के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया।
त्रिपिटक : त्रिपिटकों में तीन पिटक शामिल हैं-विनय पिटक, सुत्त पिटक तथा अभिधम्म पिटक।
(1) विनय पिटक में संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह है।
(2) सुत्त पिटक में बुद्ध की शिक्षाएँ दी गई हैं
(3) अभिधम्म पिटक में दर्शन से जुड़े विषय शामिल हैं।
प्रत्येक पिटक के अंदर कई ग्रंथ हैं। बाद के युगों में बौद्ध विद्वानों ने इन ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं।
महावंश तथा दीपवंश : जब बौद्ध धर्म श्रीलंका जैसे नए प्रदेशों में फैला जो दीपवंश (द्वीप का इतिहास और महावंश (महान इतिहास) आदि नए ग्रंथ लिखे गए इनमें क्षेत्र विशेष का बौद्ध इतिहास मिलता है। इनमें से कई रचनाओं में बुद्ध की जीवना भी लिखी गई है।
अधिकतर पुराने ग्रंथ पाली भाषा में है। परंतु बाद में संस्कृत में भी ग्रंथ लिखे गए।
बौद्ध ग्रंथों का संरक्षण : बौद्ध धर्म के पूर्व एशिया में फैलने पर फा-शिएन और श्वैन-त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए। वे कई ग्रंथ अपने देश ले गए जहाँ विद्वानों ने इनका अनुवाद किया। भारत के बौद्ध प्रचारक भी दूर-दूर के देशों में गए। बुद्ध की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए वे कई पुस्तकें अपने साथ ले गए। वर्षों तक ये पांडुलिपियाँ एशिया के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में स्थित बौद्ध विहारों में संरक्षित रहीं। पाली, संस्कृत, चीनी और तिब्बती भाषाओं में लिखे इन ग्रंथों से आधुनिक अनुवाद तैयार किए गए हैं।

प्रश्न 14. जैन धर्म की उत्पत्ति, शिक्षाओं तथा विस्तार की जानकारी दीजिए।
उत्तर : जैनियों के मूल सिद्धांत छठी शताब्दी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे. जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है। तीर्थंकर का अर्थ है-वे महापुरुष जो लोगों को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं। महावीर ने अपने से पहले के तीर्थंकरों की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया।
जैन धर्म की शिक्षाएँ :
(1) जैन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा यह है कि सारा संसार सजीव है। इसके अनुसार पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है।
(2) जीवों के प्रति अहिंसा जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है। इसके अनुसार जीवों विशेषकर मनुष्यों, जानवरों, पेड़ -पौधों और कीड़े-मकोड़ों को नहीं मरना चाहिए। जैन मत के अहिंसा के इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन-परंपरा को प्रभावित किया है।
(3) जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। कर्म चक्र से मुक्ति पाने के लिए | त्याग और तपस्या की जरूरत होती है। यह संसार के त्याग से हो । संभव हो पाता है। इसीलिए मुक्ति के लिए संसार का त्याग करके विहारों में निवास करना चाहिए। (4) जैन साधु और साध्वी पाँच व्रत करते थे-(i) हत्या २ करना, (ii) चोरी न करना, (ii) झूठ न बोलना, (iv) ब्रह्मर्च (अमृषा) का पालन करना, तथा (v) धन संग्रह न करना।
जैन धर्म का विस्तार : जैन धर्म धीरे-धीरे भारत के क भागों में फैल गया। बौद्धों की तरह ही जैन विद्वानों ने प्राकृत. संस्कृत, तमिल आदि भाषाओं में काफी साहित्य का सृजन किया। सैकड़ों वर्षों से इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में संरक्षित हैं।
धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में जैन तीर्थंकरों के उपासकों द्वारा बनवाई गई मूर्तियाँ भारतीय उपमहाद्वीप के कई भागों में पाई गई हैं। यह बात जैने धर्म के व्यापक विस्तार को दर्शाती है।

प्रश्न 15. वैष्णव धर्म पर एक लेख लिखिए।

अथवा

प्रायः वैष्णव धर्म को किस दूसरे नाम से जाना जाता है उससे जुड़ी महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर : 1. अन्य नाम (Other name) : भगवत धर्म को वैष्णव धर्म के रूप में भी जाना जाता है।
2.उद्भव (Origin) : इस धर्म का पुन: उद्भव या अधिक प्रचार मौर्योत्तर काल में हुआ, परन्तु इस धर्म के विषय में प्रारंभिक जानकारी उपनिषदों में प्राप्त होती है। इस धर्म के संस्थापक वासुदेव कृष्ण जी थे, जो वृष्णि वंशीय-यादव कुल के सम्माननीय महानतम व्यक्तित्व थे।
3.इतिहास (History) : वासुदेव की पूजा का सर्वप्रथम उल्लेख भक्ति के रूप में पाणिनि के काल (ई. पू. पाँचवीं शताब्दी) में प्राप्त होता है। छान्दोग्य उपनिषद में श्रीकृष्ण का उल्लेख सबसे पहले प्राप्त होता है। इस उपनिषद में कृष्ण को देवकी का पुत्र तथा ऋषि घोरा अंगिरस का शिष्य बताया गया है।
ब्राह्मण धर्म के जटिल कर्मकांड एवं यज्ञीय व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप उदय होने वाला प्रथम संप्रदाय ‘भागवत सम्प्रदाय’ था। वासुदेव कृष्ण के भक्त (उपासक) भागवत’ के नाम से प्रसिद्ध थे। मानवीय नायक के रूप में वासुदेव के दैवीकरण का सबसे प्राचीन (प्रथम) उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में उल्लिखित है। वासुदेव कृष्ण को वैदिक देव विष्णु का अवतार स्वीकार किया गया है, इसीलिए कालान्तर में वासुदेव का समीकरण नारायण से किया गया था। नारायण के उपासक ‘पांचरात्रिक’ के नाम से प्रसिद्ध थे। भागवत धर्म का सिद्धांत ‘भगवद्गीता’ में उल्लिखित है। इस संप्रदाय में वेदांत, सांख्य और योग के दार्शनिक तत्त्वों, विचारधाओं का सम्मिलन है। जैन धर्म के ग्रंथ ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ में वासुदेव (केशव) को बाईसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि का समकालीन कहा गया है। भागवत धर्म के मुख्य तत्त्व ‘भक्ति’ और अहिंसा’ माने जाते हैं। ‘अवतार सिद्धांत’ भागवत धर्म की विशेषता मानी जाती है। भागवत धर्म के नायकों का उल्लेख वायु पुराण में निहित है। ऐतरेय ब्राह्मण में विष्णु का उल्लेख सर्वोच्च देवता के रूप में वर्णित है। भगवान विष्णु को अपना इष्ट देव स्वीकार करने वाले भक्त वैष्णव के रूप में जाने जाते हैं। इसी से तत्सम्बन्धी धर्म ‘वैष्णव धर्म’ के नाम से लोकप्रिय हुआ। वैष्णव में अवतारवाद का सिद्धांत भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, जो गुप्त में अपनी पराकाष्ठा पर था। अवतारवाद का सर्वप्रथम उल्लेख युग श्रीमदभगवद्गीता में प्राप्त होता है। इसमें मंदिर व मूर्ति पूजा को विशेष महत्त्व दिया गया है|
परंपराएँ और वैष्णव धर्म (Traditions and Vashmonism) : विष्णु के परंपरागत रूप के 24 अवतार माने जाते हैं, लेकिन मत्स्य पुराण में उल्लिखित विष्णु के दस अवतार अंकित हैं। कृष्ण का नाम इसमें नहीं है, क्योंकि कृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के साक्षात् स्वरूप थे। दस अवतारों में मत्स्य, कूर्म (कच्छप), वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध और कल्कि हैं। इनमें वाराह अवतार को अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई थी, वाराह का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में है। नारायण, नृसिंह एवं वामन दैवीय अवतार माने गए हैं, जबकि शेष सात मानवीय अवतार के रूप में प्रसिद्ध हैं।
विदेशी शासन एवं वैष्णव धर्म (Foreign Ruler and Tashnonism): दूसरी शताब्दी ईसा से द्वितीय शताब्दी ईस्वी के मध्य अनेक विदेशी शासक (जैसे हिन्द-यूनानी) वैष्णव धर्म में दीक्षित हो गए थे। द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी राजा के तक्षशिला स्थित राजदूत हेलियोडोरस ने वेसनगर (विदिशा) नामक स्थान (वर्तमान मध्य प्रदेश में स्थित) पर वासुदेव (विष्णु) की अराधना हेतु गरुड़ध्वज स्तम्भ की स्थापना करायी थी।
वैष्णो नायक (Hero of Vashnonism): वासुदेव कृष्ण सहित चार वृष्णि वीरों (नायकों) की पूजा की चतुर्व्यूह के रूप में कल्पना हुई है, चतुर्व्यूह पूजा का प्रथम उल्लेख विष्णु संहिता में प्राप्त होता है। चतुर्व्यूह के चार प्रमुख देवता हैं-संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और साम्ब।
वैष्णव धर्म मुख्य मत (Main sects of Vashnonism): ‘पांचरात्र’ वैष्णव धर्म का प्रधान मत था, इसका विकास तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ था। नारद के अनुसार, पाँचरात्र में परमतत्त्व, मुक्ति, युक्ति, योग और विषय (संसार) पाँच पदार्थ हैं, इसीलिए इसे पाँचरात्र कहा जाता हैं। पाँचरात्र के मुख्य उपासक नारायण विष्णु थे।
वैष्णव मत का विदेशों और दक्षिण में प्रचार (Spread of Vaishnavaism in foreign countries and southern part of India) : गुप्त युग में वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार भारत के बाहर कम्बोडिया, इंडानेशिया, मलाया, हिन्द-चीन तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में हुआ। यह माना जाता है कि दक्षिण भारत से उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति लाए जाने का श्रेय रामानन्द को है, जिसका उनके शिष्यों, विशेषकर कबीरदास (निर्गुण भक्ति) ने प्रचार-प्रसार किया। रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य तथा चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णव धर्म में भक्ति पक्ष पर विशेष बल दिया। दक्षिण भारत में भागवत धर्म के उपासक अलवार कहलाते थे। अलवार अनुयायियों की विष्णु (नारायण) में निष्ठा थी। वैष्णव धर्म का केन्द्र तमिल प्रदेश में था। नवीं-दसवीं ईस्वी शताब्दी ईस्वी का काल अलवारों के धार्मिक पुनरुत्थान का उत्कर्ष काल था। नारायण का प्रथम उल्लेख ‘शतपथ ब्राह्मण’ में है। मेगस्थनीज ने कृष्ण को ‘हेराक्लीज’ कहा है।

प्रश्न 16. “साँची और अन्य स्थानों की वास्तुकला का समझने के लिए बौद्ध धर्मग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है।” उपर्युक्त कथन की सोदाहरण तर्कसंगत समीक्षा कीजिए।

अथवा

साँची स्तूप के विशिष्ट पहलुओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : साँची में एक विशाल ऐतिहासिक महत्त्व का स्तूप है। सारनाथ में भी बौद्ध स्तूप बनाये गये। बौद्ध वास्तुकला से जुड़े अन्य अनेक स्थल देश के विभिन्न भागों के साथ-साथ जिन देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ वहाँ भी बनाये गये। विशाल बौद्ध साहित्य एवं ग्रंथ विभिन्न इमारतों, स्तूपों की वास्तुकला के बारे में हमें जानकारी देते हैं। इस प्रश्न के उत्तर से जुड़े कुछ तथ्य तथा बिंदु निम्न हैं:
1.बौद्ध धर्मग्रंथों के अध्ययन से ही हमें पता चलता है कि स्तूप क्या थे, इनकी वास्तुकला संबंधी विशेषता क्या थी तथा ये क्यों बनाए जाते थे? स्तूप टीले जैसे बने होते थे जिनमें बुद्ध से जुड़े कुछ अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान गाड़ दिए गए थे।
स्तूप बनाने की परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, लेकिन वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। चूँकि उनमें ऐसे अवशेष रहते थे जिन्हें पवित्र समझा जाता था, इसलिए समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली। अशोकावदान नामक एक बौद्ध ग्रंथ के अनुसार अशोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से हर महत्त्वपूर्ण शहर में बाँटकर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया। ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बनाए जा चुके थे।
2.स्तूप कैसे बनाये गये : स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से इन्हें बनाने और सजाने के लिए दिये गये दान का पता चलता है। कुछ दान राजाओं के द्वारा दिये गये थे (जैसे सातवाहन वंश के राजा), तो कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों (गिल्ड) द्वारा दिये गये। उदाहरण के लिए साँची के एक तोरण द्वार का हिस्सा हाथी दाँत के शिल्पकारों के दान से बनाया गया था। सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम बताया है। कभी-कभी वे अपने गाँव या शहर का नाम बताते हैं और कभी-कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी बताते हैं। इन इमारतों को बनाने में भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया।
3.विभिन्न व्यक्तियों और निकायों की भूमिका :
(क) जब बौद्ध धर्म श्रीलंका जैसे नये इलाकों में फैला तो दीपवंश (द्वीप का इतिहास) और महावंश (महान इतिहास) जैसे क्षेत्र-विशेष बौद्ध इतिहास को लिखा गया। इनमें से कई रचनाओं में बुद्ध की जीवनी लिखी गई है। ज्यादातर पुराने ग्रंथ पालि में हैं। बाद के युगों में संस्कृत में ग्रंथ लिखे गये।
(ख) जब बौद्ध धर्म पूर्वी एशिया में फैला तब फा-शिएन और श्वान त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आये। ये पुस्तकें वे अपने देश ले गये जहाँ विद्वानों ने अनुवाद किया। इनका
(ग) हिंदुस्तान के बौद्ध शिक्षक भी दूर-दराज के देशों में गये। बुद्ध की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए वे कई पुस्तकें भी अपने साथ ले गये। कई सदियों तक ये पांडुलिपियाँ एशिया के भिन्न-भिन्न इलाकों में स्थित बौद्ध विहारों में संरक्षित थीं । पालि, संस्कृत, चीनी और तिब्बती भाषाओं में लिखे इन ग्रंथों से आधुनिक अनुवाद तैयार किये गये हैं ।

प्रश्न 17. साँची स्तूप के अतिरिक्त बौद्ध धर्म के इतिहास के पुनर्निर्माण के अन्य स्रोतों पर विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर : बौद्ध धार्मिक ग्रंथ (Religious books of Buddhism) : सॉची के स्तूप के अतिरिक्त बौद्ध धर्म के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अनेक बौद्ध धार्मिक ग्रंथ प्रयोग में लाए जाते थे।
ब्राह्मण साहित्य की तरह बौद्ध साहित्य भी इतिहास निर्माण में कुछ कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक है। इनके नाम हैं-सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्मपिटक। गौतम बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के उपरान्त इनकी रचना हुई। सुत्तपिटक में बुद्ध के धार्मिक विचारों तथा वचनों का संग्रह है। विनयपिटक में बौद्ध संघ के नियमों का उल्लेख है तथा अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन का विवेचन है । बुद्ध के उपदेश तथा शिक्षाएँ प्रायः सभी स्थलों पर कहानियों तथा दृष्टान्तों के साथ सम्बद्ध रखते हैं। अतः त्रिपिटक नामक बौद्ध ग्रन्थों में जानकारी की बहुत-सी बातें हैं जिनसे राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक स्थितियों का तत्कालीन (लगभग 600 ई. पू.) ज्ञान अर्जित किया जा सकता है।
‘महावम्स’ तथा ‘दीपवम्स’ बौद्धों के दो अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। इनकी रचना श्रीलंका में पालि भाषा में ही की गई है। इससे श्री लंका के राजवंशों के अतिरिक्त तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक अवस्थाओं के विषय में उपयोगी सूचनायें उपलब्ध होती हैं। बौद्धों के गैर-धार्मिक साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं रोचक हैं गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों से संबंधित कथाएँ। यह माना जाता था कि अन्त में गौतम के रूप में जन्म लेने से पहले बुद्ध 500 से भी अधिक पूर्व जन्मों से गुजरे थे तथा इनमें से कई जन्मों में उन्होंने पशु-जीवन धारण किया था। पूर्व जातक कथाएँ कहलाती हैं तथा प्रत्येक जातक कथा एक जन्म की कथाएँ की लोक कथा है। ये जातक ईसा पूर्व पाँचवीं से दूसरी सदी तक प्रकार की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति पर बहुमूल्य प्रकाश डालते हैं। प्रसंगवश ये कथाएँ बुद्धकालीन राजनीतिक घटनाओं की भी जानकारी देती हैं।

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