Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 5 Important Question Answer 3 Marks यात्रियों के नजरिए समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 1. किताब-उल-हिन्द पर एक लेख लिखिए।

अथवा

अल-बिरूनी द्वारा अपनी कृतियों में जिस विशिष्ट शैली का प्रयोग किया गया उसको स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : अल-बिरूनी ने अपनी कृतियों में जिस विशिष्ट शैली का प्रयोग किया है, उसे जानने के लिए हम उसकी कृति किताब उल-हिंद का उदाहरण लेते हैं। अरबी में लिखी इसकी भाषा सरल एवं स्पष्ट है। इसे धर्म एवं दर्शन, त्योहारों, खगोल-विज्ञान, रीति-रिवाजों एवं प्रथाओं, सामाजिक जीवन, भारत-तोल एवं मापन विधियों, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि विषयों के आधार पर अस्सी अध्यायों में बाँटा गया है।
अल-बिरूनी ने प्रत्येक अध्याय में प्रायः एक विशिष्ट शैली का प्रयोग किया है। आरंभ में एक प्रश्न है, इसके बाद संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन है और अंत में अन्य संस्कृतियों के साथ एक तुलना की गई है। आज के कुछ विद्वानों का तर्क है कि अल-बिरूनी का गणित की ओर झुकाव था। इसी कारण ही उसकी पुस्तक, जो लगभग एक ज्यामितीय संरचना है, स्पष्ट बन पड़ी है। बहुत ही

प्रश्न 2. इब्न-बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे थे, उनकी कीजिए तथा अंतर बताइए।
उत्तर : इन बतूता तथा बर्नियर ने भारत में अपनी यात्राओं का वृत्तांत विभिन्न दृष्टिकोणों से लिखा है। इन बतूता ने भारत की विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों, आस्थाओं, पूजास्थलों तथा राजनीतिक गतिविधियों के बारे में लिखा। उसे जो कुछ विचित्र लगता था, उसका वह विशेष रूप से वर्णन करता था। उदाहरण के लिए उसने नारियल और पान का बहुत ही रोचक ढंग से वर्णन किया है। उसने भारत की शहरी संस्कृति तथा बाजारों की चहल-पहल पर भी प्रकाश डाला है। इब्न बतूता के लिखने का दृष्टिकोण भी आलोचनात्मक था। इसके विपरीत बर्नियर ने भारतीय समाज की त्रुटियों को उजागर करने पर जोर दिया। वह भारत की प्रत्येक स्थिति की तुलना यूरोप और विशेषकर फ्रांस की स्थितियों से करता था। उसने यही दिखाने का प्रयास किया कि विकास की दृष्टि से भारत यूरोप की तुलना में पिछड़ा हुआ है।

प्रश्न 3. बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाले शहरी केन्द्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए ।
उत्तर : 17वीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत जनसंख्या नगरों में रहती थी। यह अनुपात उस समय की पश्चिमी यूरोप की नगरी जनसंख्या के अनुपात से अधिक था। फिर भी बर्नियर मुगलकालीन शहरों को “शिविर नगर” कहता है, जिससे उसका आशय उन नगरों से है जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे। उसका विश्वास था कि ये नगर राज दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे और उसके चले जाने के बाद तेजी से विलुप्त हो जाते थे वह यह भी कहता है कि इनकी सामाजिक और आर्थिक नींव व्यावहारिक नहीं होती थी और ये राजकीय संरक्षण पर आश्रित रहते थे।वास्तव में उस समय सभी प्रकार के नगर पाए जाते थे, उत्पादन केंद, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थस्थान आदि। समृद्ध व्यापारिक समुदाय तथा व्यावसायिक वर्ग इनके अस्तित्व के सूचक हैं।व्यापारी आपस में मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व के संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को ‘महाजन’ कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ।अहमदाबाद जैसे नगरों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय का मुखिया करता था जिसे नगर सेठ कहा जाता था। अन्य शहरी समूहों में व्यावसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक (हकीम अथवा वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), वकील, चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक आदि शामिल थे इनमें से कुछ वर्ग राजकीय संरक्षण पर आश्रित थे। कुछ अन्य वर्ग अपने संरक्षकों अथवा आम लोगों की सेवा द्वारा जीवनयापन करते थे।

प्रश्न 4. इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए।

अथवा

भारत में दासों के बारे में इब्न बतूता के दिए विवरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : इब्न बतूता के मुताबिक, बाजारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह सरेआम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेट स्वरूप दिए जाते थे। जब इब्न बतूता सिंध पहुँचा तो उसन सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक को भेंट के लिए भेंट स्वरूप घोड़े, ऊँट तथा दास खरीदे जब वह मुल्तान पहुँचा तो उसने गवर्नर को किशमिश व बादाम के साथ एक दास और घोड़ा’ भेट के रूप में दिया। इब्न बतूता बताता है कि मुहम्मद-बिन-तुगलक नसीरूद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना आनंदित हुआ कि उसे एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास’ दे दिए।
इब्न बतूता के वृत्तांत से प्रतीत होता है कि दासों में बहुत विभेद था। सुल्तान की सेवा में कुछ कार्यरत दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों को सामान्यत: घरेलू श्रम के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था और इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को, पालकी पर डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में खासतौर पर अपरिहार्य पाया। दासों की कीमत खास तौर पर उन दासियों की, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी, बहुत कम होती थी और अधिकांश परिवार जो उन्हें रख पाने में समर्थ थे, कम से कम एक या दो तो रखते ही थे।

प्रश्न 5. सती प्रथा के कौन से तत्त्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
उत्तर : सती प्रथा के निम्नलिखित तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया :
कुछ महिलाएँ प्रसन्नतापवूक मृत्यु को गले लगा लेती थीं, लेकिन अधिकांश को मरने के लिए अर्थात् सती होने के लिए विवश किया जाता था। तत्कालीन भारतीय समाज में सती प्रथा एक सामाजिक कुरीति थी जिसमें अत्यन्त क्रूरतापूर्ण विधवाओं को उनके पति की चिता के साथ ही जिन्दा जला दिया जाता था।

प्रश्न 6. जाति व्यवस्था के संबंध में अल-बिरूनी की व्याख्या पर चर्चा कीजिए।

अथवा

अल-बिरूनी के द्वारा किए गए जाति व्यवस्था के वर्णन की समीक्षा कीजिए।

अथवा

अल-बिरूनी के भारतीय जाति व्यवस्था के विवरण की व्याख्या कीजिए।

अथवा

अल-बिरूनी के जाति व्यवस्था संबंधी विवरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : जाति-व्यवस्था के संबंध में अल-बिरूनी की व्याख्या : अल-बिरूनी ने अन्य समुदायों में प्रतिरूपों की खोज के माध्यम से जाति व्यवस्था को जानने समझने और व्याख्या करने का प्रयत्न किया। उसने अपने वृत्तांत में लिखा कि प्राचीन फारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता प्राप्त थी। ये वर्ग थे :
(i) घुड़सवार और शासक वर्ग;
(ii) भिक्षु और आनुष्ठानिक पुरोहित;
(iii) चिकित्सक, खगोल शास्त्री एवं अन्य वैज्ञानिक;
(iv) कृषक तथा शिल्पकार।
वास्तव में, अल-बिरूनी यह दर्शाना चाहता था कि समाज का इस प्रकार विभाजन सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं था। इसके अतिरिक्त, उसने यह दर्शने की कोशिश की इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता था और उनमें भिन्नताएँ सिर्फ धार्मिकता के पालन में थीं।
अल-बिरूनी जाति व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानता था। इसके बावजूद उसने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया था। उसने लिखा कि प्रत्येक वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। अल-बिरूनी जोर देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही नहीं होता। उसका मानना था कि व्यवस्था में सन्निहित अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के खिलाफ थी।अल-बिरूनी का जाति-व्यवस्था के संबंध में विवरण उसके नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से पूरी तरह गहनता से प्रभावित था। इन ग्रंथों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से जाति व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था परंतु, वास्तविक जीवन में इस व्यवस्था का इतनी भी कड़ाई से पालन नहीं किया जाता था। उदाहरण के लिए, अत्यज नामक श्रेणियों से यह अपेक्षा की जाती थी कि ये किसानों और जमींदारों के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध करवाएँ। दूसरे शब्दों में यद्यपि ये प्रायः सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होते थे, फिर भी इन्हें आर्थिक तंत्र में शामिल किया जाता था।

प्रश्न 7. क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केंद्रों में जीवन शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्न बतूता का वृत्तांत सहायक है ? अपने उत्तर के कारण दीजिए।

अथवा

मध्ययुग इब्नबतूता कीजिए। के नगरीय जीवन के इतिहास की पुनर्रचना में के विवरण किस प्रकार सहमत होते हैं ? स्पष्ट

अथवा

चौदहवीं शताब्दी के शहरी केंद्रों में जीवन शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्नबतूता का वृतांत्त इतिहासकारों के लिए किस प्रकार सहायक है ? परख कीजिए।

अथवा

भारत के नगरों के बारे में विशेषकर दिल्ली के संदर्भ के विचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि इब्न बतूता का वृत्तांत शहरी केंद्रों की जीवन-शैली को समझने में सहायक है। इसका कारण यह है कि यह वत्तांत बहुत ही विस्तृत तथा स्पष्ट है। ऐसा लगता है जैसे कि एक सजीव चित्र हमारे सामने प्रस्तुत कर दिया गया हो।
(1) इब्न बतूता के अनुसार उपमहाद्वीप के नगरों में इच्छा-शक्ति, साधनों तथा कौशल वाले लोगों के लिए भरपूर अवसर थे। ये नगर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे परंतु कुछ नगर युद्धों तथा अभियानों के कारण नष्ट भी हो चुके थे।
(2) इब्न बतूता के वृत्तांत से ऐसा लगता है कि अधिकांश शहरों में भीड़-भाड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले और रंगीन बाजार थे जो भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं से भरे रहते थे।
(3) इब्न बतूता दिल्ली को भारत में सबसे बड़ा शहर बताता है जिसकी जनसंख्या बहुत अधिक थी। दौलताबाद (महाराष्ट्र में) भी कुछ कम नहीं था। यह आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।
(4) बाजार मात्र क्रय-विक्रय के ही स्थान नहीं थे, बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। अधिकांश बाजारों में एक मस्जिद तथा एक मंदिर होता था। कुछ बाजारों में नर्तकों, संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान भी विद्यमान थे।
(5) इब्न बतूता शहरों की समद्धि का वर्णन करने में अधिक रुचि नहीं रखता था परंतु इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत का प्रयोग यह तर्क देने के लिए किया है कि शहरों की समृद्धि का आधार गाँव की कृषि अर्थव्यवस्था थी।
(6) इब्न बतूता के अनुसार भारतीय कृषि के इतना अधिक उत्पादन होने का कारण मिट्टी का उपजाऊपन था। अत: किसानों के लिए वर्ष में दो फसलें उगाना आसान था।
(7) उसने यह भी ध्यान दिया कि उपमहाद्वीप व्यापार तथा वाणिज्य के एशियाई तंत्रों से भली -भाँति जुड़ा हुआ है। भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में बहुत माँग थी। इससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी लाभ होता था। भारत के सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की तो विशेष माँग थी। इब्न बतूता हमें बताता है कि महीन मलमल की कई किस्में इतनी अधिक महँगी थीं कि उन्हें केवल अत्यधिक धनी लोग ही खरीद सकते थे।

प्रश्न 8. चर्चा कीजिए कि बर्नियर का वृत्तांत किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निमित करने में सक्षम करता है ?
उत्तर : बर्नियर ने समकालीन ग्रामीण समाज की रूप रेखा खींचने का प्रयत्न किया है। जो भारतीय इतिहासकारों के अनुसार कोई इतना उचित प्रतीत नहीं होता। उनके अनुसार बर्नियर भारतीय समाज को यूरोपीय समाज की तुलना में पिछड़ा हुआ दिखाना चाहता था। इसलिए वह अपने विवरण में कुछ भटक सा गया लगता है। बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच एक भिन्नता यह थी कि यूरोप में भूमि निजी भूस्वामित्व के अधीन थी जबकि भारत में इसका अभाव था। वह भूमि के निजी भू-स्वामित्व के सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखता था। वह भूमि पर राजकीय स्वामित्व को दोनों (राज्य और उसके निवासियों) के लिए हानिकारक मानता था। बर्नियर के तर्क के अनुसार राजकीय भूस्वामित्व के कारण भूधारक भूमि को अपने बच्चों को नहीं दे सकते थे। इसलिए वह भूमि में कोई सुधार करने के प्रति उदासीन रहते थे, जिसके कारण भूमि उत्तरोतर ऊसर होती गई और परिणाम स्वरूप राज्य की आय में कमी आती गई। बर्नियर आगे लिखता है कि यहाँ की खेती अच्छी नहीं है और इन इलाकों की आबादी भी कम है। कृषि योग्य सभी क्षेत्रों में खेती नहीं होती है क्योंकि श्रमिकों का अभाव है। वस्तुत: कई श्रमिक गवर्नरों द्वारा किए गए बुरे व्यवहार के फलस्वरूप मर जाते हैं। गरीब ग्रामीण लोग जब अपने लोभी स्वामियों की माँगों को पूरा करने में असमर्थ होते थे तो उन्हें न सिर्फ जीवन निर्वाह के साधनों से वंचित कर दिया जाता था बल्कि उन्हें अपने बच्चों से भी हाथ धोना पड़ता था। उनके बच्चों को दास बनाकर ले जाया जाता था। कभी-कभी तंग आकर किसान गाँव भी छोड़ देते थे। लेकिन बंगाल के बारे में वह लिखता है कि यह राज्य जो मिस्र से न सिर्फ चावल, मकई तथा जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुओं के संदर्भ में जो मिस्र में भी नहीं उगाई जाती, जैसे रेशम कपास तथा नील में भी कहीं आगे है। भारत के कई ऐसे भाग भी हैं जहाँ आबादी पर्याप्त है और भूमि पर खेती अच्छी होती है।

प्रश्न 9. यह बर्नियर से लिया गया एक उद्धरण है : ऐसे लोगों द्वारा तैयार सुंदर शिल्पकारीगरी के बहुत उदाहरण हैं जिनके पास औजारों का अभाव है और जिनके विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उन्होंने किसी निपुण कारीगर से कार्य सीखा है। कभी-कभी वे यूरोप में तैयार वस्तुओं की इतना निपुणता से नकल करते हैं कि असली और नकली के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। अन्य वस्तुओं में भारतीय लोग बेहतरीन बंदूकें और ऐसे सुंदर स्वर्णभूषण बनाते हैं कि संदेह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार कारीगरी के इन उत्कृष्ट नमूनों से बेहतर बना सकता है। मैं अकसर इनके चित्रों की सुंदरता, मुदुलता तथा सूक्ष्मता से आकर्षित हुआ हूँ।

उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।

उत्तर : बर्नियर द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों की सूची

(i) गलीचा;
(ii) कसीदाकारी;
(iii) जरी का कार्य:
(iv) कढ़ाई
(v) सोने और चांदी के वस्त्र तथा वस्तुएँ;
(vi) विभिन्न प्रकार के रेशम तथा सूती वस्त्र
(vi) बंदूके।

तुलना

इब्न बतूता द्वारा भी भारतीय वस्त्रों की प्रशंसा की गई है। उसके अनुसार विशेष रूप से सूती कपड़ा, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की विदेशों में अत्यधिक माँग थी। उसके अनुसार महीन मलमल की कई किस्में इतनी अधिक महँगी थी कि उन्हें अमीर वर्ग तथा बहुत धनाढ्य लोग ही पहन सकते थे। उसने कालीन का वर्णन किया है जो दौलताबाद के बाजारों में विशाल गुंबदों में बिछायी जाती थी।

प्रश्न 10. विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर उन देशों को चिह्नित कीजिए जिनकी यात्रा इन-बतूता ने की थी। कौन-कौन ता से समुद्रों को उसने पार किया होगा ?

उत्तर : स्वयं अध्ययन कीजिए।
संकेत : बाजार से विश्व सीमारेखा मानचित्र खरीदिए और निम्नलिखित देशों के नाम लिखिए/दर्शाइए :
मोरक्को, मक्का, सीरिया, इराक, पर्सिया (ईरान) ओमन, सिंध (पाकिस्तान) दिल्ली, चीन, मालाबार (भारत), सुमात्रा (इंडोनेशिया), श्रीलंका। मालद्वीप
समुद्रों के नाम : उत्तरी अढलांटिक महासागर, दक्षिणी अटलांटिक सागर, लाल सागर, हिंद महासागर, अरब सागर, दक्षिणी चीन, बंगाल की खाड़ी।

प्रश्न 11. अपने ऐसे किसी बड़े संबंधी (माता/पिता/ बावा-वादी तथा नाना-नानी/चाचा/चाची) का साक्षात्कार कीजिए जिन्होंने आपके नगर अथवा गाँव के बाहर यात्राएँ की पता कीजिए (क) वे कहाँ गए थे (ख) उन्होंने यात्रा कैसे की (ग) उन्हें कितना समय लगा ( घ) उन्होंने यात्रा क्यों की (ङ) क्या उन्होंने किसी कठिनाई का सामना किया। ऐसी समानताओं और भिन्नताओं को सूचीबद्ध कीजिए जो उन्होंने अपने रहने के स्थान और यात्रा किए गए स्थानों के बीच देखी, विशेष रूप से भाषा, पहनावा, खानपान, रीति-रिवाज, इमारतों सड़कों तथा पुरुषों और महिलाओं की जीवन-शैली के संदर्भ में। अपने द्वारा हासिल जानकारियों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

उत्तर : (i) मेरा निवास स्थान जयपुर में है। मेरे चाचाजी जयपुर से हरिद्वार (उत्तराखंड) गए। उन्होंने बस द्वारा यात्रा की। उन्हें लगभग यह यात्रा करने में 12 घंटे लगे। उन्होंने यह यात्रा पवित्र गंगा में स्नान करने के लिए की और साथ ही वे हर की पौड़ियों पर अपने मृत पूर्वजों को पूजा-अर्चना के माध्यम से परंपरागत तरीके से अपनी श्रद्वांजलि अर्पित करना चाहते थे। उन्होंने यह यात्रा कई महीनों के अंतिम सप्ताह में की, उस समय तापमान बहुत ऊँचा (लगभग 42°C) था। उन्हें यात्रा में भारी धकान हुई।
(ii) उन्हें यह यात्रा करते हुए कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई, रास्ते में हर दस-पन्द्रह मील की दूरी के बाद सड़क के किनारे खान-पान की व्यवस्था वाले जल-पान गृह, छोटी-छोटी दुकानें बनी हुई थीं। किस प्रकार जयपुर के लोग रहते हैं लगभग उससे मिलती-जुलती वेश-भूषा और मकानों के स्तर और आकार एक जैसे ही थे। राजस्थान सीमा पार करते ही हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि के लोग सरल हिन्दी मुख्यतः बोलते थे। उन्होंने सामान्यतः साधारण वस्त्र पहने हुए थे जैसे कि पुरुषों और लड़कों ने धोती, कुर्ता, पैंट, कमीज, पजामा कुर्ता या टी शर्ट पहनी हुई थी। महिलाओं ने धोती या साडी, ब्लाऊज या अंगिया अथवा सलवार कमीज और कुछ महिलाओं ने प्रायः काले रंग का बुका पहना हुआ था। ऐसे ही पहनावे के लोग जयपुर में दिखाई देते हैं लेकिन जयपुर की जनजातियाँ बड़े विशाल आकार के घाघरे, चाँदी के आभूषण और सिर पर बोरला पहने हुए थीं।
(iii) सभी रास्ते में लोग चावल, रोटी, दाल विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ, सलाद, दही, लस्सी आदि खाते दिखाई दिए। जयपुर के लोग कुछ होटलों पर दाल चुरमा, बाटी आदि खाते हैं। हरिद्वार में एक जगह जयपुर की इन पकवानों की व्यवस्था थी लेकिन लोग प्रायः गेहूँ की चपाती या कुछ चावल के साथ पकी हुई दाल और ठंडी लस्सी को अधिक प्राथमिकता दे रहे थे।
(iv) हरिद्वार में रहने वाले लोग और तीर्थ यात्री लगभग उसी प्रकार मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं अपने आराध्य देवी-देवता के समक्ष सिर झुकाते हैं। मेरे चाचाजी ने गंगा में स्नान किया।
(v) उन्होंने हरिद्वार और जयपुर की इमारतों में एक स्पष्ट अंतर बताया। जयपुर की सभी इमारतों में मुख्यतः पत्थर का इस्तेमाल किया गया जबकि हरिद्वार की इमारतें ईंटों की बनी हुई थीं। हरिद्वार की सड़कें बहुत तंग और टेढ़ी-मेढ़ी थीं जबकि जयपुर की सड़कें सीधी, सपाट, लंबी और चौड़ी थीं। उनके अनुसार जयपुर की तुलना में हरिद्वार एक पुराना शहर था। जयपुर की सभी इमारतों पर गुलाबी सफेदी, चूना और रंग दिखाई देता है। इसलिए उसे गुलाबी नगरी भी कहा जाता है जबकि हरिद्वार की इमारतों में इस प्रकार की कोई समरूपता नहीं दिखाई दी।

परियोजना कार्य :

प्रश्न 12. इस अध्याय में उल्लिखित यात्रियों में से एक जीवन तथा कृतियों के विषय में और अधिक जानकारी हासिल कीजिए। उनकी यात्राओं पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हुए कि उन्होंने समाज का कैसा विवरण किया है तथा इनकी तुलना अध्याय में दिए गए उद्धरणों से कीजिए ।

अथवा

दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद तुगलक के अधीन सेवा काल में इब्न-बतूता और सुल्तान के संबंधों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1. परिचय (Introduction) : इब्न-बतूता का जन्म तैजियर (मोरक्को) अफ्रीका में हुआ था। उसका संबंध

सबसे सम्मानित तथा शिक्षित परिवारों में से समझे जाने वाले एक परिवार से था। उसका परिवार इस्लामिक कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था।

  1. यात्रा के लिए प्रस्थान (Start for travel) : अपनी श्रेणी के अन्य सदस्यों के विपरीत, इब्न-बतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्वपूर्ण स्रोत मानता था। उसे यात्राएँ करने का बहुत शौक था और वह नए-नए देशों और लोगों के विषय में जानने के लिए दूर-दूर के क्षेत्रों तक गया। 1332-33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन ओमान तथा अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।
  2. यात्रा मार्ग (Route of Travel) : मध्य एशिया के रास्ते होकर इब्न-बतूता सन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा। उसने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में सुना था और कला और साहित्य के एक दयाशील संरक्षक के रूप में उसकी ख्याति से आकर्षित हो बतूता ने मुल्तान के रास्ते होकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।
  3. इब्न-बतूता दिल्ली में (Ibr-Battuta at Delhi) : सुल्तान उसकी विद्वता से प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली का काजी या न्यायाधीश नियुक्त किया। वह इस पद पर कई वर्षों तक रहा, पर फिर उसने विश्वास खो दिया और उसे कारागार में कैद कर दिया गया। बाद में सुल्तान और उसके बीच की गलतफहमी दूर होने के बाद उसे राजकीय सेवा में पुनर्स्थापित किया गया और 1342 ई. में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया। अपनी नयी नियुक्ति के साथ इब्न-बतूता मध्य भारत के रास्ते मालाबार तट की ओर बढ़ा। मालाबार से वह मालद्वीप गया जहाँ वह अठारह महीनों तक काजी के पद पर रहा पर अंतत: उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया।
  4. इब्न-बतूता अन्य स्थानों पर (Ibn-Battuta at other places countries) : बाद में एक बार फिर वह मालाबार तट तथा मालद्वीप गया और चीन जाने के अपने कार्य को दोबारा शुरू करने से पहले वह बंगाल तथा असम भी गया। वह जहाज से सुमात्रा गया और सुमात्रा से एक अन्य जहाज से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन (जो आज क्वानझू के नाम से जाना जाता है) गया। उसने व्यापक रूप से चीन में यात्रा की और वह बीजिंग तक गया लेकिन वहाँ लंबे समय तक नहीं ठहरा। 1347 में उसने वापस अपने घर जाने का निश्चय किया। चीन के विषय में उसके वृत्ता की तुलना मार्को पोलो, जिसने तेरहवीं शताब्दी के अंत में वेनिय से चलकर चीन (और भारत की भी) की यात्रा की थी, के वृत्तंत से की जाती है।
  5. वृत्तांत का मूल्यांकन (Evaluation of description):
    (क) इब्न-बतूता ने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के विषय में अपने अभिमत को सावधानी तथा कुशलतापूर्वक दर्ज किया। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि यह विश्व-यात्री चौदहवीं शताब्दी में यात्राएँ कर रहा था, जब आज की तुलना में यात्रा करना अधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था। इब्न-बतूता के अनुसार उसे मुल्तान में दिल्ली की यात्रा में चालीस और सिंध से दिल्ली की यात्रा में लगभग पचास दिन का समय लगा था। दौलताबाद से दिल्ली की दूरी चालीस, जबकि ग्वालियर से दिल्ली की दूरी दस दिन में तय की जा सकती थी।
    (ख) जब चौदहवीं शताब्दी में इब्न-बतूता दिल्ली आया था। उस समय तक पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा बन चुका था जो पूर्व में चीन से लेकर पश्चिम में उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका तथा यूरोप तक फैला हुआ था।
    (ग) इब्न-बतूता ने स्वयं इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर यात्राएँ की, पवित्र पूजास्थलों को देखा, विद्वान लोगों तथा शासकों के साथ समय बिताया, कई बार काजी के पद पर रहा तथा शहरी केन्द्रों की विश्ववादी संस्कृति का उपभोग किया जहाँ अरबी. फारसी, तुर्की तथा अन्य भाषाएँ बोलने वाले लोग विचारों. सूचनाओं तथा उपाख्यानों का आदान-प्रदान करते थे। (घ) इब्न-बतूता ने अपने वृत्तांत में भारतीय शहरों, बाजारों यहाँ की समृद्धि, डाक प्रणाली के साथ-साथ दास-दासियों आदि का विस्तृत विवरण किया है। इसका विवरण कुछ यूरोपीय इतिहासकारों जैसे बर्नियर से अधिक श्रेष्ठ माना जाता है। वह पूर्वग्रहों विहीन और अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
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