Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 6 Important Question Answer 3 Marks भक्ति-सूफी परंपराएँ (धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ)

प्रश्न 1. उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं ?
उत्तर : संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकारों का आशय पूजा प्रणालियों के समन्वय से है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि यहाँ से कम दो प्रक्रियाएँ कार्यरत थीं। एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार से जुड़ी थी। इसका प्रसार पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन और परीक्षण द्वारा हुआ। इन ग्रंथों को सरल संस्कृत छंदों में लिखा गया था जिसे ‘वैदिक’ विद्या से विहीन स्त्रियों और शुद्रों द्वारा भी आसानी से समझा जा सकता था। इस काल की दूसरी प्रक्रिया थी स्त्री, शूद्रों और अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकृत करके उसे एक नया रूप प्रदान करना। समाज-शास्त्रियों का यह विश्वास है कि समूचे उपमहाद्वीप में अनेक धार्मिक विचारधाराएँ और पद्धतियाँ ‘महान’ संस्कृत-पौराणिक परिपाटी तथा ‘लघु’ परंपरा के बीच हुए अविरल संवाद का परिणाम है। इस प्रक्रिया का सबसे महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट उदाहरण पुरी, उड़ीसा से प्राप्त है जहाँ मुख्य देवता को बारहवीं शताब्दी तक आते-आते जगन्नाथ जिन्हें शाब्दिक अर्थ में संपूर्ण विश्व का स्वामी माना गया है. विष्णु के एक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया गया।
देवता को बहुत भिन्न तरीके से प्रस्तुत किया है। एक उदाहरण में एक स्थानीय देवता जिसकी प्रतिमा को पहले और वर्तमान में भी लकड़ी से स्थानीय जनजाति के विशेषज्ञों द्वारा बनाया जाता है, को दूसरे भागों में मिलने वाले स्वरूपों से बिल्कुल भिन्न था।
समन्वय के इस प्रकार के उदाहरण देवी संप्रदायों में भी पाए गए हैं। देवी की उपासना ज्यादातर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में ही की जाती थी। इन स्थानीय देवियों को पौराणिक परंपरा के अंदर मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता दी गई- कभी उन्हें लक्ष्मी के रूप में विष्णु की पत्नी माना गया तो कभी शिव की पत्नी पार्वती को माना गया।

प्रश्न 2. किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों को सम्मिश्रण है?
उत्तर : मस्जिदों के कुछ स्थापत्य संबंधी तत्व सार्वभौमिक थे- जैसे इमारत का मक्का की तरफ अनुस्थापन जो मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिनबार (व्यासपीठ) की स्थापना से लक्षित होता था। अनेक तत्व ऐसे थे जिनमें भिन्नता देखने में आती है जैसे छत और निर्माण का सामान। उदाहरण के लिए 13 वा शताब्दी में केरल में बनाई गई एक मस्जिद की शिखर के आकार की छत मंदिर के शिखर से मिलती-जुलती है। इसके विपरीत 1609 में मैमनसिंग जिला (बांग्लादेश) में बनाई गई अतिया मस्जिद की छत गुंबदाकार है। यह मस्जिद ईंटों से बनी है। इसी प्रकार श्रीनगर की झेलम नदी के किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद को कश्मीर की सभी मस्जिदों में मुकुट का नगीना समझी जाती है। इसका निर्माण 935 में किया गया था और यह कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसके शिखर और नक्काशी छज्जे देखने योग्य हैं। यह पेपर मैशी से सजाई गई है।

प्रश्न 3. बे शरिया और बा शरिया सूफी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर दोनों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : शरिया मुसलमानों को निर्देशित करने वाला कानून है। यह कुरान शरीफ और हदीस पर आधारित है कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या को आधार बनाया और उसी आधार पर नवीन आंदोलनों की नींव रखी। ये रहस्यवादी खानकाह का तिरस्कार करते थे और फकीर की जिंदगी बिताते थे उन्होंने निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव प्रदान किया। इन रहस्यवादियों को कई नामों से जाना जाता था जिनमें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी शामिल हैं। इन लोगों ने शरिया की अवहेलना, की और इस कारण उन्हें बे-शरिया कहा जाता था। दूसरी ओर शरिया का पालन करने वाले को बा-शरिया कहा जाता था।

प्रश्न 4. चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीर शैवों ने किस प्रकार जाति-प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
उत्तर : अलवार और नयनार तमिलनाडु के भक्ति संत थे। अलवार विष्णु के तथा नयनार शिव के भक्त थे।
1.कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध आवाज़ उठाई। कुछ सीमा तक यह बात सत्य प्रतीत होती है क्योंकि भक्ति संत विविध समुदायों से थे जैसे ब्राह्मण, शिल्पकार किसान आदि। अलवार और नयनार संतों की रचनाओं को वेदों के महत्त्वपूर्ण बताकर इस परंपरा को सम्मानित किया गया उदाहरण के लिए अलवार संतों के एक मुख्य काव्य संकलन नलयिरादिव्यवं का उल्लेख तमिल वेद के रूप में किया जाता था। इस प्रकार इस ग्रंथ का महत्त्व संस्कृत के चारों वेदों के समान बताया गया। समान
2.वीर शैव कर्नाटक से संबंध रखते थे। वे बासवना के अनुयायी थे। उन्होंने जाति तथा कुछ समुदायों के ‘दूषित’ होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया।

प्रश्न 5. कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए । इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ।

अथवा

गुरु नानक की शिक्षाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : कबीर : कबीर संत कवियों में विशेष स्थान रखते उनके मुख्य उपदेश निम्नलिखित हैं :
(i) उन्होंने बहुदेववाद तथा मूर्ति-पूजा का खंडन किया।
(ii) उन्होंने जिक्र और इश्क के सूफी सिद्धांतों के प्रयोग: द्वारा ‘नाम सिमरन’ पर बल दिया।
(iii) कबीर के अनुसार परम सत्य अथवा परमात्मा एक है, भले ही विभिन्न संप्रदायों के लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।
(iv) उन्होंने परमात्मा को निराकार बताया।
(v) उनके अनुसार भक्ति के माध्यम से मोक्ष अर्थात् मुक्ति प्राप्त सकती है।
(vi) उन्होंने हिंदुओं तथा मुसलमानों दोनों के धार्मिक आडंबरों का विरोध किया।
(vii) वह जातीय भेदभाव के विरुद्ध थे।
विचारों का संप्रेषण : कबीर ने अपने विचारों को काव्य की आम बोलचाल की भाषा में व्यक्त किया जिसे आसानी से समझा जा सकता था। कभी-कभी उन्होंने बीज लेखन की भाषा का प्रयोग भी किया जो कठिन थी। उनके देहांत के बाद उनके अनुयायियों ने अपने प्रचार-प्रसार द्वारा उनके विचारों का संप्रेषण किया।
बाबा गुरु नानक देव जी : श्री गुरु नानक देवी जो (1469-1539) का जन्म पंजाब के ननकाना गाँव में एक व्यापारी परिवार में हुआ। यह गाँव अब पाकिस्तान में है । उन्होंने फारसी पड़ी और लेखाकार के कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनका विवाह छोटी आयु में ही हो गया था परंतु वह अपना अधिकतर समय सूफी तथा भक्ति संतों के बीच बिताते थे। उन्होंने दूर-दूर क की यात्रा भी कीं। उनके मुख्य उपदेश निम्नलिखित हैं।
(क) उन्होंने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों का खंडन किया जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति-पूजा तथा कठोर तप।
(ख) उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के धर्म्रंथों को भी नकारा।
(ग) उनके लिए परमपूर्ण रब (परमात्मा) का कोई लिंग या आकार नहीं था।
(घ) उन्होंने रब की उपासना के लिए सरल उपाय बताया और वह था उनका निरंतर स्मरण व नाम का जाप।
विचारों का संप्रेषण : गुरु नानक देव जी ने अपने विचार पंजाबी भाषा में शबद के माध्यम से लोगों के सामने रखे। वह ये शबद अलग-अलग रागों में गाते थे और उनका सेवक मरदाना रबाब बजाकर उनका साथ देता था।

प्रश्न 6. सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

सूफी मत के विश्वास (शिक्षाएँ अथवा सिद्धांत) बताइए ।
उत्तर : इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोगों का झुकाव रहस्यवाद तथा वैराग्य की ओर बढ़ने लगा। इन सू लोगों को सूफी कहा गया। सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों विचारों का वर्णन निम्न प्रकार है: तथा
1.सूफ़ियों ने रूढ़िवादी परिभाषाओं तथा धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या नमक की आलोचना की। उन्होंने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की।
2.उन्होंने मुक्ति पाने के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया।
3.उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद को इंसान-ए-कामिल बताते हुए उनका अनुसरण करने की शिक्षा दी।
4.वे किसी औलिया या पीर की देख-रेख में जिक्र (नाम का जाप) चिंतन, समा (गाना), रक्स (नृत्य) , नीति-चर्चा, साँस पर नियंत्रण आदि क्रियाओं द्वारा मन को प्रशिक्षित करने के पक्ष में थे।
5. वे सदाचारिता और मानव के प्रति दयालुता पर बल देते थे। 6. वे सूफ़ी संतों की दरगाहों पर जियारत (तीर्थयात्रा) करते थे। नाच और संगीत भी जियारत के भाग थे। विशेषकर कव्वालों द्वारा प्रस्तुत रहस्यवादी गुणगान, ताकि अलौकिक आनंद की भावना को उभारा जा सके। सूफी संत जिक्र (ईश्वर का नाम-जाप) या फिर समा (श्रवण करना) अर्थात् आध्यात्मिक संगीत की महफिल द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे।
7.(i) सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर एक है। सभी जीव उसी से उत्पन्न होते हैं। इसलिए सभी जीव एकसमान हैं।
(ii) सूफ़ी मत के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान है। उसका निवास सृष्टि के कण-कण में है।
(iii) सूफी संतों का विचार है कि हमें सच्चे मन से प्रभु-भक्ति करनी चाहिए। यदि मनुष्य प्रभु प्रेम में मग्न हो जाए तो वह उसे शीघ्र ही पा सकता है।
(iv) सूफी संतों का कहना है कि मनुष्य को अपना सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए।
(v) सूफी मत में मुर्शीद (गुरु) को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है। मुर्शीद ही मनुष्य को सच्चा मार्ग दिखाता है।।
(vi) सूफी मत के अनुसार मनुष्य को सांसारिक पदार्थों के साथ मोह नहीं करना चाहिए।
(vii) सूफ़ी मत के अनुसार मानव सेवा तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता करना प्रभु-भक्ति करने के समान है। इसी उद्देश्य से शेख निजामुद्दीन औलिया के खानकाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) चलाई जाती थी जो फुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी। सुबह से देर रात तक चलने वाली इस रसोई में सभी वर्गों के लोग भोजन करते थे।

प्रश्न 7. क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफी संतो से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया ?
उत्तर : चोल शासकों ने नयनार संतों के साथ संबंध बनाने पर बल दिया और उनका समर्थन हासिल करने का प्रयत्न किया। इन शासकों ने मंदिरों निर्माण के लिए भूमि -अनुदान दिया। चिदम्बरम्, तंजावुर और गंगैकोडचोलपुरम के विशाल शिव मंदिर चोल सम्राटों की सहायता से ही निर्मित हुए हैं। मंदिरों में कांस्य में ढाली गई शिव की प्रतिमाओं का निर्माण भी इसी काल में हुआ। चोल सम्राटों ने दावा किया कि उन्हें दैवीय समर्थन प्राप्त है। इन सम्राटों ने अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया जिनमें पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ सुसज्जित की गई थीं। इस प्रकार इन लोकप्रिय संत-कवियों की परिकल्पना को जिन्होंने जन-भाषाओं में गीत रचा गया था, मूर्त रूप प्रदान किया गया।
तमिल भाषा के शैव भजनों के गायन को भी इन सम्राटों ने इन मंदिरों में प्रचलित किया। उन्होंने ऐसे भजनों का संकलन एक प्रथ के रूप में करने का भी जिम्मा उठाया। 945 ईसवी क एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कलि अप्पार संबंदर और सुदरार की धातु की मूतियाँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाई थीं। इन मूर्तियों को उत्सव में एक जुलूस में निकाला जाता था।
सुल्तानों ने खानकाही को कर मुक्त (इनाम) अनुदान में और दान संबंधी न्यास स्थापित किए। सूफी संतों की लोकप्रियता के कारणों में उनकी धर्मनिष्ठा. विद्वता और लोगों द्वारा उनको चमत्कारी शक्ति में विश्वास करना शामिल था। इन कारणों से शासक वर्ग भी उनका समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। शासक वर्ग सिर्फ सूफी संतों से ही संबंध नहीं रखना चाहते थे बल्कि वे उनके समर्थन के भी कायल थे। तुर्कोड ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना के पश्चात् उलमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की मांग को ठुकरा दिया था। सुल्तान को यह मालूम था कि उसकी प्रजा इस्लाम धर्म मानने वाली नहीं है। ऐसे समय में सुल्तानों ने सूफी संतों की मदद ली जो यह मानते थे कि उनकी आध्यात्मिक सत्ता की उद्भूति अल्लाह से हुई थी। ये सूफी संत उलमा द्वारा शरिया की व्याख्या पर निर्भर नहीं थे। यह भी विश्वास किया जाता था कि औलिया एक मध्यस्द की हैसियत से ईश्वर से लोगों की ऐहिक तथा आध्यात्मिक दशा में सुधार लाने का कार्य करते हैं। सम्भवतः इसलिए शासक अपनी कब्र सूफी दरगाहों और खानकाहों के निकट बनाना चाहते थे लेकिन सुल्तान और सूफियों के बीच तनाव भी हुआ करता था। अपनी सत्ता की प्रभुसत्ता बनाए रखने के लिए दोनों ही के द्वारा कुछ आचारों पर विशेष बल दिया जाता था, जैसे झुक कर प्रणाम करना और कदम चूमना। कभी-कभी सूफ़ी शेखों को आडंबरपूर्ण पदवी से संबोधित किया जाता था । उदाहरण के लिए, शेख निजामुद्दीन औलिया को उनके अनुयायी उन्हें सुल्तान-उल-मशेख अर्थात् शेखों में सुल्तान कहकर संबोधित करते थे।

प्रश्न 8. उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया ?
उत्तर : भक्ति तथा ‘सूफ़ी चिंतकों’ ने अपने विचारों को आम जनता तक पहुँचाने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया। ये भाषाएँ प्रायः स्थानीय थीं, जिन्हें समझना साधारण लोगों के लिए आसान था। यदि संत कवि कुछ विशिष्ट भाषाओं का ही प्रयोग करते रहते, तो उनके विचारों का संप्रेषण कभी नहीं होता और ये उनके साथ ही विलुप्त हो गए होते। अत: स्थानीय भाषाओं को अपनाना विचारों के प्रवाह में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। उदाहरण : 1. अलवार तथा नयनार संतों ने अपना प्रच शिव तमिल भाषा में किया।
2.भक्त कबीर के भजन अर्थात् दोहे तथा छंद कई भाषाओें | में मिलते हैं। इनमें से कुछ संत भाषा में हैं जो निर्गुण कवियों की विशेष बोली थी।
3.सूफी संतों ने भी स्थानीय भाषाओं को अपनाया। उदाहरण के लिए बाबा फरीद ने पंजाबी भाषा को अपनाया।
4. श्री गुरु नानक देव जी ने पंजाबी भाषा में अपना प्रचार किया।

प्रश्न 9. इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर : (क) चतुर्वेदी ब्राह्मण चारों वेदों के ज्ञाता थे। वे भगवान विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते थे। इसलिए भगवान विष्णु को वे दास अधिक प्रिय थे जो उनके चरणों से प्रेम रखते थे।
(ख) दास वर्ण-व्यवस्था में शामिल नहीं थे।
(ग) ब्राह्मण साँप की पत्थर की मूर्ति पर दूध चढ़ाते थे, पहु वास्तविक साँप को देखते ही वे उसे मारने पर उतारू हो जाते थे। ऐसा ही आडंबर भोजन खिलाने में करते थे। वे पत्थर से बन ईश्वर की मूर्ति को तो भोजन परोसते थे जबकि वह खा ही नहीं सकती थी, परंतु किसी भूखे सेवक को भोजन देने से साफ इंका कर देते थे, जबकि वह खा सकता था।
(घ) मुगल शासक, विशेषकर अकबर सभी धर्मों का आटा करते थे और उन्हें सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करते थे। सभी धर्म के लोगों को अपने पूजा-स्थलों के निर्माण की अनुमति थी औरंगजेब भी अन्य संप्रदायों के धर्म-गुरुओं की समय-समय स सहायता करता था।

प्रश्न 10. भारत के एक मानचित्र पर 3 सूफी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर : संकेत : तीन प्रमुख सूफी दरगाह :(i) नई दिल्ली निजामुद्दीन औलिया का दरगाह, (ii) अजमेर राजस्थान) शेख मईनदीन चिश्ती की दरगाह, (iii) अजोधन पाकिस्तान) शेख फरीद्दीन गंज-ए-शंकर की दरगाह।
कुछ मंदिरों का उल्लेख :
(i) जगन्नाथ पुरी, भुवनेश्वर (उड़ीसा), (ii) सोमनाथ, द्वारका (गुजरात), (iii) ब्रह्माजी अथवा विष्णु जी का मंदिर, पुष्कर, अजमेर (राजस्थान), (iv) बौद्धि देवी मरीचि (बिहार), (v) शिव मंदिर चिंदरबम, तंजबूर गंगई कोंडाचोलापुरम (तमिलनाडु), (vi) वैष्णो देवी-कटरा, जम्मू (जम्मू-कश्मीर राज्य), (vii) कालाबाडी मंदिर, नई दिल्ली अथवा कालाबाडी या दुर्गा मंदिर-कलकत्ता (पश्चिमी बंगाल), (viii) रामेश्वरम् (विष्णु) तमिलनाडु।

प्रश्न 11. इस अध्याय में वर्णित किन्हीं 2 धार्मिक उपदेशकों/चिंतकों/संतों का चयन कीजिए और उनके जीवन व उपदेशों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए। इनके समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचारों के बारे में एक विवरण तैयार कीजिए। हमें इनके बारे में कैसे जानकारी मिलती है और हमें क्यों लगता है कि वे महत्त्वपूर्ण हैं।
उत्तर : (क) नामदेव (Namdev) : महाराष्ट्र महान् संत नामदेव भी भक्ति आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वें एक उच्च कोटि के कवि थे।
नामदेव का जीवन (Life of Namdev) : नामदेव का जन्म 29 अक्तूबर, 1270 ई. को महाराष्ट्र के पण्डरपुर नामक स्थान पर हुआ था। उनकी माता का नाम गोणाई और पिता का नाम दामा सेठ था। उनके पिता दर्जी का काम करते थे उनके माता-पिता बिट्ठल स्वामी के भक्त थे, अत: वे भी बिट्ठल स्वामी के अनन्य भक्त बन गए। नामदेव जी का विवाह राजबाई नाम की लड़की से हुआ था। उससे उनके चार पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुई।
नामदेव ने बिसोबा खेचर नामक एक प्रसिद्ध महात्मा को अपना गुरु बनाया। उनकी कृपा से ही नामदेव एक महान् संत बने। अपने अभंगों (गीतों) में उन्होंने अपने गुरु की महिमा को गाया है। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर के प्रति भी नामदेव बड़ी निष्ठा रखते थे। उनके साथ उन्होंने लगभग सारे देश का भ्रमण किया। संत ज्ञानेश्वर की मृत्यु के बाद नामदेव पंजाब में ही रह गए और गुरदासपुर को अपना प्रचार-केन्द्र बनाकर लोगों को उपदेश दिया।
अपने जीवन के अन्तिम दिनों में नामदेव पाण्डरपुर लौट आए थे। यहीं 80 वर्ष की आयु में 1350 ई. में उनका देहान्त हो गया। नामदेव की शिक्षाएँ (Teachings of Namdev) :
1.ईश्वर एक है। वह सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक है। उनके अपने शब्दों में, “इस संसार में ईश्वर है, संसार का कोई ऐसा भाग नहीं है, जहाँ ईश्वर नहीं है। हे ईश्वर, तुम सर्वव्यापक हो, नाम’ को पूरा विश्वास है, तुम सारे संसार में विद्यमान हो।” 2. प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर की भक्ति में लगे रहना चाहिए। नामदेव का विश्वास था कि ईश्वर भक्ति ही जीवन का सच्चा सहारा है। इसके बिना जीवन व्यर्थ है ।
3.जाति-पाति और बाहरी आडम्बर व्यर्थ हैं। नामदेव के शब्दों में, “गाय कितने रंगों की होती है, पर दूध सबका एक रंग का होता है। आप किस प्रकार से ब्राह्मण हैं और हम शूद्र !”
4.मानव जीवन नाशवान है। नामदेव का कथन था कि जिस प्रकार कोई पक्षी वृक्ष पर बैठता है और फिर उड़ जाता है, उसी तरह मनुष्य संसार में आता है और चला जाता है।
5.तीर्थ यात्रा व्यर्थ है। नामदेव कहा करते थे कि चाहे तुम हजारों, बल्कि लाखों यात्राएँ कर लो, चाहे अपने शरीर को हिमालय में जमा लो, यह सब कुछ भी ईश्वर के नाम की बराबरी नहीं कर सकता। इस तरह नामदेव जी ने तीर्थ यात्राओं की अपेक्षा ईश्वर का नाम जपना अधिक उत्तम कहा है।
6.नामदेव मानव मात्र की एकता के समर्थक थे। उनका कथन था कि हिन्दू भी अन्धे हैं और मुसलमान भी अन्धे हैं, जो मनुष्य प्रभु को जानता है, वह दोनों से अच्छा है हिन्दू अपने मंदिर की पूजा करता है और मुसलमान मस्जिद की। मगर ‘नाम’ उस ईश्वर की पूजा करता है जिसका न कोई मन्दिर है, न कोई मस्जिद।
(ख) गुरु रविदास (Guru Ravidas) : गुरु रविदास मध्यकालीन भारत के महान् संत और उच्च कोटि के कवि थे।
I. जीवन (Life History) : रविदास जी का जन्म 1377 ई. है में बनारस के एक गाँव मान्दूर में हुआ था। कहा जाता कि इनका जन्म रविवार के दिन हुआ था, अतः इनका नाम रविदास रखा गया। इनके पिता का नाम भानदास और माता का नाम करमा देवी था। रविदास जाति के चमार थे। इसके विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है:
“जाति ओछी पाँति ओछी, ओछा जनम हमारा। राजा राम की सेवन कीन्हीं, कहि रविदास चमारा ॥
रविदास के माता-पिता धार्मिक विचारों के थे। इसका उन पर बहुत प्रभाव पड़ा और वे बचपन से ही ईश्वर- भक्ति में मग्न रहने लगे। संसार के विषयों में लगाने के लिए उनके माता-पिता ने उनका विवाह लोना नाम की एक लड़की से कर दिया लेकिन वे सांसारिक बन्धनों में न फंस सके। वे प्रायः साधुओं की सेवा तथा सत्संग में ही अपना समय व्यतीत करते थे। रविदास ने रामानन्द से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। वे अपने समय के प्रसिद्ध संतों और भक्तों में सबसे लंबी आयु वाले थे। 1528 ई. में 151 वर्ष की आयु में चित्तौड़ में उनका देहान्त हुआ। उनकी स्मृति में बनवाई गई ‘रविदास की छतरी’ और ‘रविदास के चरण चिह्न’ आज भी चित्तौड़ में विद्यमान हैं।
II. शिक्षाएँ (Teachings) :
1.रविदास जाति-पांति के विरुद्ध थे। उनका कथन था कि सब लोग एक ईश्वर की संतान हैं और सब समान हैं। अतः ब्राह्मण और शूद्र आदि के भेदभाव व्यर्थ है।
2.रविदास हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षपाती थे। उनके अनुसार मन्दिर और मस्जिद एक हैं तथा राम और रहीम में कोई अन्तर नहीं।
3.मनुष्य को संतोष और सदाचार को जीवन का आधार बनाना चाहिए और विषय-वासनाओं को छोड़ देना चाहिए।
“सत्त संतोष अरु सदाचार, जीवन को आधार।
रविदास नर भये देवते, जिन तिओगे पंच विकार
4. मनुष्य को सदा शुभ कर्म करने चाहिए लेकिन उनका परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।
(ग) मीराबाई (Mirabai) :
(i) गिरिधर गोपाल की भक्त मीरा का मध्यकालीन संतों में विशेष स्थान है। उसने भक्ति की जो मन्दाकिनी (गंगा) अपने हृदय से निकाली कविताओं द्वारा प्रवाहित की, उसने केवल राजस्थान की मरुभूमि ही नहीं, अपितु सारे उत्तरी भारत को रसमग्न कर दिया।
(ii) मीराबाई का जन्म लगभग 1516 ई. में राजस्थान के मेड़ता परगने के कुड़की या चौकड़ी गाँव में हुआ था। मीरा जोधपुर के शासक रतनसिंह राठौर की पुत्री थी। मीरा अभी 4-5 वर्ष की ही थी कि उसकी माता का देहान्त हो गया। उसका पालन-पोषण उसके दादा ने किया। अपने दादा के धार्मिक विचारों से मीरा बहुत प्रभावित हुई।
(iii) 18 वर्ष की आयु में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह के बड़े पुत्र भोजराज से कर दिया गया लेकिन मीरा का वैवाहिक जीवन बहुत संक्षिप्त था। विवाह के लगभग एक वर्ष बाद ही उसके पति की मृत्यु हो गई। इस तरह मीरा छोटी आयु में ही विधवा हो गई। कुछ समय बाद उसके ससुर राणा साँगा की भी मृत्यु हो गई। अब मीरा बेसहारा हो गई। अतः वह संसार से मोह त्यागकर कृष्ण-भक्ति में लीन हो गई।
(iv) वह साधुओं का सत्कार करती और पैरों में घुँघरू बाँधकर भगवान् कृष्ण की मूर्ति के सामने नाचने लगती। उसके ससुराल के लोगों ने उसके कार्यों को अपने कुल की मर्यादा के विपरीत समझा। अत: उसे कई प्रकार के अत्याचारों द्वारा मारने के प्रयास किए लेकिन जहर का प्याला, साँप और सूली आदि भी मीरा का बाल-बाँका न कर सके। इस विषय में मीरा ने स्वयं कहा है कि “मारी मारी न मरूँ, मेरो राखणहार और”। इससे उसकी भक्ति-भावना और बढ़ गई, लेकिन अत्याचार भी बढ़ते जा रहे थे। कहा जाता है कि मीरा ने अपने ससुराल वालों से तंग आकर गोस्वामी तुलसीदास जी को पत्र लिखकर उनकी सलाह माँगी।
तुलसीदास जी ने मीरा को इस प्रकार उत्तर दिया : “जाके प्रिय न राम वैदही।
तजिये ताहि कोटि वैरी सम, यद्यपि परम सनेही।¨
(v) इस उत्तर को पाकर मीरा ने घर-बार छोड़ दिया और वह वृन्दावन चली गई। वहाँ कुछ समय रहने के बाद मीरा द्वारिका चली गई। कहा जाता है कि मीरा के द्वारिका से लाने के लिए उनकी ससुराल तथा मायके-दोनों स्थानों से ब्राह्मण आये लेकिन वह नहीं गई। द्वारिका में ही 1574 ई. में मीराबाई का देहान्त हो गया।

परियोजना कार्य : Project work

प्रश्न 12. इस अध्याय में वर्णित सूफी व देव स्थलों से संबद्ध तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कीजिए। क्या यह यात्राएँ अभी भी की जाती हैं ? इन स्थानों पर कौन लोग और कब-कब जाते हैं ? वे यहाँ क्यों जाते हैं ? इन तीर्थयात्राओं से जुड़ी गतिविधियाँ कौन सी हैं ?
उत्तर : कृपया अपने अभिभावकों/संबंधियों/अपने अध्यापका अध्यापिकाओं से विचार-विमर्श कीजिए और इस परियोजना कार्य को स्वयं करें। आपकी सहायता के लिए कुछ सहायक बिंदु दिए जा रहे हैं।

सहायक बिन्दु (Helping Hints) :
(i) प्राय: लोग तीर्थ करने के लिए विभिन्न प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों की यात्रा करते हैं। उदाहरण के लिए सिक्ख बैसाखी के दिन या उसके आसपास स्वर्ण मंदिर अथवा आंनदपुर साहिब में स्थित गुरुद्वारे दर्शन हेतु जाते हैं। कुछ लोग तो पाकिस्तान स्थित ननकाना साहिब भी जाते हैं। देश के अंदर बसों/कारों अथवा रेलगाडी से जाया जा सकता है। अब अमृतसर के लिए वायुयान सेवा भी उपलब्ध है और पाकिस्तान की बस। रेलगाड़ी या वायुयान से अनुमति लेकर जाया जा सकता है।
(ii) सिक्ख तीर्थ यात्री पवित्र तीर्थ स्थानों पर स्थित धार्मिक स्थानों पर मथा टेकते हैं, सिर झुकाते हैं, अपनी निर्धारित परम्पराओं और विधियों के अनुसार पूजा-पाठ करते हैं। सांझी रसोई में लंगर खाते हैं, पवित्र तालाबों में स्नान करते हैं, गुरु प्रति तन, मन और धन से अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं । के
(iii) अनेक हिंदू कुंभ और अर्द्ध-कुंभ के समय या अन्य त्योहारों के समय हरिद्वार या पुष्कर जाते हैं, कई लोग दक्षिण भारत में बाला जी भी जाते हैं। वे मेलों में भाग लेते हैं, पवित्र नदियों और तालाबों में स्नान करते हैं, अपने-अपने आराध्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्जना करते हैं, दीन-दुखियों को भोजन कराते हैं।
(iv) मुस्लिम मक्का की यात्रा पर जीवन में कम से कम एकबार जाने का प्रयास करते हैं। कुछ मुस्लिम अजमेर या दिल्ली सूफी संतों की दरगाहों पर जाते हैं। वहाँ इबादत करते हैं, चादर चढ़ाते हैं, गरीबों को दान-दक्षिणा देते हैं।

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