2 अंकीय प्रश्न उत्तर – शासक और इतिवृत – Class12th History Chapter 9

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 9 Important Question Answer 2 Marks शासक और इतिवृत्तक (मुगल दरबार)

प्रश्न 1. ‘मुगल साम्राज्य का हृदयस्थल उसके राजधानी नगर थे।’ उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) मुगल साम्राज्य का केंद्रीय बिंदु उसका राजधानी नगर था, जहाँ शाही दरबार लगता था। अकबर द्वारा 1560 में आगरा के किले का निर्माण करवाया था। इस किले के निर्माण में निकटवर्ती इलाकों की खदानों से लाए गए लाल बलुआ पत्थर से किया गया था।
(ii) मुगल सम्राट शाहजहाँ ने विवेकपूर्ण राजकोषीय नीतियों को आगे बढ़ाते हुए इमारत निर्माण की अपनी रुचि को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर लिया था।
(iii) राजतंत्रीय संस्कृतियों में भवन-निर्माण कार्य राजवंशीय सत्ता, धन तथा प्रतिष्ठा का सर्वाधिक स्पष्ट तथा ठोस प्रतीक था। मुसलमान शासकों के संदर्भ में इस कार्य को धर्मनिष्ठा के रूप में देखा जाता था।

प्रश्न 2. भारत में मुगल साम्राज्य की रचना कैसे की गई ? बाबर 1526 में भारतीय उपमहाद्वीप की ओर क्यों बढ़ा था ?
उत्तर : मुगलों व स्थानीय सरदारों के बीच राजनीतिक मंत्रियों के जरिए तथा विजयों के जरिए भारत के विविध क्षेत्रीय राज्यों को मिलाकर साम्राज्य की रचना की गई। साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन बाबर को उसके मध्य एशियाई स्वदेश फरगाना से प्रतिद्वंद्वी उज़बेकों ने भगा दिया था। उसने सबसे पहले स्वयं को काबुल में स्थापित किया और फिर 1526 में अपने दल के सदस्यों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए क्षेत्रों और संसाधनों की खोज में वह भारतीय उपमहाद्वीप में और आगे की ओर बढ़ा।

प्रश्न 3. मुगल काल में पांडुलिपियों के रचनाकारों और उनसे जुड़े सुलेखन कार्यकर्ताओं आदि को किस प्रकार उनके कार्यों का सम्राट् द्वारा पारितोषिक दिया गया ?
उत्तर :पांडुलिपियों की वास्तविक रचना में शामिल कुछ लोगों को भी पदवियों और पुरस्कारों के रूप में पहचान मिली।

इनमें सुलेखकों और चित्रकारों को तो उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा मिली जबकि अन्य, जैसे कागज़ बनाने वाले अथवा जिल्दसाज गुमनाम कारीगर ही रह गए।सुलेखन अर्थात् हाथ से लिखने की कला अत्यंत महत्त्वपूर्ण कौशल मानी जाती थी। इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न शैलियों में होता था। नस्तलिक अकबर की पसंदीदा शैली थी। यह एक ऐसी तरल शैली थी जिसे लंबे सपाट प्रवाही ढंग से लिखा जाता था। इसे 5 से 10 मिलीमीटर की नोक वाले छँटे हुए सरकंडे, जिसे कलम कहा जाता है, के टुकड़े से स्याही में डुबोकर लिखा जाता है। सामान्यतया कलम की नोक में बीच में छोटा सा चीरा लगा दिया जाता था ताकि वह स्याही आसानी से सोख ले।

प्रश्न 4. शाहजहाँ के रतन जड़े सिंहासन पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : आगरा महल के सार्वजनिक सभा भवन में रखे शाहजहाँ के रत्नजड़ित सिंहासन (तख़्त-ए-मुरस्सा) के बारे में बादशाहनामा में लिखा है:
सिंहासन की भव्य संरचना में एक छतरी है जो द्वादशकोणीय स्तंभों पर टिकी हुई है। इसकी ऊँचाई सीढ़ियों से गुंबद तक पाँच क्यूबिट (लगभग 10 फुट) है। अपने राज्यारोहण के समय महामहिम ने यह आदेश दिया कि 86 लाख रुपए के रत्न तथा बहुमूल्य पत्थर और एक लाख तोला सोना जिसकी कीमत चौदह लाख रुपए है, से इसे सजाया जाना चाहिए। सिंहासन का साज-सज्जा में सात वर्ष लग गए। इसकी सजावट प्रयुक्त हुए थी में बहुमूल्य पत्थरों में रूबी था जिसकी कीमत एक लाख रुपए, और जिसे शाह अब्बास सफावी ने दिवंगत बादशाह जहाँगीर को भेजा था। इस रूबी पर महान बादशाह तिमूर साहिब-ए किरान, मिर्जा शाहरूख, मिर्जा उलुग बेग और शाह अब्बास के साथ-साथ अकबर, जहाँगीर और स्वयं महामहिम के नाम अंकित थे।

प्रश्न 5. मुगलों ने अपने भवन निर्माण के शौक को अपनी राजधानी नगरों द्वारा किस प्रकार प्रदर्शित किया है? समीक्षा कीजिए।
उत्तर : मुगलों ने अपने भवन निर्माण के शौक को अपनी राजधानी नगरों द्वारा निम्नलिखित तरीकों द्वारा प्रदर्शित किया :
1.मुगल साम्राज्य का केंद्रीय बिंदु उसका राजधानी नगर था, जहाँ शाही दरबार लगता था। अकबर द्वारा 1560 में आगरा के किले का निर्माण करवाया था। इस किले के निर्माण में निकटवर्ती इलाकों की खदानों से लाए गए लाल बलुआ पत्थर से किया गया था।
2.बादशाह अकबर द्वारा 1570 के दशक में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में एक नयी राजधानी निर्मित करने का फैसला लिया। अकबर द्वारा सीकरी में जुम्मा मस्जिद के निकट शेख सलीम चिश्ती के लिए सफेद संगमरमर का मकबरा बनाने का आदेश दिया। यहाँ ‘बुलंद दरवाजा’ बनाने का मकसद यहाँ आने वाले व्यक्तियों को गुजरात में मुगलों की शानदार जीत की याद दिलाना था।
3.मुगल सम्राट शाहजहाँ ने विवेकपूर्ण राजकोषीय नीतियों को आगे बढ़ाते हुए इमारत निर्माण की अपनी रुचि को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर लिया था।
4.राजतंत्रीय संस्कृतियों में भवन-निर्माण कार्य राजवंशीय सत्ता, धन तथा प्रतिष्ठा का सर्वाधिक स्पष्ट तथा ठोस प्रतीक था। मुसलमान शासकों के संदर्भ में इस कार्य को धर्मनिष्ठा के रूप में देखा जाता था।
5.1648 में दरबार, सेना तथा राजसी खानदान का स्थानांतरण आगरा से नयी निर्मित शाही राजधानी शाहजहाँनाबाद हो गया। यहाँ लाल किला, जामा मस्जिद, चाँदनी चौक के बाजार की वृक्ष वीथि तथा अभिजात-वर्ग के विशाल घर थे। शाहजहाँ का यह नया शहर शाही राजतंत्र की औपचारिक कल्पना की अभिव्यक्ति करता है।

प्रश्न 6.गुलबदन बेगम द्वारा लिखित ‘हुमायूँ नामा’ से हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की झलक कैसे मिलती है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर : गुलबदन बेगम द्वारा लिखित एक रोचक पुस्तक हुमायूँ नामा’ से हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की निम्नलिखित झलक मिलती है :
(i) गुलबदन बेगम बाबर की पुत्री, हुमायूँ की बहन तथा अकबर की चाची (बुआ) थी। वह स्वयं तुर्की तथा फारसी में धाराप्रवाह लिख सकती थी।
(ii) जब अकबर ने अबुल फ़ज़ल को अपने शासन का इतिहास लिखने के लिए नियुक्त किया तो उसने अपनी चाची से बाबर और हुमायूँ के समय के अपने पहले संस्मरणों को लिपिबद्ध करने का आग्रह किया। इसका आशय था कि अबुल फजल उनका लाभ उठाकर अपनी कृति को पूरा कर सके।
(iii) गुलबदन ने जो लिखा वह मुगल बादशाहों की प्रशस्ति नहीं थी बल्कि उसमें राजाओं और राजकुमारों के बीच चलने वाले संघर्षों और तनावों की कहानी थी। इनमें से कुछ संघर्षों को सुलझाने में परिवार की उम्रदराज स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में विस्तार से लिखा गया था।
(iv) मुगल परिवार में शाही परिवारों से आने वाली स्त्रियों (बेगमों) और अन्य स्त्रियों (अगहा) में अंतर रखा जाता था। मेहर के रूप में अच्छा-खासा नकद और बहुमूल्य वस्तुएँ लेने के बाद विवाह करके आई बेगमों को अपने पतियों से स्वाभाविक रूप से अगहाओं की तुलना में अधिक ऊँचा दर्जा और सम्मान मिलता था।

प्रश्न 7. अभिजात वर्ग मुगल साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ था।’ न्यायसंगत पुष्टि कीजिए।
उत्तरः (i) मुगल राज्य का एक सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंभ इसके अधिकारियों का समूह था जिसे इतिहासकार सामूहिक रूप से अभिजात वर्ग कहते हैं। साम्राज्य के निर्माण के शुरू के चरण से ही तूरानी और ईरानी अभिजात अकबर की शाही सेवा में हाजिर, थे। इसमें से कुछ हुमायूँ के साथ भारत चले आए थे।
(ii) 1560 से आगे भारतीय मूल के दो शासकीय समूहों-राजपूतों व भारतीय मुसलमानों ने शाही कार्यों में प्रवेश किया। इसमें प्रवेश लेने वाला पहला व्यक्ति एक राजपूत मुखिया अंबेर का राजा भरमाल कछवाहा था जिसकी पुत्री का अकबर से विवाह हुआ था। (शिक्षा व लेखा शास्त्र वाले हिंदू जातियों के सदस्यों को भी पदोन्नत किया जाता था। उदाहरण के लिए अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल हैं जो खत्री जाति से थे।
(iii) जहाँगीर के शासन में ईरानियों को उच्च पद प्राप्त हुए। जहाँगीर की राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रानी नूरजहाँ (1645) ईरानी थी। औरंगजेब ने राजपूतों को उच्च पदों पर आसीन किया। फिर भी शासन में अधिकारियों के समूह में मराठे अच्छी संख्या में थे।

प्रश्न 8. पानीपत की पहली लडाई (1526) भारत के इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई समझी जाती है, विवेचना कीजिए।
उत्तर : 1. इस लड़ाई में लोदियों की कमर टूट गई दिल्ली और आगरा तक का सारा प्रदेश बाबर के अधीन हो गया।
2.इब्राहीम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र खजाना अधिकार में आ जाने से बाबर की सारी आर्थिक कठिनाइयाँ दूर हो गई।
3.जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र भी बाबर के सामने प्रशस्त था। 4. पानीपत की लड़ाई ने उत्तर भारत पर आधिपत्य के लिए संघर्ष के एक नये युग का सूत्रपात किया।

प्रश्न 9. 1530 में हुमायूँ के गद्दी पर बैठने के समय उत्तरी भारत की राजनैतिक स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1. प्रशासन अभी सुसंगठित नहीं हुआ था। आर्थिक दशा भी अच्छी नहीं थी।
2.अफगानों को पूरी तरह दबाया नहीं जा सका था, वे अब भी मुगलों को भारत से बाहर खदेड़ने के सपने देख रहे थे।
3.हुमायूँ ने अपने राज्य का बहुत बड़ा भाग भाइयों में बॉट दिया था। काबुल और कंधार कामरान के पास थे। उसने लाहौर और मुल्तान पर आक्रमण करके उन्हें भी जीत लिया।
4.हुमायूँ के दूसरे भाई असकरी और हिन्दाल भी विद्रोह करने पर तुले हुए थे। अवसर मिलते ही वे कुछ भी कर सकते थे।

प्रश्न 10. अफगानों के विरुद्ध बाबर की विजय के कारण बताइये।
उत्तर : 1. बाबर की वैज्ञानिक रणनीति : बाबर ने एशिया में अनेक युद्ध किए थे। अत: उसे विभिन्न जातियों की युद्ध-कला का अच्छा अनुभव था। उसने तुर्कों से घुड़सवार सेना, ईरानियों से तोपखाने, मंगोलों से छिपकर लड़ने या घात लगाने की कला और उजबेगों से तुलुगमा रणनीति को सीखा था। इस प्रकार उसकी रणनीति वैज्ञानिक थी। भारत की अफगान सेनायें पुराने तरीके से लड़ती थीं। अत: वे उसका सामना नहीं कर सकीं।
2.बाबर का तोपखाना (7 topkhana of Babar) : बाबर की सफलता का प्रमुख कारण उसका शक्तिशाली तोपखाना था.. जिसका संचालन उस्ताद अली खाँ और मुस्तफा खाँ कर रहे थे। बाबर के तोपखाने ने युद्ध-क्षेत्र में अफगान सेना का भयंकर विनाश किया था।
3.बाबर का योग्य सेना नेतृत्व (Good commanding on army by Babar) : बाबर एक जन्मजात सैनिक और अनुभवी सेनापति था। उसे एशिया की नवीन युद्ध कला का पूर्ण अनुभव था। उसकी सेना का संचालन बहुत उत्तम था। उसका विरोधी इब्राहीम लोधी एक अनुभवहीन और अयोग्य सेनापति था।
4.इब्राहीम की अलोकप्रियता (Impopularity of Ibrahim) : सुल्तान इब्राहीम लोधी अपने सरदारों से अच्छा व्यवहार नहीं करता था। अत: उसके चाचा आलम खाँ और पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोधी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। अपनी अलोकप्रियता के कारण इब्राहीम लोधी मुसीबत के समय अपने सरदारों और भारतीय शासकों का सहयोग न पा सका।
5.इब्राहीम की दुर्बल गुप्तचर व्यवस्था (Keak C.I.D. of Ibrahim) : इब्राहीम के गुप्तचर अनुभवी और कुशल नहीं थे, जिससे उसे बाबर की सैन्य जानकारियाँ प्राप्त नहीं हो सकीं।

प्रश्न 11. “अनेक लोग जलालुद्दीन अकबर (1556- 1605 ) को मुगल सम्राटों में महानतम मानते हैं।” उक्त कथन का उचित साक्ष्यों की सहायता से समर्थन कीजिए ।
उत्तर : जलालुद्दीन अकबर (1556-1605) को सबसे महान् मुगल शासक माना जाता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं।
(1) अकबर ने न केवल साम्राज्य का विस्तार किया बल्कि उसे सुदृढ़ और समृद्ध भी बनाया।
(2) वह अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार हिंदुकुश पर्वत तक करने में सफल रहा।
(3) उसने ईरान के सफावियों और तूफान (मध्य एशिया) के उजबेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर लगाम लगाए रखी।
(4) उसने मुगल प्रशासन को व्यवस्थित किया। उदारता और सहनशीलता इसके दो मुख्य लक्षण थे।
(5) अकबर द्वारा अपनाई न्याय प्रणाली आदर्श थी।

प्रश्न 12. बाबर के ‘तुज्क-ए-बाबरी’ या ‘बाबरनामा’ पर नोट लिखें।
उत्तर : बाबर एक वीर योद्धा ही नहीं, अपितु एक विद्वान साहित्यकार भी था। उसकी रचनाओं में सबसे उत्तम उसकी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ या ‘तुज्क-ए-बाबरी’ है। श्रीमती बैवरिज के अनुसार, “बाबर की आत्मकथा एक ऐसा अमूल्य भंडार है जिसे सेंट अगस्टॉइन तथा रूसो के स्वीकृति वचन और गिब्बन तथा न्यूटन की आत्म कथाओं के समकक्ष रखा जा सकता है।” बाबर ने अपनी आत्मकथा को अपनी मातृ-भाषा तुर्की में लिखा था। फारसी में इनका अनुवाद गुलबदन ने किया। अंग्रेजी में श्रीमती बैवरिज तथा हिंदी में केशव कुमार ठाकुर के अनुवाद बहुत प्रसिद्ध हैं।
विषय (Subjects) : बाबरनामा में बाबर के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन है। इसमें फरगान, समरकन्द, बाबर की काबुल विजय, भारत के उत्तर-पश्चिम प्रदेश तथा पानीपत, खनवाह, चंदेरी और घाघरा आदि के प्रसिद्ध भारतीय युद्धों का भी वर्णन है। बाबर के जीवन में स्थिरता का अभाव था। अत: बाबर की आत्मकथा में केवल 18 वर्ष की घटनायें ही मिलती हैं।
भाषा-शैली (Language and Style) : बाबरनामा की भाषा तुर्की है। इसमें अरबी-फारसी के शब्दों की अधिकता है। बाबर की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रवाहमयी है। उसकी । वर्णन-शैली भी साधारण और स्पष्ट है। उसे जब अधिक समय मिला तो उसने विस्तार में लिखा है और जब कम समय मिला तो संक्षेप में वर्णन किया है।
विशेषताएँ (Merits) :1.बाबर ने सरल और स्पष्ट वर्णन किया है। उसने अपनी भूलों और कमजोरियों को भी नहीं छुपाया।
2.बाबर को प्रकृति से बड़ा अनुराग था। बाबरनामा में प्राकृतिक दृश्यों का सुंदर वर्णन किया है। 3. बाबरनामा के वर्णन सजीव और रोचक हैं।
3.बाबरनामा में तत्कालीन भारत का प्रामाणिक इतिहास है।
महत्त्व (Importance) : बाबरनामा साहित्यिक तथा ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में मध्य एशियाई राजनीति, तैमूरों के इतिहास, मंगोलों और चुगताइयों के आपसी सम्बन्ध, बाबर की तत्कालीन कठिनाइयाँ, ईरानी, उजबेग शक्ति के उत्थान और संघर्ष तथा बाबर के संघर्षमय । जीवन की जानकारी मिलती है। इसी प्रकार यह ग्रन्थ तत्कालीन भारत और मध्य एशिया की सांस्कृतिक और राजनैतिक जानकारी के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 13. “मुगल इतिहास पड़ोसी राजनीतिक शक्तियों के साथ राजनीतिक रिश्तों और संघर्ष का विवरण देते हैं।”उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) कंधार सफ़ावियों तथा मुगलों के बीच झगड़े की जड़ था। यह किला नगर के आरंभ में हुमायूँ के अधिकार में था। 1595 में अकबर ने इसे पुन: जीत लिया था। (ii) यद्यपि सफावी दरबार ने मुगलों के साथ अपने राजनयिक संबंध कायम रखे तथापि कंधार पर यह दावा करता रहा। (i) 1613 ई० में जहाँगीर ने शाहअब्बास के दरबार में कंधार को मुगल अधिकार में रहने देने की वकालत के लिए एक राजनयिक दूत भेजा, लेकिन यह शिष्टमंडल अपने उद्देश्य में असफल रहा। 1662 ई० में एक फारसी सेना ने कंधार पर घेरा डाल दिया। (iv) ऑटोमन साम्राज्य के साथ मुगलों का संबंध इस हिसाब से कायम था कि उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के स्वतंत्र आवागमन बरकरार रखा जा सके। मुगल बादशाह आमतौर पर धर्म और वाणिज्य के मुद्दों को मिलाने की कोशिश करता था। (v) परंतु औरंगजेब को जब अरब भेजे जाने वाले धन के दुरुपयोग की जानकारी हुई, तो उसने भारत में उसके वितरण का समर्थन किया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मुगल इतिहास पड़ोसी राजनीतिक शक्तियों के साथ राजनीतिक रिश्तों और संघर्ष का विवरण देते हैं।

प्रश्न 14. शेरशाह सूरी के भू-राजस्व का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : 1. शेरशाह ने भूमि पर लगान की दर निश्चित करने के लिए कृषि योग्य भूमि को तीन भागों में बाँटा। अच्छी, खराब और साधारण स्तर की भूमि। तीनों प्रकार की भूमि की उपज निश्चित करके उनके औसत पर लगान निश्चित किया जाता था।
2. लगान उपज के अनुसार निश्चित किया जाता था। साधारण उपज वाली भूमि की उपज का एक तिहाई भाग लगान के रूप में देना होता था। लगान अनाज या धन के रूप में नकद, सरकारी कोष में जमा किया जा सकता था।
3.फसल नष्ट होने पर किसानों का लगान माफ कर दिया जाता था। उन्हें राजकोष से आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। सैनिकों को आदेश था कि वे कूच के समय फसल न खराब करें। यदि अनिवार्य परिस्थितियों के कारण सैनिकों द्वारा खड़ी फसल को नुकसान पहुँचता था तो राज्य उसकी क्षति पूर्ति करता था।
4.सरकार और किसानों के बीच पट्टे होते थे। इन पट्टों पर भूमि का क्षेत्रफल, भूमि की श्रेणी तथा लगान की दर लिखी होती थी। किसान उस पर हस्ताक्षर करता था। इस पट्टे से किसान के अधिकार सुरक्षित हो जाते थे।

प्रश्न 15. शेरशाह द्वारा व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने के लिए किए गए कार्य लिखें।
उत्तर : अपने शासन काल में शेरशाह ने व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कदम उठाए :

1.शांति और व्यवस्था की स्थापना (Establishment of Peace and Organisation) : व्यापार और वाणिज्य की उन्नति के लिए शेरशाह ने शांति और व्यवस्था की स्थापना की। उसने चोर-डाकुओं और उपद्रवी जमींदारों का कठोरता से दमन किया।
2.सड़कें और सरायें (Roads and Shelters) : व्यापार के विकास के लिए शेरशाह ने आवागमन के साधनों का सुधार किया। उसने कई बड़ी सड़कों का निर्माण करवाया। पुराने राजमार्ग को, जिनसे जी. टी. रोड कहा जाता है, शेरशाह ने फिर से खोला। यह सड़क पूर्वी बंगाल में ढाका से लेकर अटक तक है। उसने दूसरी सड़क आगरा से चित्तौड़ तक, तीसरी आगरा से दक्षिण की ओर तथा चौथी सड़क लाहौर से मुल्तान तक बनवायी। यात्रियों की सुख-सुविधा के लिए सड़कों के दोनों ओर छायादार पेड़ लगवाए और प्रति 6 किमी. की दूरी पर सरायें बनवायीं। इनमें हिन्दुओं तथा मुसलमानों के रहने तथा भोजन के लिए अलग अलग प्रबंध था। इनमें सरकार की ओर से सुरक्षा का भी पूरा प्रबंध होता था।
3.व्यापारियों की सुरक्षा (Safety of Traders) : शेरशाह ने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि वे व्यापारियों से अच्छा व्यवहार करें और उन्हें किसी भी प्रकार की हानि न पहुँचायें। व्यापारियों के जान-माल की रक्षा की जिम्मेदारी गाँव के मुखिया या जमींदार पर होती थी। यदि कोई हानि हो जाए जो उन्हें अपराधी को पेश करना होता था, नहीं तो स्वयं दंड भुगतना पड़ता था। व्यापारियों को दी गई सुरक्षा से व्यापार को बहुत बढ़ावा मिला।
4.चुंगी-कर सुधार (Reforms in Chungi-tax) : शेरशाह ने व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने के लिए अनेक अनुचित कर हटा दिए। चुंगी- |-कर अनेक स्थानों की अपेक्षा केवल दो स्थानों पर ही लगाया। एक बार देश में माल के आने पर और दूसरी बार उसकी बिक्री पर ही व्यापारियों को कर देना पड़ता था।
5.मुद्रा सुधार (Currency reforms) : शेरशाह ने व्यापार के विकास के लिए मुद्रा प्रणाली में भी सुधार किया। उससे पहले खोट मिले मिश्रित धातुओं के सिक्के चलते थे विदेशी व्यापारी उन्हें लेने से हिचकते थे लेकिन शेरशाह ने शुद्ध सोने, चाँदी तथा ताँबे के मानक सिक्के ढलवाए। छोटे सिक्के अधिक ढाले गए। इससे साधारण लोगों को लेन-देन में बड़ी सरलता हो गई।
6.मानक बाट और माप (Standard Weight and Measures) : शेरशाह ने अपने सारे राज्य में मानक बाट और माप लागू किए ताकि भाव निश्चित करने में आसानी हो और हिसाब भी ठीक से लगाया जा सके। इससे भी व्यापार के विकास को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 16. अकबर के शासन के आरम्भिक वर्षों की समस्याओं का वर्णन कीजिए। उसने इन आरंभिक समस्याओं का किस प्रकार समाधान किया ?
उत्तर : 1. अकबर को कठिनाइयाँ तो जन्म काल से ही मिली थीं। जब वह पैदा हुआ, तो माँ-बाप से बिछुड़ कर चाचा कामरान के पास रहा और बाद में वह अपने माँ-बाप से मिला। 1556 ई. में कलानौर में ही उसे गद्दी पर बैठा दिया और उसकी आयु उस समय केवल 13 वर्ष 4 महीने ही थी।
2.आगरा के पास अफगान अभी भी सबल थे और हेमू के नेतृत्व में अंतिम लड़ाई की तैयारी कर रहे थे। काबुल पर आक्रमण करके घेरा डाला जा चुका था। पराजित अफगान शासक सिकंदर सूर शिवालिक की पहाड़ियों में घूम रहा था।
3.अकबर के योग्य संघरक्षक बैरमखाँ ने सारी कठिनाइयों को परास्त कर दिया। इससे प्रसन्न होकर अकबर ने उसे खान-ए-खाना की उपाधि दी। मुगल सेना का पुनर्गठन किया गया। उस समय सबसे अधिक खतरा हेमू से था।
4.चुनार से लेकर बंगाल की सीमा तक का प्रदेश शेरशाह के भतीजे आदिलशाह के अधीन था। हेमू का पराक्रम इसी बात से सिद्ध होता है कि उसने 22 लड़ाइयाँ लड़ीं और एक भी नहीं हारीं। हेमू ने आगरा जीत लिया था और एक विशाल सेना के साथ दिल्ली की ओर बढ़ा।
5. हेमू के नेतृत्व में अफगान सेना और मुगल सेना के बीच 5 नवम्बर, 1556 ई. को पानीपत की दूसरी लड़ाई हुई। अचानक हेमू को तीर लगा और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। अफगान भागने लगे और जीती हुई लड़ाई हार गए।

प्रश्न 17. मनसबदारी प्रथा से क्या अभिप्राय है ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर : मनसबदारी प्रथा का अर्थ (Meaning of Mansabdari System) : “मनसब अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अभिप्राय उपाधि या प्रतिष्ठा है। अकबर ने जिस सैनिक सा असैनिक अधिकारी की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ‘मनसब’ दिया, उसको मनसबदार कहा जाने लगा।
मनसबदारी प्रथा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1.मनसबदारी का वर्गीकरण (Classification of Mansabdari System) : कम-से-कम दस और अधिक-से- अधिक दस हजार सैनिक एक मनसबदार रख सकता था। सर्वोच्च मनसब राजकीय परिवार के व्यक्ति को ही मिलता था।
2. नियुक्ति आदि (Appointment etc.) : बादशाह स्वयं ही किसी मनसबदार की नियुक्ति, पदोन्नति या पदावनति कर सकता था।
3.जात एवं सवार (Jat and Sawar) : जिस पद में व्यक्ति का पद, स्थान तथा मासिक वेतन निश्चित होता था, उसे जात कहा जाता था जेपी.एच इतिहास-XII (संशोधित संस्करण) परंतु घुड़सवारों की संख्या के आधार पर सवार पद माना जाता था।
4. अच्छा वेतन (Good.Salary): मनसबदारों को उनके के अनुसार वेतन मिलता था। जैसे 100 जात वाले मनसबदार को पद 500 रू. मिलते थे जबकि 5,000 वाले को 30,000 रु. मिलते थे।
5. कार्य भार (Work Load) : यह बादशाह की इच्छा पर निर्भर करता था कि वह अमुक मनसबदार को सैनिक या असैनिक कार्य करने के लिए कहता था। किसी क्षेत्र में उठे विद्रोह को दवासे या किसी क्षेत्र को जीतने के लिए कहा जाता था।
6.घोड़ों को दागने की प्रथा (Marking of the Horses): अकबर ने घोड़ों को दागने और सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा चलाई थी। इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा।
7.मनसबदारी की जब्ती (Capturing of Mansabdari): मनसबदार की अचानक मृत्यु हो जाने पर उसकी मनसब सरकार जब्त कर लेती थी।
8.मनसबदारों के मिले-जुले सवार (Mix Sawars of Mansabdars) : पठान, तुर्क, राजपूत, मुगल आदि सवार मनसबदारों के अधीन होते थे। इससे किसी एक वर्ग के हाथ में शक्ति केन्द्रित नहीं होती थी।

प्रश्न 18. अकबरकालीन युग में नौ रत्न पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : अकबर के नौरत्न (Akbar s Nine gems) अकबर के पास विद्वानों का समूह था, जो नवरत्नों के नाम से प्रसिद्ध था। जिनमें से प्रसिद्ध विद्वान थे-अबुल फ़ज़ल, फैजी, रहीम खान-ए-खाना, टोडरमल, तानसेन और बीरबल। बीरबल अपनी बुद्धिमत्ता तत्परता और हज्ञसी मजाक के लिए प्रसिद्ध था। वह एक महान् सेनापति भी था। एक अन्य रत्न था, राजा मानसिंह। वह एक महान् सेनापति होने के अलावा अकबर का अति विश्वसनीय सलाहकार भी था। कई अन्य विद्वान् भी अकबर के संरक्षण में थे।
तानसेन अकबर के दरबार का एक प्रसिद्ध संगीतकार था। वह अकबर के नवरत्नों में से एक था। उसने अनेक रागों की गायन शैली में नवीनता का समावेश करके भारतीय संगीत को समृद्ध किया। राग दरबारी इन रागों में सबसे अधिक लोकप्रिय था। जिसकी रचना तानसेन ने विशेष रूप से अकबर के लिए की थी। अकबर के शासन काल में भारत की संगीत कला में फारस की संगीत कला की बहुत-सी विशेषताएँ ली गई थीं। अबुल फ़ज़ल तानसेन के बारे में लिखता है-“उस जैसा संगीतकार भारत में आने वाले हजारों वर्षों तक नहीं होगा।”

प्रश्न 19. “मुगल शासकों ने बड़े प्रभावशाली तरीके से विजातीय जनसाधारण को शाही संरचना के अंतर्गत सम्मिलित किया” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर : मुगल इतिवृत्त मुगल साम्राज्य को हिंदुओं, जैनियों,पारसियों, मुसलमानों आदि अनेक नृजातीय एवं धार्मिक समुदायों समूह के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बादशाह शांति और स्थायित्व स्रोत के रूप में इन सभी समूहों से ऊपर होता था । वह इनके सच मध्यस्थता करता था और यह सुनिश्चित करता था कि राज्य न्याय और शांति बनी रहे। अबुल फज्ल सुलह-ए-कुल (पूर्ण शाति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। सुलह-ए-कुल में यूँ तो सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी, परंतु इसकी एक शर्त थी। वह यह थी कि वे राज्य-सत्ता को क्षति नहीं पहुँचाएँगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे।
सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य नीतियों के जरिए लागू किया गया। मुगलों के अधीन अभिजात वर्ग मिश्रित किस्म का था अर्थात् इसमें ईरानी, तूरानी, अफगानी, राजपूत, देखनी सभी शामिल थे। इन सबको दिए गए पद और पुरस्कार पूरी तरह से राजा के प्रति उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित थे।

प्रश्न 20. मुगल साम्राज्य के शाही परिवार के विशिष्ट अभिलक्षणों की पहचान कीजिए।
उत्तर : (i) मुगल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त साम्राज्य और उसके दरबार के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्त्रोत हैं। ये इतिवृत्त साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले सभी लोगों के सामने एक प्रबुद्ध राज्य के दर्शन की प्रायोजना के उद्देश्य से लिए गए थे।
(ii) अकबर ने काफी सोच-समझकर फारसी को दरबार की मुख्य भाषा बनाया। संभवत: इसके पीछे ईरान के साथ सांस्कृतिक एवं बौद्धिक संपर्क स्थापित करने का उद्देश्य निहित था।
(iii)अबुल फ़ज़ल मुगल राजस्व को देवी स्वरूप प्रदान किया और सुलह-ए-कुल की नीति द्वारा न्याय और शांति की स्थापना पर बल दिया। सभी धर्मों और मतों की अभिव्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान की गई।
(iv) मुगल दरबार की शान-शौकत सत्ता शक्ति और प्रतिष्ठा की सूचक थी। मनसबदार और अभिजात वर्ग द्वारा प्रशासनिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया गया।
(v) पड़ोसियों के साथ संबंधों को मधुर बनाने का प्रयास किया गया और जेसुइट धर्म प्रचारकों के माध्यम से यूरोप को भारत के बारे में जानकारी हुई।

प्रश्न 21. “सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श प्रबद्ध शासन की आधारशिला है” ऊपर दिए गए कथन के संदर्भ में अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति का मूल्यांकन कीजिए।

अथवा

विश्लेषण कीजिए कि अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति उसके प्रबुद्ध शासन की आधारशिला क्यों समझी जाती थी? मुगलकाल में इतिवृत्तों की रचना किस प्रकार होती थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1. मुगल इतिवृत्त मुगल साम्राज्य को हिंदुओं,जैनियों, पारसियों, मुसलमानों आदि अनेक नृजातीय एवं धार्मिक समुदायों के समूह के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बादशाह शांति और स्थायित्व के प्रांत के रूप में इन सभी समूहों से ऊपर होता था। वह इनके बीच मध्यस्थता करता था और यह सुनिश्चित करता था कि राज्य में न्याय और शांति बनी रहे। अबुल फज्ल सुलह – ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। सुलह-ए-कुल में यूँ तो सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की ति स्वतंत्रता थी, परंतु इसकी एक शर्त थी। वह यह थी कि वे राज्य-सत्ता को क्षति नहीं पहुँचाएँगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे।
सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य नीतियों के जरिए लागू किया गया। मुगलों के अधीन अभिजात वर्ग मिश्रित किस्म का था अर्थात् इसमें ईरानी, तूरानी, अफगानी, राजपूत, देखनी सभी शामिल थी। इन सबको दिए गए पद और पुरस्कार पूरी तरह से राजा के प्रति उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित थे।
2.इतिवृत्तों की रचना : (i) मुगल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त (Chronicles) मुगल साम्राज्य और दरबार के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। (ii) इन इतिवृत्तों की रचना मुगल साम्राज्यों के अंतर्गत आने वाले सभी व्यक्तियों के सामने एक प्रबुद्ध राज्य (Enligtened kingdom) के दर्शन की प्रायोजना (Project) के उद्देश्य से लिखे गए थे। (ii) निरपवाद रूप से मुगल इतिवृत्तों के लेखक दरबारी थे। उनके द्वारा जो इतिहास लिखे गए उनमें शासक पर केंद्रित घटनाओं पर अधिक ध्यान दिया गया। उदाहरण के लिए शासक का परिवार, दरबार तथा अभिजात, युद्ध तथा प्रशासनिक व्यवस्थाएँ आदि। (iv) अकबर, शाहजहाँ तथा आलमगीर की कहानियों पर आधारित इतिवृत्तों के शीर्षक ‘अकबर नामा’, ‘शाहजहाँनामा’, ‘आलमगीरनामा’ यह बताते हैं कि इनके लेखकों की दृष्टि में साम्राज्य तथा दरबार का इतिहास तथा बादशाह का इतिहास एक ही था।

प्रश्न 22. जजिया से आप क्या समझते हैं ? इसको फिर से लागू किये जाने के क्या कारण थे ?
उत्तर :1.जजिया एक प्रकार का धार्मिक कर था, जो हिन्दुओं और अन्य गैर-मुस्लिमों से वसूल किया जाता था उन्हें इस कर के रूप में गैर-मुस्लिम होने का आर्थिक दण्ड ही भरना पड़ता था। साथ ही उन्हें सैनिक सेवाओं से भी मुक्त कर दिया जाता था। शरिअत के अनुसार जो भी हिन्दू, किसी मुसलमान शासक के अधीन रहता था उसके लिए यह कर चुकाना अति आवश्यक था परन्तु अनेक सम्राटों ने इसे हिन्दुओं से लेना बन्द कर दिया। यह कर बच्चों, स्त्रियों, ब्राह्मणों, गुलामों और पागलों से नहीं लिया जाता था। अकबर के पश्चात् जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी इस कर को दोबारा लगाने का प्रयत्न नहीं किया।
2.(i) अधिकतर लेखकों का विचार है कि जजिया कर का मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं के अन्दर हीनता की भावना पैदा करना तथा मुसलमानों की स्थिति को ऊँचा उठाना था। दूसरे शब्दों में, इसका उद्देश्य शासक और शासित में भेद करना था। यह दोनों धर्मों के बीच दीवार थी। हिन्दुओं को अपने धर्म से नफरत करने तथा गरीब हिन्दुओं को मुसलमान धर्म ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना था।
(ii) कुछ का कहना है कि औरंगजेब ने यह कर जाटों, सतनामियों आदि को दण्ड देने के लिए लगाया था ताकि वे दुबारा विद्रोह न करें इसीलिए यह धार्मिक कारण न होकर राजनीतिक कारण था।
3.औरंगजेब एक पक्का हिन्दू-विरोधी सम्राट होने पर भी जजिया कर नहीं लगाना चाहता था, परन्तु कट्टरपंथियों के राजनीतिक विरोध के डर से उसे ऐसा करना पड़ा। धर्मान्ध लोगों के दबाव और प्रभाव में आकर उसने जजिया कर को 1679 ई. में दुबारा लगा दिया। इससे हिन्दुओं के विभिन्न वर्ग औरंगजेब के कट्टर दुश्मन बन गए और मुगल साम्राज्य का नाश करने में उन्होंने कसर नहीं छोड़ी।
औरंगजेब के जजिया कर दोबारा लगाने के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है। इस सम्बन्ध में यदुनाथ सरकार का कहना है, “हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का षड्यन्त्र था।” दूसरी ओर जाफर और फारूखी का मत है, “जाटों, सतनामियों मराठों, आदि के बार-बार विद्रोह के कारण क्रोधित होकर ही उसने जजिया कर दुबारा लगाया था ताकि हिन्दुओं को दण्डित किया जा सके।” 1679 ई. में इस कर को दुबारा लगाये जाने के बारे में इतिहासकार जाफर और फारूखी के विचार हैं कि औरंगजेब की अपनी स्थिति इतनी मजबूत न थी इसीलिए उसने शासक बनने के कुछ समय पश्चात् यह कर दुबारा लगाया।
जजिया कर औरंगजेब ने चाहे बाह्य दबावों के कारण या आंतरिक प्रेरणा के कारण लगाया। वह इसके लिए बहाना ढूँढ रहा था। कभी जाटों का विद्रोह हो या सतनामियों का, पर बात कुछ भी रही हो यह कर दुबारा लगाना उसके लिए मुसीबत बन गया। इसके परिणाम भयंकर निकले। इसी कारण उसके उत्तराधिकारियों ने उसे दोबारा हटा दिया।

प्रश्न 23. अकबरनामा किसने लिखा था ? इसकी विषयवस्तु का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
उत्तर : अकबर के काल में ‘अकबरनामा’ की रचना फारसी भाषा में हुई। ‘अकबरनामा’ के लेखक अबुल फ़ज़ल का पालन-पोषण मुगल राजधानी में हुआ। वह अरबी, फारसी, यूनानी दर्शन और सूफीवाद में पर्याप्त कुशल था।
अकबरनामा की विषय-वस्तु : अबुल फज्ल ने अकबरनामा पर तेरह वर्षों तक कार्य किया। समय-समय पर उसने इसके प्रारूप में कई सुधार भी किए। अकबरनामा को तीन जिल्दों (भागों) में विभाजित किया गया है। इनमें प्रथम दो भाग इतिहास हैं जबकि तीसरा भाग आइन-ए-अकबरी एक राजनीतिक ग्रंथ है। पहले भाग की विषय-वस्तु के रूप में आदम से लेकर अकबर के जीवन-काल के प्रथम 30 वर्षों का मानव जाति का इतिहास हैं। दूसरे भाग में अकबर के 46वें शासन वर्ष तक का वर्णन है। इन दो इतिहास के भागों में अकबर के समय भौगोलिक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक पहलुओं का विवरण मिलता है। अकबरनामा का तीसरा भाग आइन-ए-अकबरी, बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसमें विभिन्न धर्मों की आबादी वाले मिश्रित संस्कृति वाले साम्राज्य का खाका खींचा गया है।

प्रश्न 24. बादशाहनामा के लेखक का नाम लिखिए । इसकी विषय-वस्तु का वर्णन लिखिए।
उत्तर : बादशाहनामा लेखक का नाम अब्दुल हमीद लाहौरी था।

बादशाहनामा की विषय-वस्तु : अकबर काल में प्रसिद्ध अबुल फजल के शिष्य अब्दुल हमीद, लाहौरी को मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपने पितामह अकबर पर लिखे अकबरनामा के नमूने के आधार पर अपने शासन का इतिहास लिखने के लिए आदेश दिया। इस रूप में अकबरनामा की तरह बादशाहनामा भी एक सरकारी इतिहास है। इसकी तीन जिल्दें (दफ्तर) और प्रत्येक जिल्द (दफ्तर) दस चंद्र वर्षों (चाँद की गति पर आधारित पंचांग)। का ब्यौरा देती है। अब्दुल हमीद लाहौरी ने मुगल सम्राट शाहजहाँ के काल के पहले दो दशकों (1627-1647) का विवरण अपनी इस रचना के पहले और दूसरे दफ्तर (अर्थात् जिल्दों) में दिया है। इन जिल्दों में बाद में शाहजहाँ के वजीर सादुल्ला खान सुधार किया।
अपनी वृद्धावस्था के कारण अमीद लाहौरी बादशाहनामा की 3 तीसरी जिल्द तीसरे दशक के इतिहास के बारे में नहीं लिख सका। कालांतर में इतिहासकार वारिश ने उसे लिखा।

प्रश्न 25. सूर्योदय के बाद से मुगल बादशाह अकबर की दिनचर्या का वर्णन कीजिए। उनके जन्मदिन पर क्या हुआ था?

अथवा

सम्राट् अपना दिन झरोखे (बालकोनी) तथा दीवान-ए- – आम में कैसे प्रारंभ करता था ? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर : मुगल बादशाह अकबर की दिनचर्या :
1.झरोखा दर्शन (Jharokha Darshan) : बादशाह अपने दिन की शुरुआत सूर्योदय के समय कुछ व्यक्तिगत धार्मिक प्रार्थनाओं से करता था और इसके बाद वह पूर्व की ओर मुँह किए एक छोटे छज्जे अर्थात् झरोखे में आता था। इसके नीचे लोगों की भीड़ (सैनिक, व्यापारी, शिल्पकार, किसान, बीमार बच्चों के साथ औरतें) बादशाह की एक झलक पाने के लिए इंतजार करता थी। अकबर द्वारा शुरू की गई झरोखा दर्शन की प्रथा का उद्देश्य जन विश्वास के रूप में शाही सत्ता की स्वीकृति को और विस्तार देना था।
2.दीवान-ए-आम एवं दीवान-ए-खास (Diwan-i प्रधानित Aam and Diwan-i-Khas) : झरोखे में एक घंटा बिताने के बाद बादशाह अपनी सरकार के प्राथमिक कार्यों के संचालन हेतु सार्वजनिक सभा भवन (दीवान-ए-आम) में आता था। वहाँ राज्य लाइए के अधिकारी रिपोर्ट प्रस्तुत करते तथा निवेदन करते थे। दो घरै अ बाद बादशाह दीवान-ए-खास में निजी सभाएँ और गोपनीय मुद्दों पर चर्चा करता था। राज्य के वरिष्ठ मंत्री उसके सामने अपनी याचिकाएँ प्रस्तुत करते थे और कर अधिकारी हिसाब का ब्यौरा देते थे। कभी-कभी बादशाह उच्च प्रतिष्ठित कलाकारों के कार्यों अथवा वास्तुकारों (मिमार) के द्वारा बनाए गए इमारतों के नक्शों को देखता था।
हुमायूँ को भारत में अपनी गद्दी (सिंहासन) के वारिस अकबर के जन्म की सूचना मिली तो वह बहुत प्रसन्न हुआ और व उसने अपने पास से हिरण की कस्तूरी को तोड़कर अपने साथ र रहे अमीरों एवं लोगों को बांटते हुए कहा कि आज मेरे पास यही है लेकिन जैसे इसकी सुगंध सर्वत्र फैल रही है एक दिन मेरे इस युग की कीर्ति की सुंगध भी सर्वत्र व्याप्त होगी। कालांतर में सम्राट जन्म दिन पर विभिन्न मूल्यवान वस्तुओं तथा सिक्कों से सोला जाता था जिन्हें तुरंत दान में बांट दिया जाता था।

प्रश्न 26. ‘सटीक और विस्तृत आलेख तैयार करना, गुगल प्रशासन की मुख्य चुनौती थी। उदाहरणों के साथ कथन की पुष्टि कीजिए। (CBSE 2016 Outside)
उत्तर : नि: संदेह सटीक और विस्तृत आलेख तैयार करना मुगल प्रशासन की मुख्य चुनौती थी क्योंकि :
(i) मीर बख्शी दरबारी लेखकों के समूह का निरीक्षण करता ये लेखकगण दरबार में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी दस्तावेजों, था। अर्जियों और शासकीय आदेशों का आलेख तैयार करते थे। (ii) अभिजातों और क्षेत्रीय शासकों के प्रतिनिधि उच्च दरबार से –ए- समाचार नामक शीर्षक के अंतर्गत दरबार की सभी कार्यवाहियों जए का विवरण तैयार करते थे। इन विवरणों में दरबार की बैठकों की तिथि और समय का भी उल्लेख किया जाता था। (iii) समाचार नामक शीर्षक के अंतर्गत प्रत्येक प्रकार की सूचनाएँ होती थी। अग उदाहरण के लिए, दरबार में उपस्थिति, पदों तथा पदवियों का मित विवरण, राजनयिक शिष्टमंडल, ग्रहण किए गए उपहार एवं किसी कि अधिकारी के स्वास्थ्य के विषय के बादशाह द्वारा की गई पूछताछ। (iv) समाचार और महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक दस्तावेज शाही डाक द्वारा मुगल साम्राज्य में एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचाए जाते थे। इस कार्य के लिए हरकारों के दल दिन-रात दौड़ते रहते थे।
(v) सार्वजनिक समाचार के लिए पूरा साम्राज्य बहुत ही तीव्र सूचना तंत्र से जुड़ा हुआ था। अत्यधिक दूर स्थित प्रांतीय राजधानियों से भी वृत्तांत कुछ ही दिनों में बादशाह तक पहुँच जाया करते थे।

प्रश्न 27. मध्य युग में निम्नलिखित स्थानों का महत्त्व बताइए : आगरा, अजमेर, गोवा, गोलकुंडा, बीजापुर।
उत्तर : 1. आगरा : बाबर से लेकर शाहजहाँ के प्रारंभिक शासनकाल में भारत या मुगल काल की राजधानी रहा।
2.अजमेर : सूफियों का तीर्थस्थान बन गया।
3.गोवा : पुर्तगालियों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र रहा।
4.गोलकुंडा तथा बीजापुर : मुगलों से बहुत वर्ष तक स्वतंत्र राज्य रहे लेकिन और मत देने इन राज्यों को मुगल साम्राज्य का हिस्सा बना लिया।

प्रश्न 28. मुगल पांडुलिपियों में चित्रों को किस प्रकार संलग्न किया जाता था ? इनके महत्त्व के कोई दो बिंदु भी लिखिए।
उत्तर : मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। किसी बादशाह के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ उन घटनाओं को चित्रों के माध्यम से भी दर्शाया जाता था। जब किसी पुस्तक में घटनाओं अथवा विषयों को दृश्यों द्वारा दर्शाना होता था, तो सुलेखक उसके आस-पास के पृष्ठों को खाली छोड़ देते थे। चित्रकार शब्दों में वर्णित विषय को अलग से चित्रों में उतारकर वहाँ संलग्न कर देते थे। ये लघुचित्र होते थे जिन्हें पांडुलिपि के पृष्ठों पर आसानी के लगाया और देखा जा सकता था।
महत्त्व : (1) चित्र पुस्तक के सौंदर्य में वृद्धि करते थे। (2) राजा और उसकी शक्ति के बारे में जो बात शब्दों में नहीं कही जा सकती थी, उसे चित्र व्यक्त कर देते थे।

अथवा

मुगल बादशाह शासन पर दैवीय अधिकार रखते थे। इस विचार को किस प्रकार संप्रेषित किया गया ?
उत्तर : दरबारी इतिहासकारों ने कई साक्ष्यों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि मुगल राजाओं को सीधे ईश्वर से शक्ति प्राप्त हुई थी। उनके द्वारा वर्णित दंतकथाओं में से एक कथा मंगोल रानी अलानकुआ की है। वह अपने शिविर में आराम करते समय सूर्य की एक किरण द्वारा गर्भवती हुई थी। उसकी संतान पर इसी दैवीय प्रकाश का प्रभाव था। यह प्रकाश पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा।
अबुल फ़ज़ल ने ईश्वरीय प्रकाश को ग्रहण करने वाली चीजों में मुगल राजत्व को सबसे ऊँचा स्थान दिया। इस विषय में वह प्रसिद्ध ईरानी-सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के विचारों से प्रभावित था जिन्होंने सर्वप्रथम यह विचार प्रस्तुत किया था। इस विचार के अनुसार यह दैवीय प्रकाश राजा में संप्रेषित होता था जिसके फलस्वरूप राजा अपनी प्रजा का आध्यात्मिक मार्गदर्शक बन जाता था। इतिवृत्तों से जुड़े चित्रों ने इन विचारों को इस तरह संप्रेषित किया कि उन्हें देखने वालों के दिलो-दिमाग पर इनका स्थायी प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 29. “अबुल फज्ल ने अकबर के सुलह-ए-कुल के आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला बताया है। न्यायसंगत पुष्टि कीजिए।
उत्तर : मुगल साम्राज्य में न्याय और शांति के लिए सुलह-ए-कुल की नीति चलाई गयी। इसमें सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की जाती है, किंतु उसके लिए शर्त यह होती है कि वे आपस में नहीं लड़े तथा राजसत्ता को हानि ना पहुँचाये। अबुल फजल ‘सुलह-ए-कुल’ के आदर्श को शासन की आधारशिला बताता है। यह राज्य की नीतियों के जरिये लागू किया गया मुगलों के अधीन जो अभिजात वर्ग था वह मिश्रित किस्म का था। इन सबको दिए गए पद और पुरस्कार पूरी तरह से राजा के प्रति उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित होते थे, इसी नीति के तहत 1564 में अकबर ने जजिया तथा 1563 में तीर्थयात्रा पर लगाये जाने वाले ‘कर’ समाप्त कर दिया था क्योंकि उसका आधार धार्मिक पक्षपात था और अकबर सुलह-ए-कुल की नीति का समर्थक था। उसने साम्राज्य के अधिकारियों को प्रशासन में सुलह-ए-कुल के नियमों के पालन करने के निर्देश जारी करवा दिये थे। इस नीति का पालन करने वाले सभी प्रशासकों, बादशाहों ने उपासना स्थलों के निर्माण एवं रख-रखाव के लिए अनुदान दिए। यहाँ तक कि युद्ध के दौरान क्षतिग्रस्त उपासना स्थलों की मरम्मत के लिए अनुदान जारी किये चाहे वे किसी भी धर्म के हों। इस प्रकार यह धर्मनिरपेक्षता की नीति भी मानी जा सकती है. जहाँगीर-शाहजहाँ के शासनकाल तक मुगलों द्वारा इस नीति का अनुसरण किये जाने के साक्ष्य इतिहास द्वारा प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 30. फतेहपुर सीकरी के इबादतखाने में की गई धार्मिक चर्चाओं का अकबर के धार्मिक दर्शने पर पडे प्रभाव की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : प्रभाव : (i) आरंभ में अकबर एक कटरपंथी मुसलमान था परंतु बैरम खाँ, अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, फैजी,अबुल फ़ज़ल, बीरबल जैसे उदार विचारों वाले लोगों के संपर्क से उसका दृष्टिकोण बदल गया। हिंदू रानियों का भी उस पर प्रभाव पड़ा। अब वह अन्य धर्मों के प्रति उदार हो गया था।
(ii) 1575 ई. में उसने इबादतखाना बनवाया जिसमें विभिन्न धर्मों के विद्वानों को अपने-अपने विचार प्रकट करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। अक्सर बहस करते समय मौलवी गाली-गलौच पर उतर आते थे। अत: अकबर की इस्लाम धर्म में रूचि कम हो गई।
(iii) वह स्वयं तिलक लगाने लगा और गौ की पूजा करने लगा। इस प्रकार कटरपंथी मुसलमान उसे काफिर कहने लगे थे।
(iv) 1579 ई. में उसने अपने नाम का खुतवा पढ़वा कर अपने आप को धर्म का प्रमुख घोषित कर दिया। इससे उलेमाओं का प्रभाव कम हो गया।

प्रश्न 31, अबुल फ़ज़ल भूमि राजस्व को ‘राजक पारिश्रमिक’ क्यों बताया है ?
उत्तर : बर्नियर के अनुसार मुगल साम्राज्य में सारी भूमिका स्वामी सम्राट् था जो इसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था जिससे । अर्थव्यवस्था और समाज पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता था। परंतु वा आश्चर्य की बात यह है कि एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज यह नहीं दर्शाता कि भूमि का स्वामी राज्य ही था। उदाहरण के लिए अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल भू-राजस्व को ‘राजस्व का पारिश्रमिक’ बताता है जो राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले लिया जाता था, न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान के रूप में। ऐसा संभव है कि यूरोपीय यात्री ऐसे करों को लगान मानते हों क्योंकि भू-राजस्व की माँग प्राय: बहुत अधिक होती थी। परंतु वास्तव में यह न तो लगान था, न ही भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।

प्रश्न 32. सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य नीतियों के द्वारा कैसे लागू किया गया ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : मुगल इतिवृत्त मुगल साम्राज्य को हिंदुओं, जैनियों पारसियों, मुसलमानों आदि अनेक नृजातीय एवं धार्मिक समुदायों। के समूह के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बादशाह शांति और स्थायित्व के स्रोत के रूप इन सभी समूहों से ऊपर होता था। वह इनके बीच मध्यस्थता करता था और यह सुनिश्चित करता था कि राज्य में न्याय और शांति बनी रहे। अबुल फ़ज़ल सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। सुलह-ए-कुल में यूँ तो सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी, परंतु इसकी एक शर्त थी। वह यह थी कि वे राज्य-सत्ता को क्षति नहीं पहुँचाएँगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे।

प्रश्न 33. (i) मुगलकालीन पांडुलिपियों की रचना में शामिल लोगों की सामाजिक स्थिति में क्या परिवर्तन आया? भूमिट (ii) सुलेखन का पांडुलिपियों के साथ क्या संबंध था?
उत्तर : (i) मुगलकालीन पांडुलिपियों की वास्तविक रचना में शामिल कुछ लोगों को पदवियों और पुरस्कारों के रूप में भी पहचान मिली। इनमें से सुलेखकों और चित्रकारों को तो उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई, जबकि अन्य भागीदार जैसे कागज बनाने वाले अथवा जिल्दसाज गुमनाम कारीगर ही बनकर रह गए।
(ii) सुलेखन अर्थात् हाथ से लिखने की कला अत्यंत महत्त्वपूर्ण कौया मानी जाती थी। इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न से शैलियों में होता था। ‘नस्तलिक’ अकबर की मनपसंद शैली थी।यह एक ऐसी तरल शैली थी जिसे क्षैतिज रूप से प्रभावी ढंग से लिखा जाता था। इसे लिखने के लिए 5 से 10 मिलीमीटर की नोक वाली सरकंडे की एक कलम तथा स्याही का प्रयोग किया जाता था। सामान्यत: कलम की नोक के बीच एक छोटा-सा चीरा लगा दिया जाता था, ताकि वह स्याही को आसानी से सोख ले।

अथवा

मुगल इतिवृत्त की विशेषताओं का वर्णन कीजिए । मुगल इतिहास लेखन के लिए इनका क्या महम्व है ?
उत्तर : (1) मुगल इतिवृत्त मुगल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए राजवंशीय इतिहास हैं। (2) ये इतिवृत्त घटनाओं का कालक्रम अनुसार विवरण प्रस्तुत करते हैं । (3) मुगलों का इतिहास लिखने के इच्छुक किसी भी विद्वान के लिए ये इतिवृत्त अनिवार्य स्रोत हैं। (4) एक ओर तो ये इतिवृत्त मुगल राज्य की संस्थाओं के बारे में जानकारी देते हैं, तो दूसरी ओर ये उन उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हैं जिन्हें मुगल शासक अपने क्षेत्र में लागू करना चाहते थे। (5) इस प्रकार ये इतिवृत्त हमें इस बात की एक झलक दते हैं कि शाही विचारधाराएँ किस प्रकार रची तथा प्रचारित की जाती थीं।

प्रश्न 34. संक्षेप में वर्णन कीजिए कि शरियत में समयानुसार परिवर्तन किस प्रकार आया ?
उत्तर : विभिन्न सामाजिक समूहों ने इस्लामी परंपरा के ढाँचे की अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की। प्रायः प्रत्येक समूह इस परंपरा की ऐसी व्याख्या प्रतिपादित की जो उनकी राजनीतिक आवश्यकताओं से सबसे ज्यादा मेल खाती थी। जिन शताब्दियों के दौरान साम्राज्य निर्माण हो रहा था उस समय कई एशियाई क्षेत्रों के शासकों ने नियमित रूप से कलाकारों को उनके चित्र तथा उनके राज्य के जीवन के दृश्य चित्रित करने के लिए नियुक्त किया। उदाहरण के लिए, ईरान के सफावी राजाओं ने दरबार में स्थापित कार्यशालाओं में प्रशिक्षित उत्कृष्ट कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया। बिहज़ाद जैसे चित्रकारों के नाम ने सफावी दरबार की सांस्कृतिक प्रसिद्धि को चारों ओर फैलाने में बहुत योगदान दिया।
ईरान से भी कलाकार मुगलकालीन भारत आने में सफल हुए। कुछ को मुगल दरबार में लाया गया जैसे मीर सैय्यद अली और अब्दुस समद को बादशाह हुमायूँ को दिल्ली तक साथ देने के लिए कहा गया। अन्य ने संरक्षण और प्रतिष्ठा के अवसरों की तलाश में प्रवास किया। बादशाह और रूढ़िवादी मुसलमान विचारधारा के प्रवक्ताओं के बीच जीवधारियों के दृश्य निरूपण पर मुगल दरबार में तनाव बना हुआ था। अकबर का दरबारी इतिहासकार अबुल फजल बादशाह को यह कहते हुए उद्धृत करता है, “कई लोग ऐसे हैं जो चित्रकला से घृणा करते हैं पर मैं ऐसे व्यक्तियों को नापसंद करता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि कलाकार के पास खुदा को पहचानने का बेजोड़ तरीका है। चूँकि कहीं न कहीं उसे यह महसूस होता है कि खुदा की रचना को वह जीवन नहीं दे सकता।”

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