Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 7 Important Question Answer 8 Marks एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 1. विजयनगर राज्य का ‘चरमोत्कर्ष और पतन नामक विषय पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर : विजयनगर साम्राज्य का चरमोत्कर्ष : राजनीति में सत्ता के दावेदारों में शासकीय वंश के सदस्य तथा सैनिक कमाडर शामिल थे। पहले राजवंश. जो संगम वंश कहलाता था, ने 1485 तक नियंत्रण रखा। उन्हें सुलुवों ने उखाड़ फेंका. जो सैनिक कमांडर थे और वे 1503 तक सत्ता में रहे। इसके बाद तुलुवों ने उनका स्थान लिया। कृष्णदेव राय तुलुव वंश से ही संबद्ध था।
कृष्ण देव राय के काल में विजयनगर : कृष्णदेव राय के शासन की चारित्रिक विशेषता विस्तार और दृढ़ीकरण था। इसी काल में तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच का क्षेत्र (रायचूर दोआब) हासिल किया गया ( 1512), उडीसा के शासकों का दमन किया गया (1514) तथा बीजापुर के सुल्तान को बुरी तरह पराजित किया गया था (1520)। हालांकि राज्य हमेशा सामरिक रूप से तैयार रहता था, लेकिन फिर भी यह अतुलनीय शांति और समृद्धि की स्थितियों में फला-फूला। कुछ बेहतरीन मंदिरों के निर्माण तथा कई महत्त्वपूर्ण दक्षिण भारतीय मंदिरों में भव्य गोपुरमों को जोड़ने का श्रेय कृष्णदेव को ही जाता है। उसने अपनी माँ के नाम पर विजयनगर के समीप ही नगलपुरम् नामक उपनगर की स्थापना भी की थी। विजयनगर के संदर्भ में सबसे विस्तृत विवरण कृष्णदेव राय के या उसके तुरंत बाद के कालों से प्राप्त होते हैं।
विजयनगर कृष्णदेव राय की मृत्यु के उपरांत : कृष्णदेव की मृत्यु के पश्चात् 1529 में राजकीय ढाँचे में तनाव उत्पन्न होने लगा। उसके उत्तराधिकारियों को विद्रोही नायकों या सेनापतियों से चुनौती का सामना करना पड़ा।।542 तक केंद्र पर नियंत्रण एक अन्य राजकीय वंश, अराविदु के हाथों में चला गया, जो शताब्दी के अंत तक सत्ता पर काबिज रहे। पहले की ही तरह इस काल में भी विजयनगर शासकों और साथ ही दक्कन सल्तनतों शासकों की सामरिक महत्त्वाकांक्षाओं के चलते समीकरण रहे। अंततः यह स्थिति विजयनगर के विरुद्ध दक्कन सल्तनतों के क्षेत्र बीच मैत्री-समझौते के रूप में परिणत हुई। सत्रहमी]
विजयनगर का पतन : 1565 में विजयनगर की सेकको प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में राक्षसी-तांगड़ी (जिसे तालिका के नाम से भी जाना जाता है) के युद्ध में उतरी जहाँ उसे बीजापुर अहमदनगर तथा गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं द्वारा करा शिकस्त मिली। विजयी सेनाओं ने विजयनगर शहर पर धान बोलकर उसे लूटा। कुछ ही वर्षों के भीतर यह शहर पूरी तरह से उजड़ गया। अब साम्राज्य का केंद्र पूर्व की ओर स्थानांतरित हो गया जहाँ अराविदु राजवंश ने पेनुकोण्डा से और बाद में चन्द्रगिरी (तिरुपति के समीप) से शासन किया।

प्रश्न 2. विजयनगर की भौगोलिक स्थिति के विषय में चौंकाने वाले तथ्य, इसकी जल संपदा तथा किलेबंदियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : विजयनगर शहर विजयनगर साम्राज्य की राजधानी थी। अधिकांश राजधानियों की तरह यह भी एक विशिष्ट भौतिक लक्षणों तथा स्थापत्य शैली से सुसज्जित शहर था।
1.जल-संपदा : विजयनगर की भौगोलिक स्थिति के बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यहाँ तुंगभद्रा नदी द्वारा निर्मित एक प्राकृतिक द्रोणी (basin) है। यह नदी उत्तर- पूर्व दिशा में बहती है । आस-पास के भू-दृश्य पर ग्रेनाइट की पहाड़ियाँ फैली हैं जिन्होंने शहर को चारों ओर से घेरा हुआ है। इन पहाड़ियों से कई जल ध राएँ आकर नदी में मिलती हैं।लगभग सभी धाराओं के साथ-साथ बाँध बनाकर विभिन्न आकारों के हौज बनाए गए थे क्योंकि शहर प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक था। इसलिए पानी को इकट्ठा करने और इसे शहर तक ले जाने के लिए व्यापक प्रबंध करना आवश्यक था। यहाँ के सबसे महत्त्वपूर्ण हौजों में एक का निर्माण 15 शताब्दी के आरंभिक वर्षों में हुआ था जिसे आज ‘कमलपुरम्ज लाशय’ कहा जाता है। इस हौज के पानी से न केवल आस-पास के खेतों को सींचा जाता था बल्कि इसे एक नहर द्वारा “राजकीय केंद्र” तक भी ले जाया जाता था। हिरिया नहर सबसे महत्त्वपूर्ण जल संबंधी संरचनाओं में से एक थी। इस नहर में तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाया जाता था। इसका प्रयोग “धार्मिक केंद्र” से “शहरी केंद्र” को अलग करने वाली घाटी की सिंचाई करने में किया जाता था संभवत: इसका निर्माण संगम वंश के राजाओं ने करवाया था ।
2.किलेबंदी तथा सड़कें : विजयनगर शहर की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यहाँ की एक विशाल किलेबंदी थी जिन दीवारों से घेरा गया था। 15वीं शताब्दी में फारस से कालीक (कोजीकोड) आए दूत अब्दुर्रज्जाक को यहाँ की किलेबंदी बहुत प्रभावित किया था। उसने दुर्गों की सात पंक्तियों का उल्ले किया है। इनके द्वारा न केवल शहर को बल्कि आसपास के कु क्षेत्र तथा जंगलों को भी घेरा गया था।
(1) सबसे बाहरी दीवार शहर के चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती थी। इसमें गारे या जोड़ने के लिए किसी भी अन्य वस्तु का प्रयोग नहीं किया गया था। पत्थर के टुकड़े फन्नी जैसे थे, जिसके कारण वे अपने स्थान पर टिके रहते थे। दीवारों के अंदर का भाग मिट्टी तथा मलबे के मिश्रण से बना हुआ था। वर्गाकार तथा आयताकार बुर्ज बाहर की ओर निकले हुए थे। शहर की किलेबंदी की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इससे खेतों को भी घेरा गया था। अब्दुर्रज्जाक लिखता है, “पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बगीचे तथा आवास है।” इसी प्रकार पेस कहता है, “इस पहली परिधि से शहर में प्रवेश करने तक की दूरी बहुत अधिक है, जिसमें खेत हैं जहाँ वे धान उगाते हैं, कई उद्यान हैं और बहुत-सा जल है जो दो झीलों से लाया जाता है।” इन कथनों की आज के पुरातत्वविदों द्वारा भी पुष्टि की गई है। उन्होंने धार्मिक केंद्र तथा नगरीय केंद्र के बीच एक कृषि क्षेत्र के साक्ष्य खोज निकाले हैं। इस क्षेत्र को एक व्यापाक नहर प्रणाली द्वारा सींचा जाता था, जिसमें तुंगभद्रा से जल लाया जाता था। मध्यकाल में कृषि क्षेत्रों की किलेबंदी करने का मुख्य उद्देश् प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था। ये घेराबंदियां कई महीनों और यहाँ तक कि वर्षों तक चल सकती थीं। ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए शासक प्रायः किलेबंद क्षेत्रों के भीतर ही विशाल अन्नागारों का निर्माण करवाते थे वियजनगर के शासकों ने अपने कृषि भू-भाग की रक्षा के लिए एक अत्यधिक महँगी तथा व्यापक नीति को अपनाया।
(2) दूसरी किलेबंदी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग के चारों ओर बनी हुई थी और तीसरी से शासकीय केंद्र को घेरा गया था जिसमें महत्त्वपूर्ण इमारतों के प्रत्येक समूह की घेराबंदी उनकी अपनी ऊँची दीवारों से की गई थी।
दुर्ग में प्रवेश के लिए पूरी तरह से सुरक्षित प्रवेश द्वार बने हुए थे जो शहर को मुख्य सड़कों से जोड़ते थे । प्रवेश द्वार स्थापत्य के विशिष्ट नमूने थे। किलेबंद बस्ती में जाने वाले प्रवेश द्वार पर बनी मेहराब और द्वार के ऊपर बनी गुंबद संभवतः तुर्की सुलतानों की स्थापत्य कला के नमूने थे। कला -इतिहासकार इस शैली को इंडो-इस्लामिक (हिंद-इस्लामी) शैली कहते हैं, क्योंकि इसका विकास विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य कला के साथ संपर्क से हुआ था।
सड़कें प्रायः पहाड़ी भू-भाग से हटकर घाटियों से होकर ही इधर-उधर घूमती थीं। सबसे महत्त्वपूर्ण सड़कों में से कुछ मंदिर के प्रवेश द्वारा से आगे की ओर बढ़ी हुई थीं। इनके दोनों ओर बाजार थे।

प्रश्न 3 : विजयनगर साम्राज्य के अधिकांश प्रमुख शासकों ने स्थापत्य कला की प्रगति में रुचि ली।” कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1. विजयनगर के संस्थापक हरिहर प्रथम ने रायचुर दुआब में स्थित किले पर अधिकार किया और उसकी आवश्यकता अनुसार मरम्मत की और कुछ इमारतें बनवाई।
2. बुक्काराय प्रथम के शासन काल में जैनियों और वैष्णव मंदिर बनवाये गए।
3.हरिहर द्वितीय के काल में कई मंदिर, महल, तालाब आदि बनावाये गये लेकिन उसके शासन काल के बाद लगभग दो वर्षों तक उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर राज्य में अशांति रही। इसलिए निर्माण कार्य ठप्प रहे।
4.देवराय ने शांतिकाल के निर्माण कार्यों की ओर ध्यान दिया। उसने तुंगभद्रा नदी पर बाँध बनाकर वहाँ से नहरें निकालीं ताकि शहर में पानी की कमी को दूर किया जा सके। इस नहर से आसपास के खेतों की सिंचाई भी होती थी। उसने सिंचाई के लिए हरिद्रा नदी पर भी बाँध बनवाया और इन नहरों से राजस्व में लगभग साढ़े तीन लाख रुपयों की वृद्धि हुई। इसी शासक के काल में इतालवी यात्री निकालो कोंती ने विजयनगर का बहुत सुंदर वर्णन किया है। उसके शासन काल में मंदिरों तथा पुजारियों को प्रचुर दान दिए गए। देवराय की मृत्यु के बाद (1422) कुछ महाना के लिए उसका पुत्र रामचंद्र सिंहासन पर बैठा और उसके बाद दूसरे प्रजा वीर विजयराय के शासन की अवधि के बारे में तरह-तरह के अनुमान किए जाते हैं।
5.देवराय द्वितीय धार्मिक दृष्टि से उदार था। उसने अपने राज्य में मुसलमानों की मस्जिदें बनाने की स्वतंत्रता दी। उसके राज्यकाल में फारस का प्रसिद्ध यात्री अब्दुर्रज्जाक विजयनगर आया था जिसने विजयनगर की और देवराय द्वितीय की बड़ी प्रशंसा की है।

प्रश्न 4. विजयनगर शहर की जल संपदा, किलेबंदियों तथा सड़कों की विवेचना कीजिए।

अथवा

विजयनगर की भौगोलिक स्थिति के विषय में चौंकाने वाले दो तथ्य जल-संपदा और किलेबंदियाँ थीं। व्याख्या कीजिए।
उत्तर : विजयनगर शहर विजयनगर साम्राज्य की राजधानी थी। अधिकांश राजधानियों की तरह यह भी एक विशिष्ट भौतिक लक्षणों तथा स्थापत्य शैली से सुसज्जित शहर था।
1.जल-संपदा : विजयनगर की भौगोलिक स्थिति के बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यहाँ तुंगभद्रा नदी द्वारा निर्मित एक प्राकृतिक द्रोणी (basin) है। यह नदी उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है। आस-पास के भू-दृश्य पर ग्रेनाइट की पहाड़ियाँ फैली हैं जिन्होंने शहर को चारों ओर से घेरा हुआ है। इन पहाड़ियों से कई जल-ध राएँ आकर नदी में मिलती हैं।
लगभग सभी धाराओं के साथ-साथ बाँध बनाकर विभिन्न आकारों के हौज बनाए गए थे क्योंकि शहर प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक था। इसलिए पानी को इकट्ठा करने और इसे शहर ले जाने के लिए व्यापक प्रबंध करना आवश्यक था।
यहाँ के सबसे महत्त्वपूर्ण हौजों में एक का निर्माण 15वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में हुआ था जिसे आज ‘कमलपुरम् जलाशय’ कहा जाता है। इस हौज के पानी से न केवल आस-पास के खेतों को सींचा जाता था बल्कि इसे एक नहर द्वारा “राजकीय केंद्र” तक भी ले जाया जाता था।
हिरिया नहर सबसे महत्त्वपूर्ण जल संबंधी संरचनाओं में से एक थी। इस नहर में तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाया जाता था। इसका प्रयोग “धार्मिक केंद्र” से “शहरी केंद्र” को अलग करने वाली घाटी की सिंचाई करने में किया जाता था। संभवत: इसका निर्माण संगम वंश के राजाओं ने करवाया था। .
2.किलेबंदियाँ तथा सड़कें : विजयनगर शहर की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यहाँ की एक विशाल किलेबंदी थी जिसे दीवारों से घेरा गया था। 15वीं शताब्दी में फारस से कालीकट (कोजीकोड) आए दूत अब्दुर्रज्जाक को यहाँ की किलेबंदी ३ बहुत प्रभावित किया था। उसने दुर्गों की सात पंक्तियों का उल्लेख । किया है। इनके द्वारा न केवल शहर को बल्कि आसपास के कृषि क्षेत्र तथा जंगलों को भी घेरा गया था।
(1) सबसे बाहरी दीवार शहर के चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती थी। इसमें गारे या जोड़ने के लिए किसी भी में अन्य वस्तु का प्रयोग नहीं किया गया था। पत्थर के टुकड़े फनी जैसे थे. जिसके कारण वे अपने स्थान पर टिके रहते थे। दीवारों घूम के अंदर का भाग मिट्टी तथा मलबे के मिश्रण से बना हुआ था। कि वर्गाकार तथा आयताकार बुर्ज बाहर की ओर निकले हुए थे। शहर की किलेबंदी की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इससे खेतों को 44 भी घेरा गया था। अब्दुर्रज्जाक लिखता है, “पहली , दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बगीचे तथा आवास है।” इसी प्रकार पेस कहता है,”इस पहली परिधि से शहर में प्रवेश करने तक की दूरी बहुत अधिक है, जिसमें खेत हैं जहाँ वे धान उगाते हैं, कई उद्यान हैं और बहुत-सा जल है जो दो झीलों से लाया जाता है।” इन कथनों की आज के पुरातत्वविदों द्वारा भी पुष्टि की गई है। उन्होंने धार्मिक केंद्र तथा नगरीय केंद्र के बीच एक कृषि क्षेत्र के साक्ष्य खोज निकाले हैं। इस क्षेत्र को एक व्यापक नहर प्रणाली द्वारा सींचा जाता था, जिसमें तुंगभद्रा से जल लाया जाता था।
मध्यकाल में कृषि-क्षेत्रों की किलेबंदी करने का मुख्य उद्देश्य । प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था। ये घेराबंदियाँ कई महीनों और यहाँ तक कि वर्ष तक चल सकती थीं। ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए शासक प्राय: किलेबंद क्षेत्रों के भीतर ही विशाल अन्नागारों का निर्माण करवाते थे। विजयनगर के शासकों ने अपने कृषि भू-भाग की रक्षा के लिए एक अत्यधिक महँगी तथा व्यापक नीति को अपनाया।
(2) दूसरी किलेबंदी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग के चारों ओर बनी हुई थी और तीसरी से शासकीय केंद्र को घेरा गया था जिसमें महत्त्वपूर्ण इमारतों के प्रत्येक समूह की घेराबंदी उनकी अपनी ऊँची दीवारों से की गई थी।
दुर्ग में प्रवेश के लिए पूरी तरह से सुरक्षित प्रवेश द्वार बने हुए थे जो शहर को मुख्य सड़कों से जोड़ते थे। प्रवेश द्वार स्थापत्य के विशिष्ट नमूने थे। किलेबंद बस्ती में जाने वाले प्रवेश द्वार पर बनी मेहराब और द्वार के ऊपर बनी गुंबद संभवत: तुर्की सुलतानों की स्थापत्य कला के नमूने थे। कला-इतिहासकार इस शैली को इंडो-इस्लामिक (हिंद-इस्लामी) शैली कहते हैं, क्योंकि इसका विकास विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य कला के साथ संपर्क से हुआ था।
सड़कें प्राय: पहाड़ी भू-भाग से हटकर घाटियों से होकर ही इधर-उधर घूमती थीं। सबसे महत्त्वपूर्ण सड़कों में से कुछ मंदिर के प्रवेश द्वारा से आगे की ओर बढ़ी हुई थीं। इनके दोनों ओर बाजार थे।

प्रश्न 5. विजयनगर प्रशासन में ‘नायकों’ तथा ‘अमरनायकों’ की क्या भूमिका थी ?
उत्तर : I. ‘नायक’ साम्राज्य में शक्ति का प्रयोग करने वालों में सेना प्रमुख भी शामिल थे वे प्रायः किलों पर नियंत्रण रखते थे और उनके पास सशस्त्र समर्थक होते थे। वे स्थान- स्थान पर घूमते रहते थे और कभी-कभी उपजाऊ भूमि की तलाश में किसान भी उनका साथ देते थे। इन प्रमुखों को ‘नायक’ कहा जाता था। ये प्रायः तेलुगु या कन्नड़ भाषा बोलते थे। कई नायकों ने विजयनगर के शासकों की प्रभुसत्ता के आगे समर्पण किया था परंतु वे प्रायः विद्रोह कर देते थे और इन्हें सैनिक कार्यवाही द्वारा ही दबाया जाता था।
II. अमरनायक तथा अमरनायक प्रणाली : अमरनायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक नई राजनीतिक खोज थी। इस प्रणाली के कई तत्व संभवत: दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए थे।
अमरनायक सैनिक कमांडर थे। उन्हें राय द्वारा प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र दिए जाते थे। वे किसानों, शिल्पियों तथा व्यापारियों से भू-राजस्व तथा अन्य कर वसूल करते थे। वे राजस्व का कुछ भाग व्यक्तिगत उपयोग तथा घोड़ों एवं हाथियों के निर्धारित दल के रख-रखाव के लिए अपने पास रख लेते थे और शेष भाग राजकोष में जमा करवा देते थे।
महत्त्व : (1) अमरनायकों के दल आवश्यकता के समय विजयनगर के शासकों को भी एक प्रभावी सैनिक सहायता प्रदान करते थे। इन्हीं की सहायता से उन्होंने पूरे दक्षिणी प्रायद्वीप को अपने नियंत्रण में कर लिया था।
(2) राजस्व का कुछ भाग मंदिरों तथा सिंचाई के साधनों के रख-रखाव के लिए भी खर्च किया जाता था।
अमरनायकों पर नियंत्रण : अमरनायक राजा को वर्ष में एक बार भेंट भेजा करते थे। वे अपनी स्वामिभक्ति प्रकट करने के लिए राज-दरबार में उपहारों के साथ स्वयं उपस्थित होते थे। राजा उन पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए उन्हें समय-समय पर एक से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करता रहता था। परंतु 17वीं शताब्दी में इनमें से कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए। परिणामस्वरूप केंद्रीय ढाँचे का तेजी से विघटन होने लगा।

अथवा

कृष्णदेव राय के शासनकाल का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर : देवराय द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् विजयनगर साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई। धीरे-धीरे प्राचीन संगम वंश का अंत हो गया। इन परिस्थितियों में कृष्णदेव राय ने तुलुव वंश की नींव रखी और स्वयं विजयनगर पर शासन करने लगा। उसने 1509 ई० से 1529 ई० तक शासन किया। उसकी मुख्य सफलताओं का वर्णन निम्न प्रकार है। राज्य विस्तार : कृष्णदेव राय को विजयनगर के पुराने शत्रु बहमनी राज्य के उत्तराधिकारी राज्यों और उड़ीसा से मुकाबला करना पड़ा। सात साल तक कई लड़ाइयाँ लड़ने के पश्चात् कृष्णदेव ने पहले उड़ीसा को कृष्णा नदी तक के क्षेत्र के सभी जीते हुए प्रदेशों को विजयनगर को लौटाने के लिए विवश किया। इस प्रकार अपनी स्थिति को सुदृढ़ करके कृष्णदेव ने तुंगभद्रा दोआब के लिए पुरानी लड़ाई आरंभ कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि उसके दो शत्रुओं, उड़ीसा और बीजापुर ने आपस में संधि कर ली। कृष्णदेव ने युद्ध के लिए काफी तैयारियाँ की। उसने रायपुर और मुद्कल पर आक्रमण कर दिया। 1520 ई० में बीजापुर के सुलतान की युद्ध में पूर्ण पराजय हुई। कृष्णदेव राय ने इसे कृष्णा नदी के पार खदेड़ दिया। इसके पश्चात् विजयनगर की सेना बेलगाँव पहुँची। फिर उसने बीजापुर पर अधिकार किया और कई दिनों तक लूट-पाट जारी रखी। इसके पश्चात् उन्होंने गुलबर्गा को नष्ट कर दिया।
इस प्रकार कृष्णदेव राय के समय में विजयनगर सैनिक दृष्टि से दक्षिण का शक्तिशाली राज्य बन गया।
महान् भवन-निर्माता तथा साहित्यकार-कृष्णदेव राय महान् भवन-निर्माता भी था। उसने विजयनगर के समीप एक नया नगर बनवाया और बहुत बड़ा तालाब खुदवाया जो सिंचाई के काम भी आता था। वह तेलुगु और संस्कृत का बहुत अच्छा विद्वान था। उसकी बहुत-सी रचनाओं में से तेलुगु में लिखी राजनीति पर एक पुस्तक और एक संस्कृत नाटक ही उपलब्ध है। उसके राज्यकाल में तेलुगु साहित्य का नया युग आरंभ हुआ जबकि संस्कृत से अनुवाद की अपेक्षा तेलुगु में मौलिक साहित्य लिखा जाने लगा। उसे कविता से काफी लगाव था। वह तेलुगु के साथ-साथ कन्नड़ और तमिल कवियों को भी प्रोत्साहन दिया करता था।
अच्छा प्रशासक-बरबोसा, पेस और नूनिज जैसे विदेशी यात्रियों ने उसके श्रेष्ठ प्रशासन और उसके शासनकाल में साम्राज्य की समृद्धि का वर्णन किया है। कृष्णदेव राय की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके शासनकाल में पनपी सहिष्णुता की भावना थी। बरबोसा कहता है कि राजा की ओर से किसी भी व्यक्ति को कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता प्राप्त है। बिना किसी कठिनाई के या इस पूछताछ के कि वह ईसाई है, यहूदी है, मूर है अथवा नास्तिक है, यह अपने धार्मिक सिद्धांतों के अनुरूप आचरण कर सकता है।” बरबोसा ने कृष्णदेव राय की प्रशंसा उसके राज्य में प्राप्त न्याय और समानता के कारण भी की है।
अतएव इससे स्पष्ट हो जाता है कि कृष्णदेव राय विजयनगर के शासकों में महानतम् था।

प्रश्न 6. विजयनगर राज्य की स्थापना किन परिस्थितियों में हुई ? इस साम्राज्य के प्रसिद्ध शासक कौन-कौन से थे और वे किस-किस वंश से संबंध रखते थे ?
उत्तर : विजयनगर की स्थापना 1336 ई० में हुई। इसके संस्थापक हरिहर और बुक्काराय नामक दो भाई थे। उन्होंने तुंगभद्रा नदी के किनारे विजयनगर नामक एक नगर बसाया था। यही नगर धीरे-धीरे एक विशाल हिंदू राज्य बन गया। इस साम्राज्य पर तीन राजवंशों ने शासन किया
(1) संगम वंश (2) सुलुवा वंश (3) तुलुव वंश। शासक : विजयनगर राज्य के प्रसिद्ध शासकों का वर्णन इस प्रकार है
1.हरिहर प्रथम : हरिहर प्रथम ने अपने भाई बुक्काराय के सहयोग से विजयनगर की स्थापना की। वह संगम वंश से संबंध रखता था। उसने अपने राज्य की सीमा को कृष्णा नदी से कावेरी नदी तथा पूर्वी घाट से पश्चिमी घाट तक फैलाया।
2.बुक्काराय प्रथम : हरिहर प्रथम के बाद बुक्काराय प्रथम शासक बना। उसका संबंध भी संगम वंश से था। उसने विजयनगर को सुंदर बनाया तथा बहमनी शासकों से युद्ध किए।
3.हरिहर द्वितीय तथा देवराय द्वितीय : ये संगम वंश के अंतिम दो प्रसिद्ध शासक थे। देवराय ने अपनी सेना में मुसलमानों को भी भर्ती किया। उन्होंने वियजनगर के वैभव और गौरव में बड़ी वृद्धि की।
4.कृष्णदेव राय : कृष्णदेव राय तुलुव वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसने 1509 ई० से 1530 ई० तक शासन किया। सर्वप्रथम उसने विद्रोही सरदारों का दमन किया। तत्पश्चात् उसने रायचूर दोआब पर अपना अधिकार कर लिया। उसके 21 वर्ष के शासन काल में विजयनगर राज्य की कीर्ति चारों ओर फैल गई थी।
5.सदाशिव राय : सदाश्वि राय तुलुव वंश का अंतिम शासक था। उसके समय में अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा और बीदर के शासकों ने मिलकर विजयनगर पर आक्रमण किया।
1566 ई० में तालीकोट के युद्ध में विजयनगर की सेनाओं पराजय हुई। आक्रमणकारियों ने विजयनगर में लूटमार और इसके प्रदेशों को अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार विजयनगर. साम्राज्य सदा के लिए समाप्त हो गया। का

अथवा

मैकेंजी के बाद विजयनगर संबंधी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ। व सामग्री एकत्र किए जाने के लिए विद्वानों द्वारा किए गए विभिन्न प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : विजयनगर के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए मैकेंजी द्वारा किए गए आरंभिक सर्वेक्षणों के बाद यात्रा वृत्तांतों तथा अभिलेखों से प्राप्त जानकारी को एक साथ जोड़ा गया। 20वीं शताब्दी में यह स्थान भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण तथा कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग के सरंक्षण में आ गया। 1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल रूप में विविध प्रकार के अभिलेखनों द्वारा विजयनगर से मिले भौतिक अवशेषों के व्यापक प्रलेखन की एक महत्त्वपूर्ण परियोजना आरंभ की गई। लगभग 20 वर्षों के काल में पूरे विश्व के दर्जनों विद्वानों ने इस जानकारी को इकट्ठा और संरक्षित करने का कार्य किया।
मानचित्र निर्माण इस विशाल प्रक्रिया का एक छोटा-सा भाग है। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बाँध गया और प्रत्येक वर्ग को वर्णमाला के एक अक्षर से अंकित किया गया। फिर इन छोटे वर्गों को और भी छोटे वर्ग समूहों में बाँटा गय परंतु इतना काफी नहीं था, छोटे वर्गों को आगे फिर छोटी इकाइपो । में बाँटा गया।
ये गहन सर्वेक्षण बहुत परिश्रम से किए गए थे इनसे हजारों संरचनाओं के अंशों, छोटे देवस्थलों तथा आवासों से लेकर विशाल मंदिरों तक को पुनः उजागर किया गया। उनका प्रलेखन भी किया। गया। इन कार्यों से विजयनगर की सड़कों, रास्तों और बाजार आदि के अवशेषों को पुनः प्राप्त किया जा सकता है। इनकी स्थिति की पहचान स्तंभ आधारों तथा मंचों द्वारा की गई है।

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