3 अंकीय प्रश्न उत्तर – किसान, जमींदार और राज्य – Class12th History Chapter 8

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 8 Important Question Answer 3 Marks किसान, जमींदार और राज्य (कृषि समाज और मुगल साम्राज्य)

प्रश्न 1. कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं ? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं ?
उत्तर : आइन को अबुल फजल ने लिखा था। अपनी इस पुस्तक में उसने कृषि सम्बन्धी अनेक जानकारियाँ दी हैं। इस पुस्तक में खेतों की नियमित जुताई की तसल्ली करने के लिए. राज्य के नुमाइदों द्वारा करों की उगाही के लिए और राज्य तथा ग्रामीण जमीदारों के बीच के रिश्तों के नियमन के लिए जो इंतजाम राज्य ने किए थे, उसका लेखा-जोखा पेश किया गया है।आइन में कृषि इतिहास के सन्दर्भ में संख्यात्मक आँकड़ों की दृष्टि से विषमताएँ पाई गई हैं। सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में नहीं एकत्रित किए गए। मसलन, जहाँ कई सूबों के लिए जमींदारों की जाति के मुताबिक विस्तृत सूचनाएँ संकलित की गई, वहीं बंगाल और उड़ीसा के लिए ऐसी सूचनाएँ मौजूद नहीं हैं। इसी प्रकार जहाँ राजकोषीय आंकड़े बड़ी तफसील से दिए गए हैं, वहीं उन्हीं इलाकों से कीमतों और मजदूरी जैसे इतने ही महत्त्वपूर्ण मापदण्ड इतने अच्छे से दर्ज नहीं किए गए हैं। कीमतों और न्य मजदूरी की दरों की जो विस्तृत सूची आइन में दी गई है। स्पष्ट है कि देश के बाकी हिस्सों के लिए इन आंकड़ों की प्रासंगिकता इतिहासकार आइन की समस्याओं से निपटने के लिए अन्य दूसरे स्रोतों का भी इस्तेमाल करते हैं जो मुगलों की राजधानी से दूर के क्षेत्रों में लिखे गए थे। इनमें सत्रहवीं एवं अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से मिलने वाले वे दस्तावेज शामिल हैं जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं। इसके अतिरिक्त, ईस्ट इंडिया कपनी के बहुत सारे दस्तावेज भी हैं जो पूर्वी भारत में कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका पेश करते हैं। ये सभी स्रोत यह समझने में हमारी मदद करते हैं कि किसान द्वारा राज्य को किस दृष्टिकोण से देखा जाता था और राज्य से उन्हें किस प्रकार के न्याय की उम्मीद थी।

प्रश्न 2. सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज गुजारे के लिए खेती कह सकते हैं ? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में दैनिक आहार की खेती पर विशेष बल दिया जाता था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि मध्यकालीन भारत में खेती केवल गुजारा करने के लिए की जाती थी। स्रोतों में हमें प्रायः जिन्स-ए-कामिल, जिसका अर्थ है सर्वोत्तम फसलें, जैसे लफ्ज मिलते हैं। मुगल राज्य भी किसानों को ऐसी फसलों की खेती करने के लिए बढ़ावा देते थे क्योंकि इनसे राज्य को अधिक कर मिलता था। कपास और गन्ने जैसी फसलें बेहतरीन जिन्स-ए-कामिल थीं तिलहन और दलहन भी नकदी फसलों में आती थी। इससे पता चलता है कि एक औसत किसान की जमीन पर किस प्रकार पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक-दूसरे से सम्बन्धित थे।

प्रश्न 3. कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।

अथवा

16वीं तथा 17वीं शताब्दी के दौरान कृषि समाज में महिलाओं की भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

अथवा

कृषि समाज में महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन के रूप में कैसे देखा जाता था ? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर : कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण थी। महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करती थीं महिलाओं का काम बुआई, निराई और कटाई के साथ-साथ पकी हुई फसल का दाना निकालने का था। सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करना और गूँधने और कपड़ों पर कढ़ाई जैसे दस्तकारी का काम उत्पादन के ऐसे पहलू थे जो महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। किसान और दस्तकार महिलाएँ आवश्यकता पड़ने पर न सिर्फ खेतों में काम करती थी बल्कि नियोक्ताओं के घरों का भी काम करती थी और बाजारों के काम भी। भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक मिला हुआ था। पंजाब में ऐसे उदाहरण प्राप्त हुए हैं जहाँ महिलाएँ पुश्तैनी संपत्ति के विक्रेता के रूप में ग्रामीण जमीन के बाजार में सक्रिय हिस्सेदारी रखती थीं।

प्रश्न 4. विचाराधीन काल (मुगल काल) में मौद्रिक कारोबार की अहमियत (महत्त्व) की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।
उत्तर : (i) मुगल काल में भारत के समुद्र पार व्यापार में अत्यधिक वृद्धि हुई और कई नई वस्तुओं का व्यापार आरंभ हो गया। लगातार बढ़ते व्यापार के कारण भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं के भुगतान के रूप में एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई। इस चाँदी का एक बड़ा भाग भारत में पहुँचा। यह भारत के लिए अच्छी बात थी क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक भंडार नहीं थे। फलस्वरूप 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारत में धातु मुद्रा विशेषकर चाँदी के रुपयों की उपलब्धि में स्थिरता बनी रही। अतः अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार तथा सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। इसके अतिरिक्त मुगल साम्राज्य को नकदी कर उगाहने में भी आसानी हुई।
इटली के एक यात्री जोवान्नी कारेरी जो लगभग 1690 ई० में भारत से गुजरा था, ने इस बात का बहुत ही सजीव चित्रण किया कि किस प्रकार चाँदी संसार भर से भारत में पहुँचती थी। उसके वृत्तांत से हमें यह भी पता चलता है कि 17वीं शताब्दी के भारत में भारी मात्रा में नकदी और वस्तुओं का आदान-प्रदान हो रहा था।
(ii) गाँवों में भी आपसी लेन-देन नकदी में होने लगा। गाँवों के शहरी बाजारों से जुड़ जाने से मौद्रिक कारोबार में और भी वद्धि हुई। इस प्रकार गाँव मुद्रा बाजार का अंग बन गए।
(iii) मौद्रिक कारोबार के कारण श्रमिकों को ठनका दैनिक भुगतान करना सरल हो गया।

प्रश्न 5. उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुगल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू-राजस्व बहुत । महत्त्वपूर्ण था।

अथवा

‘राजस्व मुगल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी” कृषि और व्यापार के संदर्भ में इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : भू-राजस्व मुगल साम्राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। इसलिए कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रखने के लिए और तेजी से फैलते साम्राज्य में राजस्व के आकलन तथा वसूली के लिए एक प्रशासनिक तंत्र का होना आवश्यक था। अत: सरकार ने ऐसी हर संभव व्यवस्था की जिससे राज्य में सारी कृषि योग्य भूमि की जुताई सुनिश्चित की जा सके। इस तंत्र में ‘दीवान’ की भूमिका बहुत ही महत्तवपूर्ण थी क्योंकि पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख-रेख की जिम्मेवारी उसी के विभाग पर थी। इस प्रकार हिसाब-किताब रखने वाले और राजस्व अधिकारी कृषि संबंधों को नया रूप देने में एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरे।
कर-निर्धारण और वसूली : कर निर्धारित करने से पहले मुगल राज्य ने जमीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में विशेष प्रकार की सूचनाएँ इकट्ठी की। भू-राजस्व व्यवस्था के चरण थे : कर निर्धारण तथा वास्तविक वसूली। जमा निर्धारित राशि थी और हासिल वास्तविक वसूली गई राशि। अकबर ने : अमील-गुजार या राजस्व वसूली करने वाले अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे उसे नकद भुगतान प्राप्त करने के साथ-साथ फसल के रूप में भुगतान का विकल्प भी खुला रखें राजस्व निर्धारित करते समय राज्य अपना हिस्सा अधिक-से-अधिक रखने की कोशिश करता था। परंतु स्थानीय स्थिति को देखते हुए कभी-कभी इतनी वसूली कर पाना संभव नहीं हो पाता था।
भूमि की माप : प्रत्येक प्रांत में जुती हुई जमीन और जोतने योग्य जमीन दोनों की माप करवाई गई। अकबर के शासनकाल में अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में ऐसी जमीनों के सभी सलन, आँकड़ों को संकलित किया। उसके बाद के बादशाहों के शासनकाल और क में भी जमीन की माप के प्रयास जारी रहे।
व्यापार :(i) मुगल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में एक था जो सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में सत्ता तथा संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने में सफल रहा। चीन में मिंग, ईरान में सफावी या और तुर्की में ऑटोमन साम्राज्य इनमें प्रमुख साम्राज्य थे।
(ii) मुगल काल में भारत के स्थलीय और समुद्र मार्ग दोनों में प्रकार के व्यापार में अत्यधिक प्रसार हुआ। भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं के भुगतान के रूप में एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई। इस चाँदी का एक बड़ा भाग भारत में भी पहुँचा। भारत में चाँदी के प्राकृतिक भण्डार नहीं थे। फलतः इस काल में भारत में धातु मुद्रा के प्रचलन में स्थिरता बनी रही।

प्रश्न 6. मुगलकालीन ग्रामीण समाज को जानने के विभिन्न स्रोतों की व्याख्या कीजिए। इसी काल में किसानों द्वारा कृषि के लिए प्रयोग की गई तकनीकों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : मुगलकालीन ग्रामीण समाज को जानने के निम्नलिखित स्रोत हैं :(i) किसान अपने बारे में स्वयं नहीं लिखते थे। इसलिए 16वीं और 17वीं शताब्दी के कृषि इतिहास के लिए हमारे मुख्य स्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ तथा दस्तावेज हैं।
(ii) ‘आइन-ए-अकबरी’ सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथों में एक था। इसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा था।
(iii) ‘आइन’ अथवा ‘आइन-ए-अकबरी’ का मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का एक ऐसा रेखाचित्र प्रस्तुत करना था जहाँ एक शक्तिशाली सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था।
(iv) ईस्ट इंडिया कंपनी के भी बहुत-से दस्तावेज हैं जो पूर्वी भारत में कृषि-संबंधों पर प्रकाश डालते हैं। इन सभी स्रोतों में किसानों, जमींदारों और राज्य के बीच समय-समय पर होने वाले संघर्षों के ब्यौरे दर्ज हैं।
(v) 17वीं शताब्दी के स्रोत दो प्रकार के किसानों की जानकारी देते हैं-खुद-काश्त तथा पाहि-काश्त। पहले प्रकार के किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी जमीन थी। पाहि-काश्त वे किसान थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे।
इस काल में किसानों द्वारा कृषि कार्य के लिए निम्नलिखित तकनीकों का प्रयोग किया गया।
1.मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था। कुछ ऐसी फसलें भी थीं जिनके लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत थी इसके लिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े। रेहट (Persian wheel) का प्रयोग बढ़ा। सिंचाई कार्यों को राज्य की मदद भी मिलती थी। मसलन, उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें व नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई।
2.वैसे तो खेती मेहनतकशी का काम था लेकिन किसान ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल भी करते थे जो अक्सर पशुबल पर आधारित होती थीं। ऐसा एक उदाहरण लकड़ी के उस हल्के हल का दिया जा सकता है जिसको एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगाकर आसानी से बनाया जा सकता था। ऐसे हल मिट्टी को बहुत गहरे नहीं खोदते थे, जिसके कारण तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी। बैलों के जोड़े के सहारे खींचे जाने वाले बरमे का इस्तेमाल बीज बोने के लिए किया जाता था लेकिन बीजों को हाथ से छिड़क कर बोने का रिवाज ज्यादा प्रचलित था। मिट्टी की गुड़ाई और साथ-साथ निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार काम में लाए जाते थे।

प्रश्न 7. सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगलवासियों की जिंदगी किस तरह बदल गई?
उत्तर : वाणिज्यिक खेती का असर बाहरी कारक के रूप में जंगलवासियों की जिंदगी पर पड़ता था। जंगल के विभिन्न उत्पादों जैसे-शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थीं सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुओं में लाक जैसी कुछ वस्तुएँ थीं। जंगलों से हाथी भी पकड़े और बेचे जाते थे। व्यापार के अंतर्गत वस्तुओं की अदला-बदली भी होती थी। कुछ कबीले भारत और अफगानिस्तान के मध्य होने वाले जमीनी व्यापार में लगे थे। जंगलवासियों के जीवन में आए परिवर्तनों में सामाजिक कारण भी था। कबीलों के सरदार बहुत कुछ ग्रामीण समुदाय के बड़े आदमियों’ की तरह होते थे। कई कबीलों के सरदार तो जमींदार बन गए, कुछ राजा भी बन गए। ऐसे में उन्हें अपनी सेना खड़ी करने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने अपने ही खानदान के लोगों को सेना में भर्ती किया या फिर अपने ही भाई-बंधुओं से सैन्य सेवा की माँग की। सिंध क्षेत्र की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 700 पैदल सिपाही होते थे। असम में, अहोम राजाओं के अपने पायक होते थे। ये वे लोग थे जिन्हें जमीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। अहोम राजाओं ने जंगली हाथी पकड़ने पर अपने एकाधिकार का ऐलान भी कर रखा था।
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों के साथ बारी-बारी से युद्ध किया और उन पर अपना कब्जा जमा लिया। जंगल के क्षेत्रों में नए सांस्कृतिक प्रभावों के विस्तार की भी शुरूआत हुई। कुछ इतिहासकारों के अनुसार नए से क्षेत्रों के खेतिहर समुदायों ने जिस प्रकार धीरे-धीरे इस्लाम को अपनाया उसमें सूफी संतों (पीर) ने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

प्रश्न 8. मुगल भारत में जमींदारों की भूमिका की जाँच जए।
उत्तर : मुगल भारत में जमींदारों की भूमिका : मुगल भारत में जमींदार जमीन के मालिक होते थे। ग्रामीण समाज में इन्हें ऊँची हैसियत प्राप्त थी। इस कारण इन्हें कुछ विशेष सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ मिली हुई थीं। जमींदारों की बढ़ी हुई हैसियत के पीछे एक कारण जाति था। दूसरा कारण यह था कि वे लोग राज्य को विशेष तरह की सेवाएँ देते थे। जमींदारों की विस्तृत व्यक्तिगत जमीन उनकी समद्धि का कारण थी। इन्हें मिल्कियत कहा जाता था। मिल्कियत जमीन पर जमींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती की जाती थी। प्रायः इन जमीनों पर रोज कमाने वाले मजदूर या पराधीन मजदूर काम करत थेा जमींदार जब चाहें इन जमीनों को बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या उन्हें गिरवी रख सकते थे।
जमींदार की शक्ति इस बात से भी आती थी कि उन्हें प्रायः राज्य की ओर से कर वसूलने का कार्य दिया जाता था इसके बदले उन्हें वित्तीय मुआवजा दिया जाता था। उनकी ताकत का एक और जरिया सैनिक संसाधन था। अधिकांश जमींदारों के पास अपने किले थी थे ओर अपनी सैनिक टुकड़ियाँ भी जिसमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे। इस प्रकार यदि हम मुगलकालीन गाँवों में सामाजिक संबंधों को एक पिरामिड के रूप में देखें तो जमींदार इसके संकरे शीर्ष का हिस्सा थे।
जमींदारों ने खेती लायक जमीनों को बसाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने खेतिहरों को खेती के साजो-सामान तथा उधार देकर उन्हें वहाँ बसने में भी सहायता की। जमींदारों की खरीद-फरोख्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई। इसके अतिरिक्त जमींदारों द्वारा अपनी मिल्कियत की जमीनों की फसलों को भी बेचा जाता था। सम्भवत: जमींदार प्रायः बाजार (हाट) स्थापित करते थे। इन हाटों में किसान भी अपनी फसले बेचने आते थे।
जमींदार वर्ग एक शोषण करने वाला वर्ग जरूर था, परंतु किसानों से उनके सम्बन्धों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था। किसान प्रायः राजस्व अधिकारियों को ही दोषी ठहराते थे। परवर्ती काल में अनेक कृषक विद्रोह हुए और उनमें राज्य के खिलाफ जमींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन और सहयोग मिला।

प्रश्न 9. पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।
उत्तर : पंचायतें और गाँव का मुखिया:(i) गाँवों की पंचायत में बुजुर्गों का जमाव होता था, वह गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी सम्पत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे।
(ii) पंचायत का सरदार मुखिया होता था जिसे मंडल या मुकद्दम कहते थे। मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की इच्छा से होता था।
(iii) गाँव के आमदनी व व्यय का हिसाब किताब अपनी निगरानी में बनवाना मुखिया का मुख्य काम था, इस काम में पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था।
(iv) पंचायत का व्यय गाँव के उस आम खजाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना सहयोग देता था। इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था।
(v) ग्रामीण समुदाय के सबसे नीचे के वर्ग के लोग अर्जियाँ लगाते थे। अक्सर सामूहिक तौर पर ऐसी अर्जियाँ दी जाती थी। ‘निचली जाति’ के किसानों और राज्य के अधिकारियों या स्थानीय जमींदारों के बीच झगड़ों में पंचायत के फैसले अलग-अलग मामलों में अलग-अलग हो सकते थे। बहुत अधिक कर की माँगों के मामले में पंचायत अक्सर सुलह का सुझाव देती थी।

प्रश्न 10. विश्व के रेखा मानचित्र पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुगल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात-मार्गों को भी दिखाएँ।
उत्तर : संकेत : देश : अरब, ईरान, अफगानिस्तान, चाइना, मध्य एशिया, पश्चिमी एशिया, पुर्तगाल, फ्रांस, ब्रिटेन, हालैंड (नीदरलैंड) इत्यादि मुगल साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध रखते थे।संभावित मार्ग :
समुद्री मार्ग : (i) अटलांटिक होते हुए दक्षिणी अफ्रीका के अंतिम छोर आशा अंतरीप, अरब सागर। (ii) लाल सागर, अरबियन सागर, बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर।
स्थल मार्ग : मध्य एशिया से ईरान, अफगानिस्तान, आधुनिक पाकिस्तान से सतपुड़ा विंध्याचल पहाड़ियाँ पार करते हुए, मालाबार तट, त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, मद्रास (चेन्नई) आदि।

प्रश्न 11. पड़ोस के गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन सी फसलें उगाई जाती हैं, कौन से जानवर पाले जाते हैं, कौन से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ जमीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत | किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनों को व्याख्या कीजिए।
उत्तर : संकेत : एक ग्राम पंचायत है जो इस गाँव में स्थानीय शासन चलाती है। इस गाँव में लगभग 4000 लोग 250 घरों में रहते हैं।
फसलें : इस गाँव में गेहूँ, चावल, मटर, सरसों, बाजरा, गन्ना, चावल, कपास और दालों की खेती ग्रामीण लोग करते हैं। गाँव के लोग कई तरह के फल और सब्जियाँ भी उगाते हैं।
मवेशी/पशु : गाँव के लोग, भैंस, गाय, ऊँट, घोड़े, गधे, बकरियाँ, भेड़ें, सुअर, मुर्गियाँ आदि रखते और पालते हैं। ये मत्स्य पालन का भी कार्य करते हैं। शिल्पकार : गांव में कुम्हार, बढ़ई, सुनार, जुलाहे, टोकरियाँ बनाने वाले, रंग-रेज, सूत कातने वाले, स्थापत्यकार, पेंटर,मैकेनिक, विद्युत कार्यकर्ता निवास करते हैं।
महिलाएँ भू-स्वामी : गाँव में कुछ महिलाएँ जिनकी संख्या 200 है परिवार के मुखिया के रूप में अपने अन्य परिवार जनों/बच्चों आदि के रूप में पृथक् रूप में रहती हैं। इनमें विधवाएँ, तलाकशुदा आदि शामिल हैं।
इन्हें पति या पिता या अन्य पारिवारिक मुखिया के देहांत के बाद कानूनन भू-स्वामित्व प्राप्त हो गया है।
स्थानीय पंचायत कार्य : गाँव की पंचायत अनेक कार्य करती है। जैसे गाँव में साफ-सफाई करना, कूड़े को उचित स्थान पर डलवाना, सार्वजनिक सुविधाओं (मूत्रालयों), शौचालय का निर्माण और उनका रख-रखाव करना, गलियों और मार्गों पर रोशनी का प्रबंध करना, रात को चौकीदारी की व्यवस्था करना, स्वच्छ पीने के लिए जल की आपूर्ति करना, प्राथमिक विद्यालय, लड़के और लड़कियों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्था करना, मवेशियों के लिए छोटे-छोटे अस्पताल की व्यवस्था करना, गाँवों में छोटे पार्को, बागों, गाँवों के मालियों, नालों आदि की व्यवस्था करना, बाजार की सड़कों, हौजों, कुओं जल संग्रह की व्यवस्था करना।
गाँव में छोटे-छोटे सामान्य मेले, पशु मेले को लगाना, त्योहारों के दिनों में रामलीला, कृष्ण लीला, गुरुपर्व पर जलूस निकालने की व्यवस्था आदि करना।
पंचायत घर में एक सचिव की नियुक्ति करना जो एक रजिस्टर में नए जन्में बाल/बालिकाओं का पूरा रिकार्ड और गाँव में भरने का पूरा रिकार्ड रखता है। बच्चों के लिए हैजे, प्लस पोलियों और दूसरे टीकाकरण की व्यवस्था करती है।
गाँव में लोगों के मनोरंजन के लिए वाचनालय, पुस्तकालय, दूरदर्शन केन्द्र, रेडियो केन्द्र, छोटे से अजायबघर, बच्चों के लिए खिलौना और गुड़िया केन्द्र का निर्माण और रख-रखाव करती है।
यह पंचायत सिविल और फौजदारी छोटे झगड़ों को निपटाने और मामूली जुर्माने और सजा देने जैसे कार्य भी करती है।
सामान्यताएँ या विभिन्नताएँ : हमारे देश की कुछ पंचायतें आधुनिक होते हुए भी सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों जैसे ही कार्य करती हैं। आधुनिक पंचायतों में ग्राम सभा के सभी सदस्य एक सरपंच और कुछ पंचों का चुनाव करते हैं। कानूनन हर पाँच साल के बाद ये चुनाव होते हैं। अब ग्राम पंचायतों में अनुसूचित एवं जनजातियों और महिलाओं के लिए कुछ स्थान आरक्षित हैं। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में ऐसा नहीं होता था।

परियोजना कार्य :

प्रश्न 12. आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए ( 10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्यौरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है ?
उत्तर : स्वयं अध्ययन कीजिए ।

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