Class 12th History Chapter 5 Important Question Answer 2 Marks यात्रियों के नजरिए समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 1, इतिहासकारों के द्वारा जिन कारकों को ध्यान में रखना चाहिए पाठ्य सामग्री की परंपराओं से व्यवहत करते समय उनकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर : पाठ्यपुस्तकों अथवा पाठ्य सामग्री की परंपराओं से व्यवहत करते समय इतिहासकारों को निम्नलिखित कारकों का ध्यान रखना चाहिए : (i) महिलाओं और पुरुषों ने कार्य की तलाश में प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए व्यापारियों, सैनिकों, पुरोहितों तथा तीर्थयात्रियों के रूप में या फिर साहस की भावना स प्रेरित होकर यात्राएँ की हैं। वे. जो किसी नए स्थान पर आत हैं अथवा बस जाते हैं, निश्चित रूप से एक ऐसी दुनिया का समक्ष पाते हैं भू-दृश्य या भौतिक परिवेश के संदर्भ में और साथ ही लोगों की प्रधाओं, भाषाओं, आस्था तथा व्यवहार में भिन्न होती है।
(ii) महिलाओं द्वारा छोड़े गए वृत्तान्त न के बराबर है। सुरक्षित मिले वृत्तान्त अपनी विषयवस्तु के संदर्भ में अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कुछ दरबार की गतिविधियों से संबंधित होते हैं, जबकि अन्य धार्मिक विषयों या स्थापत्य के तत्त्वों और स्मारकों पर केंद्रित होते हैं। उदाहरण के लिए, पंद्रहवीं शताब्दी में विजय नगर शहर के सबसे महत्त्वपूर्ण विवरणों में से एक हेरात से आए एक राजनायिक अब्दुर रज्जाक समरकंदी से प्राप्त होता है।
(iii) कई यात्री सुदूर क्षेत्रों में नहीं जाते हैं। उदाहरण के लिए, मुगल साम्राज्य में प्रशासनिक अधिकारी कभी-कभी साम्राज्य के भीतर ही भ्रमण करते थे और अपनी टिप्पणियाँ दर्ज करते थे। इनमें से कुछ अपने ही देश की लोकप्रिय प्रथाओं तथा जन-वार्ताओं और परम्पराओं को समझना चाहते थे।
(iv) पूरी तरह से भिन्न सामाजिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने के कारण लेखक दैनिक गतिविधियों तथा प्रथाओं के प्रति अधिक सावधान रहते थे। देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे। नजरिये में यही भिन्नता ही यात्रा-वृत्तान्तों को अधिक रोचक बनाती है।

प्रश्न 2, बर्नियर 17वीं शताब्दी के नगरों के बारे में क्या कहता है ? उसका यह विवरण किस प्रकार संशयपूर्ण है ?
उत्तर : 17वीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत जनसंख्या नगरों में रहती थी। यह अनुपात उस समय की पश्चिमी यूरोप की नगरीयं जनसंख्या के अनुपात से अधिक था। फिर भी बर्नियर मुगलकालीन शहरों को “शिविर नगर” कहता है, जिससे उसका आशय उन नगरों से है जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे। उसका विश्वास था कि ये नगर राज-दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे और उसके चले जाने । के बाद तेजी से विलुप्त हो जाते थे। वह यह भी कहता है कि इनकी सामाजिक और आर्थिक नींव व्यावहारिक नहीं होती थी। और ये राजकीय संरक्षण पर आश्रित रहते थे। परंतु यह बात संशयपूर्ण है। वास्तव में उस समय सभी प्रकार के नगर पाए जाते थे-उत्पादन केंद्र, व्यापरिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थस्थान आदि। समृद्ध व्यापारिक समुदाय तथा व्यावसायिक वर्ग इनके अस्तित्व के सूचक हैं।

अथवा

“18वीं शताब्दी से बर्नियर के विवरणों ने यूरोपीय लेखकों को प्रभावित किया।” इस कथन के समर्थन में तर्क दीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि 18वीं शताब्दी से बर्नियर के विवरणों ने यूरोपीय लेखकों को प्रभावित किया। इन संबंध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं :
(i) मुगलकाल में सारी भूमि का स्वामी सम्राट था। लोगों का भूमि पर निजी स्वामित्व नहीं था। फलस्वरूप भूमि में सुधार लान वाले वर्ग का अभाव था। उसके इस विचार ने फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो को प्रभावित किया। उसने उस विचार का प्रयोग प्राचीन निरंकुशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया जिसके अनुसार एशिया में लोगों को गरीबी और दासता की स्थितियों में रखा जाता था।
(ii) बर्नियर के विचार ने कार्ल मार्क्स को भी प्रभावित किया। ओं उसने इस विचार को एशियाई उत्पादन के सिद्धांत का रूप दे दिया। उसने यह तर्क दिया कि भारत तथा अन्य एशियाई देशों में उपनिवेशवाद से पहले अधिशेष का ग्रहण राज्य द्वारा होता था। इससे एक ऐसे समाज का उदय हुआ जो बडी संख्या में स्वायत्त तथा समतावादी ग्रामीण समुदायों से बना था। इन समुदायों पर राजदरबार का नियंत्रण था। जब तक अधिशेष की आपूर्ति बिना किसी बाधा के होती रहती थी तब तक स्वायत्तता का सम्मान किया जाता था। कार्ल मार्क्स के अनुसार यह एक निष्क्रिय प्रणाली मानी जाती थी।

प्रश्न 3. बर्नियर के मुगल साम्राज्य के बारे में दिए गए वर्णन में की गई एक जटिल समाजिक सच्चाई के संकेत को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई :
1. बर्नियर द्वारा मुगल राज्य को निरंकुश रूप देने की तन्मयता स्पष्ट है, लेकिन उसके विवरण कभी-कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। उदाहरण के लिए वह कहता है कि शिल्पकारों के पास अपने उत्पादों को बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था क्योंकि लाभ का अधिग्रहण राज्य द्वारा कर लिया जाता था।
2.उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था। साथ ही वह यह भी मानता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था। वह एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय जो लंबी दूरी के विनिमय से संलग्न था, के अस्तित्व को भी रेखांकित करता है।
3.सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था। यह औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
4.भू-स्वामित्व के प्रश्न की तरह ही बर्नियर एक अति सरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था। वास्तव में सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे, उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि। व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व के संबंध से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे

प्रश्न 4. भारतीय सामाजिक और ब्राह्मणिक प्रथाओं के समझने में अल-बिरूनी को जिन अंतर्निहित समस्याओं क सामना करना पड़ा, उन्हें स्पष्ट कीजिए। उसके समर्थन में दि गए किन्हीं दो स्रोतों का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर : (i) अल-बिरूनी का जन्म आधुनिक उज्बेकिस्तान में स्थित ख्वारिज्म में 973 ई० में हुआ था। ख्वारिज्म शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था। वह कई भाषाएँ जानता था जिनमें सीरियाई, फारसी, हिब्रू और संस्कृत शामिल थी।
(ii)अल-बिरूनी अपने लिए निर्धारित उद्देश्य में निहित 44 পমस्याओं से परिचित था। उसने कई “अवरोधों” की चर्चा की है जो उसके अनुसार समझ में बाधक थे।
(iii) इनमें से पहला अवरोध भाषा थी। उसके अनुसार संस्कृत, अरबी और फारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धांतों को एक भाषा से दूसरी में अनुवादित करना आसान नहीं था।
(iv) उसके द्वारा चिह्नित दूसरा अवरोध धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता थी।
(v) अल-बिरूनी के अनुसार तीसरा अवरोध अभिमान था। यहाँ रोचक बात यह है कि इन समस्याओं की जानकारी होने पर भी अल-बिरूनी लगभग पूरी तरह से ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर आश्रित रहा। उसने भारतीय समाज को समझने के लिए अकसर वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों तथा मनुस्मृति आदि से अंश उद्धृत किए।

प्रश्न 5. अल-बिरूनी ने जाति-व्यवस्था की किस मान्यता को स्वीकार नहीं किया और क्यों ? वह जाति-व्यवस्था की कठोरता के विषय में क्या कहता है ?
उत्तर : जाति-व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद अल-बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार कर दिया। उसने लिखा कि प्रत्येक वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी खोई हुई पवित्रता को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। अल-बिरूनी जोर देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव हो जाता। उसके अनुसार जाति-व्यवस्था में शामिल अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है ।
वास्तव में जाति-व्यवस्था के विषय में अल-बिरूनी का विवरण पूरी तरह से संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से प्रभावित था। इन ग्रंथों में ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था परंतु वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी। उदाहरण के लिए जाति-व्यवस्था के अंतर्गत न आने वाली श्रेणियों से प्रायः यह अपेक्षा की जाती थी कि वे किसानों और जमींदारों को सस्ता श्रम प्रदान करें। भले ही ये श्रेणियाँ प्रायः सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होती थीं, फिर भी उन्हें आर्थिक तंत्र में शामिल किया जाता था।

प्रश्न 6. इतिहासकारों ने इन बतूता द्वारा दिए गए शहरों के विवरण के आधार पर, शहरों की समृद्धि की व्याख्या किस प्रकार की है? स्पष्ट कीजिए।

अथवा

भारत के नगरों के बारे में, विशेषकर दिल्ली के संदर्भ में, इब्न बतूता के विचारों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तरः इब्न बतूता ने भारतीय शहरों को उन लोगों के लिए व्यापाक अवसरों से भरपूर पाया जिनके पास दृढ़ इच्छा, साधन तथा कौशल था। ये शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे सिवाय कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों से होने वाले नाश के। इब्न बतूता के वृत्तांत से ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश शहरों में भीड़-भाड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले रंगीन बाजार थे। ये बाजार तरह-तरह की वस्तुओं से भरे रहते थे। इब्न बतूता दिल्ली को एक बड़ा शहर, विशाल आबादी वाला तथा भारत में सबसे बड़ा बताता है। दौलताबाद (महाराष्ट्र में) भी कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।
बाजार मात्र आर्थिक विनिमय के केंद्र ही नहीं थे बल्कि ये सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। अधिक बाजारों में एक मस्जिद तथा एक मंदिर होता था। कुछ बाजारों में तो नर्तकों, संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए भी स्थान बने हुए थे। तो नर्तकों, संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए भी स्थान बने हुए थे।

प्रश्न 7. बर्नियर ने भूमि स्वामित्व के कौन-कोन से दुष्परिणाम बताये हैं ?
उत्तर : भूमि स्वामित्व के दुष्परिणाम :
(i) बर्नियर के अनुसार भारत में निजी भू-स्वामित्व का अभाव था। वह भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों दोनों के लिए हानिकारक मानता था।
(ii) बर्नियर को प्रतीत हुआ कि भूमि पर सम्पूर्ण अधिकार सम्राट का था जिसे वह अपने अमीरों में बांटता था। फलस्वरूप इसकी अर्थव्यवस्था और समाज पर हानिकारक प्रभाव पड़ता था।
(iii) बर्नियर के अनुसार भूमिस्वामी अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाये रखने और उसमें बढ़ावे के लिए निवेश के प्रति उदासीन थे।
(iv) निजी स्वामित्व के अभाव ने बेहतर भूस्वामी के वर्ग के उदय को रोका जो भूमि के रख-रखाव व बेहतरी के प्रति सजग रहते थे।
(v) निजी भूमि स्वामित्व के कारण कृषि का विनाश, कृषकों का उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में गिरावट आई।

अथवा

अल-बिरूनी ने भारत की वर्ण-व्यवस्था के विषय में क्या जानकारी दी है ?
उत्तर : अल-बिरूनी द्वारा भारत की वर्णव्यवस्था की जानकारी :
(i) हिंदू ग्रंथों के आधार से उसका कहना है कि सबसे ऊंची जाति ब्राह्मणों की है जो ब्रह्मा के सिर से उत्पन्न हुए थे। क्योंकि ब्रह्म प्रकृति नामक शक्ति का ही दूसरा नाम है और सिर शरीर का ऊपरी भाग है। इसलिए ब्राह्मण पूरी प्रजाति का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है। यही कारण है कि उन्हें मानव जाति में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है।
(ii)ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय आते हैं जिनका जन्म शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा के कंधों और हाथों से हुआ है। वह लगभग ब्राह्मणो समकक्ष हैं।
(iii) क्षत्रिय के बाद वैश्य आते हैं जिनका उद्भव ब्रह्मा की जंघाओं से हुआ था।
(iv) शूद्र का सृजन ब्रह्मा के पैरों से हुआ था ।

प्रश्न 8. इन-बतूता द्वारा मुहम्मद-बिन तुगलक की नई राजधानी दौलताबाद से संबधित विवरण का एक अंश देते हुए बताइए कि उस समय बाजार में संगीत का आयोजन किस प्रकार किया जाता था ?
उत्तर : 1. इन्न बतूता ने अपने भारत संबंधी विवरण में बताने का प्रयास किया है कि भारत के जीवन में संगीत मनोरंजन का एक महत्त्वपूर्ण साधन था और उसका आयोजन बाजारों में किया जाता था। अनेक गायिकाएँ गीत गाती थीं और नाचती थीं।
2.इब्न बतूता द्वारा दौलताबाद के विवरण से एक अंश दिया जा रहा है:
(क) दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के लिए एक बाजार है जिसे ताराबबाद कहते हैं। यह सबसे विशाल और सुंदर बाजारों में से एक है। यहाँ बहुत सी दुकानें हैं और प्रत्येक दुकान में एक ऐसा दरवाजा है जो मालिक के आवास में खुलता है दुकानों को कालीनों से सजाया गया है और दुकान के मध्य में झूला है जिस पर गायिका बैठती है। वह सभी प्रकार की भव्य वस्तुओं से सजी होती है और उसकी सेविकाएँ उसे झूला झुलाती हैं।
(ख) बाजार के मध्य में एक विशाल गुंबद खड़ा है जिसमें कालीन बिछाए गए हैं और सजाया गया है। इसमें प्रत्येक गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख, अपने सेवकों और दासों के साथ स्थान ग्रहण करते हैं। गायिकाएँ एक के बाद एक झुंडों में उनके समक्ष आकर सूर्यास्त का गीत गाती और नाचती हैं जिसके पश्चात् वे चले जाते हैं।
(ग) इस बाजार में इबादत के लिए मस्जिदें बनी हुई हैं. हिंदू शासकों में से एक- जब भी बाज़ार से गुजरता था, गुंबद में उतर कर आता था और गायिकाएँ उसके समक्ष गान प्रस्तुत करती थीं। यहाँ तक कि कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे। आपके विचार में इब्न बतूता ने अपने विवरण में इन गतिविधियों को रेखांकित क्यों किया?

प्रश्न 9. बर्नियर ने मुगल राज्य को किस रूप में देखा? क्या सरकारी मुगल दस्तावेज इस बात की पुष्टि करते हैं ?
उत्तर : बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को जिस रूप में देख । उसकी ये विशेषताएँ थीं :
(1) इसका राजा “भिखारियों और क्रूर लोगों” का राजा था।
(2) इसके शहर और नगर ध्वस्त हो चुके थे तथा “खराब हवा” से दूषित थे। इन सबका मात्र एक ही कारण था राज्य का स्वामित्व।
भूमि पर परंतु एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज यह नहीं दर्शाता कि भूमि का एकमात्र स्वामी राज्य ही था। उदाहरण के लिए अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फजल भू-राजस्व का “राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है जो राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले लिया जाता था, न कि अपने स्वामित वाली भूमि पर लगान के रूप में। ऐसा संभव है कि यूरोपीय थाम ऐसे करों को लगान मानते हों, क्योंकि भू-राजस्व की माँग प्राय बहुत अधिक होती थी परंतु वास्तव में यह न तो लगान था, ही भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।

अथवा

उन यात्रियों ने, जो भारत आए, सामाजिक पक्षपात को सामान्य परिस्थिति क्यों माना ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : भारत आने वाले सभी यात्री पुरुष था इसलिए उन्होंने उपमहाद्वीप में महिलाओं की स्थिति की ओर विशेष ध्यान नहीं जिन्हें समाज में पुरुषों के बराबर स्थान प्राप्त नहीं था। फिर की यात्री इस पक्षपात को कभी-कभी सामान्य परिस्थिति मान लेते को इसका कारण यह था कि बाजार में पुरुष तथा महिला-दास वस्तुओं की तरह खुलेआम बिकते थे। इस दृष्टि से दोनों की अन्य स्थिति लगभग एकसमान थी। दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए प्रयोग में लाया जाता था। वे विशेष रूप से पालकी या डोली में महिलाओं या पुरुषों को ले जाने का काम करते थे।

प्रश्न 10. बर्नियर की रचना “ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर” पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी लिखिए।

अथवा

“बर्नियर के लेखों ने 18वीं शताब्दी में पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। इस कथन के पक्ष में तर्क दें।
उत्तर : 1. बर्नियर के ग्रंथ ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर अपने गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि तथा गहन चिंतन के लिए उल्लेखनीय है। उसके वृत्तांत में की गई चर्चाओं में मुगलों के इतिहास को एक प्रकार के वैश्विक ढाँचे में स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
2.वह निरंतर मुगलकालीन भारत की तुलना तत्कालीन करता रहा, सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करते हुए
3.उसका भारत का चित्रण द्वि-विपरीतता के नमूने पर आधारित है, जहाँ भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया गया है या फिर यूरोप का “विपरीत” जैसा कि कुछ इतिहासकार परिभाषित करते हैं। उसने जो भिन्नताएँ महसूस की उन्हें भी| पदानुक्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया, जिससे भारत, पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का प्रतीत हो। बर्नियर का दृष्टिकोण एक औपनिवेशिक इतिहासकार का था। उसने मुगलकाल में, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थिति को एवं औपनिवेशिक लेखक की भाँति ही उल्लेख किया। इसका यही दृष्टिकोण बाद में एवों शताब्दी के यूरोपीय और विशेषकर अंग्रेज विद्वानों, यात्रियों कथा इतिहासों ने अपनाया। उन्होंने भारत में फूट एवं हीन भावना को बढ़ावा दिया। भारत में औपनिवेशिक काल में हो रहे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण को उचित ठहराया।

प्रश्न 11. मुगलकालीन शिल्पकारों की स्थिति के बारे में बर्नियर ने क्या विवरण छोड़ा है ? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर : बर्नियर के विवरण मुगल साम्राज्य को तो निरंकुश दिखाते ही हैं साथ ही एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर भी संकेत करते हैं। उदाहरण के लिए वह कहता है कि शिल्पकारों को अपने उत्पादों को बेहतर बनाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था, क्योंकि उनके मुनाफे का अधिग्रहण राज्य द्वारा कर लिया जाता था। इसलिए उत्पादन के स्तर में निरंतर कमी आ रही थी। दूसरी ओर वह यह कहता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थी, क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था। वह लंबी दूरी के व्यापार में लगे के समृद्ध व्यापारिक समुदाय के अस्तित्व को भी स्वीकार करता है।

प्रश्न 12. भारतीय उपमहाद्वीप के नगरों के बारे में इब्न-बतूता के विचारों की व्याख्या कीजिए ।

अथवा

इतिहासकारों ने इब्न बतूता द्वारा दिए गए शहरों के विवरण के आधार पर, शहरों की समृद्धि की व्याख्या किस प्रकार की है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : इब्न बतूता शहरों की समृद्धि का वर्णन करने में अधिक रुचि नहीं रखता था परंतु इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत का प्रयोग यह तर्क देने के लिए किया है कि शहरों की समृद्धि का आधार गाँव की कृषि अर्थव्यवस्था थी। इब्न बतूता के अनुसार भारतीय कृषि अत्यधिक उत्पादक थी। इसका कारण मिट्टी का उपजाऊपन था। अत: किसानों के लिए वर्ष में दो फसलें उगाना आसान था। इब्न बतूता ने यह भी देखा कि उपमहाद्वीप व्यापार तथा वाणिज्य के एशियाई तंत्रों से भली-भाँति जुड़ा हुआ है। भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में बहुत माँग थी। इससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी लाभ होता था। भारत के सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, जरी तथा साटन की तो विशेष माँग थी। इब्न बतूता हमें बताता है कि महीन मलमल की कई किस्में इतनी अधिक महँगी थीं कि उन्हें केवल अत्यधिक धनी लोग ही खरीद सकते थे।

प्रश्न 13. “मुगलकालीन राजकीय कारखाने संबंधी विवरणों की दृष्टि से बर्नियर महत्त्वपूर्ण इतिहासकार है ।” इस कथन के संदर्भ में बर्नियर द्वारा प्रस्तुत शिल्पकारों और राजकीय कारखानों के बारे में संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर : बर्नियर और मुगल राजकीय कारखाने (Barnier and Mughal Governments factories) : संभवतः बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली है। का विस्तृत विवरण प्रदान करता
1.कई स्थानों पर बड़े कक्ष दिखाई देते हैं जिन्हें कारखाना अथवा शिल्पकारों की कार्यशाला कहते हैं।
2.एक कक्ष में कसीदाकार एक मास्टर के निरीक्षण व्यस्तता से कार्यरत रहते हैं।
3.एक अन्य में आप सुनारों को देखते हैं।
4.तीसरे में, चित्रकार; चौथे में, प्रलाक्षा रस का रोगन लगान
5.पाँचवें में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले; छठे में रेशम, जरी तथा महीन मलमल का काम करने वाले शिल्पकार अपने कारखानों में हर रोज़ सुबह आते हैं जहाँ वे पूरे दिन कार्यरत रहते हैं; और शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं।
6.इसी निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है। कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ था।

प्रश्न 14. मध्यकालीन भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति विभिन्न यात्रियों तथा लेखकों द्वारा पश्चिमी महिलाओं से तुलना करते हुए किस तरह दयनीय और दुखदायी स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। संक्षेप में लिखिए।

अथवा

बर्नियर एवं अन्य समकालीन यूरोपीय यात्रियों तथा लेखकों द्वारा वर्णित भारतीय महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक स्थिति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों तथा लेखकों के लिए, महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अक्सर पश्चिमी तथा पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था। इसलिए यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि बनियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना। उसने लिखा कि हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
लेकि हिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीजों के चारों ओर घूमता था। उनका श्रम कृषि तथा कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था। व्यापारिक परिवारों से आने वाली महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं, यहाँ तक कि कभी-कभी वाणिज्यिक विवादों को अदालत के सामने भी ले जाती थीं। अत: यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को उनके घरों के खास स्थानों तक परिसीमित कर रखा जाता था।

प्रश्न 15, अल-बिरूनी की जीवन-यात्रा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर : अल-बिरूनी का जन्म आधुनिक उज्बेकिस्तान में स्थित ख्वारिज्म में 973 ई० में हुआ था| ख्वारिज्म शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था। अल-बिरूनी ने उस समय वहाँ उपलब्ध. सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त की थी। वह कई भाषाएँ जानता था जिनमें सीरियाई, फारसी, हिब्रू तथा संस्कृत शामिल हैं। भले ही वह यूनानी भाषा नहीं जानता था परंतु फिर भी वह प्लेटों तथा अन्य यूनानी दार्शनिकों के कार्यों से पूरी तरह परिचित था। इन्हें उसने अरबी अनुवादों के माध्यम से पढ़ा था। 1017 ई० में ख्वारिज्म पर महमूद ने आक्रमण किया और यहाँ के कई विद्वानों तथा कवियों को अपने साथ अपनी राजधानी गजनी ले गया। अल-बिरूनी भी उनमें से एक था। वह बंधक के रूप में गजनी आया था, परंतु धीरे-धीरे उसे यह शहर अच्छा लगने लगा। अत: उसने अपना शेष जीवन यहीं बिताया। 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई थी।

प्रश्न 16. बर्नियर भूमि पर राज्य के स्वामित्व को विनाशकारी क्यों मानता है ?

अथवा

बर्नियर के अनुसार, “भूमि पर राजकीय (शाही स्वामित्व के राज्य और समाज के लिए हानिकारक परिणाम थे।” इस कथन का औचित्य सिद्ध कीजिए।

उत्तर : बर्नियर का निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास था। इसलिए उसने भूमि पर राज्य के स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक माना। उसे यह लगा कि मुगल साम्राज्य में सारी भूमि का स्वामी सम्राट् है जो इसे अपने अमीरों के बीच बाँटता है। इससे अर्थव्यवस्था और समाज पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।
बर्नियर के अनुसार भूमि पर राज्य के स्वामित्व के कारण भू-धारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें बढ़ोत्तरी करने का कोई प्रयास नहीं करते थे। इस प्रकार निजी भू-स्वामित्व के अभाव ने भू-धारकों के “बेहतर” वर्ग का उदय न होने दिया जो भूमि सुधार तथा उसके रख-रखाव की ओर ध्यान देते, इसी के चलते कृषि के विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन-स्तर में लगातार पतन की स्थिति उत्पन्न हुई। केवल शासक वर्ग को ही इसका लाभ मिलता रहा।

प्रश्न 17. इब्न बतूता की यात्राएँ कठिन तथा जोखिम भरी थीं, स्पष्ट कीजिए। उसे हठी यात्री क्यों कहा गया है?
उत्तर : इब्न बतूता ने नवीन संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं आदि के विषय में अपने विचारों को बड़ी सावधानी से लिखा। इब्न बतूता ने अपनी यात्राएँ उस समय की थी, जिस समय यात्रा करना अत्यधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था। इन बतूता के अनुसार उसे मुलतान से दिल्ली की यात्रा में चालीस तथा सिंध से दिल्ली की यात्रा में लगभग 50 दिन का समय लगा था |
यात्रा करना सुरक्षित भी नहीं था। इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं द्वारा किए गए आक्रमण झेले थे। यूँ तो वह अपने साथियों के साथ कारवाँ में चलना पसंद करता था, परंतु इससे भी राजमार्गों के लुटेरों से बचा नहीं जा सका। मुलतान से दिल्ली की यात्रा के दौरान उसके कारवाँ पर आक्रमण हुआ था और उसके कई साथी यात्रियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। शेष यात्री भी बुरी तरह से घायल हो गए थे। इनमें इब्न बतूता भी शामिल था।
हठी यात्री : इब्न बतूता वास्तव में एक हठी यात्री था। उसने उत्तर पश्चिमी अफ्रीका में अपने निवास-स्थान मोरक्को वापस जाने से पूर्व कई वर्ष उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के भागों, उपमहाद्वीप तथा चीन की यात्रा की थी। उसकी वापसी पर मोरक्को के स्थानीय शासक ने उसकी कहानियों को दर्ज करने के निर्देश दिए।

गजनी में रहते हुए अल-बिरूनी की भारत के प्रति रूचि कैसे बढ़ी? उसके लेखन कार्य की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।

उत्तर : भारत के प्रति रुचि बढ़ना-गजनी में अल-बिरूनी की भारत के प्रति रुचि बढ़ने लगी। इसके पीछे एक विशेष कारण था। 8वीं शताब्दी से ही संस्कृत में रचित खगोल-विज्ञान, गणित और चिकित्सा संबंधी कार्यों का अरबी भाषा में अनुवाद होने लगा था। पंजाब के गजनवी साम्राज्य का भाग बन जाने के बाद स्थानीय लोगों से हुए संपर्कों ने आपसी विश्वास और समझ का वातावरण तैयार किया। अल-बिरूनी ने ब्राह्मण, पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और संस्कृत, धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया।

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