8 अंकीय प्रश्न उत्तर – शासक और इतिवृत – Class12th History Chapter 9

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 9 Important Question Answer 8 Marks शासक और इतिवृत्त (मुगल दरबार)

प्रश्न 1. मुगल पांडुलिपियों में चित्रकारों तथा चित्रों की भूमिका पर प्रकाश डालिए। इस संबंध में किस बात पर तनाव था और क्यों ?
उत्तर : मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। किसी बादशाह के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ उन घटनाओं को चित्रों के माध्यम से भी दर्शाया जाता था। जब किसी पुस्तक में घटनाओं अथवा विषयों को दृश्यों द्वारा दर्शाना होता था, तो सुलेखक उसके आसपास के पृष्ठों को खाली छोड़ देते थे। चित्रकार शब्दों में वर्णित विषय को अलग से चित्रों में उतारकर वहाँ संलग्न कर देते थे। ये लघुचित्र होते थे जिन्हें पांडुलिपि के = पृष्ठों पर आसानी से लगाया और देखा जा सकता था।
चित्रों का महत्त्व : (1) चित्र किसी पुस्तक के सौंदर्य में वृद्धि करते थे। (2) इसके अतिरिक्त राजा और राजा की शक्ति के विषय में जो बात शब्दों में न कही जा सकी हो, उसे चित्रों द्वारा व्यक्त कर दिया जाता था। इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने चित्रकारी को एक ‘जादुई कला’ की उपमा दी है। उसकी राय में यह कला किसी निर्जीव वस्तु में भी प्राण फूंक सकती है।
चित्रों को लेकर तनाव : बादशाह, उसके दरबार और उसमें हिस्सा लेने वाले लोगों के चित्रों की रचना को लेकर शासकों और रूढ़िवादी वर्ग अर्थात् उलमा के बीच निरंतर तनाव बना रहता था। उलमा का कुरान के साथ-साथ हदीस जिसमें दिए गए पैगंबर मुहम्मद के जीवन के एक प्रसंग के आधार पर यह कहना था कि इस्लाम मानव रूपों के चित्रण की अनुमति नहीं दता। इस प्रसंग में पैगंबर साहिब प्राकृतिक रूप से जीवित प्राणियों के चित्रण की मनाही करते थे। इसका कारण यह है कि ऐसा करने से यह प्रतीत होता है कि कलाकार ‘रचना’ की शक्ति को अपने हाथ में लेने का प्रयास कर रहा है। यह एक ऐसा कार्य था जो केवल ईश्वर ही कर सकता था।
शरियत में परिवर्तन : परंतु समय के साथ-साथ शरियत की व्याख्याएँ भी बदल गई। विभिन्न सामाजिक समूहों ने इस्लामी परंपरा की अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की। प्रायः प्रत्येक समूह ने इस परंपरा की ऐसी व्याख्या की जो उनकी राजनीतिक आवश्यकताओं से सबसे अधिक मेल खाती थी। कई एशियाई शासकों ने अपने तथा अपने राज्य के जीवन के दृश्य चित्रित करने के लिए नियमित रूप से कलाकारों को नियुक्त किया। उदाहरण के लिए ईरान के सफावी राजाओं ने अपने दरबार की कार्यशालाओं में प्रशिक्षित कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया। बिहजाद जैसे चित्रकारों ने सफावी दरबार की सांस्कृतिक प्रसिद्धि को चारों ओर फैलाने में अत्यधिक योगदान दिया। मुगल काल में ईरानी कलाकार भारत में भी आए। कुछ को मुगल दरबार में लाया गया। उदाहरण के लिए मीर सैय्यद अली और अब्दुस समद बादशाह हुमायूँ के साथ दिल्ली आए। कुछ अन्य कलाकार संरक्षण तथा प्रतिष्ठा पाने के लिए भारत पहुँचे परंतु बादशाह और रूढ़िवादी मुस्लिम परंपराओं के प्रवक्ताओं के बीच जीवधारियों के चित्र बनाने पर मुगल दरबार में तनाव जारी रहा। इस संबंध में अकबर का दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल कहता है, “कई लोग ऐसे हैं जो चित्रकला से घृणा करते हैं परंतु मैं ऐसे व्यक्तियों को नापसंद करता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि कलाकार के पास खुदा की रचना को जीवन नहीं दे सकता।”

प्रश्न 2. अकबर अथवा मुगलों के केंद्रीय प्रशासन के ढाँचे का वर्णन करो।

अथवा

मुगल साम्राज्य की केन्द्रीय और प्रांतीय प्रशासन व्यवस्था की परख कीजिए।
उत्तर : अकबर एक उच्च कोटि का प्रशासक था। उसने केंद्र का अधिक-से-अधिक मजबूत बनाने का प्रयास किया। उसके द्वारा प्रचलित शासन-प्रणाली पूरे मुगलकाल में जारी रही। संक्षेप में, अकबर तथा मुगलों के केंद्रीय प्रशासन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन निम्न प्रकार है
1.सम्राट् : अकबर के काल में सम्राट् शासन का केंद्र बिंदु था। शासन की सारी शक्तियाँ उसी के हाथ में थीं। उसकी शक्तियों पर किसी प्रकार की कोई रोक नहीं थी। फिर भी सम्राट् अन्यायी तथा अत्याचारी तानाशाह के रूप में कार्य नहीं करता था। मुल्लाओं और मौलवियों का भी उस पर कोई प्रभाव नहीं था। वह अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि समझता था।
2.मंत्रिपरिषद् : शासन-कार्यों में सम्राट् की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था थी। मंत्रियों के अधिकार आज के मंत्रियों को भौँति अधिक विस्तृत नहीं थे वे सम्राट् की आज्ञानुसार काम करते थे। अत: उन्हें सम्राट् का सचिव कहना अधिक उचित है। प्रधानमंत्री का पद अन्य मंत्रियों से ऊँचा था। सभी गंभीर विषयों पर सम्राट् उससे सलाह लेता था। सभी मंत्री सम्राट् के प्रति उत्तरदायी थे। वे अपने पद पर उसी समय तक कार्य कर सकते थे जब तक सम्राट् उनसे प्रसन्न रहता था।
प्रमुख मंत्रियों तथा उनके विभागों का वर्णन इस प्रकार है : (i) वकील या वज़ीर : वह प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करता था। वह सम्राट् को प्रत्येक विषय में परामर्श देता था।
(ii) दीवान : वह आय-व्यय का हिसाब किताब रखता था। उसके हस्ताक्षर के बिना किसी रकम का भुगतान संभव नहीं था।
(iii) मीर बख्शी : उसका कार्य सैनिक तथा असैनिक कर्मचारियों को वेतन देना था।
(iv) मुख्य सदर : धर्म संबंधी सभी कार्य संपन्न करना उसका मुख्य कर्तव्य था।
(v) खान-ए-सामां : वह सम्राट् और उसके परिवार के लिए आवश्यक सामान की व्यवस्था करता था।
(vi) मुख्य काज़ी : मुख्य काज़ी न्याय संबंधी कार्य संपन्न करता था। सम्राट् के बाद वही सबसे बड़ा न्यायाधीश था।
(vii) अन्य मंत्री : उपर्युक्त मंत्रियों के अतिरिक्त जंगलों की प्रबंध, डाक कार्यों, तोपखाने के प्रबंध आदि के लिए अलग मंत्री होते थे। तोपखाने के मुखिया को मीर आतिश के नाम से पुकार जाता था।

प्रश्न 3.शेरशाह और हुमायूँ के बीच के संघर्ष का वर्णन कीजिए तथा हुमायूँ की असफलता के कारणों पर प्रकाश डालिए।

अथवा

हुमायूँ की असफलता के मुख्य कारण क्या थे ?

अथवा

हुमायूँ और शेरशाह के बीच संघर्ष का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। हुमायूँ की असफलता के क्या कारण थे ?
उत्तर : 1. अफगानों की शक्ति का गलत अनुमान(Wrong Assessment of the Afghan Power) : हुमायूँ ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि अफगान संगठित होकर उसके लिए चुनौती बन सकते थे। जैसे ही शेरशाह जैसा योग्य तथा वीर नेता जब अफगानों को मिला, वे सभी उसके झंडे के नीचे इकट्ठे हो गये परन्तु हुमायूँ ने यह जानने का प्रयास कभी नहीं किया कि यह संगठन किसके विरुद्ध हो रहा था। वह उसकी भयंकर भूल थी।
2.विलासिता में डूबा हुमायूँ (Luxurious Humanyun): हुमायूँ शराब और अफीम का दीवाना था। सुरा-सुन्दरी के अलावा मे देश की राजनीतिक, प्रशासनिक अथवा धार्मिक दशा जानने में रुचि न थी। लेनपूल (Lanepoole) के शब्दों में, “Humanynms end of piece with his character. If there was a possibility of falling, Humanyun was not the man to miss. He tumbled through and he tumbed out of it.”
3.शेरशाह की सैनिक योग्यता (Military Ability of Shershah) : शेरशाह का अपने सैनिकों पर पूरा नियंत्रण था, परंतु हुमायूँ के सैनिक षड्यंत्रकारियों से मिलते रहते थे। उसमें बुद्धि-तत्परता का अभाव था अर्थात् वह एकाएक मुसीबत पड़ने पर घबरा जाता था। वह सामयिक निर्णय नहीं ले पाता था जबकि शेरशाह चुस्त-दुरुस्त था। उसकी कूटनीतिक चालों के आगे हुमायूँ नहीं ठहर सकता था। वह समय को देखकर काम करता था। वह साम, दाम, दंड, भेद नीतियों का प्रयोग करता था।
4.विश्वासघाती भाई (7hreascherous Brothers) : हुमायूँ के भाइयों ने कभी बुरे समय में उसका साथ नहीं दिया। अफगानों के विरुद्ध उसकी सहायता करने के बजाय वे उसे बन्दी बनाने या जान से मार डालने के चक्कर में पड़ गये। कामरान ने अपनी सेना को अफगानों के विरुद्ध भेजने से इंकार कर दिया था। हिन्दाल ने जब हुमायूँ को जंगल में भटकता हुआ पाया तो उसने तुरन्त आगरा में अपने आपको स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। अपना साम्राज्य खोकर हुमायूँ जंगलों और रेगिस्तानों में मारा-मारा भटकता रहा और अपने नवजात पुत्र के जीवन की रक्षा के लिए प्रयास करता रहा।
5.हुमायूँ के अधिकारियों द्वारा धोखा (Cheating by his officials) : उसके अधिकारियों ने भी बुरे दिन देखकर उसका साथ छोड़ दिया। हिन्दूबेग नामक अधिकारी ने शेरशाह से घूस स्वीकार कर ली और हुमायूँ को शेरशाह के विषय में गलत जानकारी दी। शेखअली भी शेरशाह से घूस लेकर हुमायूँ की कमजोरियों, उसके प्रति उसके भाइयों का रवैया आदि कई बातें बता आया। इन मक्कार अधिकारियों के विश्वासघात के कारण ही हुमायूँ को सही जानकारी न मिल सकी और ये अधिकारी घुन की तरह उसके साम्राज्य को अन्दर से खोखला करते रहे।
6.हुमायूँ की सैनिक भूलें (Humayuan’s Military Fanus) : हुमायूँ भूल जाता था कि वह शेरशाह के बराबर सैनिक योग्यता नहीं रखता । यही कारण है कि उसने कन्नौज में शेरशाह पर एकाएक हमला कर दिया। अतः उसको हार का मुंह देखना पड़ा।

प्रश्न 4. “शेरशाह सूरी एक महान प्रशासक था” इस कथन की पुष्टि करिए।

अथवा

शेरशाह के प्रशासनिक सुधारों का विवेचन कीजिए।

अथवा

शेरशाह के प्रशासनिक सुधारों का वर्णन कीजिए। वाणिज्य और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उसने क्या उपाय किए ?
उत्तर : “यदि शेरशाह कुछ काल और जीता रहता या उसके उत्तराधिकारी उसके समान योग्य होते तो महान् मुगल पुनः भारतीय इतिहास के रंगमंच पर नहीं आ सकते थे।”
शासन प्रबंध को जानने के लिए निम्न तथ्यों का शेरशाह अध्ययन आवश्यक है :
1.केन्द्रीय शासन (Central Administration) : राज्य की समस्त शक्तियाँ शासक के हाथों में होती थीं । राज्य के काम को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसको भिन्न-भिन्न भागों में बाँट दिया गया था। प्रत्येक विभाग का काम एक मंत्री के हाथ में होता था जिसकी सहायता के लिए कर्मचारी होते थे। मंत्री और अधिकारी पूर्णतः राजा के अधीन होते थे। शेरशाह स्वयं हर विभाग का काम देखता था।
2.प्रांतीय शासन (Provincial Administration) : शेरशाह ने अपने राज्य को 47 सरकारों (प्रांतों) में बाँट रखा था। ‘सरकार’ का मुख्य अधिकारी शिकदार कहलाता था। प्रत्येक सरकार कई परगनों में बँटी होती थी। परगने भी कई छोटी-छोटी इकाइयों में बँटे हुए थे जिनका प्रबंध पंचायतें करती थीं। समय-समय पर अधिकारियों का स्थानान्तरण कर दिया जाता था जिससे कि वे अपने क्षेत्र में अपने प्रभाव का अनुचित लाभ न उठा सकें और जनता को परेशान न कर सकें। घूस लेने वाले और अयोग्य अधिकारियों के साथ कठोरता का व्यवहार किया जाता था।
3.भूमि सुधार (Land Reforms) : शेरशाह ने सारी कृषि भूमि की नाप करवाकर, किसानों से लगान उपज का 1/3 भाग लिया। उसने रैयतवाड़ी व्यवस्था को लागू करवाया। किसान लगान नकद या अनाज के रूप में दे सकते थे। दैवी विपत्ति के समय किसानों को आर्थिक सहायता दी जाती थी। जब कभी सेना के संचालन से खेती को हानि पहुँचती थी तो राज्य उसका हर्जाना देता था।
4.सैनिक सुधार (Military Reforms) : शेरशाह स्वयं सैनिकों की भर्ती करता था तथा उन्हें राज्य के प्रति निष्ठा की शपथ दिलवाता था। उसने सैनिकों का हुलिया (चेहरा) लिखने और घोड़े दागने की प्रथा चलाई जिससे कि युद्ध के समय अयोग्य और निकम्मे सैनिक और खराब नस्ल के घोड़े न प्रवेश पा सके। वह सैनिकों को नकद वेतन देता था। उसकी सेना में 25,000 पैदल, डेढ़ लाख घुड़सवार तथा पाँच सौ हाथी थे।
5.न्याय और पुलिस व्यवस्था (Justice and police system): वह बिना जाति, धर्म’ वर्ण या वर्ग भेद के न्याय करता था। दंड व्यवस्था कठोर थी। दण्ड देने में वह अपने पुत्र को भी नहीं छोड़ता था। चोरी, डाका, घूस आदि के अपराध में फाँसी दे दी जाती थी। यदि किसी पुलिस अधिकारी के क्षेत्र में चोरी हो जाती थी तो आठ दिनों में उसे चोरी का पता लगाना पड़ता था अन्यथा उसे स्वयं हर्जाना देना पड़ता था। इससे भी अपराध कम हो गये क्योंकि पुलिस किसी तरह के अपराधी को पनपने का मौका नहीं देती थी।
6.जासूसी व्यवस्था (Spy System) : विद्रोहियों, षड्यंत्रकारियों आदि का पता लगाना अब आसान हो गया था। सारे राज्य में जासूसों का जाल फैला हुआ था।
7.सड़कें (Rouds) : देश की अर्थव्यवस्था, सैनिकों की गतिविधियों, यात्रियों और व्यापारियों की सुविधा के लिए बड़ी-बड़ी सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाये गये तथा सराएँ भी बनवाई गईं। उसने चार प्रसिद्ध सड़कें बनवाई जिनमें से ग्रांड ट्रंक रोड आज भी कलकत्ता (कोलकात्ता) से पेशावर तक जाती है।
8.डाक व्यवस्था (Postal System) : प्रत्येक सराय पर दो घुड़सवार होते थे जो डाक लाने और ले जाने का प्रबन्ध करते थे। इसे ‘डाक चौकी’ कहा जाता था, जो आजकल के डाक घर जैसे थे। इससे समाचार एक स्थान से दूसरे स्थान पर आ जा सकते थे।
9.मुद्रा सुधार और सार्वजनिक हित के काम (Coin Reform and Work of General Welfare) :और चाँदी के सिक्के चलाये। इससे आंतरिक और बाह्य व्यापार में सुविधा हो गई।
“शेरशाह और अकबर में पहले के किसी भी शासक से कानून-निर्माण और प्रजा की भलाई की भावना अधिक थी। ”

प्रश्न 5. भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक एकीकरण के क्षेत्र में अकबर के योगदान की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1. भारत से पूर्ण समन्वय (Complete Indentification with India) : अकबर पहला मुगल बादशाह था जिसने मूलत: विदेशी होते हुए भी भारतीय परम्पराओं को अपनाया। वह बाबर और हुमायूँ की तरह तुर्किस्तान के प्रशंसकों में से नहीं था।
“इतिहास का संबंध, जो कोई शासन करना चाहता है, उससे न होकर जो किसी शासक ने वास्तविक रूप में किया होता है, उससे (अर्थात् स्वयं व्यक्ति से) होता है। इसलिए अकबर पूर्ण रूप से राष्ट्रीय भावनाओं से प्रेरित था। उन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर भारत के हर क्षेत्र जैसे-राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक में अकबर ने एकरूपता लाने का प्रयत्न किया।”
2.राजनीतिक एकता (Political Unity) : अपने वैवाहिक संबंधों, विजयों तथा कूटनीतिक संबंधों से उत्तरी और दक्षिणी भारत को एक शासक (अकबर) के अधीन लाकर, सब प्रांतों में एक जैसे अधिकारी, न्याय व्यवस्था, भूमि- कर, सिक्के तथा माप-कीर चलाकर देश में राजनैतिक और प्रशासनिक एकता लाने का प्रयास किया जबकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
3.सांस्कृतिक एकता (Cultural Unity) : अकबर ने फारसी को तो राष्ट्रीय भाषा का स्थान दिया ही साथ ही हिटी ो संस्कृत, अरबी. तुर्की, यूनानी आदि भाषाओं के प्रमुख ग्रंथों का फारसी में अनुवाद कराकर, मुसलमानों के मदरसों में हिंदू बच्च की शिक्षा का प्रबंध करवाकर तथा हिंदू पाठशालाओं को राजकीय सहायता देकर उदारता का परिचय दिया। साथ ही उसने सांस्कृतिक सह-अस्तित्व का भी प्रदर्शन किया। उसने ललित कलाओं, भवन ई निर्माण कला, चित्रकला, संगीत, नृत्य आदि की शैलियों के मिलाप में सहयोग दिया। अकबर द्वारा संस्कृत और हिंदी को प्रोत्साहन देना भी भारतीय संस्कृति के विकास की ओर महत्वपूर्ण कदम था।
4.सामाजिक एकता (Social Unity) : हिंदू-मुस्लिम विवाह, होली, दशहरा, दीपावाली आदि त्यौहार मनाकर योग्यतानुसार हिंदुओं को ऊँचे पद देकर, अकबर ने सिद्ध कर दिया कि वह मानव-मानव के बीच भेदभाव नहीं मानता। 44 अकबर हिंदुओं तथा मुसलमानों में एकता स्थापित करने और राष्ट्रीय भावना को विकसित करने का प्रयास करने वाला प्रथम मुस्लिम सम्राट था।”
5.धार्मिक एकता (Religious Uniformity) : अकबर ने सभी धर्मों को अपने-अपने ढंग से पूजा- अर्चना करने की पूरी छूट दे रखी थी। इसीलिए उसने सभी धर्मों की अच्छी बातें लेकर एक नया धर्म चलाया, जिसे दीन-ए-इलाही के नाम से जाना जाता है परंतु अकबर ने कभी भी किसी से यह नहीं कहा कि वह इस धर्म को ग्रहण कर ले। यही कारण है कि इस धर्म के अनुयायियों की संख्या केवल 18 ही थी। उसने जजिया कर तथा तीर्थकर हटाकर बहुसंख्यक हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं का प्रशंसीय सम्मान किया। उसके द्वारा निर्मित इबादतखाना वहाँ आयोजित होने वाली धार्मिक विचार-विनिमय की गोष्ठियाँ उसकी धार्मिक एकता स्थापन की नीति का प्रतीक बन गया।
6.आर्थिक एकता (Economic Unity) देश में यातायात के साधनों को सुधार कर अच्छी सिक्का प्रणाली, माप-तोलों को अपनाकर तथा विदेशों से व्यापारिक संबंध जोड़कर अपने देश की आर्थिक दशा को सुधारा। भूमि संबंधी सुधार लाकर तथा किसानों को उपज के लिए प्रोत्साहित करके देश को समृद्धि के मार्ग पर लाकर खड़ा कर दिया था।

प्रश्न 6. उत्तर भारत के राजनीतिक एकीकरण में अकबर के योगदान का वर्णन करें।

अथवा

अकबर किन उद्देश्यों से दक्षिण गया ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर : जब 1556 ई. में अकबर गद्दी पर बैठा तो चारों ओर राजनीतिक अस्थिरता, अशांति, अराजकता और विद्रोहों का बोलबाला था। मुहम्मद आदिलशाह और इब्राहीम सूर सत्ता हथियाने के लिए दॉव-पंच लड़ा रहे थे। मिर्जा हकीम जो अकबर का सौतेला भाई था, काबुल का शासक बन बैठा। सुलेमान मिर्जा, जो अकबर का चचेरा भाई था, वह भी षड्यंत्रकारियों से मिल कर इसके विरूद्ध जाल बुन रहा था। राजस्थान, मालवा, गुजरात, आदि राज्य पहले ही अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर चुके थे। आदिलशाह का मंत्री हेमू दिल्ली और आगरा पर विजय पा चुका ऐसे कठिन समय में अकबर के संघरक्षक बैरम खाँ ने उसकी सहायता की। अकबर की प्रमुख विजयें निम्नलिखित थीं
1.दिल्ली और आगरा की विजय (Conquest of Delhi and Agra) : अकबर ने सर्वप्रथम पानीपत के मैदान में 1556 ई. में आदिलशाह के मंत्री हेमू को हराया। यह पानीपत की दूसरी लड़ाई थी।
इस युद्ध में अकबर के भाग्य ने उसका साथ दिया क्योंकि हेमू की विशाल सेना के सामने मुगल सेना नहीं टिक पाती। इतिहासकार बदायूँनी लिखता है, “हेमू ने एक ही हमले में अकबर की पूरी सेना को तितर-बितर कर दिया। जब घमासान युद्ध चल रहा था, तो एक तीर आकर हेमू की आँख में लगा और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। उसे युद्ध स्थल में न देखकर उसकी सेना में भगदड़ मच गई। स्थिति को बदलता देख मुगल सेना हेमू की सेना पर टूट पड़ी। हेमू को बंदी बना लिया गया और बाद में उसे मार डाला गया। दिल्ली और आगरा पर अधिकार होने के बाद मुगल साम्राज्य की नींव का पत्थर फिर से मजबूत होता चला गया।
2.ग्वालियर, जौनपुर और अजमेर विजय (Conquests of Gwalior, Jaunpur and Ajmer) : अकबर ने 1556-60 ई. के बीच ग्वालियर, जौनपुर तथा अजमेर को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
3.मालवा विजय (Conquest of Mawa) : मालवा के शासक बाज बहादुर को 1556 ई. में अकबर ने परास्त कर दिया। जब उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तो अकबर प्रसन्न हो गया और उसे एक उच्च पद देकर मालवा अपने अधीन ले लिया।
4.गोंडवाना विजय (Conquest of Gondwana) : गोंडवाना पर रानी दुर्गावती अपने अल्पवयस्क पुत्र की संरक्षिका बनकर शासन कर रही थी। राजपूत सैनिकों और मुगलों के बीच जमकर लड़ाई हुई। युद्ध में रानी और उसका पुत्र मारे गए। अत: गोंडवाना मुगलों के हाथों में आ गया।
5.चित्तौड़ विजय (Conquest of Chittor) : कई राजपूत शासकों ने अकबर की सत्ता को स्वीकार कर लिया तथा उसके साथ बेटी-रोटी का रिश्ता भी जोड़ लिया, परंतु मेवाड़ के स्वाभिमानी महाराणा प्रताप ने अकबर की सत्ता स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। अतः अकबर ने स्वयं सेना का नेतृत्व करके मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को जीत लिया।
6.रणथम्भौर और कालिंजर की विजय (Conqursr of Ranthambore and Kalinejan): 1569 ई. में अकबर ने रणथम्भौर के किले को जीत लिया। कालिंजर के शासक ने भी अकबर की सत्ता स्वीकार कर ली। इसके अलावा जोधपुर, बीकानेर आदि कई रियासतें अकबर की अधीनता स्वीकार करती जा रही थीं।
7.गुजरात विजय (Conquest of Gujarat) : 1572 ई. में गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह को अकबर ने हरा दिया। ‘फतेहपुर सीकरी’ का नाम अकबर ने इसी विजय की खुशी में रखा था। उसका मुख्य द्वार ‘बुलन्द दरवाजा’ के नाम से बनवाया गया। उस समय अकबर के साम्राज्य की राजधानी फतेहपुर सीकरी थी।
8.बिहार और बंगाल विजय (Conquest of Bihar and Bengal): सुलेमान कहानी जो बिहार और बंगाल का शासक था, उसने अकबर की सत्ता स्वीकार कर ली थी परन्तु उसकी मृत्यु होते ही उसका पुत्र दाउद खाँ स्वतंत्र शासक बन बैठा। 1575 ई. में दाउद खाँ को हरा कर मार डाला गया। बिहार और बंगाल को मुगलों ने अपने अधीन ले लिए।
9.काबुल विजय (Conquest of Kabul) : मिर्जा मुहम्मद हकीम जो अकबर का सौतेला भाई था, उसने पंजाब पर आक्रमण कर दिया। अकबर ने उसका काबुल तक पीछा किया और उसे हरा दिया, परन्तु अकबर ने उसे अभयदान दे दिया। 1575 ई. में मिर्जा हकीम की मृत्यु के बाद काबुल अकबर ने अपने राज्य में मिला लिया। काबुल के विद्रोहियों को दबाते हुए बीरबल मारा गया। इससे अकबर को गहरा आघात लगा।
10.कश्मीर, सिंध और कंधार विजय (Conquest of Kashmir, Sindh and Kandhar) : अकबर ने 1586 ई. में कश्मीर, 1591 ई. में सिन्ध और 1595 ई. में कन्धार पर विजय पताका फहरा दी।
11.दक्षिण भारत की विजयें (Conquest of Deccan): 1600 ई. में अकबर ने दक्षिण विजय के लिए शाहजादा मुराद और खान-ए-खाना रहीम को भेजा। अहमदनगर के शासक निजामशाह को बन्दी बना लिया गया और उसके राज्य को मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
1601 ई. में अकबर ने खानदेश के शासक मिर्जा बहादुरशाह को हरा दिया।
साम्राज्य विस्तार (Expansion of Empire) : अकबर का साम्राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में गोदावरी तक फैला हुआ था। अकबर का विशाल साम्राज्य 15 प्रान्तों में बँटा हुआ था।

प्रश्न 7. अकबर की उपलब्धियाँ एवं महानता का वर्णन कीजिए।
उत्तर : अकबर भारत के महानतम् सम्राटों में से एक था और अपने युग अर्थात् मुगलकालीन मध्यकालीन भारत का तो वह सबसे महान् शासक था। एक व्यक्ति, सेनानायक तथा शासक रूप में उसका मूल्यांकन इस प्रकार किया जा सकता है के

1.आदर्श व्यक्ति (Ideal Person) : उसका व्यक्तित्व असाधारण था। वह एक आदर्श व्यक्ति था। वह बड़ा दयालु था और उसे मानव मात्र से बड़ा लगाव था। वह अनपढ़ था लेकिन उसका साहित्य से अनुराग था। उसके दरबार में अनेक विद्वान आश्रय पाते थे। वह सुन्नी मुसलमान था लेकिन उसके धार्मिक विचार उदार थे। वह मानवता की सेवा को ही ईश्वर की आराधना मानता था।

2.सेनानायक तथा कूटनीतिज्ञ (Good Commander and Diplomat) : अकबर एक वीर सैनिक और योग्य सेनानायक था। वह अपने युग का महान विजता था। उसने अपनी विजयों से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। वह एक महान् कूटनीतिज्ञ भी था। राजपूतों का सहयोग पाने और गुजरात, कश्मीर, कन्धार तथा खानदेश में उसने कूटनीति से ही सफलता पाई थी।

3.एक शासक तथा प्रशासक के रूप में (As a Ruler and Administrator): अकबर अपने युग का महान् साम्राज्यवादी और महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासक था लेकिन वह अपनी प्रजा के हित का सदा ध्यान रखता था। वह एक न्यायप्रिय, उदार एवं सहिष्णु शासक था। उसका शासन धर्म-निरपेक्ष था। उसने हिन्दू-मुसलमानों को समान अधिकार प्रदान किये। वह ललित कलाओं का उदार संरक्षक था। उसने अनेक कलाकारों को राज्याश्रय दिया था। उसके शासन काल में भवन-निर्माण कला, चित्रकला, नृत्यकला तथा संगीत आदि की बड़ी उन्नति हुई। उसने उद्यान कला तथा ललित कला को भी बढ़ावा दिया। वह साहित्य का भी संरक्षक था। उस समय के अनेक विद्वान उसके दरबार की शोभा थे।
वह एक कुशल प्रशासक था। उसने प्रशासन के सभी अंगों में सुधार किये। उसकी भूमि-कर व्यवस्था आदर्श थी। उसने सैनिक तथा असैनिक सेना का मनसबदारी में सुंदर समन्वय किया। सारे साम्राज्य में एक जैसी कानून-व्यवस्था, मुद्रा-प्रणाली, न्याय-प्रणाली, जनता की सुरक्षा और हित-चिन्तन से वह एक जनप्रिय शासक बन गया। इस प्रकार अकबर ने निष्पक्ष आर्थिक दशा सुधारने तथा लोगों की सुख-समृद्धि बढ़ाने का प्रयत्न किया। भूमि संबंधी सुधार करके किसानों की दशा में तो सुधार हुआ ही, साथ ही लोगों की सुख-समृद्धि में भी वृद्धि हुई। उसने कृषि, उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र में एक-सी व्यवस्था लागू करके आर्थिक एकता लाने का प्रयत्न किया।

प्रश्न 8. राजपूत राज्यों के प्रति अकबर की नीति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। यह नीति किस सीमा तक सफल हुई ? विवेचना कीजिए।
उत्तर : 1. समानता का व्यवहार (Equality of Status) : अकबर ने हिन्दू-मुस्लिम का भेदभाव मिटा कर दोनों को समान स्तर दिया।
2.वैवाहिक संबंध (Matrimonial Alliance) : अम्बेर के बिहारी मल की बेटी जोधाबाई से अकबर ने शादी की। उसने बीकानेर और जैसलमेर की राजकुमारियों से भी विवाह किया। सलीम का विवाह भगवानदास की पुत्री भानबाई से हुआ। इससे राजपूतों के साथ उसके सम्बन्ध और घनिष्ठ हो गये।
3.उच्च पद (High Posts) : अकबर ने राजपूतों को उनकी योग्यता के अनुसार ऊँचे पद भी दिए। भगवानदास, राजा मानसिंह, राजा टोडरमल, राजा बीरबल आदि को उच्च पद दिए गये। राजपूत सैनिक और सेनापति मुसलमानों की अपेक्षा अधिक कारगर सिद्ध हुए।
4.पराजित राजपूत शासकों के साथ अच्छा व्यवहार (Good Treatment with the Defeated Rajput Rulers): जिन राजपूतों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली या युद्ध में हार गये उन सब के साथ अकबर ने अच्छा व्यवहार किया। केवल मेवाड़ ने उसकी अधीनता नहीं मानी।
5.धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) : अकबर न हिन्दुओं को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दे रखी थी। वे अपने मन्दिरों का बनवा या मरम्मत करवा सकते थे। उन्हें मनचाही विधि से पूजा पाठ करने की अनुमति दे दी गई थी।
6.जजिया या तीर्थयात्रा कर की समाप्ति (Abolition of Juria and Pilgrimage Taxes) : जजिया और तीर्थ यात्रा का हटा कर अकबर ने हिन्दू जनता के मन को जीत लिया। उपरोक्त राजपूत नीति पूर्णतः सफल हुई और अकबर को ईमानदार, सच्चे वीर और साहसी लोग मिल गये, जिनकी सेवाएँ जनता के लिए तथा राज्य के लिए उपयोगी सिद्ध हुईं। साम्राज्य के स्थिरीकरण और विकास में लोगों ने राजपूतों को भरपूर सहयोग दिया। निःसन्देह वह मेवाड़ के महराणा प्रताप तथा उसके उत्तराधिकारी को अपना सहयोगी या मित्र नहीं बना सका।

प्रश्न 9. अकबर की राजपूत नीति के परिणाम बताइये।
उत्तर : 1. राजपूत विरोध की समाप्ति (End of opposition by Rajputs) : राजपूत, जो हिन्दुओं की वीर जाति थी, जिन्होंने सदा विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया था, वे अकबर के दादा बाबर से भयंकर संघर्ष कर चुके थे लेकिन अकबर की उदार नीति के कारण वे उसके मित्र बन गए और उन्होंने मुगल साम्राज्य का विरोध बन्द कर दिया।
2.राजपूत मुगल साम्राज्य के संरक्षक बन गए (Rajpuls become the guard of Mughal Empire) : पहले राजपूत मुसलमान शासकों तथा मुसलमानों के घोर शत्रु थे। अकबर की उदारता की नीति से वे मुगल साम्राज्य के संरक्षक बन गए। अकबर ने उन्हें सैनिक और नागरिक प्रशासन में उच्च पद प्रदान किए थे। इससे उसे अनुभवी सेनापतियों, योग्य प्रशासकों तथा कुशल राजनीतिज्ञों की सेवाएँ मिल गई।
3.मुगलों की सैनिक शक्ति बढ़ गई (Military power antereased) : राजपूतों को मित्र बनाकर अकबर ने अपनी सैनिक शक्ति बड़ा ली थी। मोरलैंड के अनुसार, “राजपूतों के सहयोग से अकबर को भारत के लगभग 50,000 सर्वोत्तम घुड़सवारों की सेवाएँ मिल गई।”
4.प्रशासन में सुधार (Administrature Reforms) : प्रशासन कार्यों में हिन्दू बहुत योग्य थे। अकबर ने उदार नीति अपनाकर हिन्दुओं, विशेषकर राजपूतों को उच्च पदों पर नियुक्त किया और उनकी योग्यता का लाभ उठाकर अनेक प्रशासनिक सुधार किए।
5.साम्राज्य विस्तार (Extension of Empire) : राजपूत वीर योद्धा थे। अकबर ने उनकी सहायता से अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
6.विद्रोही सरदारों का दमन (Rebel Sardars were enyshed) : अकबर ने राजपूतों की सहायता से अपने विद्रोही सरदारों का दमन किया।
7.हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति में एकता (Unity of Hindu Muslims Cultures) : अकबर की राजपूत नीति से हिन्दुओं और मुसलमानों में पारस्परिक सहयोग की भावना उत्पन्न हुई। इससे नई राष्ट्रीयता का जन्म हुआ और हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों का समन्वय भी हुआ।

प्रश्न 10. ‘आइन’ के अनुसार, अकबर के शासन के दौरान प्रशासन और सेना के संगठन की व्याख्या कीजिए।

आइन’ के अनुसार अकबर के शासन के दौरान प्रशासन और सेना का संगठन :
(i) आइन-ए-अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण के एक व्यापक ऐतिहासिक तथा प्रशासनिक परियोजना का परिणाम थी जिसका उत्तरदायित्व मुगल बादशाह अकबर की आज्ञा पर अबुल फ़ज़ल ने उठाया था।
(ii) आइन में अकबर की सरकार के सभी विभागों तथा सूबों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई है।
(iii) ‘ आइन’ वास्तव में पाँच भागों का संकलन है जिसके पहले तीन भाग प्रशासन की जानकारी देते हैं। पहली किताब ‘मंजिल-आबादी’ है जो शाही घर-परिवार और उसके रख-रखाव से संबंधित है। दूसरी किताब ‘सिपह-आबादी’ सैनिक व नागरिक प्रशासन तथा नौकरों की व्यवस्था के बारे में है।
(iv) आइन’ का तीसरा भाग ‘मुल्क-आबादी’ है। यह साम्राज्य तथा प्रांतों के वित्तीय मामलों और राजस्व की दरों के आँकड़ों की व्यापक जानकारी देने के बाद ‘बारह सूबों का बयान देता है।
(v) मुल्क-आबादी’ में सांख्यिकी सूचनाएँ विस्तार से दी गई हैं। इसमें सूबों तथा उनकी समस्त प्रशासनिक व वित्तीय इकाइयों जैसे-सरकार, परगना तथा महल के भौगोलिक, स्थलाकृतिक तथा आर्थिक रेखाचित्र भी सम्मिलित हैं।
(vi)’ आइन’ से हमें सूबों से नीचे इकाई सरकारों के बारे में व्यापक जानकारी मिलती है। इन सूचनाओं को तालिकाबद्ध रूप में दिया गया है। प्रत्येक तालिका में आठ खाने हैं।
(vii) तालिकाबद्ध खाने हमें निम्नलिखित सूचनाएँ प्रदान करते हैं :
1.परगनात/महल, 2. किला, 3. अराजी और जमीन-ए-पाईमूद, 4. नकदी, 5. सुयूरगल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान), 6. जमींदार, 7. और 8. जमींदारों की जातियाँ, उनके घुड़सवार, पैदल सिपाही के साथ उनकी फौज की जानकारी हासिल होती है।

प्रश्न 11. मुगलकालीन पांडुलिपियों (Manuscripts) में चित्रित आकृतियों (Painted images) के महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर : (i) चित्रित आकृतियों का महत्त्व : ‘मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकार भी शामिल थे। एक मुगल बादशाह के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ ही उन घटनाओं को चित्रों के माध्यम से दृश्य रूप में भी वर्णित किया जाता था। जब किसी पुस्तक में घटनाओं अथवा विषयों को दृश्य रूप में व्यक्त किया जाना होता था तो सुलेखक उसके आसपास के पृष्ठों को खाली छोड़ देते थे। चित्रकार शब्दों में वर्णित विषय को अलग से चित्र रूप से उतारकर वहाँ संलग्न कर देते थे। ये लघुचित्र होते थे जिन्हें पांडुलिपि के पृष्ठों पर आसानी से लगाया और देखा जा सकता था।
(ii) चित्रों का योगदान : चित्रों को न केवल किसी पुस्तक के सौंदर्य को बढ़ावा देने वाला बल्कि उन्हें तो लिखित माध्यम से राजा और राजा की शक्ति के विषय में जो बात कही न जा सकी हो, ऐसे विचारों के संप्रेषण का भी एक सशक्त माध्यम माना जाता था। इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने चित्रकारी का एक ‘जादुई कला’ के रूप में वर्णन किया है। उसकी राय में यह कला किसी निर्जीव वस्तु को भी इस रूप में प्रस्तुत कर सकती है कि जैसे उसमें जीवन हो।

प्रश्न 12, जलालुद्दीन अकबर को सभी मुगल सम्राटों में महानतम क्यों माना जाता है ? उसके साम्राज्य विस्तार तथा प्रशासन के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।

जलालुद्दीन अकबर ( 1556-1605) के अंतर्गत मुगल साम्राज्य का न केवल विस्तार ही हुआ अपितु इसे सुदृढ़ भी बनाया। संक्षेप में वर्णन कीजिए। [C. B.S. E. 2011 Delhi]
उत्तर : I. जलालुद्दीन अकबर (Jalaluddin Akbar) : कई लोग जलालुद्दीन अकबर (1556-1605) को मुगल बादशाहों में महानतम मानते हैं क्योंकि उसने न केवल अपने साम्राज्य का विस्तार ही किया बल्कि इसे अपने समय का विशालतम, दृढतम और सबसे समृद्ध राज्य बनाकर सुदृढ़ भी किया। अकबर हिंदुकश पर्वत तक अपने साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार में सफल हुआ और उसने ईरान के सफावियों और तुरान (मध्य एशिया) के उजबेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर लगाम लगाए रखी।
II. एक आदर्श राज्य का वास्तविक संस्थापक:
(क) एक दैवीय प्रकाश (A Divine Light) : दरबारी इतिहासकारों के कई साक्ष्यों का हवाला देते हुए दिखाया कि मुगल राजाओं को सीधे ईश्वर से शक्ति मिली थी।
(ख) सुलह-ए-कुल : एकीकरण का एक स्रोत (Suleh i-kul: A Source of integration) : अबुल फज्ल सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला बताता है। सुलह-ए-कुल में यूँ तो सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी किंतु उसकी एक शर्त थी कि वे राज्य-सत्ता को क्षति नहीं पहुँचाएँगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे। सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य नीतियों के जरिए लागू किया गया।
अकबर ने 1563 में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जजिया को समाप्त कर दिया क्योंकि ये दोनों कर धार्मिक पक्षपात पर आधारित थे। साम्राज्य के अधिकारों को प्रशासन में सुलह-ए-कुल के नियम का अनुपालन करने के लिए निर्देश दे दिए गए।
(ग) सामाजिक अनुबंध के रूप में न्यायपूर्ण प्रभुसत्ता (Sovereignty ful of justice in a for social contract): अबुल फ़ज़ल ने प्रभुसत्ता को एक सामाजिक अनुबंध के रूप में परिभाषित किया है। वह कहता है कि बादशाह अपनी प्रजा के चार सत्त्वों की रक्षा करता है-जीवन (जन), धन (माल), सम्मान (नामस) और विश्वास (दीन) और इसके बदले में वह आज्ञापालन तथा संसाधनों में हिस्से की माँग करता है। केवल न्यायपूर्ण संप्रभु ही शक्ति और दैवीय मार्गदर्शन के साथ इस अनुबंध का सम्मान कर पाते थे।
III. अकबर द्वारा साम्राज्य विस्तार : अकबर की प्रमुख विजयें निम्नलिखित थीं :
(i) दिल्ली और आगरा की विजय (Conquest of Delhi and Agra) : अकबर ने सर्वप्रथम पानीपत के मैदान में 1556 ई. में आदिलशाह के मंत्री हेमू को हराया। दिल्ली और आगरा पर अधिकार होने के बाद मुगल साम्राज्य की नींव का पत्थर फिर से मजबूत होता चला गया।
(ii) ग्वालियर, जौनपुर और अजमेर विजय (Conquests of Gwalior, Jaunpur and Ajmer) : 556-60 के बीच ग्वालियर, जौनपुर तथा अजमेर को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
(iii) मालवा विजय (Conquest of Malwa) : मालवा के शासक बाज बहादुर को 1556 ई. में अकबर ने परास्त कर दिया।
(iv) गोंडवाना विजय (Conquest of Gondwana): गोंडवाना पर रानी दुर्गावती अपने अल्पवयस्क पुत्र की संरक्षिका बनकर शासन कर रही थी। राजपूत सैनिकों और मुगलों के बीच जमकर लड़ाई हुई। युद्ध में रानी और उसका पुत्र मारे गए। अनः गोंडवाना मुगलों की हाथों में आ गया।
(v) चित्तौड़ विजय (Congquest to Chitror) : मेवाड़ के स्वाभिमान महाराणा प्रताप ने अकबर की सत्ता स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। अत: अकबर ने स्वयं सेना का नेतृत्व कर मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को जीत लिया।
(vi) रणथम्भौर और कालिंजर की विजय (Congrucost of Ranthamvor and Kalinejar) : 1569 ई. में अकबर ने रणथम्भौर के किले को जीत लिया। कालिंजर के शासक ने भी अकबर की सत्ता स्वीकार कर ली। इसके अलावा जोधपुर बीकानेर आदि कई रियासतें अकबर की अधीनता स्वीकार करती जा रही थीं।
(vii) गुजरात विजय (Conquest of Gujarat) : 1572 ई में गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह को अकबर ने हरा दिया।
(viii) बिहार और बंगाल विजय (Conquest of Bihar and Bengal) : सुलेमान करानी जो बिहार और बंगाल का शासक था, उसने अकबर की सत्ता स्वीकार कर ली थी परंतु उसकी मृत्यु होते ही उसका पुत्र दाउद खाँ स्वतंत्र शासक बन बैठा। 1575 ई. में दाउद खाँ को हरा कर मार डाला गया। बिहार और बंगाल को मुगलों ने अपने अधीन ले लिए।
(ix) काबुल विजय (Conquest of Kabul) : 1575 ई. में मिर्जा हकीम की मृत्यु के बाद काबुल अकबर ने अपने राज्य में मिला लिया।
(x) कश्मीर, सिंध और कंधार विजय (Conquest of Kashmir, Sindh and Kandhar) : अकबर ने 1586 ई. में कश्मीर, 1591 ई. में सिंध और 1595 ई. में कंधार पर विजय पताका फहरा दी।
(xi) दक्षिण भारत की विजयें (Conguest of Deccan): 1600 ई. में अकबर ने दक्षिण विजय के लिए शाहजादा मुराद और खान-ए-खाना रहीम को भेजा। अहमदनगर के शासक निजामशाह को बंदी बना लिया गया और उसके राज्य को मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। 1601 ई. में अकबर ने खानदेश के शासक मिर्जा बहादुरशाह को हरा दिया।
साम्राज्य विस्तार (Expansion of Empire) : अकबर का साम्राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में गोदावरी तक फैला हुआ था। अकबर का विशाल साम्राज्य 15 प्रांतों में बँटा हुआ था।
IV. अकबर का प्रशासन :
1.अकबर अपने युग का महान साम्राज्यवादी और महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासक था लेकिन वह अपनी प्रजा के हित का सदा ध्यान रखता था। वह एक न्याय-प्रिय, उदार एवं सहिष्णु शासक था। उसका शासन धर्म-निरपेक्ष था। उसने हिंदू-मुसलमानों को समान अधिकार प्रदान किये। वह ललित कलाओं का उदार संरक्षक था। उसने अनेक कलाकारों को राज्याश्रय दिया था। उसके शासन काल में भवन-निर्माण कला, चित्र कला तथा संगीत आदि की बड़ी उन्नति हुई। उसने उद्यान कला तथा ललित कला को भी बढ़ावा दिया। वह साहित्य का भी संरक्षक था। उस समय के अनेक विद्वान् उसके दरबार की शोभा थे।
2.वह एक कुशल प्रशासक था। उसने प्रशासन के सभी अंगों में सुधार किये। उसकी भूमि-कर व्यवस्था आदर्श थी। उसने सैनिक तथा असैनिक सेना का मनसबदारी में सुंदर समन्वय किया। सारे साम्राज्य में एक जैसी कानून-व्यवस्था, मुद्रा-प्रणाली, न्याय-प्रणाली, जनता की सुरक्षा और हित-चिंतन से वह एक जनप्रिय शासक बन गया। इस प्रकार अकबर ने निष्पक्ष आर्थिक दशा सुधारने तथा लोगों की सुख-समृद्धि बढ़ाने का प्रयत्न किया। भूमि संबंधी सुधार करके किसानों की दशा में तो सुधार हुआ ही साथ ही लोगों की सुख-समृद्धि में भी वृद्धि हुई लेकिन उसने कृषि, उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र में एक-सी व्यवस्था लागू करके आर्थिक एकता लाने का प्रयत्न किया।

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