Class 12th History Chapter 5 Important Question Answer 8 Marks यात्रियों के नजरिए समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 1. बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को किस रूप से । देखा उसे । अब्बुल फजल जैसे इतिहासकार से क्या शिकवा बर्नियर का विवरण फ्रांसीसी दार्शनिक और कार्ल माक्क्स जैसे प्रगतिशील समाजवादियों पर कितना प्रभाव डाल सका ? क्या उसके द्वारा दिए गए ग्रामीण समाज के चित्रण को आप सत्य मानते हैं ?

अथवा

“बर्नियर के शाही भू-स्वामित्व के विवरण ने पश्चिमी विचारकों जैसे कि फ्रांसीसी दार्शनिक मान्टेस्क्यू और जर्मन कार्ल मार्क्स को प्रभावित किया।” इस कथन की न्यायसंगत पुष्टि कीजिए।
उत्तर : 1. बर्नियर और मुगल सम्राट : भारत में आए यूरोपीय यात्री और विवरण देने वाले प्रसिद्ध यात्री बर्नियर ने मुग़ल साम्राज्य को इस रूप में देखा-इसका राजा “भिखारियों और क्रूर लोगों” का राजा था; इसके शहर और नगर विनष्ट तथा “खराब हवा” से दूषित थे; और इसके खेत “झाड़ीदार” तथा “घातक दलदल” से भरे हुए थे और इसका मात्र एक ही कारण था-राजकीय भूस्वामित्व।
2.बर्नियर और अब्बुल फल जैसे इतिहासकारों से शिकायत : आश्चर्य की बात यह है कि एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। उदाहरण के लिए, सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज्ल भूमि राजस्व को राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है जो राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले की गई माँग प्रतीत होती है न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान। ऐसा संभव है कि यूरोपीय यात्री ऐसी मांगों को लगान मानते थे क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अक्सर बहुत अधिक होती थी। लेकिन असल में यह न तो लगान था, न ही भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।
3.फ्रांसीसी दार्शनिकों पर बर्नियर के विवरण का प्रभाव (Impact on Bernier description on French Philospher) : बर्नियर के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी से पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। उदाहरण के लिए, फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत का प्रयोग प्राच्य निरंकुशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया, जिसके अनुसार एशिया (प्राच्य अथवा पूर्व) में शासक अपनी प्रजा के ऊपर निर्बाध प्रभुत्व का उपभोग करते थे, जिसे दासता और गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था। इस तर्क का आधार यह था कि सारी भूमि पर राजा का स्वामित्व होता था तथा निजी संपत्ति अस्तित्व में नहीं थी। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजा और उसके अमीर वर्ग को छोड़ प्रत्येक व्यक्ति मुश्किल से गुजर-बसर कर पाता था।
4.बर्नियर का विचार एवं कार्ल मार्क्स का एशियाई देशों में भूमि उत्पादन संबंधी विचार (Karl Marx thoughts about land production in Asian Countries thought of Bernier) : उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में और आगे बढ़ाया। उसने यह तर्क दिया कि भारत (तथा अन्य एशियाई देशों) में उपनिवेशवाद से पहले अधिशेष का अधिग्रहण राज्य द्वारा होता था। इससे एक ऐसे समाज का उद्भव हुआ जो बड़ी संख्या में स्वायत्त तथा (आंतरिक रूप से) समतावादी ग्रामीण समुदायों से बना था। इन ग्रामीण समुदायों पर राजकीय दरबार का नियंत्रण होता था और जब तक अधिशेष की आपूर्ति निर्विघ्न रूप से जारी रहती थी, इनकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाता था यह एक निष्क्रिय प्रणाली मानी जाती थी।
5.बनियर के वर्णन में सत्यता (Zayalness and Sermier descrinticns) : ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था। बल्कि सोलहवों और सत्रहवीं शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक और बड़े जमींदार थे जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे और दूसरी ओर भूमिविहीन अमिक (बलाहार)। इन दोनों के बीच में बड़ा किसान ‘अस्पृश्य” थी जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था और माल उत्पादन में संलग्न रहता था; साथ ही अपेक्षाकृत छोटे किसान भी थे जो मुश्किल से ही निर्वहन लायक उत्पादन कर पाते थे।

प्रश्न 2. बनियर के अनुसार भूमि स्वामित्व का प्रश्न भारत और यूरोप के मध्य किस प्रकार भिन्नताओं को अभिव्यक्त करता है ? स्पष्ट रूप से समझाइए।

अथवा

मुगल साम्राज्य में भूमि स्वामित्व के संदर्भ में बर्नियर के विवरणों की आलोचनात्मक परख कीजिए।
उत्तर : बर्नियर और भूमि स्वामित्व का प्रश्न (Bernier and Question of Land’s ownership) :
1.बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था। उसका निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास था और उसने भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक माना। उसे यह लगा कि मुगल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था जो इसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था, और इसके अर्थव्यवस्था और समाज के लिए अनर्थकारी परिणाम होते थे।
2.इस प्रकार का अवबोधन बर्नियर तक ही सीमित नहीं था बल्कि सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों के वृत्तांतों में मिलता है।
3.राजकीय भूस्वामित्व के कारण, बर्नियर तर्क देता है, भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें बढ़ोत्तरी के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे।
4.इस प्रकार, निजी स्वामित्व के अभाव ने “बेहतर” भूधारकों के वर्ग के उदय (जैसा कि पश्चिमी यूरोप में) को रोका जो भूमि के रखरखाव व बेहतरी के प्रति सजग रहते। इसी के चलते कृषि का समान रूप से विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में अनवरत पतन की स्थिति उत्पन्न हुई है, सिवाय शासक वर्ग के।

प्रश्न 3. अल-बिरूनी द्वारा दिए गए उसके तत्कालीन भारत के विवरण को अपने शब्दों में संक्षेप में दीजिए।
उत्तर : अल-बिरूनी द्वारा दिए गए भारत के बारे में विवरण का सारांश (Summary of description of India given by Al-biruni): महमूद गजनवी के आक्रमणों के वक्त भारत में आए यात्री एवं इतिहासकार अल-बिरुनी ने भारत के बारे में जो वर्णन लिखा है, वह संक्षेप में नीचे लिखा जा रहा है
1.सामाजिक स्थिति (Social Condition) : अल-बिरूनी लिखता है कि सारा हिन्दू समाज जाति प्रथा के कड़े बन्धनों में जकड़ा हुआ था। उस समय बाल-विवाह और सती प्रथा की कुप्रथायें मौजूद थीं। विधवाओं को पुनः विवाह करने की आज्ञा नहीं थी।
2.धार्मिक स्थिति (Religious Condition) : उसके वर्णन के अनुसार सारे देश में मूर्ति पूजा प्रचलित थी। लोग मंदिरों को बहुत दान देते थे। मंदिरों में बहुत-सा धन जमा था। साधारण जनता अनेक देवी-देवताओं में विश्वास रखती थी जबकि सुशिक्षित एवं विद्वान केवल एक ईश्वर में विश्वास रखते थे।
3.राजनीतिक दशा (Political Condition) : सारा देश छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था। उसमें से कन्नौज, मालवा, गुजरात, सिंध, कश्मीर तथा बंगाल अधिक प्रसिद्ध थे। इनमे राष्ट्रीय भावना की कमी थी। ये आपस में ईर्ष्या के कारण सदैव लड़ते रहते थे।
4.न्याय व्यवस्था (Judiciary) : फौजदारी कानून नरम थे। ब्राह्मणों को मृत्युदंड नहीं दिया जाता था। केवल बार-बार अपराध करने वाले के ही हाथ-पैर काट दिए जाते थे।
5.भारतीय दर्शन (/ndian Philosoplhy): भारतीय दर्शन से अल-बिरूनी बहुत प्रभावित हुआ। उसने भगवद्गीता और उपनिषदों के ऊँचे दार्शनिक विचारों की मुक्त कण्ठ से सराहना की है।
6.ऐतिहासिक ज्ञान (Historical Knowledge) : इतिहास लिखने के बारे में वह लिखता है कि “भारतीयों को ऐतिहासिक 44 घटनाओं को तिथि अनुसार लिखने के बारे में बहुत कम ज्ञान है और जब उनको सूचना के लिए अधिक दबाया जाए तो वे कथा-कहानी शुरू कर देते हैं।” इस वर्णन से स्पष्ट है कि हमें उस काल तक इतिहास लिखने का वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था।
7.सामान्य स्वभाव (General Nature) : भारतीय झूठा अभिमान करते हैं तथा अपना ज्ञान दूसरों को देने को तैयार नहीं होते हैं। उसने लिखा है कि हिन्दू अपना ज्ञान दूसरों को देने में बड़ी कंजूसी करते हैं, वे अपनी जाति के लोगों को बड़ी कठिनता से ज्ञान देते हैं, विदेशियों की बात तो दूर रही। हिन्दू यह समझे हैं कि उनके जैसा देश नहीं है, उनके जैसा संसार में कोई धर्म नहीं है, उनके जैसा किसी के पास ज्ञान नहीं है . ।
सारांश यह है कि अल-बिरूनी के वर्णन से तत्कालीन भारत के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।

प्रश्न 4. “भारत में संचार की एक अनूठी प्रणाली थी” इब्न बतूता के वृत्तान्त से इसकी पुष्टि कीजिए।
उत्तर : इब्न बतूता द्वारा वर्णित भारत की अनूठी संचार प्रणाली :व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने के लिए राज्य ने कई उपाय किये थे जिसमें अनूठी संचार प्रणाली का महत्त्वपूर्ण योगदान है। लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय तथा विश्रामगृह स्थापित किये गये। इब्न बतूता भारत की अद्भुत डाक व्यवस्था देखकर चकित रह गया था। इसके कारण व्यापारियों को सुदूर स्थानों पर सूचना भेजने की सुविधा ही नहीं हुई उधार भेजना भी संभव हो गया। अल्प सूचना पर व्यापारी आसानी से माल भी भेज देते थे। डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिंध से दिल्ली की यात्रा में 50 दिन लगते थे वहीं गुप्तचरों की खबरें सुल्तान तक इस डाक व्यवस्था के माध्यम से सिर्फ 5 दिनों में पहुँच जाती थीं।
इब्न बतूता के अनुसार भारत में डाक व्यवस्था दो प्रकार की थी
(i) अरब डाक व्यवस्था (उलुक)
(ii) पैदल डाक व्यवस्था (दावा)
अश्व डाक व्यवस्था या उलुक प्रत्येक चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा संचालित होती थी। पैदल डाक व्यवस्था या दावा में प्रत्येक तीन मील पर अवस्थान था।
इसकी प्रक्रिया अद्भुत थी। इसमें प्रत्येक तीन मील पर एक गाँव था जिसके बाहर तीन मंडप होते थे जिन्में लोग कार्य आरंभ के लिए तैयार बैठे रहते थे। उनमें प्रत्येक के पास दो हाथ (40 इंव) लंबी एक छड़ होती थी जिसके ऊपर तांबे की घंटिया लगी होती थीं।
डाक प्रणाली प्रक्रिया में सन्देशवाहक शहर से यात्रा आरंभ करता था। वह एक हाथ में पत्र तथा दूसरे हाथ में घंटियों सहित छड़ लिए क्षमतानुसार तेज भागता है। जब मंडप में बैठे लोग घंटियों की आवाज सुनकर तैयार हो जाते थे। जैसे संदेशवाहक उनके पास पहुँचता था, उनमें एक उससे पत्र लेता था और वह छड़ हिलाते हुए पूरी सामर्थ्य से दौड़ता था, जब तक वह अगले दावा तक नहीं पहुँच जाता था। पत्र के अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचने तक यही प्रक्रिया चलती रहती थी।

प्रश्न 5. लगभग 1500 ई० के बाद भारत आने वाले फ्रांस्वा बर्नियर तथा अन्य यूरोपीय लेखकों की जानकारी दीजिए।

उत्तर : लगभग 1500 ई० में भारत में पुतगालियों के आगमन के पश्चात् उनमें से कई लोगों ने भारत के सामाजिक रीति-रिवाजों तथा धार्मिक प्रथाओं के विषय में विस्तृत वृत्तांत लिखे। उनमें से कुछ लोगों जैसे कि जेसुइट रॉबर्टो नोबिली ने तो भारतीय ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद भी किया।
दुआर्ते बरबोसा : सबसे प्रसिद्ध यूरोपीय लेखकों में एक नाम दुआर्ते बरबोसा का है। उसने दक्षिण भारत के व्यापार और समाज के बारे में एक विस्तृत विवरण लिखा। 1600 ई० के बाद भारत में आने वाले डच, अंग्रेज, तथा फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी।
तैवर्नियर तथा मनूकी : इन यात्रियों में फ्रांसीसी जौहरी ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर एक था। उसने कम-से-कम छह बार भारत की यात्रा की। वह विशेष रूप से भारत की व्यापारिक स्थितियों से प्रभावित था। उसने भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की थी। इनमें से कई यात्री कभी भी यूरोप वापस नहीं गए और भारत में ही बस गए। इतालवी चिकित्सक मनूकी ऐसा ही एक यात्री था।
फ्रांस्वा बर्नियर : फ्रांस्वा बर्नियर एक फ्रांसीसी था। वह एक चिकित्सक, राजनीतिक, दार्शनिक तथा इतिहासकार था। वह मुगल साम्राज्य में काम की तलाश में आया था। वह 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में रहा और मुगल दरबार से नजदीकी रूप से जुड़ा रहा। पहले उसने सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में काम किया और बाद में मुगल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद खान के साथ एक बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक के रूप में रहा।
पूर्व और पश्चिम की तुलना : बर्नियर ने भारत के कई भागों की यात्रा की और जो कुछ देखा उसके विषय में विवरण लिखे। वह सामान्यत: भारत में जो भी देखता था उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था। उसने अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित की थी और उसके कई अन्य कार्य प्रभावशाली अधिकारियों तथा मन्त्रियों को पत्रों के रूप में लिखे गए थे। बर्नियर ने लगभग प्रत्येक वर्णन में भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।
बर्नियर की रचनाएँ फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई थीं। अगले पाँच वर्षों के भीतर ही इनका अंग्रेजी, डच, जर्मन तथा इतालवी भाषाओं में अनुवाद हो गया। 1670 और 1725 के बीच उसका वृत्तांत फ्रांसीसी भाषा में आठ बार छपा और 1684 तक यह तीन बार अंग्रेजी में छपा। उसका वृत्तांत अरबी और फारसी वत्तांतों से पूरी तरह विपरीत था। अरबी तथा फारसी वृत्तांत 1800 से पहले छपते ही नहीं थे। ये हस्तलिपियों के रूप में ही प्रचलित थे।

प्रश्न 6. उदाहरणों सहित व्याख्या करें कि कैसे विदेशी यात्रियों के वृत्तान्त 10वीं से 17वीं शताब्दी के बीच भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायता करते हैं।

उत्तर : (i) अधिकांश विदेशी यात्री बहुत-ही अलग सामाजिक पर्यावरण में आये थे।
(ii) स्थानीय लेखक इनके प्रति उदासीन रहे।
(iii) उन्होंने भारत के पर्यावरण तथा सामाजिक परिवेश की तुलना बाहरी संसार से की।
(iv) उन्होंने अपने विवरणों में उन बातों तथा वस्तुओं को अधिक महत्त्व दिया जो उन्हें विचित्र जान पड़ती थीं। इससे उनके विवरणों में रोचकता आईं।
(v) उनके विवरण तत्कालीन राजदरबार के क्रियाकलापों, धार्मिक विश्वासों तथा स्थापत्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालते है। इससे इतिहास लेखन में सहायता मिलती है।
तीन महत्वपूर्ण विदेशी यात्री : मध्यकालीन भारत में आने वाले प्रमुख विदेशी यात्री अल-बिरूनी, इब्न बतूता तथा बर्नियर थे। अल-बिरूनी : (i) अल-बिरूनी का विवरण ‘किताब-उल- हिंद’ तत्कालीन धर्म, दर्शन तथा विज्ञान की जानकारी देता है। यह बहुत ही सरल एवं स्पष्ट है।
(ii) अल-बिरूनी ने बताया कि जाति प्रथा केवल भारतीय समाज की ही विशेषता नहीं थी। यह विश्व के अन्य कई समाजों में प्रचलित थी।
इन-बतूता : (i) इब्न बतूता ने ‘रिहला’ नामक ग्रंथ लिखा। इसमें उसने अपनी यात्रा के दौरान प्राप्त अनुभवों का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। इससे हमें सामाजिक मूल्यां तथा नई संस्कृति के विभिन्न पक्षों का पता चलता है।
(ii) इब्न बतूता ने पान तथा नारियल को विचित्र पाया।
इसलिए उसने इनका विशेष रूप से वर्णन किया। (ii) उसने भारत के नगरों तथा कुशल डाक-प्रणाली के बारे में भी लिखा।
बर्नियर : (i) बर्नियर ने ‘ट्रैवेल्स इन मुगल एंपायर’ नामक पुस्तक लिखी।
(ii) अल-बिरूनी तथा इब्न बतूता की तरह उसकी पुस्तक भी उसके अनुभवों का निचोड़ है।
(iii) उसने भारत की स्थिति की तुलना यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस के साथ की। उसने यूरोप की स्थिति की तुलना में भारत के जनजीवन को निकृष्ट बताया।
(iv) वह अपने विवरण में समस्त भूमि पर राज्य के अधिकार की आलोचना करता है और इसे भारतीय कृषि तथा कृषक की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी ठहराता है।

प्रश्न 7. रिहला के लेखक इन बतूता की पारिवारिक पृष्ठभूमि, अनुभवों तथा यात्राओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर : इब्न बतूता द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा वत्तांत रिहला के नाम से विख्यात है। यह 14वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन की बहुत ही व्यापक तथा रोचक जानकारियाँ देता है। मोरक्को के इस यात्री का जन्म तैजियर के एक सम्मानित तथा शिक्षित परिवार हुआ था। उसका परिवार इस्लामी कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार इब्न बतूता ने कम आयु में ही साहित्यिक तथा शा आधारित शिक्षा प्राप्त की।
अपनी श्रेणी के अन्य सदस्यों के विपरीत, इब्न बतूता पुस्तक के स्थान पर यात्राओं से प्राप्त अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था। उसे यात्राएँ करने का बहुत शौक था वह नए-नए देशों और लोगों के विषय में जानने के लिए दूर-दूर के क्षेत्रों तक गया। 1332-33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।

इब्न बूतता 1333 में मध्य एशिया होते हुए स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा। उसने दिल्ली के सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में सुन रखा था कि वह कला और साहित्य का संरक्षक है। उसके ख्याति से आकर्षित हो इब्न बतूता ने मुलतान तथा कच्छ के रास्ते दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। सुलतान उसकी विद्वता से बहुत प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली का काजी या न्यायाधीश नियुक्त इि कर दिया। वह इस पर पद कई वर्षों तक रहा परंतु बाद में उसने विश्वास खो दिया और उसे कारागार में डाल दिया गया। समय बीतने पर सुलतान और उसके बीच की गलतफहमी दूर हो गई और उसे फिर से राजकीय सेवा में ले लिया गया। 1342 ई० में उसे मंगोल शासक के पास सुलतान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया।
चीन जाने के लिए इब्न बतूता मध्य भारत के रास्ते मालाबार तट की ओर बढ़ा। मालाबार से वह मालद्वीप गया जहाँ वह 18 महीनों तक काजी के पद पर रहा। अंतत: उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया। बाद में वह एक बार फिर मालाबार तट तथा महाद्वीप गया। चीन जाने के अपने कार्य को पुनः शुरू करने से पहले वह बंगाल तथा असम भी गया। वह जहाज से सुमात्रा गया और सुमात्रा से एक अन्य जहाज से चीनी बंदरगाह जायतुन (जे आज कवाणझू के नाम से जाना जाता है) पहुँचा। उसने चीन में व्यापक रूप से यात्रा की। वह बीजिंग तक गया, परंतु वहा का लंबे समय तक नहीं ठहरा। 1347 में उसने वापस अपने घर जान का निश्चय किया। चीन के विषय में उसके वृत्तांत की तुल मार्कोपोलो के वृत्तांत से की जाती है। मार्कोपोलों ने 13वीं शताब्दी । के अंत में वेनिस से चलकर चीन और भारत की भी यात्रा की थी |

प्रश्न 8. मुगलकालीन भारत में भू-सम्पत्तियों के स्वामित पर बर्नियर के दृष्टिकोण की समीक्षा कीजिए।

उत्तर : 1. 1600 ई. के बाद भारत में आने वाले डच. अंग्रेज तथा फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी थी। इनमें एक प्रसिद्ध नाम फ्रांसीसी जौहरी ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर का था जिसने कम से कम छह बार भारत की यात्रा की।
2.फ्रांस का रहने वाला फ्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक. राजनीतिक दार्शनिक तथा एक इतिहासकार था। कई और लोगों की तरह ही वह मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था।
3.वह 1656 से 1668 तक भारत में बारह वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से नजदीकी रूप से जुड़ा रहा-पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में, और बाद में मुगल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद खान के साथ एक बुद्धिजावी तथा वैज्ञानिक के रूप में।
4.बर्नियर द्वारा पूर्व और पश्चिम की तुलना : बर्नियर ने देश के कई भागों की यात्रा की। लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।
5.बर्नियर के ग्रंथ ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ अपने गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि तथा गहन चिंतन के लिए उल्लेखनीय है। उसके वृत्तांत में की गई चर्चाओं में मुगलों के इतिहास को एक प्रकार के वैश्विक ढाँचे में स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
6.भूमि स्वामित्व का प्रश्न : (i)बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था उसका निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास था और उसने भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक माना।
(i) बर्नियर को यह लगा कि मुगल समाज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था जो इसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था और इसके अर्थव्यवस्था और समाज के लिए अनर्थकारी परिणाम होते थे।
(iii) राजकीय भूस्वामित्व के कारण, बर्नियर त्क देता है, भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें बढ़ोत्तरी के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे।
(iv) आश्चर्य की बात यह है कि एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। उदाहरण के लिए, सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फज्ल (अकबरनामा का लेखक याद रहे आइन-ए-अकबरी इसी ग्रंथ का तीसरा भाग है।) भूमि राजस्व को राजस्व का पारिश्रमिक’ बताता है जो राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले की गई माँग प्रतीत होती है न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान।

(v) बर्नियर के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी में पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। उदाहरण के लिए, फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत का प्रयोग प्राच्य निरंकुशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया जिसके अनुसार एशिया (प्राच्य अथवा पूर्व) में शासक अपनी प्रजा के ऊपर निर्बाध प्रभुत्व का उपभोग करते थे. जिसे दासता और गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था।

प्रश्न 9. मुगलकालीन भारत में शिल्पकारों, व्यापारियों और शहरों की स्थिति पर बर्नियर के दृष्टिकोण की समीक्षा कीजिए।
उत्तर : 1. फ्रांस का रहने वाला फ्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक, राजनीतिक, दार्शनिक तथा एक इतिहासकार था। कई और लोगों की तरह ही वह मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था।
2.वह 1656 से 1668 तक भारत में बारह वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से नज़दीकी रूप से जुड़ा रहा-पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में और बाद में मुगल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद खान के साथ एक बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक के रूप में।
एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई (A more complex social reality):
1.मुगल राज्य को निरकुंश रूप देने की तन्मयता स्पष्ट है, लेकिन उसके विवरण कभी-कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। उदाहरण के लिए वह कहता है कि शिल्पकारों के पास अपने उत्पादों को बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था क्योंकि लाभ का अधिग्रहण राज्य द्वारा कर लिया जाता था।
2.उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था। साथ ही वह यह भी मानता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थी क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था। वह एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय जो लंबी दूरी के विनिमय से संलग्न था, के अस्तित्व को भी रेखांकित करता है।
3.सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था। यह औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
4.भू-स्वामित्व के प्रश्न की तरह ही बर्नियर एक अतिसरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था। वास्तव में सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे, उत्पादन केन्द्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केन्द्र, तीर्थ स्थान आदि। व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व के संबंध से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे।
5.अन्य शहरी समूहों में व्यावसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक (हकीम अथवा वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), (वकील), चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक आदि सम्मिलित अधिवक्ता थे। जहाँ कई राजकीय प्रश्रय पर आश्रित थे, कई अन्य संरक्षकों या भीड़भाड़ वाले बाजार में आम लोगों की सेवा द्वारा जीवनयापन करते थे।
टिप्पणी : बर्नियर के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी से पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। उदाहरण के लिए, फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत का प्रयोग प्राच्य निरकुंशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया, जिसके अनुसार एशिया (प्राच्य अथवा पूर्व) में शासक अपनी प्रजा के ऊपर निर्बाध प्रभुत्व का उपभोग करते थे, जिसे दासता और गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था।

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