Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 6 Important Question Answer 2 Marks भक्ति-सूफी परंपराएँ (धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ)

प्रश्न 1. मुलफुजात का क्या अर्थ है ? सूफी परंपरा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए एक स्रोत के रूप में इस पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : मुलफुजात का अर्थ है सूफी संतों की बातचीत। सूफी / आनकाहों के आसपास अनेक ग्रंथों की रचना हुई जिनमें यह ग्रंथ भी शामिल है। सूफ़ी परंपरा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए विभिन्न स्रोत है जिनमे से ही मुलफुजात पर एक आरंभिक ग्रंथ फवाइद-अल-फुआद यह शेख निजामुद्दीन औलिया की बातचीत पर आधारित एक n) संग्रह है जिसका संकलन प्रसिद्ध फ़ारसी कवि अमीर हसन गायों मिजजी देहलवी ने किया। स्रोत 9 में इस ग्रंथ से लिया एक अंश 6. नार उद्धरत है। मुलफुजात का संकलन विभिन्न सूफी सिलसिलों के जापा शेखों की अनुमति से हुआ। इनका उद्देश्य मुख्यत: उपदेशात्मक था। उपमहाद्वीप के अनेक भागों से जिसमें दक्कन शामिल है, अनेक उदाहरण इस तरह के मिलते हैं। कई शताब्दियों तक इनका संकलन होता रहा।

प्रश्न 2, मक्तुबात पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : मक्तुबात (लिखे हुए पत्रों का संकलन ) : ये वे प्रथम जो सूफी संतों द्वारा अपने अनुयायियों और सहयोगियों को लिखे । गए। इन पत्रों से धार्मिक सत्य के बारे में शेख के अनुभवों र का वर्णन मिलता है जिसे वह अन्य लोगों के साथ बाँटना चाहते वह इन पत्रों में अपने अनुयायियों के लौकिक और आध्यात्मिक – जीवन, उनकी आकांक्षाओं और मुश्किलों पर भी टिप्पणी करते विद्वान बहुधा सत्रहवीं शताब्दी के नक्शबंदी सिलसिले के शेख । अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624) के लिखे मक्तुबात-ए-इमाम पर चर्चा करते हैं। इस शेख की विचारधारा का तुलनात्मक अध्ययन वे वे बादशाह अकबर की उदारवादी और असांप्रदायिक বিবारधारा से करते है।

प्रश्न 3. रामानुज और रामानंद पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए।
उत्तर : 1. रामानुज (Ramanuja) : शंकराचार्य के बाद प्रसिद्ध भक्त संत रामानुज हुए। उन्हें प्रथम वैष्णव आचार्य माना जाता है। उनका कार्य-काल बारहवीं शताब्दी था। उन्होंने सगुण ब्रहा की भक्ति पर जोर दिया तथा कहा कि उसकी सच्ची भक्ति ज्ञान तथा कर्म से ही मोक्ष प्राप्ति का साधन है।
2.रामानन्द (Ramanand) : आचार्य रामानुज की पीढ़ी में स्वामी रामानन्द प्रथम संत थे जिन्होंने भक्ति द्वारा जन-साधारण को नया मार्ग दिखाया। उनका समय चौदहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध और पंद्रहवीं शताब्दी के प्रथम पच्चीस वर्ष माने जाते हैं। उनका

जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) में 1299 ई. में कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने एकेश्वरवाद पर जोर देकर हिन्दू मुसलमानों में प्रेम भक्ति सम्बन्ध के साथ सामाजिक समाधान प्रस्तुत किया। इससे भी अधिक उन्होंने हिन्दू समाज के चारों वर्ों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) को भक्ति का उपदेश दिया और निम्न वर्ण के लोगों के साथ खान-पान निषेध का घोर विरोध किया। उनके शिष्यों में सभी जातियों के लोग थे। इनमें शूद्र भी थे। इनके शिष्यों में रविदास चर्मकार थे। कबीर जुलाहे थे, सेना नाई थे, पीपा राजपूत थे और संतधना कसाई थे। उन्होंने ब्राह्मणों और क्षत्रियों की उच्चता का खण्डन किया और मानववाद तथा मानवीय समानता जैसे प्रगतिशील विचारों एवं सिद्धांतों का प्रचार किया उन्होंने अपने उपदेशों का प्रचार क्षेत्रीय भाषा के माध्यम किया।

प्रश्न 4. कबीर पर एक टिप्पणी लिखिए।

अथवा

कबीर ने परम सत्य को वर्णित करने के लिए परंपराओं के परिसर का कैसे सहारा लिया ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : कबीर (Kabir) : मध्ययुगीन भारतीय संतों में कबीरदास की साहित्यिक एवं ऐतिहासिक देन स्मरणीय है। वे मात्र भक्त ही नहीं बड़े समाज सुधारक थे उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों का डटकर विरोध किया। अंधविश्वासों, दतकियानूसी अमानवीय मान्यताओं तथा गली-सड़ी रूढ़ियों की कटु आलोचना की। उन्होंने समाज, धर्म तथा दर्शन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण विचारधारा को प्रोत्साहित भी किया। कबीर ने जहाँ एक ओर बौद्धों, सिद्धों और नाथों की साधना पद्धति तथा सुधार परम्परा के साथ वैष्णव सम्प्रदायों की भक्ति-भावना को ग्रहण किया वहाँ दूसरी ओर राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक असमानता के विरुद्ध प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। इस प्रकार मध्यकाल में कबीर ने प्रगतिशील तथा क्रांतिकारी विचारधारा को स्थापित किया। कबीर एकेश्वरवाद के समर्थक थे। वे मानसिक पवित्रता, अच्छे कर्मों तथा चरित्र की शुद्धता पर बल देते थे। उन्होंने जाति, धर्म या वर्ग को प्रधानता नहीं दी। उन्होंने धार्मिक कुरीतियों, आडम्बरों, अंधविश्वासों तथा कर्मकाण्डों को व्यर्थ बतलाया। उन्होंने मूर्ति पूजा का खंडन करने के उद्देश्य से लिखा था
“पाहन पूजें हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार। ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार।।¨
सारांश यह है कि कबीर धार्मिक क्षेत्र में सच्ची भक्ति का संदेश लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने निर्गुण-निराकार भक्ति का मार्ग अपनाकर मानव धर्म के सम्मुख भक्ति का मौलिक रूप रखा। यह सयैव स्मरण रखना चाहिए कि “कबीर के राम दशरथ पुत्र राजा राम नहीं है अपितु घट-घट में निवास करने वाली अलौकिक शक्ति है जिसे राम रहीम, कृष्ण, खुदा वाहेगुरु कोई भी नाम दिया जाए। उसका रूप एक है। उसकी प्राप्ति के लिए न मंदिर का आवश्यकता है न मस्जिद की। वह सब में विद्यमान है और सभी उसे भक्ति तथा गुरु की कृपा से प्राप्त कर सकते है । “
कबीर जनसाधारण की भाषा में अपने उपदेश देते थे। उन्होंने अपने दोहों में धार्मिक कुरीतियों, आडम्बरों, अन्धविश्वासों तथाकर्मकाण्डों को व्यर्थ बतलाया।

प्रश्न 5. संत नामदेव पर टिप्पणी लिखिए
उत्तर : नामदेव (Namdev) :(i) मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विकास एवं लोकप्रियता में महाराष्ट्र के संतों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। ज्ञानेश्वर, हेमाद्रि और चक्रधर से आरम्भ होकर रामनाथ, तुकाराम, नामदेव ने भक्ति पर बल दिया तथा एक ईश्वर की सम्पूर्ण मानव जाति संतान होने के नाते सबकी समानता के सिद्धांत को प्रतिष्ठित किया।
(ii) नामदेव ने भरपूर कोशिश के साथ जाति प्रथा का खण्डन किया। नामदेव जाति से दर्जी थे। वे अपने पैतृक व्यवसाय की ओर कभी भी आकृष्ट नहीं हुए तथा साधु संगत को ही उन्होंने चाहा।
(iii) संत विमोवा खेचम उनके गुरु थे तथा वे संत ज्ञानेश्वर के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे। उन्होंने भक्त संत प्रचारक बनने के बाद अपने शिष्यों के चुनाव में विशाल हृदय से काम लिया।
(iv) उनका काव्य जो मराठी भाषा में है, ईश्वर के प्रति गहरे प्रेम और भक्ति को व्यक्त करता है। उनके अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी, एकेश्वर तथा सर्वत्र है। वे समाज सुधारक तथा हिन्दू मुस्लिम एकता के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने भरपूर कोशिश के साथ जाति प्रथा का खंडन किया।
(v) कहा जाता है कि उन्होंने दूर-दूर तक यात्राएँ कीं और दिल्ली में सूफी संतों के साथ विचार-विमर्श किया। वे प्रार्थना, भ्रमण, तीर्थयात्रा सत्संग तथा गुरु की सेवा के समर्थक थे। उन्होंने आध्यात्मिक क्षेत्र में आचरण की शुद्धता, भक्ति की पवित्रता एवं सरसता और चरित्र की निर्मलता पर बल दिया।
(vi) नामदेव की मराठी तथा हिन्दी रचनाओं में इनकी निर्गुणवादिता का रूप स्पष्ट देखा जा सकता है। उन्होंने मराठी भाषा के माध्यम द्वारा महाराष्ट्र के संतों की न केवल धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति की अपितु मराठों के राजनीतिक उत्थान में बुनियादी काम किया। उनके विचारों से महाराष्ट्र की जनता ने एक नवीन संगठन तथा एकता को महसूस किया है। इस प्रकार मध्ययुगीन इतिहास पर महाराष्ट्र के संतों का महत्त्वपूर्ण प्रभाव देखा जा सकता है।

प्रश्न 6. अलवार और नयनार संतों ने किस तरह भकि आंदोलन को फैलाया ?
उत्तर : 1. प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग छठी शताब्दी में अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।
2.वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हुए तमिल में अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाते थे। इसका स्थानीय लोग पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
3.अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध आवाज उठाई। कुछ सीमा तक यह बात सत्त प्रतीत होती है क्योंकि भक्ति संत विविध समुदायों से थे, जैस ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान आदि।
4.अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने भक्ति आंदोलन का खुद प्रचार किया। वे जहाँ-जहाँ गये, उन्होंने अपना प्रभाव जाहिर किया। इस दौरान उन्होंने कुछ तीर्थ-मंदिरों को धर्म -स्थान का दर्ज दिया। उनके इस फैसले का लोगों पर गहरा प्रभाव भी पड़ा जिससे भक्ति आंदोलन को बल मिला।
5.अलवार और नयनार संतों की रचनाओं को वेदों के समान महत्त्वपूर्ण बताकर इस परंपरा को सम्मानित किया गया उदाहरण के लिए अलवार संतों के एक मुख्य काव्य संकलन ‘नलयिरादिव्यप्रबंधम्’ का उल्लेख तमिल वेद के रूप में किया जाता है। इस प्रकार इस ग्रंथ का महत्त्व संस्कृत के चार वेदों के समाम बताया गया।

प्रश्न 7. सूफ़ीवाद और कट्टर इस्लाम के बीच संबंध वर्णन कीजिए।
उत्तर: 12वीं शताब्दी तक अल-गज्जाली, अल-हल्ला अवर और इब्न अल-अरबी के प्रयासों के परिणामस्वरूप सूफीवाद तरह से कट्टर इस्लाम में सम्मिलित हो गया। भारतीय परिप्रेक्ष्य सूफ़ियों ने उलेमा के साथ अपने मतभेदों को अच्छी तरह सुलझाकर शरियत का पालन करने की आवश्यकता पर बल दिया भारत में विभिन्न सूफी विचारधाराओं में चिश्ती और सुहराव विचारधाराएँ (सिलसिला) प्रमुख थीं। भारत में चिश्ती विचार की स्थापना मुइनुद्दीन चिश्ती ने की जो 1192 ई. में भारत पही तथा अजमेर में अपना केन्द्र स्थापित किया। भारत में अन्य प्रमुख सूफी संत थे : शेख कुतबुद्दीन बख्तियार काकी, शेख हमीदुद्दीन शेख फरीदुद्दीन, मसूद गंज-ए-शकर तथा प्रसिद्ध शेख निजामुद्दे औलिया।

प्रश्न 8. सूफी संत के प्रमुख सिद्धांतों की व्याख्या कीजिए। इनकी जन-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर : 1. एकेश्वरवाद (Monotheism) : सूफी ला इस्लाम धर्म को मानने के साथ एकेश्वरवाद पर जोर देते थे। पौ और पैगम्बरों के उपदेशों को वे मानते थे।
2.रहस्यवाद (M/istensue) : इनकी विचारधारा रहस्यवादी इनके अनुसार कुरान के छिपे रहस्य को महत्त्व दिया जाता है। सूफी सारे विश्व के कण-कण में अल्लाह को देखते हैं।
3.प्रेम साधना पर जोर (Stress on Love and Meditation): सच्चे प्रेम से मनुष्य अल्लाह के समीप पहुँच सकता है। प्रेम के आगे नमाज, रोजे आदि का कोई महत्त्व नहीं।
4.भक्ति संगीत (Bhakti Music) : वे ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए गायन को विशेष महत्त्व देते थे। मूर्ति पूजा के वे विरोधी थे।
5.गुरु या पीर का महत्त्व (Importance of Pir or Teacher) : गुरु या पीर को सूफी लोग अधिक महत्त्व देते थे। उनके उपदेशों का वे पालन करते थे।
6.इस्लाम विरोधी कुछ सिद्धांत (Some principles against Islam) : वे इस्लाम विरोधी कुछ बातें-संगीत, नृत्य आदि को मानते थे। वे रोजे रखने और नमाज पढ़ने में विश्वास नहीं रखते थे।

प्रश्न 9. सूफ़ी मत के चिश्ती सिलसिले (संप्रदाय) से जुड़ी रीतियाँ (परंपराएँ) बताइए।
उत्तर : (1) चिश्ती सिलसिले के सूफी आध्यात्मिक संगीत (जिक्र और समा) की महफिल द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे।
(2) वे जियारत और कव्वाली को बुहत महत्त्व देते थे। इस अवसर पर संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद की कामना की जाती थी।
(3) उन्होंने खानकाह स्थापित किए।
(4) उन्होंने लंगर चलाए जिनमें सभी वर्गों के लोग भाग लेते थे।
(5) सूफी संत अपने सिद्धांतों के प्रसार के लिए अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी नियुक्त करते थे।
(6) उन्होंने स्थानीय परंपराओं को अपनाया; जैसे शेख के आगे सिर झुकाना तथा लोगों को पानी पिलाना।

प्रश्न 10. गुरु रविदास पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : गुरु रविदास (Guru Ravidas) : गुरु रविदास मध्यकालीन भारत के महान संत और उच्च कोटि के कवि थे। जीवन इतिहास (Life History) : रविदास जी का जन्म 1377 ई. में बनारस के एक गाँव मांदूर में हुआ था। कहा जाता है कि इनका जन्म रविवार के दिन हुआ था, अतः इनका नाम रविदास रखा गया। इनके पिता का नाम भानदास और माता का नाम करमा देवी था। रविदास के परिवार जन दलित जगत से सम्बन्धित थे जाति के थे इसके विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है
“जाति ओछी पाँति ओछी, ओछा जनम हमारा। राजा राम की सेवा कीन्हीं, कहि रविदास चमारा॥” रविदास के माता-पिता धार्मिक विचारों के थे। इसका उन पर बहुत प्रभाव पड़ा और वे बचपन से ही ईश्वर-भक्ति में मग्न रहने लगे। संसार के विषयों में लगाने के लिए उनके माता-पिता ने उनका विवाह लोना नाम की एक लड़की से कर दिया लेकिन वे सांसारिक बंधनों में नहीं फंस सके। प्रायः साधुओं की सेवा तथा सत्संग में ही अपना समय व्यतीत करते थे रविदास ने रामानंद से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। वे अपने समय के प्रसिद्ध संतों और भक्तों में सबसे लंबी आयु वाले थे। 1528 ई. में 151 वर्ष की आयु में चित्तौड़ में उनका देहांत हुआ। उनकी स्मृति में बनवाई गई रविदास की छतरी’ और ‘रविदास के चरण चिह्न’ आज भी चित्तौड़ में विद्यमान हैं।

शिक्षाए (Teachings) :
1.रविदास जाति-पाँति के विरुद्ध थे। उनका कथन था कि सब लोग एक ईश्वर की संतान हैं और सब समान हैं। अत: ब्राह्मण और शूद्र आदि के भेदभाव व्यर्थ हैं।
2.रविदास हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षपाती थे। उनके अनुसार मंदिर और मस्जिद एक हैं तथा राम और रहीम में कोई अंतर नहीं।

3.मनुष्य को संतोष और सदाचार को जीवन का आधार बनाना चाहिए और विषय-वासनाओं को छोड़ देना चाहिए।
“सत्त संतोष अरु सदाचार, जीवन को आधार। रविदास नर भये देवते, जिन तिओगे पंच विकार॥”
4.मनुष्य को सदा शुभ कार्य करने चाहिए लेकिन उनका परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।

प्रश्न 11. मीरा बाई पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

अथवा

संत कवयित्री मीरा बाई की जीवनी की रचना मूल रूप से किस आधार पर की गई है ? उन्होंने समाज की रूढ़ियों का उल्लंघन किस प्रकार किया ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : मीराबाई को भक्ति लहर की सबसे प्रसिद्ध कवयित्री माना जाता है। उनकी जीवनी उनके द्वारा लिखे गए भजनों के आधार पर संकलित की गई है। ये भजन शताब्दियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे। मीराबाई मारवाड़ के मेड़ता जिले की एक राजपूत राजकुमारी थीं। उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश में कर दिया गया। उन्होंने अपने पति की आज्ञा को परवाह ने करते हुए पत्नी और माँ के परंपरागत दायित्वों को निभाने से इंकार कर दिया और विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति मान लिया। उनके ससुराल वालों ने उन्हें विष देने का प्रयत्न किया परंतु वह राजमहल को छोड़ एक घुमक्कड़ गायिका बन गईं। उन्होंने अनेक भावना प्रधान गीतों की रचना की।
मौरा ने जातिवादी समाज की रूढ़ियों का भी उल्लंघन किया। ऐसा माना जाता है कि मीरा ने राजमहल के ऐश्वर्य को त्याग कर विधया के सफेद वस्त्र अथवा संन्यासिनी के जोगिया वस्त्र धारण कर लिए।भले ही मीराबाई के आस-पास अनुयायियों का जमघट नही लगा और न ही उन्होंने किसी निजी मंडली की नींव डाली. फिर भी वह शताब्दियों से प्रेरणा का स्रोत रही हैं। उनके द्वारा रचित पद आज भी लोगों द्वारा गए जाते हैं विशेषकर गुजरात व राजस्थान के गरीब लोगों द्वारा।

प्रश्न 12. भक्ति और सूफ़ी जैसी धार्मिक परम्पराओं के इतिहास की पुनर्रचना इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।” इस कथन के समर्थन में तर्क दीजिए।

अथवा

इतिहासकारों द्वारा धार्मिक परंपराओं के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए उपयोग किए गए विभिन्न स्रोतों को स्पष्ट कीजिए। =
उत्तर : (क) इतिहासकार धार्मिक परंपरा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अनेक स्रोतों का उपयोग करते हैं, जैसे मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ, दैवीय-स्वरूप को समझने को उत्सुक स्त्री और पुरुषों द्वारा लिखी गई काव्य रचनाएँ आदि।
(ख) मूर्तिकला और स्थापत्यकला का हम इस उद्देश्य के लिए तभी इस्तेमाल कर सकते हैं जब हम उसके संदर्भ को अच्छी तरह समझें अर्थात् इन आकृतियों और इमारतों को बनाने और उसका इस्तेमाल करने वालों के विचारों, आस्थाओं और आचारों की हमें समझ हो।
(ग) लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही है। परिपाटी की यह निरंतरता इतिहासकारों के लिए लाभदायक सिद्ध होती है क्योंकि वे सामयिक आचार-व्यवहार की तुलना उस परिपाटी से कर सकते हैं जिसका वर्णन साहित्य और पुरानी चित्रकला में मिलता है और साथ ही उस परंपरा में आए परिवर्तनों की रूपरेखा भी तैयार कर सकते हैं किंतु चूँकि ये परंपराएँ आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा हैं। लोगों के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि समय के साथ संभवतः इन परिपाटियों में बदलाव आया होगा। इतिहासकारों के लिए चुनौती यह है कि वे इस तथ्य की ओर जागरूक हों कि धार्मिक परंपराएँ भी अन्य परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं।

प्रश्न 13. सूफी संप्रदाय तथा भक्ति संप्रदायों की विचारधारा में क्या समानताएँ थीं ?
उत्तर : सूफ़ी संप्रदाय तथा भक्ति आंदोलन के उद्गम स्थान अलग-अलग थे परंतु दोनों की विचारधाराओं में अनेक समानताएँ पाई जाती थीं। इनका वर्णन इस प्रकार है
(1) मानवतावाद : दोनों संप्रदायों ने मानव को मुख्य रखा और उन्हें प्रेम पूर्वक रहने का उपदेश दिया।
(2) एकेश्वरवाद : दोनों एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। सूफियों ने कहा कि परमात्मा एक है और हम उसकी संतान है। भक्ति आंदोलन के संतों ने भी एक ईश्वर की महिमा का गुणगान किया।
(3) मनुष्य-मात्र से प्रेम : सूफ़ी तथा भक्ति संप्रदायों के संतों ने लोगों को उपदेश दिया कि मनुष्य-मात्र से प्रेम करो। मानव-प्रेम ही ईश्वर-प्रेम है।
(4) गुरु की महिमा : सूफ़ी तथा भक्त संतों ने गुरु की महिमा का बखान किया है। अंतर केवल इतना था कि सूफी गरु को पीर कहकर पुकारते थे।
( 5) सहनशीलता : सूफ़ी तथा भक्त संतों ने हिंदुओं तथा मुसलमानों दोनों को साथ मिलकर रहने का उपदेश दिया।
(6) अन्य : सूफ़ियों तथा हिंदू संतों और रहस्यवादियों के बीच प्रकृति, ईश्वर, आत्मा और पदार्थ से संबंधित विचारधारा में काफी समानता पाई जाती थी।

प्रश्न 14. गुरु नानक की शिक्षाओं की व्याख्या कीजिए। क्या वे एक नए धर्म की स्थापना करना चाहते थे? उनके पश्चात् क्या हुआ?
उत्तर-1. एकेश्वर वाद, 2. निराकार, 3. निरर्गुण, 4. मानव सेवा, त्याग, 5. जातिवाद का विरोध, 6. सामूहिक लंगर, 7. सब मानव प्रेम, शांति तथा सहयोग में, 8. अंधविश्वासों से दूर रहना,
9.सर्वधर्म सम्भाव।
गुरु नानक स्वयं कोई नया धर्म चलाना नहीं चाहते थे। लेकिन उन्हीं की शिक्षाएँ कालान्तर में सिख धर्म के सिद्धान्त बन गईं।

प्रश्न 15. लोक प्रचलन में इस्लाम की परंपराओं की व्याख्या कीजिए।

अथवा

इस्लाम धर्म की उन विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए के जिनकी मदद से यह धर्म समूचे उप-महाद्वीप में फैल गया।
उत्तर : लोक प्रचलन में इस्लाम (The popular practice of Islam) : इस्लाम के आगमन के बाद जो परिवर्तन हुए वे त शासक वर्ग तक ही सीमित नहीं थे, अपितु पूरे उपमहाद्वीप में – दूरदराज तक और विभिन्न सामाजिक समुदायों-किसान, शिल्पी, योद्धा, व्यापारी के बीच फैल गए। जिन्होंने इस्लाम धर्म कबूल किया उन्होंने सैद्धांतिक रूप से इसकी पाँच मुख्य ‘बातें’ मानी : अल्लाह एकमात्र ईश्वर है; पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत (शाहद) हैं; दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ी जानी चाहिए; खैरात (जकात) बाँटनी चाहिए; रमजान के महीने में रोज़ा रखना चाहिए और हज के लिए मक्का जाना चाहिए।
एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवतः मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर । ला है। मस्जिदों के कुछ स्थापत्य तत्त्व सार्वभौमिक थे जैसे इमारत का मक्का की तरफ अनुस्थापना जो मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिनबार (व्याय पीठ) की स्थापना से लक्षित होता था।

प्रश्न 16. मस्जिद के स्थापत्य संबंधी सार्वभौमिक तत्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : मस्जिद को इस्लामिक शैली का मूल-रूप माना गया है। (1) इसका मौलिक ढाँचा बहुत ही साधारण होता है।
(2) इसमें एक खुला प्रांगण होता है जिसके चारों ओर स्तंभों वाली छतें होती हैं।
(3) प्रांगण के मध्य में नमाज से पहले स्नान के लिए एक तालाब भी होता है।
(4) इसके पश्चिम में मेहराबों वाला एक हॉल होता है। मक्का की सम्मुख दिशा में स्थित यह हाल नमाज की दिशा बताता है।
(5) इसकी दाहिनी ओर एक मंच होता है जहाँ से इमाम प्रवचन देता है।
(6) मस्जिद में एक मीनार भी होती है जहाँ से अजान दी जाती है।
(7) जिस मस्जिद में मुसलमान जुम्मा की नमाज के लिए एकत्रित होते हैं, उसे ‘जामी मस्जिद’ कहा जाता है।

प्रश्न 17. भक्ति काल के दौरान बासवन्ना ने कर्नाटक में एक नवीन आंदोलन का उद्भव किस प्रकार किया ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) कर्नाटक में 12वीं सदी में बासवन्ना (1106-68) के नेतृत्व में एक नवीन आंदोलन का उद्भव हुआ। बासवन्ना शुरू में जैन धर्म के मानने वाले थे तथा चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे। उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) व लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए।
(ii) वर्तमान समय में लिंगायत समुदाय का कर्नाटक में काफी महत्त्व है। वे शिव की आराधना लिंग के रूप में करते हैं। इस समुदाय के पुरुष वाम स्कंध पर चाँदी के एक पिटारे में एक लघु लिंग को धारण करते हैं। लिंगायतों का विश्वास है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाएँगे तथा इस संसार में दोबारा नहीं लौटेंगे। धर्मशास्त्र में बताए गए श्राद्ध संस्कार का पालन इनके द्वारा नहीं किया जाता। वे अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते हैं।
(iii) लिंगायतों द्वारा जाति की अवधारणा तथा कुछ समुदायों के ‘दूषित’ होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया गया| उनके द्वारा पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी सवालिया निशान लगाया गया। इन सभी कारणों से ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्था में जिन समुदायों को गौण स्थान मिला वे लिंगायतों के अनुयायी हो गए।
(iv) वयस्क विवाह तथा विधवा पुनर्विवाह जैसे आचारों को धर्मशास्त्रों में अस्वीकार किया गया लेकिन लिंगायतों ने उन्हें मान्यता प्रदान की। वीरशैव परंपरा की उत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री, पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में सम्मिलित हुए ।

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