Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 8 Important Question Answer 8 Marks किसान, जमींदार और राज्य (कृषि समाज और मुगल साम्राज्य)

प्रश्न 1. अबुल फजल की आइन-ए-अकबरी हमें मुगलकाल के किन-किन पक्षों की जानकारी देती है ?
उत्तर : आइन-ए-अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का परिणाम थी। इस परियोजना को पूरा करने का जिम्मा बादशाह अकबर के आदेश पर अबुल फजल ने उठाया था। अकबर के शासन के 42वें वर्ष अर्थात् 1598 ई० में पाँच संशोधनों के बाद इसे पूरा किया गया। आइन इतिहास लेखन की एक बृहत्तर परियोजना का भाग थी जिसकी पहल अकबर ने की थी। इस परियोजनास का परिणाम था ‘अकबरनामा’ जिसे तीन जिल्दों में रचा गया। पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान प्रस्तुत की गई है। तीसरी जिल्द ‘आइन-ए-अकबरी’ अथवा ‘आइन’ को शाही नियम-कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र के रूप में संकलित किया गया था।आइन कई मामलों पर विस्तार से चर्चा करती है
(i) दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन
(ii) राजस्व के स्रोत और अकबर के साम्राज्य के प्रांतों का भूगोल
(iii) लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक रीति-रिवाज।
अकबर की सरकार के सभी विभागों और प्रांतों (सूबों) के बारे में विस्तार से जानकारी देने के अतिरिक्त ‘आइन’ इन सूबों के बारे में जटिल और आँकड़े बद्ध सूचनाएँ बड़ी बारीकी से देती है।

इन सूचनाओं को इकट्ठा करके उन्हें क्रमबद्ध तरीके से संकलित करना एक महत्त्वपूर्ण शाही प्रक्रिया थी। इसमें बादशाह को साम्राज्य के सभी इलाकों में प्रचलित रिवाजों और व्यवस्थाओं की जानकारी दी। इस प्रकार हमारे लिए आइन अकबरकालीन मुगल साम्राज्य के बारे में सूचनाओं की अमूल्य खान है। फिर भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आइन का क्षेत्रों के बारे में दृष्टिकोण केंद्र का दृष्टिकोण है। हम यूँ भी कह सकते हैं कि यह समाज के शीर्ष से देखी गई समाज की तस्वीर है।
आइन के दफ्तर : आइन पाँच भागों (दफ्तरों) का संकलन है। इसके पहले तीन भाग प्रशासन का विवरण देते हैं।
(1) ‘मंजिल आबादी’ के नाम से पहली किताब शाही परिवार और उसके रख-रखाव से संबंध रखती है।
(2) दूसरा भाग ‘सिपह-आबादी’ है। यह सैनिक एवं नागरिक प्रशासन और नौकरों की व्यवस्था के बारे में है। इस भाग में शाही अफसरों (मनसबदारों) विद्वानों, कवियों और कलाकारों की संक्षिप्त जीवनियाँ शामिल हैं।
(3) आइन का तीसरा भाग ‘मुल्क-आबादी’ है। यह केंद्र एवं प्रांतों के वित्तीय पहलुओं तथा राजस्व की दरों की विस्तृत जानकारी देता है। इसके अतिरिक्त इसमें बारह प्रांतों का वर्णन भी है। इस खंड में आंकड़ों संबंधी सूचनाएँ विस्तार से दी गई हैं । इसमें सूबों (प्रांतों) और उनकी सभी प्रशासनिक एवं वित्तीय इकाइयों (सरकार, परगना और महल आदि) के भौगोलिक, स्थालाकृतिक तथा आर्थिक रेखाचित्र भी शामिल हैं। इसी खंड में प्रत्येक प्रांत और उसकी अलग-अलग इकाइयों की कुल मापी गई जमीन तथा निर्धारित राजस्व (जमा) की जानकारी भी दी गई है।
सूबा स्तर की विस्तृत जानकारी देने के बाद आइन हमें सूब के नीचे की इकाई ‘सरकार’ के बारे में विस्तार से बताती है ये सूचनाएँ तालिका के रूप में दी गई हैं। प्रत्येक तालिका में आठ खाने हैं जो हमें निम्नलिखित सूचनाएँ देते हैं
(1) परगनात/महल
(2) किला
(3) अराजी और जमीन-ए-पाईमूल (मापे गए इलाके)
(4) नकदी (नकद निर्धारित राजस्व)
(5) सुयूरगल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान)
(6) जमींदार
7वें तथा 8वें खानों में जमींदारों की जातियाँ और उनके घुड़सवारों, पैदल सिपाहियों तथा हाथियों सहित उनकी कुल सेना की जानकारी दी गई है।
मुल्क-आबादी’ उत्तर भारत के कृषि समाज का विस्तृत एवं आकर्षक चित्र पेश करता है।
(4) चौथी और पाँचवीं किताबें भारत के लोगों के धार्मिक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से संबंध रखती हैं। इनके अंत में अकबर के “शुभ वचनों” का एक संग्रह भी है।

प्रश्न 2. 16वीं तथा 17वीं शताब्दियों के दौरान ग्रामीण दस्तकारों तथा किसानों के बीच आपसी संबंधों की चर्चा कीजिए। यह भी बताइए कि ग्रामीण समुदाय का क्या महत्त्व था ?

अथवा

सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में ग्रामीण शिल्पकारों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 16वीं तथा 17वीं शताब्दी में गाँवों में काफी संख्या में शिल्पकार रहते थे। अंग्रेजी शासन के आरंभिक वर्षों में किए गए गाँवों के सर्वेक्षण और मराठों के दस्तावेजों से पता चलता है कि किसी-किसी गाँव में तो कुल घरों के 25 प्रतिशत घर दस्तकारों के थे।
कभी-कभी किसानों और दस्तकारों के बीच अंतर कर पाना कठिन हो जाता था, क्योंकि कई ऐसे समूह थे जो दोनों प्रकार के कार्य करते थे। खेतिहर और उसके परिवार के सदस्य कई प्रकार की वस्तुओं के उत्पादन में भाग लेते थे। इनमें रंगरेजी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बर्तनों को पकाना, खेती के औजार बनाया या उनकी मरम्मत करना आदि कार्य शामिल थे क्योंकि खेती का काम सालभर नहीं होता था; इसलिए खाली महीनों में खेतिहर दस्तकारी का काम करते थे।
सेवाएँ तथा सेवाओं की पूर्ति : कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे। गाँव वाले अलग-अलग तरीकों से सेवाओं की पूर्ति करते थे। वे या तो उन्हें फसल का एक हिस्सा। সूव / दे देते थे या फिर गाँव की जमीन का एक टुकड़ा। पूर्ति का तरीका । संभवत: पंचायत ही तय करती थी। महाराष्ट्र में दस्तकारों के मिली जमीन उनका मीरास या वतन बन गई जिस पर उनका पैतृक अधिकार होता था। यही व्यवस्था कुछ बदले हुए रूप में भी प्रचलित थी। इसमें दस्तकार तथा प्रत्येक खेतिहर परिवार आपसी बातचीत द्वारा सेवाओं की पूर्ति का तरीका स्वयं निश्चित Re कर लेते थे। ऐसी व्यवस्था में आमतौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। उदाहरण के लिए 18वीं शताब्दी में बंगाल दे र में जमींदार, लोहारों, बढ़ई और सुनारों को उनकी सेवाओं के बदले “रोज का भत्ता और खाने के लिए नकदी” देते थे। इस व्यवस्था को ‘जजमानी’ कहते थे। इन ग्रामीण समुदाय का महत्त्व : ग्रामीण समुदाय का बहुत अब अधिक महत्त्व था। 19वीं शताब्दी के कुछ अंग्रेज अफसरों ने भारतीय गाँवों को एक ऐसा “छोटा गणराज्य” माना जिसमें लोग सामूहिक भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे। परंतु ऐसा नहीं लगता कि गाँव में सामाजिक समानता थी। संपत्ति पर व्यक्तिगत स्वामित्व होता था। जाति और लिंग के नाम पर भी समाज में गहरी विषमताएँ पाई पाई जाती थी| कुछ शक्तिशाली लोग गाँव के मामलों पर फैसले लेते थे और कमजोर वर्गों का शोषण करते थे। न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं को प्राप्त था। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गाँवों और शहरों के बीच व्यापार के कारण गाँवों में भी नकदी लेन-देन होने लगा था। मुगलों के केंद्रीय प्रदेशों में भी कर की गणना और वसूली नकद में की जाती थी। दो दस्तकार निर्यात के लिए उत्पादन करते थे, उन्हें उनकी मजूदरी अथवा पूर्व भुगतान नकद में ही दिया जाता था। इसी तरह कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फसलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकदी में ही होता था।

प्रश्न 3. जब्ता प्रणाली की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएँ बताइए।
उत्तर : जब्ता प्रणाली की पृष्ठभूमि (Background of Zabta System) : अकबर से पूर्व भूमि-कर तय करने की कोई वैज्ञानिक विधि नहीं थी। भूमि की किस्म, भूमि में उत्पादित फसल एवं भूमि के नाप को ध्यान में रखे बिना ही भूमि कर तय कर दिया जाता था। इससे सरकार एवं किसानों को ही हानि थी। किसानों को लगान तय करने वाले अधिकारी दुखी करते थे। वे किसानों से लगान कम करने की घूस माँगते थे। जिससे भ्रष्टाचार फैलता था तथा सरकार को पूरी आय प्राप्त नहीं होती थी। अकबर ने इन दोषपूर्ण परिस्थितियों से निपटने के लिए शेहशाह सूरी कालीन टोडरमल जैसे अनुभवी व्यक्ति को नियुक्त किया। भूमि कर व्यवस्था के सुधार के काम में उसने बहुत योगदान दिया। इसीलिए अकबर की इस प्रारम्भिक भू व्यवस्था को टोडरमल की व्यवस्था के नाम से पुकारा जाता है। कभी-कभी इसे जब्ता प्रणाली (आदर्श या नियमानुमोदित प्रणाली) या बन्दोबस्त भी कहते हैं क्योंकि यह प्रणाली भूमि- माप। और उपज की मात्रा के आधार पर कुछ नियमों पर निर्धारित थी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।
टोडरमल की भूमि- व्यवस्था या जब्ता प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ (Main features of Todar Mal’s Land Revenue System or Zabta System): 1. भूमि को नपवाना (Measurement of Land) -अकबर ने सबसे पहले सारी कृषि योग्य भूमि को नपवाया। इससे कृषिपत योग्य कुल भूमि की ठीक मात्रा का ज्ञान सरकार को प्राप्त हो गया।
2.कृषि भूमि का वर्गीकरण (Classification of Agricultural Land Tax one-third of total produce): अकबर ने सारी कृषि योग्य भूमि को चार भागों में बँटवाया :
(क) पोलज भूमि : जो भूमि सबसे अधिक उपजाऊ होती थी और उस पर हर वर्ष खेती की जाती थी।
(ख) परती या पड़ोती भूमि : यह भूमि पोलज भूमि से कम उपजाऊ होती थी तथा इस भूमि को एक फसल लेने के बाद दो या तीन फसलों (एक या डेढ़ वर्ष) के लिए खाली छोड़ दिया जाता था।
(ग) चाचर भूमि : जिस भूमि को एक फसल लेने के बाद तीन या चार वर्षों तक खाली छोड़ दिया जाता था।
(घ) बंजर : जो भूमि प्रायः खाली पड़ी रहती थी लेकिन कभी-कभी जिस पर खेती कर ली जाती थी। भूमि के वर्गीकरण से सरकार को पता चल गया कि किस किसान के पास किस किस्म की कितनी भूमि है। इससे सरकार को अपनी आमदनी का पूर्व अनुमान लगाने में आसानी हो गयी।
3. उपज कर 1/3 भाग लगान में (One-third of total produce) : अकबर ने तय किया कि सरकार किसानों से उपज का 1/3 भाग लगान के रूप में वसूल करेगी।
4.अनाज या मुद्रा में जमा कराने की छूट (Liberty to deposit in Cash or Kinds) : शेरशाह सूरी के काल की तरह अकबर के युग में भी किसानों को छूट दी गई कि वे चाहें तो सरकारी खजाने में अनाज के रूप में या नकदी के रूप में कर जमा करा सकते थे लेकिन सरकार प्रायः लगान नकद लेना चाहती थी ताकि अनाज के रूप में लगाने लेने के बाद की ( जैसे गोदामों की व्यवस्था, अनाज की श्रेष्ठता एवं एकरूपता के बनाये रखने आदि) समस्याएँ न पैदा हों।

प्रश्न 4. दहसाला प्रणाली पर एक लेख लिखिए ।
उत्तर : अकबर द्वारा दहसाला ( या दससाला) प्रणाली को अपनाना (To adopt Dahsala or Ten years System by Akbar)-(क) कब (When)- वास्तविक उपज, स्थानीय कीमतों,उत्पादकता आदि के बारे में कानूनगों से प्राप्त जानकारी के आधार पर अकबर ने एक नई प्रणाली शुरू की (1580 ई.) जिसे दहसाला (दससाला) कहते थे।
अर्थ (Meaning) : दहसाला प्रणाली के तहत पिछले दस (दह) साल के दौरान अलग-अलग फसलों की औसत उपजों और उनकी औसत कीमतों का हिसाब लगाया गया औसत उपज का एक तिहाई भाग राज्य का हिस्सा तय किया गया| लेकिन राजस्व की माँग नकद की शक्ल में सामने रखी गई। यह काम पिछले दस सालों की औसत कीमतों की अनुसूची के आधार पर उपज में राज्य के हिस्से को नकद में तब्दील करके किया गया। इस प्रकार राज्य के हिस्से में पड़ने वाली एक बीघा जमीन पर उपज ‘मन’ में बताई गई, लेकिन औसत कीमतों के आधार पर राज्य का हिस्सा प्रति बीघा रुपयों में तय किया गया।
कालांतर में किए गए सुधार (Improvements done at later stage) : बाद में इसमें और भी सुधार किया गया। हिसाब से स्थानीय कीमतों का ध्यान रखा गया इतना ही नहीं, एक ही किस्म की उपज वाले अलग-अलग परगनों को भी पृथक् निर्धारण हलकों में समूहबद्ध कर दिया गया। इस प्रकार किसानों को केवल स्थानीय उपज के आधार पर हो नहीं बल्कि स्थानीय कीमतों के भी आधार पर राजस्व अदा करना पड़ता था।
दहसाला प्रणाली में दस सालों के लिए एक ही दर के कर निर्धारित किये जाते थे। यह स्थायी भी नहीं होती थी। परन्तु, फिर भी अकबर की प्रणाली कुछ परिवर्तनों के साथ सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक मुगल साम्राज्य की नीति रही।
दस साला या दहसाला भू-राजस्व पद्धति के लाभ (Advantages of Dahsala (or Ten years) Land Revenue System) :
1.सरकार को लाभ (Advantage to Government) : यह भूमि प्रबंध चूंकि दस वर्ष के लिए था, इसलिए सरकार को प्रत्येक वर्ष होने वाली आय का हिसाब किताब रखना भी आसान हो गया सरकार को वस्तुओं के मूल्य बढ़ने से भी किसी क्षति का भय जाता रहा क्योंकि दस वर्ष पश्चात् गत वर्षों का आधार पर वह अपनी दर बढ़ा सकती थी। जमींदार और किसान लगान देने के मामले में धोखा नहीं दे सकते थे क्योंकि लगान पहले से ही निश्चित किया हुआ होता है।
2.काश्तकारों या किसानों को लाभ (Advantage to rillers or farmers) : इस भूमि-प्रबंध से किसानों को बहुत लाभ हुआ। उन्हें पता चल गया कि आगामी दस वर्षों में उनको सरकार को कितना लगान देना है। फिर अकाल अथवा कठिनाई के समय सरकार की ओर से सहायता भी मिलती थी। कर माफ कर दिए जाते थे अथवा कम कर दिए जाते थे। सरकार के साथ सीधा संबंध होने के कारण किसानों को भूपतियों तथा सरकारी अधिकारियों के अत्याचारों से छुटकारा मिल गया।
3.जनसाधारण या जनता को लाभ (Advantage to Public or laymen) : इस भूमि प्रबंध से जनसाधारण को भी अनेक लाभ हुए। जब किसानों ने उत्पादन बढ़ाया तो वस्तुओं के मूल्य भी गिरने लगे और लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा।
4.भू-राजस्व की अन्य पद्धतियाँ (Other Systems of Land Revenue):
(i) कन्कूत प्रणाली (Kankut System) : इस प्रणाली के अनुसार फसलों के पकते समय सरकार अनुमान लगाकर अपना भू-राजस्व निश्चित करती थी। यह प्रणाली अत्यंत खर्चीली थी क्योंकि भू-राजस्व निश्चित करने के लिए सरकार को बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नियुक्त करना पड़ता था।
(ii) गल्लाबख्शी या बटाई प्रणाली (Gallabakshi or Batai System) : इस प्रणाली को गल्लाबख्शी प्रणाली या बटाई प्रणाली भी कहते थे। इस प्रणाली के अनुसार तैयार फसल को काटकर उसके तीन भाग कर लिए जाते थे। एक भाग सरकार भूमि ‘कर’ के रूप में ले लेती थी और शेष दो भाग कृषक के पास रह जाते थे।
(iii) नसक या कच्चा प्रणाली (Nasak or Kachcha System) : इस प्रणाली के अनुसार सारे गाँव की फसल का अनुमान लगाकर इकट्ठा ही राजस्व निश्चित किया जाता था। यह भू-राजस्व किसानों द्वारा सीधा ही सरकार के पास जमा करवा दिया जाता था।

प्रश्न 5. ‘आइन-ए-अकबर’ अथवा ‘आइन’ के महत्त्व तथा सीमाओं की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए ।

अथवा

अकबर के शासनकाल के स्रोत के रूप में आइन-ए-अकबरी के महत्त्व व सीमाओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : यद्यपि ‘आइन’ को सम्राट अकबर द्वारा शासन की सुविधा के लिए विस्तृत सूचनाएँ जमा करने के लिए प्रायोजित किया गया था, फिर भी यह किताब आधिकारिक दस्तावेजों की नकल मात्र नहीं है। इसकी पांडुलिपि को लेखक ने पाँच बार संशोधित किया था। इससे ऐसा लगता है कि अबुल फजल प्रमाणिकता के प्रति काफी सावधान था। उदाहरण के लिए मौखिक प्रमाणों को तथ्य के रूप में किताब में शामिल करने से पहले अन्य स्रोतों से उनकी वास्तविकता की पुष्टि करने का प्रयास किया जाता था। आँकड़ों वाले खंडों में सभी आँकड़े अंकों के साथ-साथ शब्दों में भी लिखे गये ताकि बाद की प्रतियों में नकल की गलतियाँ कम-से-कम हों।
सीमाएँ : फिर भी इतिहासकारों का कहना है कि ‘आइन’ पूरी तरह दोष रहित नहीं है।
(1) जोड़ करने में कई गलतियाँ पाई गई हैं। ऐसा माना जाता है कि या तो ये अंकगणित की छोटी-मोटी चूक हैं या फिर नकल उतारने के दौरान अबुल फजल के सहयोगियों की भूल। फिर भी ये गलतियाँ मामूली हैं और व्यापक स्तर पर ऑकड़ों की सच्चाई को कम नहीं करतीं।
(2) आइन की एक और सीमा यह है कि इसके संख्यात्मक आँकड़ों में विषमताएँ हैं। सभी सूबों से आँकड़े समान रूप से । एकत्रित नहीं किए गए। जहाँ कई सूबों के लिए जमींदारों की जाति । के अनुसार विस्तृत सूचनाएँ संकलित की गईं, वहीं बंगाल और उड़ीसा के लिए ऐसी सूचनाएँ नहीं मिलती।
(3) इसी प्रकार जहाँ सूबों से लिए गए राजकोषीय आँकड़े बड़े विस्तार से दिए गए हैं, वहीं उन्हीं प्रदेशों से मूल्यों और मजदूरी जैसे महत्त्वपूर्ण आँकड़े अच्छे ढंग से दर्ज नहीं किए गए हैं।
मूल्यों और मजदूरी की दरों की जो विस्तृत सूची आइन में दी भी गई है, वह साम्राज्य की राजधानी आगरा या उसके आस-पास के प्रदेशों से ली गई है। स्पष्ट है कि देश शेष भागों के लिए इन आँकड़ों की प्रासंगिकता सीमित है।
निष्कर्ष : अपनी सीमाओं के बावजूद ‘आइन’ अपने समय के लिए एक असाधारण और अनोखा दस्तावेज है। मुगल साम्राज्य के गठन एवं उसकी संरचना की आकर्षक झलकियाँ दिखाकर और साथ ही लोगों एवं उत्पादों के बारे में आँकड़े देकर अबुल फजल मध्यकालीन इतिहासकारों से कहीं आगे निकल गए। यह निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि थी। मध्यकालीन भारत में अबुल फजल से पहले के इतिहासकार अधिकतर राजनीतिक घटनाओं के बारे में ही लिखते थे-युद्ध, विजय, राजनीतिक षड्यंत्र अथवा वंशीय उथल-पुथल के बारे में। देश, उसके लोगों या उत्पादों के बारे में विरल ही बताया जाता था। यदि कभी उल्लेख किया भी जाता था, तो उसकी दिशा मूल रूप से राजनीतिक होती थी।
भारत के लोगों और मुगल साम्राज्य के बारे में विस्तृत जानकारी देकर आइन ने स्थापित परंपराओं को पीछे छोड़ दिया और इस तरह 17वीं शताब्दी के भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु तैयार हो गया| जहाँ तक कृषि संबंधों का प्रश्न है, आइन के सांख्यिकीय प्रमाणों पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसमें मुगल साम्राज्य क लगभग सभी पक्षों के बारे में विस्तृत सूचनाएँ दर्ज हैं। इनकी सहायता से इतिहासकार समकालीन भारत के सामाजिक जीवन का इतिहास पुनः रचते हैं।

प्रश्न 6. मुगल भारत के जाति और ग्रामीण माहौल का वर्णन कीजिए। मुगल काल के दौरान ग्रामीण समाज में जाति-पंचायतें किस प्रकार ताकतवर थीं ? स्पष्ट कीजिए
उत्तर : जाति और जाति जैसे अन्य भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बंटे थे खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे या फिर खेतों में मजदूरी करते थे।
गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था कि इनके पास संसाधन सबसे कम थे और ये जाति व्यवस्था की दियों से बंधे थे। इनकी हालत कमलेश वैसी ही थी जैसी कि आधुनिक भारत में दलितों की। दूसरे संप्रदायों में भी ऐसे भेदभाव फैलने लगे थे। मुसलमान समुदायों में हलालखोरान जैसे ‘नीच’ वे कामों से जुड़े समूह गांव की हदों के बाहर ही रह सकते थे। इसी तरह बिहार में मल्लाहजादाओं (शाब्दिक अर्थ-नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी। समाज के निचले तबकों में जाति, गरीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था। ऐसा बीच के समूहों में नहीं था। सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी गई एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है। इस किताब के अनुसार जाट भी किसान थे, लेकिन जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों के मुकाबले नीची थी। सत्रहवीं सदी में राजपूत होने का दावा वृंदावन (उत्तर प्रदेश) के इलाके में गौरव समुदाय ने भी किया, बावजूद इसके कि वे जमीन की जुताई के काम में लगे थे। पशुपालन और बागवानी में बढ़ते लाभ की वजह से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठी। पूर्वी इलाकों में, पशुपालक और मछुआरी जातियाँ, जैसे-सद्गोप व कैवर्त भी किसानों की-सी सामाजिक स्थिति पाने लगीं।
मुगलकाल के दौरान ग्रामीण समाज में विद्यमान जाति पंचायत : ग्राम पंचायत के अतिरिक्त गाँव में प्रत्येक जाति की अपनी पंचायत भी होती थी। समाज में ये पंचायतें काफी शक्तिशाली होती थीं। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी झगड़ों का निपटारा करती थीं।
(1) वे जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती थीं।
(2) वे यह तय करती थीं कि शादियाँ जाति के मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं।
(3) वे यह बताती थीं कि कर्मकांडीय वर्चस्व किस क्रम में होगा।
वास्तव में फौजदारी मामलों को छोड़कर अधिकतर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फैसलों को ही मानता था।

प्रश्न 7. मुगल साम्राज्य के विभिन्न प्रकार के जमींदारों पद, अधिकार और दायित्वों का विवेचन कीजिए ।
उत्तर : मुगल साम्राज्य में विभिन्न प्रकार के जमींदारों के पद, अधिकार एवं दायित्व (Posts, Rights and duties of various kinds of Zamindars in Mughal Empire) :

1.प्रथम बार जमीन जोतने वाले (Land Tiller for the First Time) : अकबर कालीन इतिहासकार अबुल फजल तथा अन्य समसामयिक लेखकों की विभिन्न कृत्यों के अध्ययन से यह भली-भाँति स्पष्ट हो जाता है कि भारत में भूमि पर व्यक्तिगत मिल्कियत की प्रथा बड़ी पुरानी थी। भूमि की मिल्कियत मुख्यतः उत्तराधिकार के नियमों पर निर्भर थी। लेकिन मुगल काल में भूमि की मिल्कियत के नये नियम भी बन गये थे। परंपरा के अनुसार किसी भी जमीन का मालिक वह था जो पहली बार उस पर खेती करता था। चूँकि मध्ययुग में काफी बड़ी मात्रा में बंजर भूमि उपलब्ध थी और उत्साही व्यक्तियों के लिए कठिन नहीं था कि वे एक नया गाँव बसा लें, आस-पास की भूमि पर कृषि आरम्भ करें और जमीन के मालिक बन जाएँ। इसी भूमि को उन्हें किसी भी पट्टे पर देने, उससे लगान वसूल करने आदि के अधिकार थे।
2.वंशगत अधिकार प्राप्त जमींदार (Zamindars who got Rights on heritage basis) : स्वयं की खेती की मिल्कियत के अतिरिक्त अनेक जमींदारों को गाँवों से भू-राजस्व या लागत प्राप्त करने का वंशगत अधिकार भी था। इसे उसका ‘तल्लुका या जमींदारी कहा जाता था। लगान इकट्ठा करने के लिए जमींदारों को आमतौर पर कुल लगान का 5 अथवा 10 प्रतिशत अंश प्राप्त होता था और कहीं-कहीं तो उसका अंश 25 प्रतिशत तक था। पैर जमींदार अपनी जमींदारी के अंतर्गत आने वाली सारी जमीन का स्वामी नहीं था। खेती करने वाले लोगों से जमीन उस समय वापस नहीं ली जा सकती थी जब तक वह उसका लगान देते रहें। इस प्रकार जमीन पर जहाँ औपचारिक रूप से स्वामित्व जमींदार का था, लेकिन भूमि का व्यावहारिक स्वामित्व किसान के पास ही रहा। इन दोनों का स्वामित्व वंशगत होता था।
3.राजा जमींदार (Ruler Zamindars) : मुगल काल में कुछ ऐसे जमींदार भी थे जिन्हें विख्यात इतिहासकार डॉ० सतीश चंद्र ने राजा जमींदार कहा है। वस्तुत: ये जमींदार सामान्य जमींदार से ऊपर स्तर के होते थे। इन्हें कहीं छोटे और कहीं बड़े इलाकों पर आधिपत्य प्राप्त था। वे अपने अधीनस्द क्षेत्रों में शासन चलाने के लिए भी किसी सीमा तक आन्तरिक स्वतन्त्रता का उपयोग करते थे। फारसी लेखकों ने इनके वर्ग को छोटा बताने के लिए इन्हें भी जमींदार पुकारा है। लेकिन सच्चाई यह है कि इनकी स्थिति जमींदारों से ऊँची थी जिनका काम केवल लगान उगाहना होता था।
4.सेवाओं के बदले जमीन प्राप्त करने वाले जमींदार (Zamindars who obtained land in lieu of their services): उपर्युक्त तीन प्रकार के अलावा चौथी किस्म के जमींदार वे होते थे जिन्हें धार्मिक नेताओं और विद्वानों के रूप में भूमि प्राप्त होती थी। वस्तुतः इन्हें मुगल सरकार विशिष्ट गुणों एवं सेवाओं के लिए भरण-पोषण के लिए पर्याप्त भूमि दान में दे देती थी। ऐसे भूमि अनुदानों को मुगलों की भाषा में ‘मिल्क’ या ‘मदद-ए- मआस तथा राजस्थान में ‘शासन’ कहा जाता था। यद्यपि इन अनुदानों की सैद्धान्तिक रूप से प्रत्येक सम्राट द्वारा पुनरावृत्ति होनी होती थी परंतु व्यवहार में ये वंशागत ही हो जाते थे। ऐसे अनुदान प्राप्त अनेक लोग सरकारी पदों पर भी नियुक्त होते थे। उदाहरणार्थ-काजी । इस तरह एक श्रेणी के जमींदारों का आधार पर सम्पूर्ण गाँवों तथा शहर दोनों से होता था। लेखक, इतिहासकार, हकीम इत्यादि अधिकतर इसी वर्ग में आते थे।

प्रश्न 8, सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों में मौसम के वो मुख्य चक्रों के दौरान खेती किस प्रकार की जाती थी ? क्या खेती केवल गुजारा करने के लिए की जाती थी या कोई अन्य उद्देश्य भी था ? स्पष्ट कीजिए।

अथवा

सोलहवीं व सत्रहवीं शताब्दियों के मुगल काल में औसतन किसान की जमीन पर पेट भरने और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक-दूसरे से किस प्रकार से जुड़े हुए थे, स्पष्ट कीजिए
उत्तर : सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दियों में मौसम के दो मुख्य चक्रों के दौरान खेती की जाती थी। एक खरीफ (पतझड़ में) और दूसरी रबी (बसंत में)। यानी सूखे इलाकों और बंजर जमीन को छोड़ दें तो ज्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फसलें होती थीं। जहाँ बारिश या सिंचाई के अन्य साधन हर समय मौजूद थे वहाँ तो साल में तीन फसलें भी उगाई जाती थीं। इस कारण पैदावार में भारी विविधता पाई जाती थी। उदाहरण के तौर पर आइन हमें बताती हैं कि दोनों मौसम में मिलाकर, मुगल प्रांत आगरा में 34 किस्म की फसलें उगाई जाती थी जबकि दिल्ली प्रांत में 43 फसलों की पैदावार होती थी। बंगाल में सिर्फ चावल की कुछ किस्में पैदा होती थीं।
कृषि उद्देश्य : हालांकि दैनिक आहार की खेती पर ज्यादा जोर दिया जाता था परंतु इसका मतलब यह नहीं था कि मध्यकालीन भारत में खेती सिर्फ गुजारा करने के लिए की जाती थी। स्रोतों में हमें अक्सर जिन्स-ए-कामिल (सर्वोत्तम फसलें) जैसे शब्द मिलते हैं। मुगल शासक भी किसानों को ऐसी फसलों की खेती करने के लिए बढ़ावा देता था क्योंकि इनसे राज्य को ज्यादा कर मिलता था। कपास और गन्ने जैसी फसलें बेहतरीन जिन्स-ए-कामिल थीं। मध्य भारत और दक्कन पठार में फैले हुए जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े पर कपास उगाई जाती थी, जबकि बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था। तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फसलों में आती थी। इससे पता चलता है कि एक औसत किसान की जमीन पर किस तरह पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक दूसरे से जुड़े हुए थे।
सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नयी फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँची। मसलन, मक्का भारत में अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया और सत्रहवीं सदी तक इसकी गिनती पश्चिम भारत की मुख्य फसलों में होने लगी। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्जियाँ नई दुनियाँ से लाई गई। इसी तरह अनानास और पपीता जैसे फल भी वहीं से आए।

प्रश्न 9, सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के दौरान पंचायतों का गठन किस प्रकार होता था ? उनके कार्य तथा अधिकारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के दौरान भारतीय ग्राम पंचायतें :(i) गाँव की पंचायत में बुजुर्गों का जमावड़ा होता था। आमतौर पर वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अक्सर पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी। यह एक ऐसा अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। फिर भी इसकी संभावना कम ही है कि छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मजदूरों के लिए इसमें कोई जगह होती होगी। पंचायत का फैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।
(ii) पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे मुकद्दम या मंडल कहते थे। कुछ स्रोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था और इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंजूरी जमींदार से लेनी पड़ती थी।
(iii) पंचायत का खर्चा गाँव के उस आम खजाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। इस ख़जाने से उन कर अधिकारियों की खातिरदारी का खर्चा भी किया जाता था जो समय-समय पर गाँव का दौरा किया करते थे। दूसरी ओर इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था।
(iv) पंचायत का एक बड़ा काम यह तसल्ली करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहें।
(v) पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्यादा गंभीर दंड देने के अधिकार थे। समुदाय से बाहर निकालना एक कड़ा कदम था जो एक सीमित समय के लिए लागू किया जाता था। इसके तहत दंडित व्यक्ति को (दिए हुए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था।

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