Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 6 Important Question Answer 8 Marks भक्ति-सूफी परंपराएँ (धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ)

प्रश्न 1. 8वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान धार्मिक विश्वासों एवं आचरणों में भेद और संघर्ष के उदाहरण दीजिए।
उत्तर : 8वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान विभिन्न पूजा- प्रणालियों के बीच संघर्ष भी चलते रहे-कहीं राजकीय अनुदान पाने के लिए गया तो कहीं स्थान बनाने के लिए। इस संबंध में निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं :
देवी की आराधना : देवी की आराधना पद्धति को प्रायः हुए में तांत्रिक पूजा पद्धति के नाम से जाना जाता है। तांत्रिक पूजा-पद्धति नोप में उपमहाद्वीप के कई भागों में प्रचलित थी। इसमें स्त्री और पुरुष शल्पी दोनों ही शामिल हो सकते थे।
इसके अतिरिक्त कर्मकांडों के संदर्भ में वर्ग और वर्ण के भेद जनीं की अवहेलना की जाती थी। इस पद्धति के कई विचारों ने शैव हर और बौद्ध दर्शन को भी प्रभावित किया। विशेष रूप से उपमहाद्वीप कात) के पूर्वी, उत्तरी तथा दक्षिणी भागों में आगामी सहस्त्राब्दी में इन सभी विश्वासों और आचारों का वर्गीकरण “हिंदू” के रूप में किया गया।
वैदिक तथा पौराणिक परंपराओं में विषमता : यदि हम वैदिक और पौराणिक परंपरा की तुलना करें तो यह विषमता और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है। वैदिक काल के अग्नि, इंद्र तथा सोम जैसे देवता पूरी तरह से अपना महत्त्व खो बैठे। उनका साहित्य तथा मूर्तिकला दोनों में ही निरूपण नहीं मिलता परंतु वैदिक मंत्रों में विष्णु, शिव और देवी की झलक अवश्य मिलती है, भले ही इनका पौराणिक रूप बदल चुका था। इतना होने पर भी वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा।
संघर्ष की स्थिति : कभी-कभी संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी। वैदिक परंपरा के प्रशंसक उन सभी तरीकों की निंदा करते थे जो ईश्वर की उपासना के लिए मंत्रों के उच्चारण तथा यज्ञों के संपादन से हटकर थे। इसके विपरीत वे लोग थे जो तांत्रिक आराधना में लगे थे। वे वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे। इसके अतिरिक्त कई बार भक्त अपने इष्टदेव विष्णु या शिव को भी सर्वोच्च देव बताते थे। प्रायः अन्य परंपराओं जैसे बौद्ध अथवा जैन धर्म से भी संबंध तनावपूर्ण हो जाते थे। फिर भी स्पष्ट संघर्ष कम ही दिखाई पड़ते थे। इस संबंध में भक्ति परंपरा का उदाहरण दिया जा सकता है।
भक्ति परंपरा : भक्ति परंपरा में मदिरा में इष्ट का आराधना से लेकर उपासकों का प्रेमभाव में तल्लीन हो जाना शामिल था। भक्ति रचनाओं का उच्चारण अथवा गान इस उपासना पद्धति के अंश थे। वैष्णव और शैव संप्रदायों पर तो यह कचन विशेष रूप से लागू होता है।

प्रश्न 2, मध्यकाल में भक्ति काल के उदय तक प्रसार के कारणों पर विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर : मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन के उदय एवं प्रसार के कारण (Causes of rise and spread of Bhakti Movement)
1.हिन्दू धर्म की बुराइयाँ (Wrong Practice of Hinduism): भक्ति आन्दोलन के व्यापार प्रसार से पूर्व हिन्दू धर्म में कुछ बुराइयाँ आ गयी थीं। इसमें वर्ण व्यवस्था तथा अस्पृश्यता का बोलबाला था तथा इस्लाम के प्रचारक अपने भाईचारे एवं छुआछूत के विरोधी दृष्टिकोण के आधार पर कुछ लोगों को हिन्दू धर्म से इस्लाम की ओर आकर्षित कर रहे थे। इसलिए भक्त संतों ने हिन्दू धर्म की रक्षा तथा इस्लामी प्रचार एवं तबलीग के आक्रमण से इसकी रक्षा करना चाहा।
2.हिन्दू मुस्लिम समन्वय (Co-ordination of the Hindus and the Muslims) : इस युग में भक्ति आन्दोलन के प्रसार एवं अधिक लोकप्रियता का कारण यह था इसके अधिक प्रचारकों ने देश के दो प्रमुख सम्प्रदायों हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों में एकता स्थापित करना चाहा। उन्होंने लोगों को विश्वास दिलाया कि राम और रहीम एक ही हैं तथा जहाँ हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा तथा उपवास एवं तीर्थ यात्राओं जैसी कुरीतियाँ हैं वहाँ इस्लाम में भी जोर-जोर से भाग देना, हज करना, रोजे रखना आदि बुराइयाँ हैं। उन्होंने धर्मान्य इस्लाम उलेमाओं की मानव-मानव के मध्य घृणा को गलत बताया।
3.मुस्लिम राजसत्ता (Mius/imm Rulers) : भक्ति आन्दोलन के अभ्युदय का एक महत्त्वपूर्ण कारण इस्लाम की राजसत्ता तथा उसके प्रति भारतीय प्रतिक्रिया भी थी। जब मुस्लिम सत्ता (जिसका आधार सैन्य बल था) भारत में स्थायी रूप से बस गयी तो हिन्दुओ ने उसके विरुद्ध निष्क्रियता दिखाई। इन निष्क्रियता का कारण यह नहीं था कि तत्कालीन भारतीय शासक वर्ग में उन्हें बाहर निकालने की क्षमता नहीं थी, बल्कि इसलिए क्योंकि समकालीन समाज ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया क्योंकि भारतीय समाज धर्म के आधार पर श्रेणीबद्ध तथा सामन्ती व्यवस्था पर आधारित ग्रामीण कृषक-समाज के ढरें पर चलता आ रहा था। मुस्लिम शासक वर्ग तथा अमीर वर्ग की संख्या निरन्तर बढ़ रही थी। हिन्दुओं ने यह मान लिया कि उन्हें देश से बाहर निकालना कठिन था। दूसरी ओर मुसलमानों ने देखा कि हिन्दुओं की संख्या इतनी अधिक है कि उन सभी को इस्लाम में दीक्षित करना कठिन है। अतः दोनों ने एक-दूसरे के निकट आने का प्रयास शुरू किया।
यह प्रयास शुरू करने वाले हिन्दू समाज की ओर से भक्त संत थे।
4.मोक्ष प्राप्ति का शंकर का ज्ञानमार्ग अथवा शंकराचार्य का ज्ञानमार्ग (Gyan Marg of Shankaracharya or Path of Knowledge of Shankar to obtain Mokshya) : शंकर ने अद्वैतवाद (अर्थात् आत्मा तथा परमात्मा एक है।) निर्गुण ब्रह्म की उपासना तथा ज्ञान द्वारा मोक्ष पाने पर बल दिया। उनके निर्गुण अज्ञानवाद ने हिन्दुओं के मन में बैठी निराशा से मानव को मुक्ति नहीं दे सका। ज्ञान मार्ग सर्वसाधारण के लिए अधिक सरल नहीं था। इसीलिए वैष्णव संतों ने सगुण भक्ति तथा भक्ति मार्ग पर अधिक जोर दिया। वैष्णवों की सगुण भक्ति का साधारण जनता पर बहुत प्रभाव पड़ा।
5.सूफी संतों के प्रचार कार्य (Preaching works of Sufi.saints) : भारत में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, बख्तियार काकी, फरीदउद्दीन-गंज-ए-शंकर, नियामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग दिल्ली आदि के प्रयासों के कारण भी भक्ति आन्दोलन के अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। उन्होंने कट्टर मुस्लिम लोगों की धर्मान्धता पर अंकुश लगाया। उनके द्वारा गीत-संगीत की पद्धति को अपनाये जाने के कारण भी सगुण भक्ति विचारधारा को बल मिला।
6.भक्त संतों का उदय (Rise of Bhakti Saints) : भक्ति आन्दोलन को 13वीं से 16वीं शताब्दी के लम्बे काल तक निरन्तर बढ़ने में जो सफलता मिली उसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मू कारण यह था कि उस समय भारतीय समाज को एक के बाद एक महान संतों के प्रेरणादायक एवं प्रभावशाली विचार मिलते रहे। रामानुज, रामानन्द, चैतन्य महाप्रभु, कबीर, गुरु नानक दा बल्लभाचार्य आदि ने अपने-अपने काल में अपने उपदेशों द्वारा भक्ति आन्दोलन को आगे बढ़ाया।

प्रश्न 3. भक्ति आंदोलन के विकास का विवरण : दीजिए तथा भक्ति संप्रदाय के मूलभूत विचारों तथा सिद्धांतों : का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : भक्ति आंदोलन का वास्तविक अर्थों में विकास सातवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य दक्षिण भारत में हुआ। वहाँ शैव नयनार और वैष्णव अलवार ने ईश्वर के प्रति भक्ति को ही मुक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया और लोगों को समझाया कि वे जाति-भेद से ऊपर उठकर एक-दूसरे के समीप आएँ। यहाँ एक बात उल्लेखनीय यह है कि दक्षिण भारत के उत्तर भारत की ओर भक्ति-आंदोलन के प्रसार काफी समय लगा। इसका मुख्य कारण शायद यह था कि इनकी भाषा उत्तरी भारत में धर्म-प्रसार के लिए अधिक सहायक नहीं हो सकती थी। यहाँ संस्कृत का माध्यम ही लोकप्रिय हो सकता था। कुछ भी हो संत और विचारक दोनों मिलकर उत्ता भारत में भक्ति दर्शन लाए।
1.ईश्वर की एकता : भक्ति आंदोलन के प्रचारकों ने कहा कि ईश्वर एक है, उसे विभाजित नहीं किया जा सकता। राम व रहीम एक ही ईश्वर के दो नाम हैं। अतः हमें एक ईश्वर की उपासना करनी चाहिए।
2.ईश्वर का महत्त्व : भक्ति प्रचारकों के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान तथा सर्वव्यापाक है। वह सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है।
3.सच्ची प्रभु-भक्ति : भक्ति प्रचारकों ने सच्ची प्रभु-भक्ति पर बल दिया। वे कहते थे कि ईश्वर दिखावे से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति से प्रसन्न होते हैं। सच्ची भक्ति ही मोक्ष प्राप्ति का साधन है। इसलिए मनुष्य को धार्मिक आडंबरों को त्याग देना चाहिए।
4.जाति प्रथा में अविश्वास : भक्ति मार्ग के लगभग सभी प्रचारक जाति-प्रथा के विरुद्ध थे, उनके अनुसार ईश्वर के लिए न कोई छोटा है और न कोई बड़ा। उसके लिए तो सभी समान हैं। अतः जाति-पाति निरर्थक है।
5.गुरु की महिमा : संत प्रचारकों ने गुरु का स्थान सर्वोच्च बताया है। उनका कहना था कि सच्चे गुरु के बिना ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता। 6. मूर्ति-पूजा का विरोध : भक्ति मार्ग के प्रचारकों ने
6.मूर्ति-पूजा का विरोध : भक्ति मार्ग के प्रचारकों ने मूर्ति-पूजा का कड़ा विरोध किया। इस कार्य में कबीर जी और नामदेव जी आदि धार्मिक संतों ने बहुत योगदान दिया। गुरु नानक देव जी भी कहा करते थे, “पत्थर पूजे, मुगद गंवार” अर्थात् सत्थर (मूर्तियों) की पूजा मूर्ख लोग करते हैं।
7.निरर्थक रीति-रिवाजों में अविश्वास: भक्ति आंदोलन के प्रचारकों ने समाज में झूठे रीति-रिवाज का भी खंडन किया। उनके अनुसार भगवे कपड़े पहनने और दाढ़ी-मूंछ मुंडवा लेने से कोई ईश्वर का भक्त नहीं बन जाता। सच्ची ईश्वर- भक्ति के लिए मन को निर्मल बनाना आवश्यक है।

प्रश्न 4. धार्मिक विश्वासों से संबंधित साहित्यिक परंपराओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : धार्मिक विश्वासों से संबंधित साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनाएँ शामिल हैं। उन्होंने इन रचनाओं में अपने आप को जनसाधारण की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से व्यक्त किया था। इनमें से अधिकतर रचनाएँ संगीतबद्ध हैं । इन्हें संतों के अनुयायियों ने उनकी मृत्यु के बाद संकलित किया था। ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं। संतों के अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने उनके मूल संदेश का न केवल विस्तार किया बल्कि भिन्न राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में अनावश्यक लगने वाले विचारों को उन्होंने या तो बदल दिया या फिर त्याग दिया। इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।
इतिहासकार इन संत कवियों के अनुयायियों द्वारा लिखी गई उनकी जीवनियों का भी प्रयोग करते हैं। भले ही ये जीवनियाँ अक्षरशः सत्य नहीं हैं तो भी इनसे यह पता चलता है कि अनुयायी इन पथ-प्रदर्शक संतों के जीवन को किस रूप में देखते थे।
धार्मिक विश्वासों से संबंधित साहित्यिक स्रोतों पर दृष्टिपात करने से हमें पता चलता है कि उनमें काफी विविधता है और वे कई भाषाओं तथा शैलियों में लिखे गए हैं। कुछ स्रोत सरल तथा स्पष्ट भाषा में हैं अब जैसे कि बसवन्ना के वचन। इसके विपरीत कुछ अन्य अलंकृत फारसी में लिखे गए हैं। प्रत्येक किस्म के मूल-पाठ को समझने के लिए तरह-तरह का कौशल चाहिए। कई भाषाओं की जानकारी, लेकिन इसके अतिरिक्त इतिहासकार को प्रत्येक विधि की शैली तथा शैलियों में सूक्ष्म अंतरों को भी पहचानना पड़ता है।
लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं। परिपाटी की यह निरंतरता इतिहासकारों के लिए वरदान सिद्ध होती है क्योंकि वे सामयिक आचार-व्यवहार की तुलना उस परिपाटी से कर सकते हैं जिसका वर्णन साहित्य और पुरानी चित्रकला में मिलता है। साथ ही वे उस परंपरा में आए बदलावों की रूपरेखा भी तैयार कर सकते हैं क्योंकि ये परंपराएँ आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, इसलिए लोगों के लिए यह मानना सरल नहीं होता कि समय के साथ संभवतः इन परिपाटियों में परिवर्तन आया होगा। इतिहासकारों के लिए चुनौती यह है कि वे इस तथ्य की ओर जागरूक रहें, क्योंकि अन्य परंपराओं की तरह धार्मिक परंपराएँ भी परिवर्तनशील हैं।

प्रश्न 5. चिश्ती उपासना के मुख्य लक्षणों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

चिश्ती उपासना की जियारत तथा कव्वाली के विशेष संदर्भ में व्याख्या कीजिए।
उत्तर : सूफी संतों की दरगाह पर की गई जियारत (तीर्थयात्रा) पूरे इस्लामी संसार में प्रचलित है इस अवसर पर संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद अर्थात् ब्रकत की कामना की जाती है। पिछले सात सौ वर्षों से भिन्न-भिन्न संप्रदायों, वर्गों तथा समुदायों के लोग पाँच महान् चिश्ती संतों की दरगाह पर अपनी आस्था प्रकट करते रहे हैं। इनके नाम हैं-शेख मुइनुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी, शेख फरीदुद्दीन गंज -ए- शकर, शेख निजामुद्दीन औलिया तथा शेख नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली। इनमें से सबसे अधिक पूजनीय दरगाह शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की है, जिन्हें ‘गरीब नवाज’ कहा जाता है।
यह दरगाह शेख की सदाचारिता और दयालुता, उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों की महानता तथा राजसी मेहमानों
द्वारा दिए गए संरक्षण के कारण लोकप्रिय थी। मुहम्मद-बिन-तुगलक (1324-51) इस दरगाह पर आने वाला पहला सुलतान था परंतु शेख की मजार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुलतान गियासुद्दीन खलजी ने 15वीं शताब्दी में बनवाई थी क्योंकि यह दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी, इसलिए यहाँ अनेक यात्री आते थे।
16वीं शताब्दी तक अजमेर की यह दरगाह बहुत ही लोकप्रिय हो गई। इस दरगाह पर आने वाले तीर्थयात्रियों के भजनों ने ही अकबर को यहाँ आने के लिए प्रेरित किया था। अकबर यहाँ 14 बार आया था-कभी साल में दो-तीन बार, कभी नई जीत के लिए आशीर्वाद लेने अथवा कामना की पूर्ति हो जाने पर या फिर पुत्रो के जन्म पर। अकबर ने यह परंपरा 1580 तक बनाए रखी। प्रत्येक यात्रा पर वह दोन-भेट दिया करते थे, जिनके ब्यौरे शाही दस्तावेजों में दर्ज हैं। उदाहरण के लिए 1568 में उन्होंने तीर्थयात्रियों के लिए खाना पकाने हेतु एक विशाल देग दरगाह को भेंट में दी थी। उन्होंने दरगाह के अहाते में एक मस्जिद भी बनवाई ।
नाच और संगीत : नाच और संगीत भी जियारत का भाग थे, विशेषकर कव्वालों द्वारा प्रस्तुत रहस्यवादी गुणगान, ताकि अलौकिक आनंद की भावना को उभारा जा सके। सूफी संत जिक्र (ईश्वर का नाम-जाप) या फिर समा (श्रवण करना) अर्थात् आध्यात्मिक संगीत की महफिल द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे। चिश्ती उपासना पद्धति में समा का महत्त्व इस बात की पुष्टि करता है कि चिश्ती स्थानीय भक्ति परंपरा से जुड़े थे।

प्रश्न 6. भक्त संत कबीर के विचारों और शिक्षाओं का भारतीय समाज, आर्थिक जीवन, साहित्य और भाषा पर पड़े प्रभाव पर वाद-विवाद कीजिए।
उत्तर : सामाजिक विचार एवं शिक्षाएँ तथा उनके प्रभाव (Social Thoughts and Teachings and their Impact) : कबीर मात्र भक्त ही नहीं, बड़े समाज सुधारक भी था उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों का डटकर विरोध किया। अंध विश्वासों, दकियानूसी मान्यताओं तथा गली-सड़ी रूढ़ियों की कटु आलोचना की। उन्होंने समाज, धर्म तथा दर्शन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण विचारधारा को प्रोत्साहित भी किया। कबीर ने जहाँ एक ओर बौद्धों, सिद्धों और नाथों की साधना तथा सुधार-परम्परा के साथ वैष्णव संप्रदायों की भक्ति-भावना को ग्रहण किया वहाँ दूसरी ओर राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक असमानता के विरुद्ध प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। इस प्रकार मध्यकाल में कबीर ने प्रगतिशील तथा क्रांतिकारी विचारधारा को स्थापित किया।
नि:संदेह पर्याप्त सीमा तक कबीर तत्कालीन स्थितियों को प्रभावित करने में सफल रहे। उन्होंने जनसाधारण के लिए धर्म की सहजता या भक्ति की सुगमता पर बल दिया। जनसाधारण की ही भाषा में उन्होंने बताया कि निर्गुण प्रभु सबका है, उस पर किसी वर्ग, व्यक्ति तथा धर्म-जाति आदि का एकाधिकार नहीं है। भी बड़ी बात है कि निर्गुण भक्ति-धारा में कबीर पहले संत थे जो संत होकर भी अंत तक शुद्ध गृहस्थ बने रहे एवं शारीरिक की प्रतिष्ठा (Dignity of labour) को मानव की सफलताओं आधार बताया। यह श्रम का ( जाति प्रथा का घोर विरोध (Strict opposition of Caste-system) : कबीर मानवतावादी विचारधारा के प्रति आस्थावान थे। उन्होंने मध्यकालीन विषम सामाजिक परिस्थितियों में इस कुप्रथा का घोर विरोध किया और बिखरे हिन्दू समाज को संगठित करने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। कबीर की दृष्टि में धर्म तथा सम्प्रदाय का संबंध सम्पूर्ण मानव समाज से था। उन्होंने जीवन पर्यन्त हिन्दुओं को समझाया कि जन्म से सभी मनुष्य समान हैं। उन्होंने कहा एक बूंट एकै मल-मूतर एक चाम एक गूदा। एक ज्योति से सब उत्पन्ना को वामन को सूदा॥ उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपने पवित्र कर्मों से भक्ति को अपनाया है उसकी जाति पूछना व्यर्थ है जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजियो ज्ञान। मोल करो तलवार का, चढ़ि रहन दो म्यान॥
(i) अन्य सामाजिक बुराइयों का विरोध (Opposition of other Social evils) : कबीर ने पर्दा प्रथा, बाल विवाह वेश्यागमन, सामाजिक फूट आदि बुराइयों का भी डटकर विरोध किया। उन्होंने सती प्रथा की भी खुली आलोचना की। वस्तुतः कबीर ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध खड़े होकर सारी मानव जाति के कल्याण एवं एकता के लिए अपने जीवन के सखों को त्याग दिया।
आर्थिक प्रभाव (Economic Impact) : कबीर को मध्यकालीन भारत का कार्ल मार्क्स ( Karl Marx) कहा जा सकता है। उन्होंने भारतीय समाज के दोषपूर्ण आर्थिक ढाँचे पर कड़ा प्रहार किया। जिस तथ्य को कार्ल मार्क्स ने आधुनिक य में पहचाना, कबीर ने उससे बहुत पहले स्पष्ट घोषणा की कि समाज एवं सरकार या राष्ट्र में ज्यादातर संघर्ष का कारण आर्थिक असमानता कबीर ने जन समाज के लिए धन को एक अनिवार्य तत्त्व माना और आवश्यकता के अनुकूल अर्जित करके उसके उपयोग का संदेश दिया। उन्होंने अनावश्यक धन संग्रह को पाप तथा उसे (अनावश्यक धन को) लोकहितार्थ व्यय को पुण्य कहा।
साहित्य का भाषा पर प्रभाव (Impact on Literature. and Language) : मध्यकालीन संतों में कबीरदास की साहित्यिक एवं ऐतिहासिक देन स्मरणीय है। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं से हिन्दी साहित्य को सम्पन्न किया। उनकी वाणी एवं विचारों का संग्रह ‘बीजक’ नाम से प्रसिद्ध है। इस संग्रह के तीन भाग हैं-रमैनी, सबद और साखी। रमैनी व सबद में पद हैं जबकि साखी में दोहे हैं कबीर ने अपनी रचनाओं में राजस्थानी, गुजराती, उर्दू, पंजाबी, हिन्दी आदि सभी भाषाओं के शब्दों का उपयोग किया।। उनकी भाषा खिचड़ी (मिली-जुली) तथा सधुक्कड़ी कहलाती है।

प्रश्न 7. कबीर की शिक्षाओं की व्याख्या कीजिए। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से ‘परम सत्य’ का वर्णन किस प्रकार किया?
उत्तर : संत कबीर एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे आप भक्ति आन्दोलन के कवि थे। कबीर ने कई भाषाओं और बोलियों में रचनाएँ की हैं। उन्होंने ईश्वर प्रेम पर बल दिया और कहा कि ईश्वर एक है। उनका विश्वास था कि भक्ति तथा ज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्ति हो सकती है। कबीर ने गुरु को बहुत अधिक महत्त्व दिया। उन्होंने कहा कि गुरु ही के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। वह उसमें ज्ञान का संचार करता है एवं अज्ञान को भगाता है। अगर हमारा हृदय पवित्र है स्वच्छ है, तो हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। बुरे हृदय वाला व अपवित्र हृदय वाला व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा सभी जीव-जंतु एक ही परमात्मा की रचना हैं उसके अंश हैं और उनके अंदर एक ही आत्मा विराजमान है। कबीरदास जी ने कहा कि अगर हम ईश्वर के पास छोटे बनकर जाएंगे या अपने को ईश्वर के लिए समर्पित कर देंगे तो ईश्वर अवश्य हमारी सहायता करेगा।
कबीर बानी की एक और विशिष्टता यह है कि उन्होंने परम सत्य को वर्णित करने के लिए अनेक परिपाटियों का सहारा लिया। इस्लामी दर्शन का अनुकरण करते हुए कबीर परम सत्य को अल्लाह, खुदा, हजरत और पीर का दर्जा देते हैं। कबीर वेदांत दर्शन से भी प्रभावित थे और इस सत्य को अलख, निराकार, ब्रह्मन् अथवा आत्मन् कहते हैं। योगी परंपरा के कुछ शब्दों का प्रयोग भी कबीर ने किया है, जैसे शब्द और शून्य।
कबीर ने हिंदू और मुसलमान दोनों के कर्मकांडों की भर्त्सना की है लेकिन वे इस्लाम दर्शन से अधिक प्रभावित दिखते हैं। वे एकेश्वरवाद का समर्थन और मूर्ति पूजा का खंडन करते हैं। अन्य कविताएँ जिक्र और इश्क के सूफी सिद्धांतों का इस्तेमाल ‘नाम सिमरन’ की हिंदू परंपरा की अभिव्यक्ति करने के लिए करती हैं।

प्रश्न 8. नानक के जीवन का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उनकी प्रमुख शिक्षाओं एवं विचारों को लिखिए। उनके क्या प्रभाव पड़े ? बताइए।

अथवा

गुरु नानक की शिक्षाओं की व्याख्या कीजिए।

उत्तर : I. नानक का संक्षिप्त जीवन परिचय (A brief Life inroduction of Nanak):
1.प्रस्तावना (Introduction): भारत महान संतों, सुधारकों, धर्म प्रवर्तकों तथा प्रचारकों की भूमि है। महान गुरु नानक देव राष्ट्र के उन महान विभूतियों में आते हैं जो मानव शरीर में ईश्वरीय अवतार माने जाने लगे हैं।
2.संक्षिप्त जीवन विवरण (A brief life sketch) : सिख धर्म के प्रणेता गुरु नानक देव रावी के तट पर स्थित तलवण्डी (आधुनिक ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में नवम्बर 1469 ई. में एक खत्री परिवार में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता का नाम मेहता कालूचन्द था। उनका विवाह (18 वर्ष) अवस्था में ही हो गया था और उन्हें पिता के व्यवसाय-लेखा-जोखा तैयार करने में प्रशिक्षित करने के लिए फारसी की शिक्षा दी गई थी किन्तु नानक का झुकाव प्रारंभ से ही आध्यात्मवाद एवं भक्ति की ओर था और वे सत्संग में बहुत आनंद उठाया करते थे।
3.गृहस्थ जीवन का त्याग (Giving up of married life): गृहस्थ जीवन में उन्हें किसी आनंद का अनुभव नहीं हुआ। यद्यपि उनके दो पुत्र (श्रीचन्द और लखमीदास) थे लेकिन उन्हें कुछ समय के गृहस्थ जीवन व्यतीत करने के बाद जब आध्यात्मिक दृष्टि मिली तो उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया। वे काव्य रचना करते थे और सारंगी के साथ गाया करते थे। संसार के बहुजीवों के कल्याणार्थ इन्होंने अनेक यात्राएँ कीं। कहते हैं कि वे चीन, बर्मा, श्रीलंका, अरब, मिस्र, तुर्की, अफगानिस्तान आदि देशों में गए। उनके दो शिष्य बाला और मरदाना प्राय: उनके साथ रहे। बड़ी संख्या में लोग उनकी ओर आकृष्ट हुए। 1539 ई. में उनकी मृत्यु हुई।
II. गुरु नानक की शिक्षाएँ एवं विचार (Teachings and Thoughts of Guru Nanak) :
(i) एकेश्वरवाद (Monotheism) : कबीर की भाँति नानक ने भी एकेश्वरवाद पर बल दिया। उन्होंने ऐसे इष्टदेव की कल्पना की जो अकाल मूर्त, अजन्मा तथा स्वयंभू है। उनके विचारानुसार ईश्वर को न तो स्थापित किया जा सकता है और न ही निर्मित । वह स्वयंभू है, वह अलख, अपार, अगम एवं इंद्रियों से परे है।
उसका न कोई काल है न कोई कर्म और न ही कोई जाति है। उन्होंने कहा-“पारब्रह्म प्रभु एक है, दूजा नहीं कोय।”
(ii) भक्ति एवं प्रेम मार्ग तथा आदर्श चरित्र (Devotion, Love Path (way) and an ideal Character): गुरु नानक देव के अनुसार ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रेम से ही मुक्ति सम्भव है, इसके लिए वर्ण, जाति और वर्ग का कोई भेद नहीं है। उनके अनुसार अच्छे व्यवहार एवं आदर्श तथा उच्च चरित्र से ईश्वर की निकटता प्राप्त की जा सकती है।
(iii) गुरु की महत्ता अंगीकार तथा आडंबरों का विरोध (Accepted the great place of Guru and opposed superistions) : गुरु नानक ने भी मार्ग दर्शन के लिए गुरु की अनिवार्यता को पहली शर्त माना। उन्होंने मूर्तिपूजा, तीर्थ यात्रा आदि धार्मिक आडम्बरों की कटु आलोचना की। उन्होंने अवतारवाद का भी विरोध किया।
(iv) जगत के कण-कण में ईश्वर है (God exists in each and every atom) : गुरु नानक ने संसार का माया स परिपूर्ण नहीं बल्कि इसके कण-कण में ईश्वरीय शक्ति को देखा है।
(v) जीव तथा आत्मा में अटूट संबंध है (There is close relation in Life and Soul) : नानक के विचारानुसार जीव परमात्मा से उत्पन्न होता है। जीवन में परमात्मा निवास करता है तथा आत्मा अमर है।
(vi) मध्यम मार्ग तथा समन्वयवादी दृष्टिकोण (Supporter of Mid way and coordinative outlook): गुरु नानक ने अपने भक्तों को मध्यम मार्ग अपनाने पर बल दिया, जिस पर चलकर गृहस्थ-आश्रम का पालन भी हो सकता है और आध्यात्मिक जीवन भी अपनाया जा सकता है। कबीर की भाँति नानक ने भी साम्प्रदायिकता का विरोध किया तथा हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल दिया। वस्तुतः उनका लक्ष्य एक नए धर्म की स्थापना करना नहीं था। उनका पवित्रतावादी दृष्टिकोण शांति सद्भावना भाईचारा स्थापित करने के लिए ही हिन्दू मुस्लिम के मध्य मतभेद दूर करना था। उन्होंने इसका अनुभव किया कि समाज के घाव को भरने के लिए धार्मिक मतभेद दूर करना परमावश्यक है। उनके विचारानुसार हिन्दू एवं इस्लाम ईश्वर के पास पहुँचने के चाहे दो अलग-अलग मार्ग हैं लेकिन इन दोनों का लक्ष्य एक है-ईश्वर प्राप्ति। उनके अनुसार हिन्दू-मुस्लिम संत परवर दीगार के दीवाने हैं। वे दोनों सम्प्रदायों में समन्वय तथा एकता स्थापित कर देश में सद्भावना तथा शांति की स्थापना करना चाहते थे।
III. सामाजिक शिक्षाएँ एवं विचार (Social Teachings and Thoughts):
(i) उन्होंने जातिवाद का विरोध किया। वे सच्चे मानववादी थे। उन्होंने मानव समाज की सेवा को ही सच्ची ईश्वर-आराधना माना। वे मानव को समान मानते थे तथा मानव मात्र से प्रेम की शिक्षा देते थे। उनका प्रेम मौखिक न होकर सेवा भावना से ओत-प्रोत था।
(ii) उनका स्त्रियों के प्रति सुधारवादी दृष्टिकोण था। उन्होंने स्त्रियों को महान माना है। गुरु नानक ने अपने धर्म में स्त्रियों के खोए हुए अधिकारों को वापस दिलाया। उन्होंने स्त्रियों तथा पुरुषों की समानता पर बल दिया।
(iii) आर्थिक शिक्षाएँ एवं विचार (Economic Teachings and Thoughts):
(a) गुरु नानकदेव ने गरीब को अमीर से अधिक प्यार किया तथा ईमानदारी की कमाई को सच्ची कमाई माना।
(b) उनके अनुसार धनी मनुष्य अहंकार के वशीभूत होकर राक्षसी कर्म करता है। उन्होंने कहा कि जो लोग सम्पत्ति को अपना समझते हैं वे सचमुच मूर्ख हैं। नानक ने धन संग्रह के र स्थान पर उसके उचित वितरण पर जोर दिया। IV. निष्कर्ष (Conclusion) : संक्षेप में कहा जा सकता है। कि गुरु नानक की शिक्षाएँ एवं विचार महान एवं प्रभावशाली थे।
1.नानक के प्रभाव से सम्पूर्ण पंजाब की जनता के साथ-साथ सम्पूर्ण देश को भी नई दिशा मिली तथा समानता, बंधुता, ईमानदारी तथा सृजनात्मक शारीरिक श्रम के द्वारा जीविकोपार्जन पर आधारित नई समाज-व्यवस्था स्थापित हुई।
2. गुरु नानक पारम्परिक समाज और धर्म की भर्त्सना या विरोध का मार्ग ही नहीं अपनाया वरन् आध्यात्मिक साधना वाली भक्ति और सूफी परंपरा की मध्यकालीन भारतीय जीवन तथा सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के संदर्भ में व्याख्या भी की। उनका यह प्रयास अत्यधिक महत्त्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है।
3.गुरु नानक से हमें विचारपरक जनतांत्रिक सिद्धांतों के महत्त्वपूर्ण सूत्र मिलते हैं जो समाजवादी समाज का पूर्वाभास देते हैं। यहाँ संप्रदायवाद और जातिवाद की निन्दा के संकेतों के साथ उनकी सामाजिक दायित्व की भावना का उदार रूप मिलता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पंजाब में भक्ति-आंदोलन के अग्रदूत गुरु नानक राजनीतिक और सामजिक समस्याओं के प्रति अत्यधिक जागरूक थे और उन्होंने उनके लिए उपचारात्मक उपाय भी सुझाए हैं। उनकी सिद्धांत दृष्टि का केन्द्र भी लोक-मंगल की भावना ही रही है।

प्रश्न 9. गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं की व्याख्या कीजिए। क्या वे कोई नया धर्म स्थापित करना चाहते थे।

उत्तर : श्री गुरु नानक देव जी (1469-1539) का जन्म पंजाब के ननकाना गाँव में एक व्यापारी परिवार में हुआ। यह गाँव । अब पाकिस्तान में है। उन्होंने फारसी पढ़ी और लेखाकार के कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनका विवाह छोटी आयु में ही हो गया था परंतु वह अपना अधिकतर समय सूफी तथा भक्ति संतों के बीच बिताते थे। उन्होंने दूर-दूर तक की यात्राएँ भी कीं। उनकी मुख्य शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं :
(i) उन्होंने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया।
(ii) उन्होंने धर्म के सभी बाहरी आडंबरों का खंडन किया जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति-पूजा तथा कठोर तप।
(iii) उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के धर्म -ग्रंथों को नकार दिया।
(iv) उनके लिए परमपुर्ण रब (परमात्मा) का कोई लिंग या आकार नहीं था।
(v) उन्होंने रब की उपासना के लिए सरल उपाय बताया और वह था उनका निरंतर स्मरण व नाम का जाप।
(vi) उन्होंने जाति के आधार पर ऊँच-नीच का खंडन किया।
(vii)उन्होंने मानव-सेवा तथा आपसी प्रेम एवं भाईचारे को सबसे बड़ा धर्म बताया।
नया धर्म : गुरु नानक देव जी ने अपने शिष्यों को एक रूप में गठित किया और उनके लिए सामुदायिक उपासना (संगत) के नियम बनाए। उन्होंने अपने अनुयायी श्री अंगद देव जी को अपने बाद गुरु-पद सौंपा।।
वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है कि श्री गुरु नानक देव जी किसी नए धर्म की स्थापना नहीं करना चाहते थे परंतु उनके देहांत के बाद उनके अनुयायियों ने अपने आचार-व्यवहार को सुगठित करके अपने आप को हिंदू और मुसलमान दोनों से अलग चिह्नित किया। पाँचवें गुरु श्री अर्जन देव जी ने श्री गुरु नानक देव एवं उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, गुरु रविदास जी और भक्त कबीर की बाणी को श्री आदि ग्रंथ साहिब में संकलित किया। इसे “गुरबाणी” कहा जाता है। सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु श्री गोबिंद सिंह जी ने नवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी की रचनाओं को भी आदि ग्रंथ साहिब में शामिल किया। अब इस ग्रंथ को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी कहा गया। श्री गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की नींव भी डाली और उनके पाँच प्रतीकों का वर्णन किया-केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और कड़ा। इस प्रकार श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के नेतृत्व में सिख समुदाय एक सामाजिक, धार्मिक और सैन्य बल के रूप में संगठित होकर सामने आया।

प्रश्न 10, भारत में सूफी मत के विकास तथा खानकाह सिलसिलों के गठन की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर : इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में धार्मिक और राजनीतिक संस्था के रूप में खिलाफत की बढ़ती शक्ति के विरुद्ध आध्यात्मिक लोगों का झुकाव रहस्यवाद तथा वैराग्य की ओर बहने लगा। इन लोगों को सूफ़ी कहा गया।
(i) सूफ़ियों ने रूढ़िवादी परिभाषाओं तथा धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगंबर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की।
(ii) उन्होंने मुक्ति पाने के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया।
(iii) उन्होंने पैगंबर मोहम्मद को इंसान-ए-कामिल बताते हुए उनका अनुसरण करने की शिक्षा दी।
(iv) सूफ़ियों ने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की।
खानकाह ।। वीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद ने एक पूर्ण विकसित आंदोलन का रूप धारण कर लिया जिसका सूफ़ी और कुरान से जुड़ा अपना साहित्य था। संस्थागत दृष्टि से सूफी स्वयं को एक संगठित समुदाय खानकाह (फारसी) के इर्द-गिर्द स्थापित करते थे। खानकाह का नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था। वे अनुयायियों (मुरीदों) की भर्ती करते थे और अपने वारिस (खलीफ़ा) की नियुक्ति करते थे। वे आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करने के साथ-साथ खानकाह में रहने वालों के आपसी संबंध और शेख तथा जनसामान्य के बीच के रिश्तों की सीमा भी निश्चित करते थे।
सिलसिले-12वीं शताब्दी के लगभग इस्लामी जगत् में सूफ़ी सिलसिलों का गठन होने लगा। सिलसिले का शाब्दिक अर्थ है-जंजीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते की प्रतीक है। इस रिश्ते की पहली अटूट कड़ी पैगंबर मोहम्मद से जुड़ी है। इस कड़ी द्वारा आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक पहुँचता या दीक्षा के लिए विशेष अनुष्ठान होते थे। इसमें दीक्षा पाने वाले को निष्ठा का वचन देना होता था और सिर मुड़कर थेगड़ी लगे वस्त्र धारण करने पड़ते थे। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह (फारसी में इसका अर्थ दरबार है) उसके मुरीदों के लिए श्रद्धा का स्थल बन जाती थी। इस प्रकार पीर की दरगाह पर जियारत के लिए विशेष रूप से उनकी बरसी के अवसर पर जाने की परिपाटी चल पड़ी। इस परिपाटी को उस (विवाह अर्थात् पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन) कहा जाता था। इसका कारण सूफ़ियों का यह मानना था कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर में समा जाते हैं। इस तरह वे पहले की अपेक्षा ईश्वर के अधिक निकट हो जाते हैं। लोग अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए उनका आशीर्वाद लेने जाते थे। इस प्रकार शेख का वली के रूप में आदर करने की परंपरा आरंभ हुई।

प्रश्न 11. भारत इस्लामी जगत् का अंग किस प्रकार बना ? इस्लाम को मानने वाले नए शासकों ने अपनी प्रजा के साथ किस प्रकार तालमेल बिठाया ?

उत्तर : प्रथम सहस्त्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी समुद्री मार्ग से पश्चिमी भारत के बंदरगाहों पर आते-जाते रहते थे। इसी समय मध्य एशिया से आकर लोग देश के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में बस गए। 7वीं शताब्दी में इस्लाम के उद्भव के बाद ये क्षेत्र उस संसार का अंग बन गए जिसे प्रायः इस्लामी विश्व कहा जाता है।
इस्लामी सत्ता की स्थापना : 711 ईसवी में मुहम्मद बिन कासिम नामक एक अरब सेनापति ने सिंध पर विजय प्राप्त की और उसे खलीफा के क्षेत्र में शामिल कर लिया। बाद में (लगभग 13वीं शताब्दी) तुर्क और अफगानों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी। समय बीतने पर दक्कन और अन्य भागों में भी सल्तनत की सीमा का विस्तार हुआ। बहुत से क्षेत्रों में शासकों का धर्म इस्लाम था। यह स्थिति 16वीं शताब्दी में मुगल सत्ता की स्थापना तक बनी रही। 18वीं शताब्दी में कुछ क्षेत्रीय राज्य उभरे। इनमें से भी कई राज्यों के शासक इस्लाम धर्म को मानते थे।
प्रजा के साथ तालमेल : सैद्धांतिक रूप से मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना होता था। उलमा से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे शासक का शरिया के अनुसार चलना सुनिश्चित करवाएँ परंतु उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल था क्योंकि जनसंख्या का एक बड़ा भाग इस्लाम धर्म को नहीं मानता था।
इसी संदर्भ में जिम्मी (व्युत्पत्ति अरबी शब्द जिम्मा से) अर्थात् संरक्षित श्रेणी का उदय हुआ। जिम्मी वे लोग थे जो उद्घटित धर्मग्रंथ को मानते थे जैसे इस्लामी शासकों के क्षेत्र में रहने वाल यहूदी और ईसाई। ये लोग जजिया नामक कर देते थे। बदले में मुसलमान शासक इन्हें संरक्षण प्रदान करते थे। भारत में हिंदू भी जिम्मी लोगों में शामिल थे। इसी व्यवस्था के कारण मुगल शासक स्वयं को न केवल मुसलमानों का अपितु सभी समुदायों का बादशाह मानते थे।
वास्तव में शासक शासितों के प्रति काफी लचीली नीति अपनाते थे। उदाहरण के लिए अनेक शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई तथा यहूदी धर्म संस्थाओं को भूमि अनुदान तथा कर में छूट दी। उन्होंने गैर-मुस्लिम धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धाभाव भी व्यक्त किया। ऐसे अनुदान अकबर, औरंगजेब आदि अनेक मुगल बादशाहों ने दिए।

प्रश्न 12, 13वीं तथा 14वीं शताब्दी में उत्तरी भारत में धार्मिक स्थिति कैसी थी ? वहाँ ब्राह्मणों के प्रभुत्व में किस प्रकार कमी आई ?
उत्तर : उत्तरी भारत में शासकों द्वारा निर्मित मंदिरों में विष्णु और शिव जैसे देवताओं की उपासना की जाती थी परंतु इतिहासकारों को 14वीं शताब्दी तक अलवार और नयनार संतों की रचनाओं जैसा कोई ग्रंथ उत्तरी भारत से प्राप्त नहीं हुआ। इस संबंध में कुछ इतिहासकारों का मत है कि इस काल में उत्तरी भारत में अनेक राजपूत राज्यों का उद्भव हुआ। सभी राजपूत राज्यों में ब्राह्मणों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था और वे गैर-धार्मिक तथा धार्मिक दोनों ही कार्य करते थे। उनकी इस प्रभुसत्ता को शायद किसी ने साधा चुनौती नहीं दी।
ब्राह्मणीय साँचे से बाहर : इसी समय रूढ़िवादी ब्राह्मणीय सांचे के बाहर के धार्मिक नेताओं के प्रभाव में विस्तार हो रहा था। इन नेताओं में नाथ, जोगी और सिद्ध शामिल थे। उनमें से बहुत-स लोग शिल्पी समुदाय के थे जिनमें मुख्यतः जुलाहे शामिल थे। व्यवस्थित शिल्प उत्पादन के विकास के साथ-साथ उनका महत्त्व भी बढ़ रहा था। नगरीय केंद्रों के विस्तार तथा मध्य एवं पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार के प्रसार से शिल्पी वस्तुओं की माँग भी बढ़ी।
ब्राह्मणों के प्रभुत्व में कमी : अनेक नए धार्मिक नेताओं ने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और अपने विचार आम लोगों की भाषा में सामने रखे। समय के साथ-साथ इन भाषाओं ने वह रूप धारण कर लिया जिस रूप में वे आज प्रयोग में लाई जाती हैं। अपनी लोकप्रियता के बावजूद नए धार्मिक नेता विशिष्ट शासक वर्ग का समर्थन प्राप्त न कर सके।

प्रश्न 13, शेख निजामुद्दीन औलिया के खानकाह के आधार पर उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिले की गतिविधियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर : 12वीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली थे इसका कारण यह था कि उन्होंने न केवल अपने आपको स्थानीय परिवेश २ अच्छी तरह ढाला, बल्कि भारतीय भक्ति परंपरा की कई बातों की भी अपनाया।
शेख निजामुद्दीन औलिया का खानकाह : खानकाह सामाजिक जीवन का केंद्र बिंदु था। इस बात को हम शेख निजामुद्दीन औलिया (14वीं शताब्दी) के खानकाह से समझ सकें हैं। यह खानकाह उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर यमुना नदी के किनारे गियासपुर में स्थित था। यहाँ कई छोटे-छोटे कमरे और एक बड़ा हॉल (जमातखाना) था। इनमें सहवासी तथा अतिथि रहते थे और उपासना करते थे। सहवासियों में शेख का अपना परिवार, सेवक और अनुयायी शामिल थे। शेख एक छोटे कमरे में छत पर रहते थे जहाँ वह अतिथियों से सुबह-शाम मिल करते थे। खानकाह का आँगन एक गलियारे से घिरा हुआ था और खानकाह को चारों ओर से एक दीवार ने घेरा हुआ था। एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ोसी क्षेत्र के लोगों ने खानकाह में शरण ली थी।
यहाँ एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी। सुबह से लेकर देर रात तक सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर आदि सभी वर्गों के लोग यहाँ अनुयायी बनने. करने, ताबीज लेने अथवा विभिन्न मामलों में शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे। कुछ अन्य मिलने वालों में अमीर हसन सिजरजी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी आदि लोग शामिल थे। इन सभी लोगों ने शेख के बारे में लिखा। इबादत
शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना. दीक्षितों के सिर का मुंडन तथा यौगिक व्यायाम आदि व्यवहार इस बात के प्रतीक थे कि स्थानीय परंपराओं को अपनाने का प्रयत्न शित किया गया।
शेख निजामुद्दीन औलिया ने कई आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों का चुनाव किया और उन्हें उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में खानकाह स्थापित करने के लिए भेजा। इस प्रकार चिश्तियों के उपदेश, व्यवहार और संस्थाएँ तथा शेख का यश चारों ओर फैल गया। उनकी तथा उनके आध्यात्मिक पूर्वजों की दरगाह पर अनेक तीर्थयात्री आने लगे।

प्रश्न 14. लिंगायत कौन थे? जाति प्रथा के विशेष संबंध में सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र उनके योगदान की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 12वीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नए आंदोलन का उद्भव हुआ जिसका नेतृत्व बांसवन्ना (1106-68) नामक एक ब्राह्मण ने किया। बासवन्ना पहले जैन मत को मानते थे और चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे। इनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) अथवा लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए। आज भी इस क्षेत्र का लिंगायत समुदाय एक महत्त्वपूर्ण समुदाय है। वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री-पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।
सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में योगदान :
(i) लिंगायत शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं। इस समुदाय के पुरुष बाएँ कंधे पर चाँदी के एक पिटारे में एक लघु लिंग धारण करते हैं।
(ii) लिंगायतों का विश्वास है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाएंगे और इस संसार में पुनः नहीं लौटेंगे।
(iii) वे धर्मशास्त्र में बताए गए श्राद्ध संस्कार का पालन नहीं करते और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते हैं।
(iv) लिंगायतों ने जाति और कुछ समुदायों के “दूषित” होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया।
(v) उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी प्रश्नवाचक चिह्न लगाया। इन सब कारणों से जिन समुदायों को ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्था में गौण स्थान मिला था, वे लिंगायतों के अनुयायी बन गए।
(vi) लिंगायतों ने धर्मशास्त्रों में अस्वीकृत वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की।

प्रश्न 15. राज्य एवं भक्ति परम्परा तथा राज्य एवं सूफी परम्परा के बीच के संबंधों की उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर : भक्ति परंपरा तथा राज्य के बीच संबंध :
(1) प्रारंभिक भक्ति आंदोलन अलवारों और नयनारों शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ। अलवार विष्णु के तथा नयनार शिव के भक्त थे। वे एक स्थान पर भ्रमण करते हुए तमिल भाषा में अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाते थे।
(2) अपनी यात्राओं के दौरान अलवारों और नयनारों ने कुछ पावन स्थलों को अपने इष्ट का निवास-स्थल घोषित किया। इन्हीं स्थलों पर बाद में विशाल मंदिर बनाए गए और वे तीर्थस्थल बन गए।
(3) तमिल भक्ति रचनाओं की एक मुख्य विषय-वस्तु बौद्ध और जैन धर्म के प्रति उनका विरोध है। विरोध का यह स्वर नयनार संतों की रचनाओं में विशेष रूप से सुनाई देता है । इतिहासकारों ने इस विरोध का कारण यह बताया है कि इन परस्पर विरोधी धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान प्राप्त करने की होड़ लगी हुई थी।
(4) शक्तिशाली चोल शासकों ने ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा को समर्थन दिया। उन्होंने विष्णु तथा शिव के मंदिरों के निर्माण के लिए भूमि – अनुदान दिए।
(5) चिदंबरम, तंजावुर और गंगैकोडचोलपुरम के विशाल शिव मंदिर चोल शासकों की सहायता से ही बने थे। इस काल में शिव की कांस्य-मूर्तियों का निर्माण भी हुआ।
(6) नयनार और अलवार संत वेल्लाल कृषकों द्वारा सम्मानित होते थे। इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा किया। उन्होंने अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए भव्य मंदिरों का निर्माण कराया। इन मंदिरों में पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ सुसज्जित थीं।
(7) 945 ई० के एक अभिलेख से पता चलता है कि चोल सम्राट् परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार संबंदर तथा सुंदरार की धातु की मूर्तियाँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाई थीं।
(8) उत्तर भारत के मंदिरों में विशेष रूप से विष्णु और शिव की पूजा होती थी। ये मंदिर मुख्य रूप से शासकों की सहायता से ही बने थे।
सूफी परंपरा और राज्य के बीच संबंध
(1) चिश्ती संप्रदाय में सांसारिक सत्ता से दूर रहने पर बल दिया जाता था परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि राजनीतिक सत्ता से अलगाव का भाव रखा जाए।
(2) यदि कोई सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता था तो सूफी संत उसे स्वीकार कर लेते थे। सुलतानों ने खानकाहों को कर-मुक्त (इनाम) भूमि अनुदान में दी थी और दान संबंधी ‘न्यास स्थापित किए थे।
(3) चिश्ती धन और सामान के रूप में दान स्वीकार करते थे परंतु इन्हें संभाल कर नहीं रखते थे; बल्कि खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था, समा की महफिलों आदि पर पूरा खर्च कर देते थे। इससे शेख की नैतिक श्रेष्ठता की पुष्टि होती थी और आम लोगों का उनकी ओर झुकाव बढ़ता था।
(4) सूफी संतों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और लोगों द्वारा उनकी चमत्कारी शक्ति में विश्वास उनकी लोकप्रियता के मुख्य कारण थे। इसलिए शासक भी उनका समर्थन प्राप्त करना चाहते थे।
(5) सुलतान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम धर्म को मानने वाली नहीं है। इसलिए जब तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उन्होंने उलमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की माँग को ठुकरा दिया ताकि उन्हें किसी विरोध का सामना न करना पड़े। ऐसे समय उन्होंने सूफी संतों का सहारा लिया जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता को अल्लाह की देन मानते थे। वे उलमा द्वारा शरिया की व्याख्या पर निर्भर नहीं थे।
(6) यह भी माना जाता था कि औलिया मध्यस्थ के रूप में ईश्वर से लोगों की भौतिक और आध्यात्मिक दशा में सुधार लाने का कार्य करते हैं। संभवत: इसी कारण शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और खानकाहों के निकट बनाना चाहते थे।
(7) सुलतानों और सूफियों के बीच तनाव के उदाहरण भी मिलते हैं। अपनी सत्ता का दावा करने के लिए दोनों ही कुछ व्यवहारों पर बल देते थे जैसे कि झुक कर प्रणाम करना और कदम चूमना।

प्रश्न 16. चिश्ती खानकाह में उनकी जीवन शैली पर प्रकाश डालिए तथा भाषा एवं संपर्क के क्षेत्र में उनके अनुदान की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : खानकाह दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर यमुना नदी के किनारे गियासपुर में था। यहाँ बहुत से छोटे बड़े कमरे और एक बड़ा हाल जिसे जमातखाना कहते हैं था। यहाँ अतिथि रहते थे और उपासना करते थे। शेख कमरे की छत पर रहते थे, वह वहाँ पर मेहमानों से मिला करते थे आंगन गलियारे से घिरा होता था और खानकाह को दीवार घेरे रहती थी। सुबह से रात गए तक हर तबके के लोग गायक, कवि, धनी, निर्धन, सिपाही, इबादत करने, ताबीज़ लेने, व्यापार व विभिन्न मसलों पर शेख से बात करने वाले लोग आते थे। लोग चिश्ती संतों की दरगाह पर अपनी आस्था प्रकट करने आते थे। शेख निजामुद्दीन ने कई आध्यात्मिक वारिसों का चुनाव किया और उपमहाद्वीपों के विभिन्न भागों में खानकाह स्थापित करने के लिए नियुक्त किया। इस तरह चिश्तियों के उपदेश, व्यवहार, संस्थाएँ और शेख का यश चारों ओर फैल गया।
चिश्तियों ने न केवल स्थानीय भाषा को अपनाया बल्कि दिल्ली में चिश्ती संप्रदाय के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे। चिश्ती संतों द्वारा उर्दू में लिखी गई कविताएँ औरतों द्वारा घर का काम करते समय जैसे; चक्की पीसते, चरखा कातते हुए गाई जाती थीं।

प्रश्न 17. भारत में इस्लाम लोक प्रचलन में किस प्रकार आया ?
उत्तर : इस्लाम के आगमन के बाद होने वाले परिवर्तन केवल शासक वर्ग तक ही सीमित नहीं थे। ये पूरे उपमहाद्वीप में दूर-दूर तक विभिन्न सामाजिक समुदायों-किसानों, शिल्पियों, योद्धाओं तथा व्यापारियों आदि के बीच फैल गए। इनमें से इस्लाम धर्म को अपनाने वालों ने इस धर्म के निम्न पाँच मूल सिद्धांतों को स्वीकार किया।
(i) अल्लाह एकमात्र ईश्वर है। पैगंबर मोहम्मद उनके दूत (शाहद) हैं। (ii) दिन में पाँच बार नमाज पढ़ी जानी चाहिए।
(iii) खैरात (जकात) बाँटनी चाहिए। (iv) रमजान के महीने में रोजे रखने चाहिए। (vi) हज के लिए मक्का जाना चाहिए।
परंतु इन सार्वभौमिक तत्वों में प्रायः सांप्रदायिक (शिया सुन्नी) कारणों से तथा स्थानीय प्रथाओं के प्रभाव से धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों के व्यवहार में भिन्नता देखने में आती थी उदाहरण के लिए खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय के लोगों में कुरान के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए देशी साहित्यिक विधा का सहारा लिया। दैनिक प्रार्थना के दौरान जीनन नाम से राग पर आधारित पंजाबी, मुलतानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में भक्ति-गीत गाए जाते थे।
इसके अतिरिक्त अरब मालाबार तट पर (केरल) बसे मुस्लिम व्यापारियों ने न केवल स्थानीय मलयालम भाषा को अपनाया, बल्कि मातृकुलीयता और मातृगृहता आदि स्थानीय प्रथाओं को भी अपनाया। स्थानीय परंपराओं के साथ एक सार्वभौमिक धर्म का जटिल मिश्रण मस्जिदों की स्थापत्य कला में दिखाई देता है।
मस्जिदों के कुछ स्थापत्य संबंधी तत्व सभी जगह एकसमान थे जैसे कि इमारत का मक्का की ओर संकेत करना जो मेहराब (प्रार्थना का आला) तथा मिनबार (व्यासपीठ) की स्थापना ें लक्षित होता था परंतु बहुत से तत्व ऐसे थे जिनमें भिन्नता दिखाईं। देती है जैसे छत और निर्माण की साम्रगी।

प्रश्न 18. चिश्तियों के राज्य के साथ संबंधों की समीक्षा कीजिए। औलिया के महत्त्व पर भी प्रकाश डालिए।
उत्तर : चिश्ती संप्रदाय की एक और विशेषता संयम और सादगी का जीवन जीना था। इसमें सत्ता से दूर रहने पर बल दिया जाता था। फिर भी विशिष्ट वर्ग बिना माँगे अनुदान देता था तो संत उसे स्वीकार कर लेते थे। सुल्तानों ने खानकाहों को कर मुक्त भूमि दान में दी और दान संबंधी न्यास स्थापित किए।
शासक सूफी संतों से न केवल संपर्क रखना चाहते थे बल्कि उनके समर्थन के भी कायल थे। अब अधिकांश जनता इस्लाम धर्म को मानने वाली नहीं थी ऐसे वक्त में सुल्तानों ने सूफी संती का सहारा लिया।
ऐसे माना जाता है कि औलिया मध्यस्थ बनकर ईश्वर से लोगों की आध्यात्मिक दशा में सुधार लाने का काम करते थे। शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान-उल -मशेख कहकर संबोधित करते थे।

प्रश्न 19. कबीर की कविताओं के महत्त्व तथा उनके द्वारा परम सत्य को वर्णित करने के लिए जिन परिपाटियों का सहारा लिया गया है, उनकी व्याख्या कीजिए।

अथवा

कबीर जी की शिक्षाओं की व्याख्या कीजिए। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से ‘परम सत्य’ का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर : कबीर संत कवियों में विशेष स्थान रखते हैं। उनके मुख्य उपदेश निम्नलिखित हैं
(1) उन्होंने बहुदेववाद तथा मूर्ति-पूजा का खंडन किया।
(2) उन्होंने जिक्र और इश्क के सूफी सिद्धांतों के प्रयोग द्वारा ‘नाम सिमरन’ पर बल दियां
(3) कबीर के अनुसार परम सत्य अथवा परमात्मा एक है, भले ही विभिन्न संप्रदायों के लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।
(4) उन्होंने परमात्मा को निराकार बताया।
(5) उनके अनुसार भक्ति के माध्यम से मोक्ष अर्थात् मुक्ति प्राप्त हो सकती है।
(6) उन्होंने हिंदुओं तथा मुसलमान दोनों के धार्मिक आंडबरों का विरोध किया।
(7) वह जातीय भेदभाव के विरुद्ध थे।
परम सत्य के विभिन्न नाम : कबीर वाणी की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन्होंने परम सत्य की वर्णन करने के लिए अनेक परिपाटियों का सहारा लिया। इस्लामी दर्शन की तरह वे इस सत्य को अल्लाह, खुदा, हजरत और पीर कहते हैं। वेदांत दर्शन से प्रभावित होकर वे सत्य को अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन और आत्मन कह कर भी संबोधित करते हैं। कबीर ने कुछ अन्य शब्दपदों का प्रयोग भी किया है, जैसे-‘शब्द और शून्य’। ये अभिव्यक्तियाँ योगी परंपरा से ली गई हैं।

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