Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 8 Important Question Answer 2 Marks किसान, जमींदार और राज्य (कृषि समाज और मुगल साम्राज्य)

प्रश्न 1. मुगलकालीन जाति पंचायतें क्या थीं और उनके क्या कार्य थे ?
उत्तर : ग्राम पंचायत के अतिरिक्त गाँव में प्रत्येक जाति की अपनी पंचायत भी होती थी। समाज में ये पंचायतें काफी शक्तिशाली होती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी झगड़ों का निपटारा करती थीं।
(1) वे जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती थीं।
(2) वे यह तय करती थीं कि शादियाँ जाति के मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं।
(3) वे यह बताती थीं कि कर्मकांडीय वर्चस्व किस क्रम में होगा। वास्तव में फौजदारी मामलों को छोड़कर अधिकतर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फैसलों को ही मानता था।

प्रश्न 2. अकबर के शासनकाल में भूमि के वर्गीकरण का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

अथवा

पोलज व परौती भूमि को परिभाषित (स्पष्ट ) कीजिए।
उत्तर : अकबर के शासनकाल में भूमि का वर्गीकरण (Classification of land during the Akbar reign) : 371551 में वर्गीकरण के मापदंड की निम्नलिखित सूची दी गई है: अकबर बादशाह ने अपनी गहरी दूरदर्शिता के साथ जमीनों का वर्गीकरण किया और हरेक (वर्ग की जमीन) के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया।
(i) पोलज वह ज़मीन है जिसमें एक के बाद एक हर फसल की सालाना खेती होती है और जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता है।
(ii) परौती वह ज़मीन है जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि वह अपनी खोयी ताकत वापस पा सके।
(iii) चचर वह ज़मीन है जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है।
(iv) बंजर वह जमीन है जिस पर पाँच या उससे ज्यादा वर्षों से खेती नहीं की गई हो। पहले दो प्रकार की ज़मीन की तीन किस्में हैं, अच्छी, मध्यम और खराब। वे हर किस्म की जमीन के उत्पाद को जोड़ देते हैं, और इसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता है, जिसका एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता है।

प्रश्न 3. मुगल काल में जंगल में रहने वाले लोगों के जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर : वाणिज्यिक खेती का असर बाहरी कारक के रूप में जंगलवासियों की जिंदगी पर पड़ता था। जंगल के विभिन्न उत्पादों जैसे-शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थीं। 17वीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुओं में लाक जैसी कुछ वस्तुएँ थीं। जंगलों से हाथी भी पकड़े और बेचे जाते थे। व्यापार के अंतर्गत वस्तुओं की अदला-बदली भी होती थी। कुछ कबीले भारत और अफगानिस्तान के मध्य होने वाले जमीनी व्यापार में लगे थे। जंगलवासियों के जीवन में आए परिवर्तनों में सामाजिक कारण भी था। कबीलों के सरदार बहुत कुछ ग्रामीण समुदाय क ‘बड़ आदमियों’ की तरह होते थे। कई कबीलों के सरदार तो जमींदार बन गए, कुछ राजा भी बन गए। ऐसे में उन्हें अपनी सेना खड़ी करने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने अपने ही खानदान के लोगों को सेना में भर्ती किया या फिर अपने ही भाई-बंधुओं से सैन्य सेवा की माँग की। सिंध क्षेत्र की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 700 पैदल सिपाही होते थे। असम में, अहोम राजाओं के अपने पायक होते थे। ये वे लोग थे जिन्हें जमीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। अहोम राजाओं ने जंगली हाथी पकड़ने पर अपने एकाधिकार का ऐलान भी कर रखा था।
16वीं-17वीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों के साथ बारी-बारी से युद्ध किया और उन पर अपना कब्जा जमा लिया। जंगल के क्षेत्रों में नए सांस्कृतिक प्रभावों के विस्तार की भी शुरूआत हुई। कुछ इतिहासकारों के अनुसार नए से क्षेत्रों के खेतिहर समुदायों ने जिस प्रकार धीरे-धीरे इस्लाम को अपनाया उसमें सूफी संतों (पीर) ने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

प्रश्न 4. “अपनी सीमाओं के बावजूद ‘आइन-ए-अकबरी’ अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज बना हुआ है।” कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि आइन-ए-अकबरी आज भी अपने समय के लिए एक असाधारण और अनोखा दस्तावेज है। मुगल साम्राज्य के गठन एवं उसकी संरचना की आकर्षक झलकियाँ दिखाकर और साथ ही लोगों एवं उत्पादों के बारे में आँकड़े देकर अबुल फजल मध्यकालीन इतिहासकारों से कहीं आगे निकल गए। मध्यकालीन भारत के इतिहासकार अधिकतर राजनीतिक घटनाओं के बारे में ही अबुल फजल से पहले लिखते थे। देश, उसके लोगों या उत्पादों के बारे में विरल ही बताया जाता था। यदि कभी उल्लेख किया भी जाता था, तो उसकी दिशा मूल रूप से राजनीतिक होती थी। भारत के लोगों और मुगल साम्राज्य के बारे में विस्तृत जानकारी देकर आइन ने स्थापित परंपराओं को पीछे छोड़ दिया और इस तरह 17वीं शताब्दी के भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु तैयार हो गया। जहाँ तक कृषि संबंधों का प्रश्न है, आइन के सांख्यिकीय प्रमाणों पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसमें मुगल साम्राज्य के लगभग सभी पक्षों के बारे में विस्तृत सूचनाएँ दर्ज हैं। इनकी सहायता से इतिहासकार समकालीन भारत के सामाजिक जीवन का इतिहास पुनः रचते हैं।

प्रश्न 5. मुगल काल के दौरान गाँवों में पंचायतों की भूमिका की परख कीजिए।
उत्तर : मुगल काल के दौरान गाँवों में पंचायतों की भूमिका की परख :
(i) गाँव की पंचायत में बुजुर्गों का जमावड़ा होता था। आमतौर पर वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अक्सर पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी। यह एक ऐसा अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। फिर भी इसकी संभावना कम ही है कि छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मजदूरों के लिए इसमें कोई जगह होती होगी। पंचायत का फैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।
(ii) पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे मुकद्दम या मंडल कहते थे। कुछ स्रोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था और इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंजूरी ज़मींदार से लेनी पड़ती थी।
(iii) पंचायत का खर्चा गाँव के उस आम खजाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। इस ख़जाने से उन कर अधिकारियों की खातिरदारी का खर्चा भी किया जाता था जो समय-समय पर गाँव का दौरा किया करते थे। दूसरी ओर इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था।
(iv) पंचायत का एक बड़ा काम यह तसल्ली करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहें।
(v) पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्यादा गंभीर दंड देने के अधिकार थे। समुदाय से बाहर निकालना एक कड़ा कदम था जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था। इसके तहत दंडित व्यक्ति को (दिए हुए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था।

अथवा

मुगलकाल के अध्ययन के स्रोत के रूप में आइन-ए-अकबरी’ के किन्हीं तीन सशक्त तथा दो कमजोर पहलुओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर : सशक्त पहलू : (i) आइन मुगल साम्राज्य के गठन और संरचना की मंत्रमुग्ध करने वाली झलकियाँ दिखाती है।
(ii) इसमें भारत के लोगों तथा मुगल साम्राज्य विस्तृत सूचनाएँ दर्ज हैं।
(iii) आइन में दिए गए कृषि से संबंधित सांख्यिकीय सूचनाएँ बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं।
(iv) आइन द्वारा दी गई सूचनाएँ मुगलकालीन इतिहास की रचना करने वाले इतिहासकारों के लिए बहुमूल्य हैं। कमजोर पहलू अथवा सीमाएँ : (i) जोड़ करने में कई त्रुटियाँ रह गई हैं।
(ii) सभी सूबों के आँकड़े समान रूप से एकत्रित नहीं किए जा सके।

प्रश्न 6, मुगल काल के प्रारंभ में भारतीय किसान बस्तियों के बसने तथा उजड़ने का विवरण ऐतिहासिक स्रोत के रूप में तुज्क-ए-बाबरी (बाबरनामा) के उल्लेखों के माध्यम का सहारा लेकर कीजिए।
उत्तर : मुगल काल के प्रारंभ में भारतीय किसान बस्तियों का बसना-उजड़ना तथा बाबर का दिया वृत्तांत :बाबर ने 1526 ई. में भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली थी। उसने सन् 1550 तक राज्य किया। इस दौरान उसने अपने संस्मरण तुज्क-ए-बाबरी के रूप में लिखे। उसका अध्ययन करने के उपरान्त पता चलता है कि उस समय भारतीय किसानों की बस्तियाँ प्रायः बसती तथा उजड़ती रहती थीं। इस संबंध में वातावारण में उल्लेख मिलता है कि यह हिंदुस्तानी कृषि समाज की एक विशेषता थी और इस विशेषता ने मुगल शासक बाबर की तेज़ निगाहों को इतना चौंकाया कि उसने इसे अपने संस्मरण बाबरनामा में नोट किया :
1.हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं। वर्षों से आबाद किसी बड़े शहर के बाशिंदे उसे छोड़कर चले जाते हैं, तो वे ये काम कुछ इस तरह करते हैं कि डेढ़ दिनों के अंदर उनका हर नामोनिशान (वहाँ से) मिट जाता है।
2.दूसरी ओर, अगर वे किसी जगह पर बसना चाहते हैं तो उन्हें पानी के रास्ते खोदने की जरूरत नहीं होती क्योंकि उनकी सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती हैं, और चूँकि हिंदुस्तान की आबादी बेशुमार है, लोग उमड़ते चले आते हैं।

प्रश्न 7. क्या मुगल भारत में खेती में कुल मिलाकर कोई विशेष वृद्धि हुई ? यदि नहीं तो क्यों ?
उत्तर : विद्वानों के अनुसार मुगल भारत में कृषि उत्पादन को लगातार सूखे और जागीरदारों द्वारा किसानों के शोषण के कारण बार-बार रुकावटें झेलनी पड़ीं। इसके फलस्वरूप वे निश्चयपूर्वक कहते हैं कि खेती में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई। हालाँकि पूर्वी बंगाल और तराई क्षेत्र में बंजर और वन भूमि के विशाल भागों पर खेती शुरू की गई लेकिन साथ ही साथ राज्यों के अत्याचारों के कारण अन्य क्षेत्रों को छोड़कर लोग जाने लगे। विद्वानों के अनुसार जनसंख्या भी वर्ष 1600-1800 के बीच 0.14 प्रतिशत की निम्न औसत वार्षिक दर पर बढ़ी।

प्रश्न 8. ग्राम समुदाय की मुख्य विशेषताओं का विवरण दीजिए।
उत्तर : ग्राम समुदाय की एक मुख्य विशेषता थी किसानों द्वारा व्यक्तिगत खेती। गाँव की जमीन के संयुक्त स्वामित्व का कोई प्रमाण नहीं है। प्रत्येक किसान को अपनी जमीन और फसल के अनुसार व्यक्तिगत रूप से कर देना होता था। हालांकि गाँव के लोगों को उत्पादन शहरों से नहीं के बराबर प्राप्त होता था लेकिन उनकी उपज का एक बड़ा हिस्सा शहरी बाजार में पहुँचता था इस प्रकार गाँव बाजारी शक्तियों के प्रभाव में आ सकता था। समान हित वाले मामलों में गाँव के लोग एक समूह के रूप में कार्य करते थे। जैसा कि विद्वान कहते हैं वे राज्य को भू-राजस्व । देने में सामूहिक रूप से निष्ठावान या निष्ठाहीन थे।
उनका समान वित्तीय कोष भी था जिससे वे गाँव के खर्च का भार उठाते थे। उदाहरण के लिए, गाँव के लेखों का रख-रखाव करने के लिए वे मिलकर पटवारी को रखते, नहरें बनाने और गाँव के लोगों को धार्मिक लाभ और मनोरंजन प्रदान कराने के लिए मिलकर कार्य करते थे।

प्रश्न 9. 16वीं और 17वीं सदियों के मुगलकाल में जंगलवासियों के जीवन जीने के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर : (i) मुगल राजनीतिक विचारधारा के अनुसार सबको न्याय प्रदान करना राज्य का मुख्य उत्तरदायित्व था। अतः शिकार के बहाने मुगल शासक साम्राज्य के विभिन्न भागों में जाते थे और जंगलवासियों की समस्याओं तथा शिकायतों का समाधान करते थे।
(ii) 16वीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की बंगाली कविता चंडीमंगल के अनुसार कृषि बस्तियों के लिए जंगलों का सफाया किया गया। इससे जंगलवासियों के लिए जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करना आसान नहीं रहा।
(iii) कुछ कबीलों के सरदार जमींदार और राजा बन गए। अपने ही खानदान के सदस्यों में से सेना का निर्माण किया जैसे सिंध में कबीलाई सेना में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सैनिक थे। इसी प्रकार असम में अहोम राजा के अपने पायक होते थे जो जमीन के बदले सैनिक सेवा प्रदान करते थे। अहोम राजाओं का हाथी पकड़ने पर भी एकाधिकार था।

प्रश्न 10. “जमीन से मिलने वाला राजस्व मुगल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी।” इस कथन की परख कीजिए।
उत्तर : (i) भू-राजस्व मुगल साम्राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। इसलिए कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रखने के लिए और तेजी से फैलते साम्राज्य में राजस्व के आकलन तथा वसूली के लिए एक प्रशासनिक तंत्र का होना आवश्यक था।
(ii) सरकार ने ऐसी हर संभव व्यवस्था की जिससे राज्य में सारी कृषि योग्य भूमि की जुताई सुनिश्चित की जा सके।
(iii) इस तंत्र में ‘दीवान’ की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख-रेख की जिम्मेदारी उसी के विभाग पर थी। इस प्रकार हिसाब-किताब रखने वाले और राजस्व अधिकारी कृषि संबंधों को नया रूप देने में एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरे।

प्रश्न 11. ‘ग्रामीण भारत में बसे हुए लोगों की खेती के अलावा भी बहुत कुछ था। कथन को मुगल काल के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : (i) ईस्ट इंडिया कंपनी के भी बहुत-से दस्तावेज हैं हैं। जो पूर्वी भारत में कृषि-संबंधों पर प्रकाश डालिए इन सभी स्रोतों में किसानों, जमींदारों और राज्य के बीच समय-समय पर होने वाले संघर्षों के ब्यौरे दर्ज हैं।
(ii) 17वीं शताब्दी के स्रोत दो प्रकार के किसानों की जानकारी देते हैं-खुद-काश्त तथा पाहि-काश्त। पहले प्रकार के किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी जमीन थी। पाहि-काश्त वे किसान थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे।
(iii) खेती व्यक्तिगत स्वामित्व के सिद्धांत पर आधारित थी। किसानों की जमीन उसी तरह खरीदी-बेची जा सकती थी जैसे अन्य संपत्ति धारकों की।
(iv) सिंचाई साधनों के विकास में राज्य की सहायता भी मिलती थी। पंजाब में शाह नहर इसका उदाहरण है। किसान कृषि में ऐसी तकनीकों का प्रयोग भी करते थे जो प्रायः पशुबल पर आधारित होती थी।
(v) खेती मौसम के दो मुख्य चक्रों के दौरान की जाती थी-एक खरीफ (पतझड़ में) और दूसरी रबी (वसंत में)। सूखे इलाकों और बंजर जमीन को छोड़कर अधिकतर स्थानों पर साल में कम-से-कम दो फसलें उगाई जाती थीं।
(vi) 17वीं शताब्दी में बाहरी संसार से कई नई फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँची। मक्का भारत में अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्जियाँ भी नई दुनिया से भारत पहुँचीं।
(vii) किसान का अपनी जमीन पर व्यक्तिगत स्वामित्व होता था। जहाँ तक इनके सामाजिक अस्तित्व का प्रश्न है, वे एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का अंग थे। इस समुदाय के तीन घटक थे-खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया।
(viii) पशुपालन और बागवानी में बढ़ते मुनाफे के कारण अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं। पूर्वी प्रदेशों में पशुपालक तथा मछुआरी जातियाँ भी किसानों जैसी सामाजिक स्थिति पाने लगीं।
(ix) कुम्हार, लोहार, बढ़ई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे। गाँव वाले इन दस्तकारों को उनकी सेवाओं के बदले अपनी फसल का एक हिस्सा दे देते थे या फिर बेकार पड़ा खेती लायक जमीन का एक टुकड़ा।
(x) मुगलकाल में महिलाएँ और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे पुरुष खेत जोतते थे तथा हल चलाते थे, जबकि महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई के साथ-साथ पकी हुई फसल से दाना निकालने का काम करती थी।

प्रश्न 12. अकबर के शासन काल में भू-राजस्व व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1. अकबर के भू-राजस्व संबंधी सुधार (Akbar s Revenue Reforms) : एक कुशल प्रशासनिक होने के नाते अकबर समझता था कि जब तक भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, राजकीय कोष रिक्त ही रहेगा क्योंकि भू-राजस्व ही राजकीय आय का सबसे बड़ा स्रोत था। इसलिए उसने राजा टोडरमल से इस संबंध में सहायता ली। अकबर जानता था कि शेरशाह के काल में भी टोडरमल ने अभूतपूर्व भू-सुधार किए थे।
2.टोडरमल का जब्ती प्रबंध (Jabti System Of Todermal): 1581 ई. में अकबर ने टोडरमल की भू-व्यवस्था जब्ती प्रणाली लागू कर दी। इस व्यवस्था के अधीन आने वाले प्रदेश थे-अवध, आगरा, इलाहाबाद, दिल्ली, मालवा, अजमेर, लाहौर, मुल्तान आदि।
3.भूमि की पैमाइश (Measurement of Land) : समस्त कृषि योग्य भूमि की नाप करवाई गई। उसने रस्सी के गजों के स्थान पर 41 अंगुल वाले बाँस के गज का प्रयोग किया। बास के सिरों पर पहले छल्ले लगे हुए थे। समस्त कृषि योग्य भूमि को 182 भागों में बाँटकर, प्रत्येक भाग को अमलगुजार नामक अधिकारी के अधीन कर दिया गया।
4.भूमि का वर्गीकरण (Classification of Land) : उत्पादक क्षमता के आधार पर भूमि का वर्गीकरण किया गया : (i) पोलज (Polege): जिस भूमि पर हर साल बुआई होती थी। (ii) परती (Parti) : जिस भूमि पर कुछ वर्षों बुआई न हुई हो। (ii) चर्चर (Chaciar) : दो या तीन साल के बाद बोई गई भूमि। (iv) बंजर (Banjar): अधिक समय तक खाली पड़ी भूमि को बंजर कहा जाता था।
5.औसत उपज के 1/3 भू भाग पर राज्य का अधिकार होता था किंतु इस मात्रा में भूमि की उत्पादकता तथा कर निर्धारण की पद्धति के अनुसार अंतर भी होता रहता था।
6.दहसाला प्रणाली में दस सालों के लिए एक ही दर के कर निर्धारित नहीं किए जाते थे। यह स्थिर भी नहीं होती थी। इसी तरह से जब्ती प्रणाली को भी टोडरमल की सहायता से लागू किया गया था।

प्रश्न 13. कृषक वर्ग के संदर्भ में मुगलों विशेषकर अकबर की भू-राजस्व नीति की समीक्षा कीजिए ।
उत्तर : कृषक वर्ग या कृषि की स्थिति (Position of Peasantary class or condition of agriculture) : कृषि लोगो का मुख्य व्यवसाय था। अकबर ने अपने राजस्व-प्रबंध अथवा भूमि प्रबंध (Land-Revenue System) से किसानों की दशा सुधारने का काफी प्रयत्न किया। उसने किसानों की भलाई के लिये भूमि की पैमाइश करवाई, उपज के अनुसार भूमि को चार भागों में बॉटा, सरकारी भाग को निश्चित किया तथा अनेक योग्य अधिकारी नियुक्त किये ताकि कोई भी किसानों को ठग न सके। स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए उसने किसानों को सुविधा के लिए जब्ती, बटाई और नसक आदि अनेक लगान पद्धतियाँ प्रारम्भ की। इसके अतिरिक्त उसने किसानों के लाभ के लिए सिंचाई को ठीक करने के लिए नहरें और तालाब बनवाये तथा नदियों पर बाँध बनाये गये। निःसन्देह अकबर के इन प्रयत्नों से किसानों की दशा कुछ अवश्य सुधरी, परन्तु इसके बाद उनकी स्थिति फिर शुरू हो गई और किसान का जीवन गरीबी के दायरे में सीमित होकर रह गया। लगातार युदधों तथा फौजों के इधर-उधर आने-जाने से उनकी फसलों को काफी हानि होती थी। बहुत रोक लगाने पर भी सरकारी अधिकारी प्राय: उन्हें तंग ही करते रहते थे। कृषि का दारोमदार वर्षा पर ही था। कभी वर्षा नहीं होती थी तो देश में अकाल पड़ जाते थे और कृषकों की अवस्था और भी बुरी हो जाती थी। मुगल सम्राट् लोगों की सहायता करने का अवश्य प्रयत्न करते थे, परन्तु एक तो यातायात । के साधन इतने ठीक न होने के कारण और दूसरे सहायता के का होने के कारण, बहुत से लोग भूख से मर जाते थे। ऐसी अवस्था में किसान बेचारे कैसे ऊपर उठ सकते थे। इसलिए उनकी गणना प्रायः समाज के निम्न वर्गों में ही की जाती थी।

प्रश्न 14. अब्दुल फल की ‘आइन-ए-अकबरी’ के आधार पर कृषि उत्पाद एवं कृषक वर्ग का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-मुगलकाल में आर्थिक जीवन पर अबुल फजल की ।’आइन-ए-अकबरी’ और विभिन्न विदेशी यात्रियों के विवरणों से। विस्तृत प्रकाश पड़ता है। कृषि उत्पाद एवं कृषक वर्ग (Agricultural produc tion and peasantary class):आइन-ए-अकबरी’ में रबी (बसन्त) की 16 फसले तथा खरीफ (शरद ऋतु) की 25 फसलों का उल्लेख है। मुख्य खाद्य पदार्थ गेहूँ, चावल, बाजरा, दाले थी। बयाना (आगरा के निकट), सरखेज (गुजरात) में सर्वोत्तम प्रकार की नील का उत्पाद किया जाता था; भारत में तम्बाकू और आलू 1605 ई. में पुर्तगालियों द्वारा लाये गए थे; मक्का भी इसी समय अमरीका से गव भारत लाया गया था। शाहजहाँ ने अकाल से निपटने के लिए नहरों की व्यवस्था सिंचाई हेतु की थी; उसने नहर-ए-फैज (रावी नहा 150 किमी. लम्बी लाहौर तक) का निर्माण कराया था शाहजहाँ हैं द्वारा निर्मित दूसरी नहर ‘नहर-ए-साहिब’ थी। मुगल काल की वक तिजारती (नकदी) फसलें गन्ना, कपास, नील, रेशम आदि थीं मुगलकालीन कृषक वर्ग प्रमुखतः तीन श्रेणियों में विभक्त था-
(i) खुदकाश्त : वे खेतिहर जो उसी गाँव की भूमि पर खेत करते थे जहाँ के वे निवासी होते थे, इन्हें अपनी भूमि पर स्थान एवं वंशानुगत स्वामित्व प्राप्त होता था।
(ii) पाहीकाश्त : वे किसान जो दूसरे गाँवों में अस्थायी ह से जाकर बंटाईदार के रूप में खेती करते थे।
(iii) मुजारियान : वे खुदकाश्त की जमीन को क्या (बंटाई) पर लेकर खेती करते थे।

प्रश्न 15, मुगल युग के अध्ययन के एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में ‘आइन-ए-अकबरी’ की तीन शक्ति और दो कमजोरियों (अर्थात् गुणों एवं दोषों ) की व्याख्या कीजिए।

अथवा

अकबर वे शासनकाल वे स्रोत के रूप में आइन-ए-अकबरी’ के महत्त्व तथा सीमाओं की समीक्षा कीजिए।
उत्तर : ‘आइन-ए-अकबरी’ आँकड़ों के वर्गीकरण के एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी जिसका जिम्मा बादशाह अकबर के आदेश पर अबुल फज्ल ने उठाया था। अकबर के शासन के 42वें वर्ष 1598 में पाँच संशोधनों के बाद इसे पूरा किया गया। यह ‘बाबरनामा’ की तीसरी जिल्द अथवा खंड हैं। इसके प्रमुख तीन गुण अथवा शक्तियाँ इस प्रकार हैं :
(i) ‘आइन-ए-अकबरी’ को शाही नियम-कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र की सूरत में संकलित किया गया था।
(ii) ‘आइन’ कई बातों पर विस्तार से चर्चा करती है, जैसे-दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन, राजस्व के स्रोत, प्रान्तों के भूगोल और लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक व धार्मिक रिवाज।
(iii) ‘आइन’ पाँच भागों का संकलन है-जिसके पहले तीन भाग प्रशासन का विवरण देते हैं। प्रथम भाग-मंजिल – आबादी, द्वितीय भाग-सिपह आबादी और तृतीय भाग मुल्क आबादी है। चौथे और पाँचवें भाग भारत के लोगों के मजहबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से ताल्लुक रखते हैं। इनके आखिर में अकबर के “शुभ वचनों” का एक संग्रह भी है ” के दो प्रमुख दोष इस प्रकार हैं : 11 आइन-ए-अकबरी”
दोष : (i) ‘आइन-ए-अकबरी’ में अंकगणितीय जोड़ में कई गलतियाँ पाई गई हैं। आमतौर पर ये गलतियाँ मामूली हैं और एक व्यापक स्तर पर कृति के आँकड़ों की सच्चाई को कम नहीं करतीं।
(ii) ‘आइन-ए-अकबरी’ में संख्यात्मक आँकड़ों में विषमताएँ हैं। सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में नहीं एकत्रित किए गए। कीमतों और मजदूरी की दरों की जो विस्तृत सूची ‘आइन’ में दी गई है वह साम्राज्य की राजधानी आगरा या इसके इर्द-गिर्द के इलाकों से ली गई है। जाहिर है कि देश के बाकी हिस्सों के लिए इन आँकड़ों की प्रासंगिकता सीमित है।

प्रश्न 16. जमींदार के जीवन की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

अथवा

मुगलकालीन भारत में जमींदारों द्वारा सामाजिक व आर्थिक सुविधाओं को भोगने के दो कारण लिखिए।
उत्तर : 1. सामाजिक दृष्टि से मुगलकालीन भारत में जमींदारों का एक विषय जातीय वर्ग था। कुछ जमींदार बहुत छोटे होते थे और कुछ बहुत बड़े। अलग-अलग स्थानों पर इनके अधिकार और उत्तरदायित्व अलग-अलग थे। कुछ क्षेत्रों में वे भू-राजस्व के मुख्य साधन थे जबकि अन्य क्षेत्रों में वे मुगल सम्राट को नजराने देने वाले थे।
2.जमींदारों को कई मदों पर खर्चा करना पड़ता था और कई साधनों में उनकी आमदनी होती थी। भूमि कर के अतिरिक्त उन्हें उत्पादन में हिस्सा (जो महसूल कहलाता था) हुक्कू-ए-जमींदारी के रूप में भी आमदनी मिलती थी और हक-ए-मिल्कियत से भी उन्हें आय मिलती थी। वह अपनी आमदनी से अपने और अपने परिवार का खर्च चलाते थे। सेना रखते थे, घोड़ों और सैनिक समान पर खर्च करते थे।
3.जमींदार खुद काश्तकारों से भू-राजस्व वसूल करते थे और पहले से ही तय की गई रकम अधिकारियों को देते थे। प्रायः जमींदार अधिकारियों को अपनी आय का 1/10 भाग देते थे।
4.जमींदारों के जीवन-स्तर के बारे में राय प्रकट करना कठिन कार्य है। इतिहासकार सतीशचंद्र के अनुसार जागीरदारों की तुलना में जमींदारों की आय सीमित थी।
5.चाहे छोटे जमींदार कमोबेश काश्तकारों की तरह ही जीवन-यापन करते हों, किंतु बड़े जमींदारों का जीवन-स्तर तो निश्चित रूप से जागीरदारों के जीवन-स्तर से होड़ करता था, क्योंकि उनके व्यय का अधिकांश हिस्सा स्पष्ट उपभोग के काम आता था। अधिकांश जमींदार प्रत्यक्ष: ग्रामीण क्षेत्र में रहते थे और सतीश चंद्र के शब्दों में, उनका जीवन “डुलमुल स्थानीय कुलीन वर्ग” का सा था।

प्रश्न 17. ग्राम पंचायत की संरचना स्पष्ट कीजिए । यह अपने उपलब्ध कोषों का उपयोग कैसे करती थी ?
उत्तर : संरचना : गाँव की पंचायत गाँव के बुजुर्गों की सभा होती थी। प्राय: वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी संपत्ति होती थी। जिन गाँवों में विभिन्न जातियों के लोग रहते थे, वहाँ पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी। यह एक ऐसा अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों को प्रतिनिधित्व प्राप्त होता था। पंचायत का निर्णय गाँव में सबको मानना पड़ता था।
उपलब्ध कोष का उपयोग : पंचायत का खर्चा गाँव के एक ऐसे कोष से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। इसे पंचायत का आम कोष कहा जाता था। इसका उपयोग निम्नलिखित ढंग से किया जाता था : (1) समय-समय पर गाँव का दौरा करने वाले अधिकारियों की आवभगत का खर्चा इसी खजाने से किया जाता था।
(2) इसी कोष से मुकद्दम तथा गाँव के चौकीदार को वेतन दिया जाता था।
(3) इस कोष का प्रयोग बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था।
(4) इसी कोष से ऐसे सामुदायिक कार्यों के लिए भी खर्चा होता था जो किसान स्वयं नहीं कर सकते थे, जैसे कि मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना।

प्रश्न 18, मुगल ग्रामीण समाज में एक मुख्य घटक के तौर पर पंचायतों की भूमिका की परख कीजिए।
उत्तर : (i) गाँव की पंचायत में बुजुर्गों का जमावड़ा होता था। आमतौर पर वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अक्सर पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी। यह एक ऐसा अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। फिर भी इसकी संभावना कम ही है कि छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मजदूरों के लिए इसमें कोई जगह होती होगी। पंचायत का फैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।
(ii) पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे मुकद्दम या मंडल कहते थे। कुछ स्रोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था और इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंजूरी ज़मींदार से लेनी पड़ती थी।
(iii) पंचायत का खर्चा गाँव के उस आम खजाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। इस ख़जाने से उन कर अधिकारियों की खातिरदारी का खर्चा भी किया जाता था जो समय-समय पर गाँव का दौरा किया करते थे। दूसरी और इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था।
(iv) पंचायत का एक बड़ा काम यह तसल्ली करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहें।
(v) पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्यादा गंभीर दंड देने के अधिकार थे। समुदाय से बाहर निकालना एक कड़ा कदम था जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था इसके तहत दंडित व्यक्ति को (दिए हुए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था।

प्रश्न 19. 16वीं तथा 17वीं शताब्दियों में ग्राम पंचायतों के कार्यों और अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : पंचायत का एक बड़ा काम यह देखना था कि गाँव में रहने वाले सभी समुदायों के लोग अपनी जाति की सीमाओं के अंदर रहें। पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की उपस्थिति में होती थीं। “जाति की अवहेलना को रोकने के लिए” लोगों के आचरण पर नजर रखना गाँव के मुखिया की एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। इस उद्देश्य से पंचायतों को जुर्माना लगाने तथा किसी दोषी को समुदाय से निष्कासित करने जैसे अधिकार प्राप्त थे। समुदाय से बाहर निकालना एक कड़ा कदम था जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था। इसके अंतर्गत दंडित व्यक्ति को दिए गए समय के लिए गाँव छोड़ना पड़ता था। इस दौरान वह अपनी जाति तथा व्यवसाय से हाथ धो बैठता था। ऐसी नीतियों का उद्देश्य जातिगत रिवाजों की अवहेलना को रोकना था।

प्रश्न 20. 17वीं शताब्दी के दौरान उत्तर भारत के एक औसत किसान की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर : उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास एक जोड़ी बैल और दो हल से अधिक कुछ नहीं होता था। अधिकतर किसानों के पास इससे भी कम था। गुजरात में जिन किसानों के पास 6 एकड़ तक जमीन थी वे समृद्ध माने जाते थे। दूसरी ओर बंगाल में एक औसत किसान की जमीन की ऊपरी सीमा 5 एकड थी। वहाँ 10 एकड़ जमीन वाले किसान को धनी माना जाता था। खेती व्यक्तिगत स्वामित्व के सिद्धांत पर आधारित थी। किसानों की जमीन उसी तरह खरीदी और बेची जाती थी जैसे अन्य संपत्ति धारकों की। 19वीं शताब्दी के दिल्ली- आगरा क्षेत्र में किसानों की भू-संपत्ति का नीचे दिया गया विवरण 17वीं शताब्दी पर भी उतना ही लागू होता है। “हल जोतने वाले खेतिहर किसान पर जमीन की सीमा पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं। जमीन के ऐसे हजारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं।”

प्रश्न 21 कृषि समाज में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।

अथवा

मुगल साम्राज्य में कृषि महिलाओं की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर : उत्पादन की. प्रक्रिया में पुरुष और महिलाएँ विशेष प्रकार की भूमिकाएं निभाते हैं। मुगलकाल में भी महिलाएँ और पुरुष कंधे-से-कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे। पुरुष खेर तते थे तथा हल चलाते थे, जबकि महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई के साथ-साथ पकी हुई फसल से दाना निकालने का काम करती थीं। छोटी-छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती का विकास होने पर घर-परिवार के संसाधन और श्रम उत्पादन का आधार बन गए। ऐसे में लिंग बोध के आधार पर किया जाने वाले अंतर (घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए पुरुष) संभव नहीं था। फिर भी महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर लोगों के मन में पूर्वाग्रह बने रहे। उदाहरण के लिए पश्चिमी भारत में मासिक-धर्म वाली महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की अनुमति नहीं थी। इसी प्रकार बंगाल में अपने मासिक धर्म के समय महिलाएँ पान के बागान में प्रवेश नहीं कर सकती थीं।
सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने और गूंथने तथा कपड़ों पर कढ़ाई जैसे दस्तकारी के काम महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। किसी वस्तु का जितना अधिक वाणिज्यीकरण होता था, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की माँग उतनी ही अधिक होती थी। वास्तव में किसान, दस्तकार और महिलाएँ जरूरत पड़ने पर न केवल खेतों में काम करती थीं बल्कि काम देने वालों के घरों पर भी जाती थीं और बाजारों में भी।

प्रश्न 22. वाणिज्यिक खेती के प्रसार ने जंगलवासियों के जीवन को कैसे प्रभावित किया ?
उत्तर : वाणिज्यिक खेती का प्रसार एक ऐसा बाहरी कारक था जो जंगलवासियों के जीवन को भी प्रभावित करता था। शहद, मधुमोम और लाख आदि जंगली उत्पादों की बहुत माँग थी। लाख जैसी कुछ वस्तुएँ तो 17वीं शताब्दी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं। हाथी भी पकड़े और बेचे जाते थे। व्यापार में वस्तुओं की अदला- बदली भी होती थी। पंजाब के
लोहानी कबीले जैसे कुछ कबीले भारत और अफगानिस्तान के बीच होने वाले जमीनी व्यापार में लगे थे। वे पंजाब के गाँवों और शहरों के बीच होने वाले व्यापार भी हिस्सा लेते थे।

प्रश्न 23. अबुल फज्ल के उन गुणों का वर्णन कीजिए जिनसे प्रभावित होकर अकबर ने उनको अपना सलाहकार और अपना प्रवक्ता नियुक्त किया। उसके एक प्रमुख ग्रंथ का नाम लिखिए।
उत्तर-अबुल फज्ल के गुणों का वर्णन जिनसे प्रभावित होकर अकबर ने उनको अपना सलाहकार और अपना प्रवक्ता नियुक्त किया वे निम्नलिखित प्रकार हैं :
(क) अबुल फज्ल का पालन-पोषण मुगल राजधानी आगरा में हुआ। वह अरबी, फारसी, यूनानी दर्शन और सूफीवाद में पर्याप्त निष्णात था।
(ख) वह एक प्रभावशाली विवादी तथा स्वतंत्र चितंक था जिसने लगातार दकियानूसी उलमा के विचारों का विरोध किया। अकबरनामा उनका एक प्रमुख ग्रंथ था।

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