What did printing culture help in the development of nationalism in India? || मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की ?

मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की ?

उत्तर:- 
  • मुद्रण अर्थात् आधुनिक प्रेस ने भारत जो विभिन्न समुदायों का निवास स्थल है और जहाँ देश के विभिन्न भागों में विभिन्न संस्कृतियों, भाषा, बोलियों, धर्मों के लोग रहते हैं, उन्हें परस्पर जोड़ने या यूं कहें कि उनमें राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने में बहुत बड़ा योगदान दिया। 
  • राष्ट्रवाद वस्तुतः वह राजनैतिक विचारधारा है जो अदृष्ट रूप से एक राज्यक्षेत्र में निवास करने वाले, भाषा-सामंजस्य वाले, समान आचार-विचार वाले और अनुकूलित सह-जीवन को समझने वाले नागरिकों को अखंड-एकता की डोर से बाँधे रहती है। ‘हमें अपने राष्ट्र के गौरव का ज्ञान है’-जैसी धारणा भौगोलिक परिवेश, पर्यावरण एवं सभी तरह के पारिस्थितिक तंत्र या व्यवस्था में एकात्मता का दर्शन कराती है और इस चेतना को धारण करने वाले लोगों से धर्म-सहिष्णु एवं सर्वजन-हितैषी कृत्य संपन्न करवाती है।
  • भारत में मुद्रण संस्कृति को लाने का श्रेय यहूदी पादरियों (पुर्तगाल निवासी) को जाता है क्योंकि 1674 में लगभग 50 पुस्तकें कन्नड़ और कोंकणी भाषा में छपी थीं। ‘गीत गोविंद’ (जयदेव) और ‘हाफिज का दीवान’ भोज पत्र पर 1824 केआस-पास सुलेखन में लिखे गए पहले ग्रंथ हैं। इसके पश्चात् आने वाले मुद्रण संस्कृति के सभी रूपों यथा-समाचार पत्र-पत्रिकाएँ, उपन्यास, कथा साहित्य, गल्प साहित्य, वीरगाथा ग्रंथ इत्यादि ने भारतीयों को परस्पर भेद-भाव से दूर रह कर राष्ट्र-राज्य बनाने के लिए प्रेरित किया। बार-बार आम लोगों के सामने आकर इन मुद्रित शब्दों में छिपे स्वतंत्रता के विचार ने ही उन्हें असहयोग, सविनय अवज्ञा आदि आंदोलन चलाने की प्रेरणा दी।
  • भारत माता को राष्ट्रदेवी या राष्ट्रमाता के रूप में चित्रित करके तत्कालीन चित्रकारों ने अंग्रेजों के अत्याचार को माता की अस्मिता पर होने वाले आक्रमण जितना घृणित और जघन्य समझने की आम-चेतना जगाई और मातृ-रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने की तत्परता को जन-गण में देह, मन और आत्मा के स्तर पर एकीकृत कर दिया। फाँसी से कुछ क्षण पूर्व शहीदों का ‘वंदे मातरम’ का आलाप करना मुद्रण संस्कृति के द्वारा सृजित चेतना का ही चमत्कार था।

What did printing culture help in the development of nationalism in India?

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Answer:-
  • Printing means that modern press has made India, which is the abode of different communities and where people of different cultures, languages, dialects, religions reside in different parts of the country, interlinking them or say a very big contribution in creating a sense of nationalism in them. gave. 
  • Rashtravad is essentially a political ideology that binds citizens living in a territory, language-cohesive, like-minded and adapted co-living, to a sense of unbroken unity. ‘We have knowledge of the pride of our nation’ -like perception, showing a unity in the geographical environment, environment and all kinds of ecosystems or systems, and performing religious-tolerant and public-friendly acts to the people holding this consciousness. is.
  • The credit for bringing the printing culture to India goes to the Jewish clergy (Portuguese residents) because in 1674 about 50 books were printed in Kannada and Konkani languages. ‘Geet Govind’ (Jayadeva) and ‘Hafiz Ka Diwan’ are the first texts written in 1824 Keas-pas calligraphy on the banquet. After this, all forms of printing culture such as newspapers, magazines, novels, fiction, fiction literature, Virgatha texts etc. inspired Indians to stay away from mutual discrimination and create a nation-state. The idea of ​​freedom hidden in these printed words repeatedly in front of the common people inspired them to run the movement of non-cooperation, civil disobedience etc.
  • By portraying Bharat Mata as Rashtra Devi or Rashtramata, the then painters raised the common consciousness of the British atrocity as disgusting and heinous as the attack on Mother’s identity and the readiness to do so for public protection. I am integrated at the level of body, mind and soul. A few moments before the gallows, the martyrs’ chanting of ‘Vande Mataram’ was a miracle of consciousness created by the printing culture.

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