Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 9 Important Question Answer 3 Marks शासक और इतिवृत्तक (मुगल दरबार)

प्रश्न 1. मुगल दरबार में पांडुलिपि तैयार करने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

अथवा

मुगलों के शासनकाल में पांडुलिपियों की रचना से जुड़े विविध कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : मुगल दरबार में पांडुलिपि की रचना का मुख्य केंद्र शाही किताबखाना था। किताबखाना एक लिपिघर था जहाँ बादशाह की पांडुलिपियों का संग्रह रखा जाता था तथा नयी बना पांडुलिपियों की रचना की जाती थी।
पांडुलिपियों की रचना में विविध प्रकार के कार्य करने वाले लोग भाग लेते थ:
(i) कागज़ बनाने वाले, (ii) पांडुलिपि के पन्ने तैयार करने वाले, (ii) पाठ की नकल करने के लिए सुलेखक, (iv) पृष्ठों को चमकाने के लिए कोफ्तगार, (v) पाठ के दृश्यों को चित्रित करने के लिए चित्रकार, (vi) पन्नों को इकट्ठा करने उन्हें अलंकृत आवरण में बाँधने के लिए जिल्दसाज। तैयार पांडुलिपि को एक बहुमूल्य वस्तु तथा बौद्धिक संपदा माना जाता था। वास्तव में ये आकर्षक पांडुलिपियाँ अपने संरक्षक मुगल बादशाह की शक्ति को दर्शाती थीं।

प्रश्न 2. मुगल दरबार से जुड़े दैनिक-कर्म और विशेष उत्सवों के दिनों ने किस तरह से बादशाह की सत्ता को प्रतिपादित किया होगा ?
उत्तर : दरबार में किसी की हैसियत इस बात से निर्धारित होती थी कि वह शासक के कितना पास और दूर बैठा है। किसी भी दरबारी को शासक द्वारा दिया गया स्थान बादशाह की नजर में उसकी महत्ता का प्रतीक था। एक बार जब बादशाह सिंहासन पर बैठ जाता था तो किसी को भी अपनी जगह से कहीं जाने की अनुमति नहीं थी और न ही कोई अनुमति के बिना दरबार से बाहर जा सकता था। दराबारी समाज में सामाजिक नियंत्रण का व्यवहार दरबार में मान्य सम्बोधन, शिष्टाचार का जरा-सा भी उल्लंघन होने पर ध्यान दिया जाता था और उस व्यक्ति को तुरंत ही दंडित किया जाता था।
शासक को किए गए अभिवादन के तरीके से पदानुक्रम में उस व्यक्ति की हैसियत का पता चलता था जैसे जिस व्यक्ति के सामने ज्यादा झुककर अभिवादन किया जाता था, उस व्यक्ति की हैसियत ज्यादा ऊँची मानी जाती थी आत्मनिवेदन का उच्चतम रूप सिजदा या दंडवत् लेटना था। शाहजहाँ के शासनकाल में इन तरीकों के स्थान पर चार तसलीम तथा जमींबोसी (जमीन चूमना) के तरीके अपनाए गए। सिंहासनारोहण की वर्षगांठ, शब-ए-बरात तथा होली जैसे कुछ विशिष्ट अवसरों पर दरबार का माहौल जीवन हो उठता था। सजे हुए सुगंधित मोमबत्तियाँ और महलों की दीवारों पर लटक रहे रंग-बिरंगे बंदनवार आने वालों पर आश्चर्यजनक प्रभाव छोड़ते थे। ये सभी बादशाह की शक्ति, सत्ता और प्रतिष्ठा को दर्शाते थे।

प्रश्न 3. मुगल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों द्वारा निभाई गई भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

अथवा

मुगल साम्राज्य में शाही परिवार की जटिल संस्था की जाँच कीजिए।
उत्तर : मुगल परिवार में शाही परिवारों से आने वाली स्त्रियों को बेगम कहा जाता था। नूरजहाँ के बाद मुगल रानियों और राजकुमारियों ने महत्त्वपूर्ण वित्तीय स्रोतों पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया। जहाँआरा और रौशनआरा शाहजहाँ की पुत्रियाँ थीं और इन दोनों को ऊँचे शाही मनसबदारों के समान वार्षिक आय होती थी। इसके अलावा, जहाँआरा को सूरत के बंदरगाह नगर जो कि विदेशी व्यापार का एक बेहद लाभप्रद केंद्र था, से भी राजस्व प्राप्त होता था। संसाधनों पर नियंत्रण रखने के कारण मुगल परिवार की महत्त्वपूर्ण स्त्रियों को इमारतों एवं बागों के निर्माण का अधिकार भी प्राप्त हो गया था। जहाँआरा ने शाहजहाँ द्वारा स्थापित नयी राजधानी शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) की कई वास्तुकलात्मक परियोजनाओं में भाग लिया। इनमें से आँगन और बाग के साथ एक दो मंजिली भव्य कारवां सराय थी। शाहजहाँनाबाद का हृदय स्थल चाँदनी चौक था। इसकी रूपरेखा जहाँआरा द्वारा बनाई गई थी।
गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक से हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की एक झलक मिलती है। गुलबदन ने अपनी पुस्तक में राजाओं और राजकुमारों के बीच चलने वाले संघर्षों तथा तनावों के साथ ही इनमें से कुछ संघर्षों को सुलझाने में परिवार की उम्रदराज स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में विस्तार से लिखा।

प्रश्न 4. वे कौन से मुद्दे थे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रों के प्रति मुगल नीतियों व विचारों को आकार प्रदान किया ?

अथवा

मुगल और सीमाओं से परे देशों के बीच के रिश्तों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर : उपमहाद्वीप के बाहर के क्षेत्रों के प्रति मुगल नीतियों व विचारों को आकार प्रदान करने वाले मुख्य मुद्दे निम्नलिखित थे :
1.सामरिक महत्त्व की चौकियों पर नियंत्रण : मुगल राजाओं तथा ईरान एवं तूरान के पड़ोसी देशों के बीच राजनीतिक संबंध हिंदुकुश पर्वतों द्वारा निर्धारित सीमाओं के नियंत्रण पर निर्भर करते थे। भारतीय उपमहाद्वीप में आने के इच्छुक सभी विजेताओं को उत्तर भारत तक पहुँचने के लिए हिंदुकुश को पार करना पड़ता था। अतः मुगलों की सदा यह नीति रही कि इस संभावित खतरे से बचाव के लिए सामरिक महत्त्व की चौकियों विशेषकर काबुल तथा कंधार पर नियंत्रण रखा जाए।
कंधार सफावियों (ईरान) और मुगलों के बीच झगड़े की जड़ था। यह किला-नगर आरंभ में हुमायूँ के अधिकार में था। 1595 में अकबर ने इसे पुनः जीत लिया। था। यद्यपि सफावियों ने मुगलों के साथ अपने राजनीतिक संबंध बनाए रखे तथापि वे कंधार पर अपना दावा करते 1613 में जहाँगीर ने ईरानी शासक शाह अब्बास के दरबार में एक दूत भेजा। इसका उद्देश्य कंधार पर मुगल अधिकार की वकालत करना था। परंतु यह शिष्टमंडल अपने उद्देश्य में असफल रहा। 1622 में एक सफावी सेना ने कंधार पर घेरा डाल दिया। मुगल सेना पूरी तरह से तैयार नहीं थी। अत: वह पराजित हुई और उसे किला तथा नगर सफावियों को सौंपने पड़े।
2.ऑटोमन साम्राज्य : तीर्थयात्रा और व्यापार : ऑटोमन साम्राज्य के साथ मुगलों के संबंधों का उद्देश्य ऑटोमन नियंत्रण वाले क्षेत्रों में व्यापारियों तथा तीर्थयात्रियों के स्वतंत्र आवागमन को निर्बाध बनाए रखना था। यह हिजाज अर्थात् ऑटोमन अरब के उस भाग के लिए विशेष रूप से सत्य था जहाँ मक्का और मदीना के महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल स्थित थे। मुगल बादशाह प्रायः इस क्षेत्र के साथ अपने संबंधों को धर्म एवं वाणिज्य के मामलों से जोड़ते थे। वह लाल सागर के बंदरगाह अदन और मोखा को बहुमूल्य वस्तुओं का निर्यात करते थे। इनकी बिक्री से प्राप्त आय को उस प्रदेश के धर्मस्थलों तथा फकीरों में दान में बाँट दिया जाता था परंतु औरंगजेब को जब अरब भेजे जाने वाले धन के दुरुपयोग का पता चला तो उसने भारत में ही उसके विवरण पर बल दिया क्योंकि उसका मानना था कि “यह भी वैसा ही ईश्वर का घर है जैसे कि मक्का ।”
3.मुगल दरबार में जेसुइट धर्म प्रचारक : यूरोप को भारत के बारे में जानकारी जेसुइट धर्म प्रचारकों, यात्रियों व्यापारियों आदि के विवरणों से हुई। मुगल दरबार के यूरोपीय विवरणों में जेसुइट वृत्तांत सबसे पुराने हैं। 15वीं शताब्दी के अंत में पुर्तगाली व्यापारियों ने देश के तटीय नगरों में व्यापारियों केंद्रों का जाल स्थापित किया। पुर्तगाली राजा भी सोसाइटी ऑफ जीसस (जेसुइट) के धर्मप्रचारकों की सहायता से ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में रुचि रखता था। 16वीं शताब्दी में भारत आने वाले जेसुइट शिष्टमंडल व्यापार और साम्राज्य निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा थे।
अकबर ईसाई धर्म के विषय में जानने की इच्छा रखता था। उसने जेसुइट पादरियों को आमंत्रित करने के लिए एक दूतमंडल गोवा भेजा। पहला जेसुइट शिष्टमंडल फतेहपुर सीकरी के मुगल दरबार में 1580 में पहुँचा। वह लगभग दो वर्ष वहाँ रहा। इन जेसुइट लोगों ने ईसाई धर्म के विषय में अकबर से बातचीत की और इसके सद्गुणों पर उलमा से उनका वाद-विवाद हुआ। लाहौर अभि के मुगल दरबार में दो और जेसुइट शिष्टमंडल 1591 और 1595 में भेजे प्रेम स्व जमीदा और ह जमींद ही ज Mus रूप वे उल गए। जेसुइट विवरण व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित हैं। बादशाह के चरित्र और सोच पर गहरा प्रकाश डालते हैं। सार्वजनिक सभाओं में जेसुइट लोगों को अकबर के सिंहासन के बहुत ही निकट स्थान दिया जाता था। वे उसके साथ अभियानों में और जाते थे तथा उसके बच्चों को शिक्षा देते थे। उसके फुर्सत के समय साम्रा में वे प्राय: उसके साथ होते थे। जेसुइट विवरण मुगलकाल के राज्य राज्य अधिकारियों और सामान्य जन-जीवन के बारे में फारसी इतिहासों में दी गई सूचना की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 5. मुगल प्रांतीय प्रशासन के मुख्य अभिलक्षणों एवं की चर्चा कीजिए। केंद्र किस तरह से प्रांतों पर नियंत्रण रखता था ?
उत्तर : प्रशासन की सुविधा के लिए मुगल साम्राज्य को प्रांती में बाँटा गया था। प्रांतीय शासन का मुखिया गवर्नर (सूबेदार) होता था जो अपनी रिपोर्ट सीधे बादशाह को भेजता था। सरकार : प्रत्येक सूबा कई सरकारों में बँटा हुआ था। सरकार की सीमाएँ प्रायः फौजदारों के अधीन आने वाले क्षेत्रों की सीमाओं से मेल खाती थीं। इन प्रदेशों में फौजदारों को विशाल घुड़सवार सेना तथा तोपचियों के साथ रखा जाता था।
परगना : परागना (उप-जिला) स्तर पर स्थानीय प्रशासन a की देख-रेख तीन अर्ध-वंशानुगत अधिकारियों द्वारा की जाती थी। ये अधिकारी थे-कानूनगो (राजस्व आलेख रखने वाला), चौध री (राजस्व का संग्रह करने वाला) और काजी।
शासन के प्रत्येक विभाग के पास लिपिकों, लेखाकारों, लेखा-परीक्षकों, संदेशवाहकों तथा अन्य कर्मचारियों का एक बड़ा सहायक समूह होता था। ये मानकीकृत नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार कार्य करते थे तथा बड़ी संख्या में लिखित आदेश तथा वृत्तांत तैयार करते थे। सभी प्रशासनिक इकाइयों में फारसी को शासन की भाषा बना दिया गया था परंतु ग्राम-लेखों के लिए स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया जाता था।
मुगल इतिहासकारों के अनुसार बादशाह और उसका दरबार ग्राम स्तर तक के समस्त प्रशासनिक तंत्र को नियंत्रित करता था परंतु इस प्रक्रिया का तनावमुक्त रहना असंभव था। स्थानीय जमींदारों और साम्राज्य के अधिकारियों के बीच प्रायः संसाधनों और सत्ता के बँटवारे को लेकर संघर्ष होते रहते थे। इन संघर्षों में जमींदार प्रायः राज्य के विरुद्ध किसानों का समर्थन करने में सफल हो जाते थे।

प्रश्न 6. उदाहरण सहित मुगल इतिहासों के विशिष्ट अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए ।
उत्तर : मुगल इतिहास के विशिष्ट अभिलक्षणों को निम्नलिखित रूप में वर्णित किया जा सकता है।
(i) मुगल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त साम्राज्य और उसके दरबार के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। ये इतिवृत्त साम्राज्य के अन्तर्गत आने वाले सभी लोगों के सामने एक प्रबुद्ध राज्य के दर्शन की प्रायोजना के उद्देश्य से लिए गए थे।
(ii) अकबर ने काफी सोच-समझकर फारसी को दरबार की मुख्य भाषा बनाया। संभवतः इसके पीछे ईरान के साथ सांस्कृतिक एवं बौद्धिक सम्पर्क स्थापित करने का उद्देश्य निहित था।
(iii) चित्रकारों ने अपने चित्रों से न केवल पांडुलिपियों के सौंदर्य को बढ़ाया बल्कि इसे सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम भी बनाया। अबुल फ़ज़ल के सौ से अधिक कुशल चित्रकारों का उल्लेख किया है जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध विहजाद था। विहजाद की चित्रकारी में निर्जीव वस्तुएँ भी प्राणवान लगती थीं।
(iv) अबुल फ़ज़ल ने मुगल राजस्व को दैवीय स्वरूप प्रदान किया और सुलह-ए-कुल की नीति द्वारा न्याय और शांति की स्थापना पर बल दिया। सभी धर्मों और मतों की अभिव्यक्ति को स्वतन्त्रता प्रदान की गई।
(v) मुगल दरबार की शान-शौकत सत्ता शक्ति और प्रतिष्ठा की सूचक थी। मनसबदार और अभिजात वर्ग द्वारा प्रशासनिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया गया।
(vi) पड़ोसियों के साथ संबंधों को मधुर बनाने का प्रयास किया गया और जेसुइट धर्म प्रचारकों के माध्यम से यूरोप को भारत के बारे में जानकारी हुई।

प्रश्न 7. अध्याय में दी गई दृश्य-सामग्री किस हद तक अबुल फजल द्वारा किए गए ‘तसवीर’ के वर्णन (स्रोत 1 ) से मेल खाती है?
उत्तर: इस अध्याय में दी गई दृश्य-सामग्री मुख्य रूप से रंगीन चित्र हैं। बुलंद दरवाज़ा जैसे कुछ भवनों को भी दर्शाया गया है। यह दृश्य-सामग्री अबुल फज्ल द्वारा किए गए ‘तसवीर’ के वर्णन से काफी सीमा तक मेल खाती है।
1.ये चित्र दर्शायी गई चीजों का सटीक चित्रण हैं।
2.ये मुगल बादशाहों की चित्रकला तथा वास्तुकला में गहरी रुचि को व्यक्त करते हैं। उन्होंने इस कला को प्रोत्साहन देने के लिए हर संभव प्रयत्न किया। इस कार्य के लिए उन्होंने शाही कार्यशाला स्थापित की हुई थी।
3.दिए गए चित्रों को देखकर यह कहा जा सकता है कि उस समय सर्वाधिक उत्कृष्ट कलाकार उपलब्ध थे। उनकी कृतियों को उन यूरोपीय चित्रकारों की अनुपम कलाकृतियों के समक्ष रखा जा सकता है जिन्होंने विश्व में अत्यधिक ख्याति प्राप्त कर ली थी।
4.चित्रों के सजीव रंग चित्र को इतना सजीव कर देते हैं कि ऐसा लगता है कि उनमें चित्रित व्यक्ति बोल रहे हों।

प्रश्न 8. मुगल अभिजात वर्ग के विशिष्ट अभिलक्षण क्या थे? बादशाह के साथ उनके संबंध किस तरह बने?

अथवा

“मुगलों के अधीन अभिजात वर्ग के सदस्यों के लिए शाही सेवा, शक्ति, धन तथा उच्चतम संभव प्रतिष्ठा प्राप्त करने का एक साधन था।” इस कथन की विवेचनापूर्ण जाँच कीजिए।
उत्तर : (i) मुगल राज्य का एक सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंभ इसके अधिकारियों का समूह था। जिसे इतिहासकार सामूहिक रूप से अभिजात वर्ग कहते हैं) साम्राज्य के निर्माण के शुरू के चरण से ही तूरानी और ईरानी अभिजात अकबर की शाही सेवा में हाजिर थे। इसमें से कुछ हुमायूँ के साथ भारत चले आए थे।
(ii)1560 से आगे भारतीय मूल के दो शासकीय समूहों-राजपूतो व भारतीय मुसलमानों ने शाही कार्यों में प्रवेश किया। इसमें प्रवेश लेने वाला पहला व्यक्ति एक राजपूत मुखिया अंबेर का राजा भरमाल कछवाहा था जिसकी पुत्री का अकबर से विवाह हुआ था। शिक्षा व लेखा शास्त्र वाले हिंदू जातियों के सदस्यों को भी पदोन्नत किया जाता था। उदाहरण के लिए अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल हैं जो खत्री जाति से थे।)
(iii) जहाँगीर के शासन में ईरानियों को उच्च पद प्राप्त हुए। जहाँगीर की राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रानी नूरजहाँ (1645) ईरानी थी। औरंगजेब ने राजपूतों को उच्च पदों पर आसीन किया। फिर भी शासन में अधिकारियों के समूह में मराठे अच्छी संख्या में थे।
(iv) सैन्य अभियानों में वे अपनी सेनाओं के साथ भाग लेते थे। कस्बों में वे साम्राज्य के अफसरों के रूप में काम करते थे। घुड़सवारी फौज मुगल फौज का एक विशेष अंग थी। मनसब प्रथा की शुरुआत करने वाले अकबर ने अपने वर्ग के कुछ लोगों को मुरीद की तरह मानते हुए उनके साथ व्यवहारिक रिश्ते भी कायम किए।
(v) अभिजात वर्ग के सदस्यों के लिए शाही सेवा, धन तथा मुख्य प्रतिष्ठा प्राप्त करने का एक जरिया थी। सेवा में अपनी मर्जी से आने वाले व्यक्ति एक अभिजाते के जरिए याचिका देता था जो बादशाह के सामने तस्वीर प्रस्तुत करता था। अगर याचिका करने वाले को सुयोग्य माना जाता था तो उसे मनसब प्रदान किया जाता था। अकबर ने सलाहकारों के साथ मिलकर साम्राज्य को प्रशासनिक, राजकोषीय व मौद्रिक संस्थाओं को आकार प्रदान किया।

प्रश्न 9. राजस्व के मुगल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्त्वों की पहचान कीजिए।
उत्तर : दरबारी इतिहासकारों ने कई साक्ष्यों के आधार पर यह दिखाने की कोशिश की है कि मुगल शासकों को सीधे ईश्वर से शक्ति मिलती थी।
ईश्वर (फर-ए-इजादी) से नि:सृत प्रकाश को ग्रहण करने वाली चीजों के पदानुक्रम में मुगल राजस्व को अबुल फ़ज़ल ने सबसे ऊचे स्थान पर रखा।इस विषय में वह प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के विचारों से प्रभावित था जिसने सर्वप्रथम इस प्रकार का विचार प्रस्तुत किया था। इस विचार के अनुसार इस पदानुक्रम के तहत यह दैवीय प्रकाश राजा में संप्रेषित होता था जिसके बाद राजा अपनी प्रजा के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का स्रोत बना जाता था।
सत्रहवीं शताब्दी से मुगल कलाकारों में बादशाहों को प्रभामंडल के साथ चित्रित करना शुरू किया। सभी तरह की शांति और स्थायित्व के स्रोत रूप में बादशाह भी धार्मिक और नृजातीय समूहों से ऊपर होता था, इनके बीच मध्यस्थता करता था, तथा यह सुनिश्चित करता था कि न्याय और शांति बनी रहे। अबुल फज्ल सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला बताता है। सुलह-ए-कुल में यूँ तो सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी, किन्तु उसकी एक शर्त थी कि वे राज्य सत्ता को क्षति नहीं पहुँचायेंगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे।
सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य नीतियों के जरिए लागू किया गया। मुगलों के अधीन अभिजात वर्ग मिश्रित किस्म का था अर्थात् इसमें ईरानी, तूरानी, अफगानी, राजपूत, देखनी सभी शामिल थे। इन सबको दिए गए पद और पुरस्कार पूरी तरह से राजा के प्रात उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित थे।

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